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मोदी की वाराणसी

मोदी की वाराणसी

विश्व का सबसे प्राचीन शहर माने जाने वाले वाराणसी (बनारस और काशी के नाम से विख्यात) का भारतीयों के दिलों में विशेष स्थान है। यह शहर गंगा नदी के किनारे बसा है, जो इस देश के बहुसंख्यक हिंदुओं के लिए पवित्र है। हिंदुओं के बीच दृढ़ विश्वास है कि गंगा घाट पर मृत्यु होने अथवा मृत्यु के बाद वाराणसी के गंगा घाट पर दाह-संस्कार करने से मृतात्मा को स्वर्ग की निश्चित प्राप्ति होती है। इस शहर का ऐतिहासिक महत्व इस कारण भी है कि ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने सर्वप्रथम यही (शहर के पास सारनाथ) उपदेश दिया था। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि दुनिया के कोने-कोने से हर साल लाखों तीर्थयात्री और पर्यटक यहां आते हैं। उनमें से कई लोग इस शहर की प्रवित्रता की वजह से यहां बार-बार आते हैं। वे ऐसा करते हैं, बावजूद इसके कि वर्षों से यह शहर सबसे प्रदूषित और गंदे शहरों में से एक बनता जा रहा है। यहां की बढ़ती जनसंख्या के लिए पर्याप्त बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं।

तो क्या वाराणसी को नए विजन या ब्रांड की जरूरत है? कुछ दिन पहले वाराणसी के एक नामी शैक्षिक संस्थान राजर्षि स्कूल ऑफ मैनेजमेंट ऐंड टेक्नोलॉजी द्वारा आयोजित संगोष्ठी में मैंने भाग लिया था। उसकी विषय-वस्तु भी यही थी। हर संभावना से यह विषय-वस्तु भारत में मोदी लहर के बाद की स्थिति और प्रभावों पर केन्द्रित थी। नरेन्द्र मोदी ने वाराणसी को विशेष रूप से संसदीय क्षेत्र के रूप में चुना था। यद्यपि उन्होंने दो संसदीय क्षेत्रों, उत्तर प्रदेश के वाराणसी और अपने गृह राज्य गुजरात के बड़ौदा, से चुनाव लड़ा था, लेकिन उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र के रूप में वाराणसी को बरकरार रखा। इसलिए प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र होने के कारण वाराणसी की ब्रांड वैल्यू अपने आप ही बढ़ जाती है। लेकिन संगोष्ठी में मेरा प्रारंभिक अवलोकन यह था कि यदि वाराणसी के लिए कोई योजना या विजन न हो, तो भी यहां तीर्थयात्री और पर्यटक आते रहेंगे। भारत के प्रमुख धार्मिक स्थान के रूप में वाराणसी की ब्रांड वैल्यू सदियों से रही है और आगे सदियों तक रहेगी। हालांकि शहर के लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए ब्रांड वैल्यू की आवश्यकता है, जिसकी चर्चा कम ही की जाती है।

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लगभग एक साल पहले लोकसभा चुनावों के दौरान नरेन्द्र मोदी ने वाराणसी के विजन के बारे में कहा था। मोदी ने अपने ब्लॉग में लिखा था, ”आज वाराणसी खस्ताहाल सड़कों, हिंसा, सड़क जाम और बिजली एवं पानी की बाधित आपूत्र्ति से परेशान है। इन समस्याओं का प्रमुख कारण केन्द्र एवं राज्य सरकार का लापरवाह रवैया है।’’ उन्होंने अपने ब्लॉग में आगे लिखा, ”सरकारी विभागों में माफिया और ठेकेदारों का हस्तक्षेप भी एक प्रमुख कारण है। मैं वादा करता हूं कि सार्वजनिक धन को लूटने वाले माफियाओं को केन्द्र से लेकर वाराणसी तक समाप्त किया जाएगा।’’ उन्होंने पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र और हस्तशिल्प तथा कला का केन्द्र होने के बावजूद वाराणसी में बढ़ती बेरोजगारी की समस्या के बारे में लिखा, ”शहर के सबसे बड़े मार्केट टैंड बनारसी पान और बनारसी साड़ी अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं। हम बनारस के लिए नया ब्रांड नहीं बना सकते, लेकिन प्राचीन ब्रांड अपना मूल्य खो रहे हैं। वाराणसी के इस प्राचीन विरासत को बरकरार रखने की आवश्यकता है। स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने के लिए कुटीर, हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योग को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। इसके अलावा शहर की पुरानी प्रतिष्ठा को भी वापस लाने की जरूरत है। यह सब बेहतर नागरिक सुविधाओं को उपलब्ध कराए बिना संभव नहीं है।’’

तथ्य यह है कि वाराणसी के साथ जुड़ी समस्याएं अपने आप में यूनिक नहीं हैं। भारत के सारे शहरों की स्थिति लगभग एक समान है। ये समस्याएं पूरी तरह शहरी समस्याएं हैं, जिससे आजकल पूरा भारत जूझ रहा है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि एक अनुमान के अनुसार, भारत की 28 प्रतिशत आबादी शहरों में निवास कर रही है। आज भारत की चुनौतियों में से एक, आर्थिक उदारीकरण द्वारा बढ़ते शहरीकरण की लहर के साथ मुकाबला है। एक अनुमान के मुताबिक, पिछले दो दशक में 160 मिलियन लोगों ने शहरों की तरफ रूख किया, जबकि अगले 20 सालों में 230 मिलियन और लोगों के शहारों में आने के अनुमान हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, धरती का दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश भारत में 2050 तक शहरों में निवास करने वाले लागों की संख्या में 404 मिलियन लोग और जुड़ेंगे। इसके बाद चीन का स्थान होगा, जहां 292 मिलियन लोग शहरी जनसंख्या में शामिल हो जाएंगे।

वास्तविकता यह है कि भारत की खस्ताहाल आधारभूत संरचना पर भयानक रूप से दबाव बढ़ा है। परिणाम यह हुआ कि पहले से ही चरमराये शहरी तंत्र में पिछले कुछ दशकों में स्वच्छता, स्वास्थ्य, शिक्षा, कानून-व्यवस्था की उचित उपलब्धता के बिना ही झुग्गी-झोपडिय़ों के रूप में अनौपचारिक आवासों का तेजी से फैलाव हुआ है। बावजूद इसके, ज्यादा से ज्यादा लोग शहरों की तरफ आ रहे हैं। देश में जारी औद्योगिकरण के कारण कृषि कार्यों से जुड़े कामगार शहरों में आकर औद्योगिक और सेवा कामगार के रूप में जुड़ रहे हैं। सामाजिक रूप से कहें तो शहरी माहौल में पले-बढ़े बच्चों का ऑप्शन वैल्यू अगली पीढ़ी के लिए बढ़ जाता है, क्योंकि हर मां-बाप मध्यमवर्गीय जिंदगी जीना चाहता है।

अब नीति अयोग के नाम से पहचाने जाने वाले योजना आयोग के एक अध्ययन में के.सी. शिवरामकृष्णन और बी.एन. सिंह ने कहा है कि 2021 तक भारत में 500 बड़े शहर (एक लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले) और 4430 मध्यम एवं छोटे शहर (एक लाख से कम आबादी वाले) होंगे। इस तेज वृद्धि से पर्यावरण और जीवन की गुणवत्ता पर बड़ा असर पड़ेगा।  तेजी से बढ़ती आबादी के कारण बढ़ते शहरीकरण की प्रक्रिया के लिए मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता की प्रक्रिया बेहद धीमी है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि शहरी पर्यावरण, खासकर बड़े शहरों में, बहुत तेजी से बिगड़ता जा रहा है। सभी शहरों में जलापूत्र्ति की कमी, जल निकासी, आवासीय भूखंड, आवास, यातायात एवं अन्य सुविधाओं की भारी कमी है। सेवा का स्तर, गुणवत्ता और उनका वितरण बेहद खराब है। विभिन्न अध्ययन इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि शहरी जनसंख्या के एक बड़े हिस्से के पास पीने योग्य पानी, साफ-सफाई, बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं और शिक्षा की भारी कमी है।

राजनैतिक रूप से कहा जाए तो जलापूत्र्ति, साफ-सफाई, कूड़ा-कचरा प्रबंधन, भू-उपयोग (अवैध निर्माण, अवैध कालोनियां एवं झुग्गी-झोपड़ी), यातायात, बिजली और पर्यावरण की समस्याएं बेहद संवेदनशील हैं। शहरी पर्यावरण का प्रबंधन एक महत्वपूर्ण राजनैतिक एवं शासन संबंधी मुद्दे के रूप में उभर रहा है। भूमि प्रदूषण में उद्योगों का भी बड़ा हाथ है, क्योंकि औद्योगिक कचरे के कारण भूजल में प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा है। प्रदूषण नियंत्रण के पहले और वत्र्तमान के प्रयासों में गैर-अनुरूप उद्योगों के स्थानांतरण तक ही शामिल हैं। खासकर दिल्ली और मुंबई मास्टरप्लान के तहत ऐसे उद्योगों के स्थानांतरण की व्यवस्था की गई है। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए इस मामले में हस्तक्षेप किया। लेकिन, राजनीतिक वर्ग वोट बैंक की वजह से इस आवश्यकता को पूरा करने में हमेशा हिचकते हैं। जब भी प्रभावित उद्योगों एवं वर्गों के खिलाफ प्रदूषण विरोधी मानक लागू किए जाते हैं, सरकार उनके समर्थन में आ जाती है। न्यायालयों के मजबूती से खड़े होने के बिना भारत में प्रदूषण मानकों को लागू करना संभव नहीं है। जहां तक अवैध निर्माण और भूमि अतिक्रमण की बात है, शहरी क्षेत्रों में यह एक बड़ा मुद्दा है। राजनेता भी, चाहे वे सत्ताधारी हों या विपक्षी, कानून तोडऩे वालों के साथ होते हैं, कानून लागू करने वालों के पक्ष में नहीं।

अगर इन बाधाओं की बात करें तो प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी बहुत चुनौतियां हैं, जिसमें निहित स्वार्थवश कुछ सदियों पुरानी धार्मिक रीति-रिवाज एवं प्रथाएं भी शामिल हैं। मोदी का सबसे बड़ा वादा है गंगा की सफाई का। लेकिन, क्या मोदी गंगा के किनारे स्थापित श्मशानों को स्थानांतरित करेंगे, जहां शवों का दाह-संस्कार किया जाता है? संकरी सड़कों के किनारे बने अवैध निर्माणों और अतिक्रमण का क्या करेंगे? क्या वे प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर प्रतिबंध लगाएंगे? क्या वे कानून का उल्लंघन करने वाले व्यापारियों के खिलाफ ऐक्शन लेंगे? प्रशासनिक तंत्र में नगर निगम के पास बहुत ही सीमित अधिकार है। असली अधिकार राज्य की राजधानी लखनऊ में सीमित है, जहां मोदी और उनकी पार्टी भाजपा के घोर विरोधी दल का शासन है।

अगर दूसरे शब्दों में कहें तो वाराणसी के शहरी विकास में सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के हित जुड़े हुए हैं। इसमें कई संवेदनशील मुद्दे समाहित हैं, जिसमें भूमि, आधारभूत ढांचा, वित्त, आर्थिक, पर्यावरण और सामुदायिक सहभागिता प्रमुख है। यह पूरी तरह से राजनीतिक विषय है, जिसमें सरकार की राजनीतिक निहितार्थ नीतियां, लाभान्वित समूह, सशक्तिकरण को नजरअंदाज कर टेक्नोक्रेटिक मैनर में हल नहीं निकाला जा सकता है। लेकिन, मोदी को उस तरीके को निकालना होगा, जिससे वाराणसी विजन को लागू किया जा सके। उन्हें रणनीति, कार्यक्रमों और परियोजनाओं के लिए अधिकतम जनता की और राजनैतिक  सहमति की आवश्यकता होगी।

 प्रकाश नंदा

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