ब्रेकिंग न्यूज़ 

‘अहम’और ‘अहंकार’

‘अहम’और ‘अहंकार’

शिशु जब दुनिया में आता है वह खाली हाथ आता है। बस कुछ रिश्ते ही उसके लिए सब कुछ होते हैं, लेकिन धीरे-धीरे इस पार्थिव दुनिया का मायाजाल उसको इतना जकड़ लेता है कि वह अपनी खुद की पहचान भी भूल जाता है। असल में वह क्या है और उसका क्या है, वह महसूस नहीं कर पाता है। एक सरल एवं निष्कपट शिशु से एक जटिल, चिंतित मानव में रूपांतरित हो जाता है। उसके अंदर धीरे-धीरे अहंकार बस जाता है। अहंकार एक ऐसा बीज है, जो एक बार अगर मन में लग गया तो उसका वृक्ष पूरी तरह से फैल जाता है। इतना विस्तृत हो जाता है कि आसानी से उखाड़ कर फेंका भी नहीं जा सकता है। अहंकाररूपी वृक्ष इतना विस्तृत हो जाता है कि आदमी की पहचान भी ढूंढऩा मुश्किल हो जाता है। अंहकार व्यक्ति को अपनों से दूर ले जाता है। वह खुल कर जी भी नहीं पाता है। उसका अहंकार उसको किसी भी कार्य में सफल नहीं होने देता है। कोई भी कार्य जिसको करके उसको सुकून मिलता है, उसे भी जटिल बना लेता है।

वास्तव में देखा जाए तो अहंकार आदमी का एक झूठा प्रतिबिंब है, जिसको सच्चा मान कर मनुष्य सारा जीवन बिता देता है। वह केवल एक भ्रम है। गीता के तीसरे अध्याय में यह वर्णन हुआ है।

प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै:कर्माणि सर्वरा:।

अहंकार विमूदात्मा कर्ताह मिति मन्यते।।

वास्तव में हमारे द्वारा किये गए सारे कर्म प्राकृतिक गुणों द्वारा किए जाते हैं, तो भी जिसका अन्त:करण अहंकार से मोहित हो रहा है। ऐसी आज्ञानता मैं करता हूं। आसक्ति रहित विवेकशील, कर्मयोग के साधन करने वाले साधक का वाचक अहंकार विमूढ़ात्मा पद नहीं है, क्योंकि उसका अन्त:करण अहंकार से मोहित नहीं, बल्कि वह तो अहंकार का नाटक करने की चेष्टा में लगा रहता है।

सरल रूप से देखा जाए तो अहंकार में डूबा हुआ व्यक्ति खुद यह महसूस भी नहीं कर पाता है कि उसका अहंकार उसके सर्वनाश का कारण बन जाता है।

अहंकार: स विज्ञेय: कत्र्ता भोक्ता भी मान्ययम।

सत्तादि गुण योगेन चावस्थात्रय म यनते।।

अहंकारी व्यक्ति अपने आपको सब कुछ मान लेता है। वह पूरी दुनिया को अपनी उंगली पर नाचने वाली कठपुतली समझ लेता है। अहंकार में अंधा होकर विषय-वासना में ऐसा डूबा रहता है कि अनुकूल परिस्थिति  में तुरंत सुखी और प्रतिकूल में तुरंत दुखी हो जाता है। परोक्ष में देखा जाए तो सुख-दुख यह अहंकार का ही धर्म है।

इस आधुनिक दुनिया में व्यस्त मानव अपने अहंकार के चलते आसानी से दूसरों के साथ अपना सुख और दुख को बांट नहीं पाता है। एक मनुष्य के लिए भाव का आदान-प्रदान बहुत जरूरी होता है। कभी-कभी दुख के समय अपने अंदर ही घुट-घुट कर रहते हुए किसी को अगोचर नहीं कराते। इसकी वजह से वह अनेक जानलेवा बीमारियों का भी सामना करता है।

हम सब इस अहंकार से खुद को दूर करके अपने जीवन को सरल और सुंदर बना सकते हैं। जिस अहंकार का असलियत में कोई वजूद नहीं होता है, उसके लिए खुद के जीवन को नर्क बना देते हैं। खुद को एक छोटे शिशु जैसा सरल बनाकर अपने आस-पास, चारों ओर खुशी का संदेश पहुंचा सकते हैं।

उपाली अपराजिता रथ

продвижение сайта ссылкамистоматология отбеливание зубов

Leave a Reply

Your email address will not be published.