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राहें आसान नहीं गैर-जरूरी होते जा रहे स्कूली सिस्टम की वैकल्पिक व्यवस्था की सफलता

राहें आसान नहीं  गैर-जरूरी होते जा रहे स्कूली सिस्टम की वैकल्पिक व्यवस्था की सफलता

स्कूल का नाम लेते ही जेहन में बड़ी-बड़ी इमारतों, विद्वत्त ईश्वर-तुल्य शिक्षक समुदायों के साथ-साथ अपने पीठ पर किताबों से ठसाठस भरे थैलों को लादे हुए बच्चों से लेकर किशोरों के चेहरे अनायास ही मस्तिष्क में बड़ी तेजी से उभरते चले जाते हैं। किन्तु कोविड-19 वैश्विक महामारी के बाद जिस प्रकार से देश में लॉकडाउन लागू हुआ है और जिसके फलस्वरूप लोग अपने घरों के ही अन्दर रहने को विवश हैं और सोशल डिस्टेंसिंग अनिवार्य लाइफ स्टाइल के रूप में हमारे लिए कई प्रतिबद्धताएं स्थापित कर दी हैं तो वर्तमान में स्कूल के परंपरागत टीचिंग और लर्निंग प्रक्रिया का स्वरुप बेसब्री से भारी तब्दीलियों की दहलीज पर खड़ा है।

केंद्र सरकार के द्वारा हाल में ही घोषित अनलॉक फेज-1 में भी स्कूलों और कॉलेजों को देरी से खोलने का फैसला लिया गया है और जब भी ये खुलेंगे तो कई अनिवार्य पाबंदियों को जारी रखने का निर्णय लिया गया है। सारांश के रूप में पुराने दिनों के स्कूल और कॉलेज की परंपरागत और दैवी छवि के वापस होने के दिन अभी भी अधर में लटके हुए हैं।

कोरोना महामारी के वर्तमान गहरे संकट के मुतल्लिक आज कई अदद प्रश्नों के उत्तर काफी अहम हो गये हैं। पहला अहम प्रश्न यह उठता है कि क्या अब आश्चर्यजनक रूप से स्कूली शिक्षा का वजूद खत्म होने वाला है? दूसरा प्रश्न कम महत्वपूर्ण नहीं है – राष्ट्र के सर्वांगींन विकास के लिए विद्यार्थियों की अन्तर्निहित प्रतिभाओं को ब्यूरोक्रेट्स, डॉक्टर, इंजीनियर, तकनीशियन और अन्य महान हस्तियों के रूप में तराशने की स्कूलों की पारंपरिक महती जिम्मेदारी का क्या अवसान हो चुका है? किन्तु सच पूछिये तो सबसे अनिवार्य प्रश्न यह है कि किसी राष्ट्र के भविष्य की दिशा और दशा को तय करने वाले अनिवार्य कारक के रूप में क्या हमने स्कूली शिक्षा के हर संभव विकल्पों की तैयारी मुकम्मल कर ली है?

यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक और राजनीतिशास्त्र के जनक अरस्तू का मानना था कि परिवार बच्चों का पहला स्कूल होता है और माता-पिता उनके पहले शिक्षक। आशय यही है कि एक बच्चा अपने परिवार में माता-पिता और अन्य सगे-संबंधियों के साथ रहकर व्यवहार, आचरण, जीवन और संस्कार के जिन मूल्यों को सीखता है वही बाद में वयस्क होने पर उसके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन जाता है। मूल रूप से बचपन में परिवार से सीखे गये आचरण और संस्कार के मूल्यों में बाद के जीवन में कोई विशेष परिवर्तन नहीं होता है। जीवन के सभी अच्छे और बुरे मूल्यों के बीजारोपण का कार्य बच्चों के स्कूल में आने के पूर्व एक परिवार में ही हो चुका होता है, जो बाद में विकसित होकर किसी बरगद के पेड़ के रूप में अपनी जड़ें जमा लेता है। स्कूलों में शिक्षक महज उन गुणों का आंशिक रूप से परिमार्जन करता है, उनको निखरता है। इस लिहाज से किसी बच्चे के पर्सनलिटी डेवलपमेंट में एक परिवार के अपने विविध मूल्यों की छाप जीवन के अंतिम सांस तक अमिट रहती है।

अंग्रेजी साहित्य के प्रसिद्ध कवि विलियम वर्ड्सवर्थ ने जब यह कहा था है ‘दि चाइल्ड इज दि फादर ऑफ दि मैन’, तो इसका  निहितार्थ भी यही परिलक्षित करता है कि एक शिशु के गुण ही क्रमश: वयस्क होने के स्टेज पर परिपक्व होता है। इन सभी बातों से यही सारांश निकलता है कि बच्चों की शिक्षा, भविष्य और करियर निर्माण में शैक्षिक संस्थान केवल एक फैसिलिटेटर की भूमिका निभाते हैं। ये संस्थान किसी परिवार से विशेष रूप से दीक्षित और सांस्कारित शिशु में कोई युगांतकारी करिश्माई परिवर्तन नहीं ला सकते हैं।

खूंखार दस्यु अंगुलिमाल और महान ग्रन्थ रामायण के रचनाकार आदिकवि वाल्मीकि के हृदय परिवर्तन और बचपन से ही प्रतिभा-कुंद पाणिनि की प्रतिभा का अभ्युदय किसी स्कूल के चहारदिवारी के मध्य नहीं हुआ था। महाकवि तुलसीदास की महान कृति रामचरितमानस की रचना के शिल्प को किसी स्कूली शिक्षा और डिग्री का मोहताज नहीं बनना पड़ा था। महान वैज्ञानिक थॉमस अलवा एडीसन को उनके शिक्षकों ने उन्हें मंद बुद्धि के होने के कारण स्कूली शिक्षा के लिए अस्वीकृत कर दिया था। विश्व इतिहास साक्षी है कि उनकी माता ने स्कूल से अनादृत पुत्र में अन्तर्निहित अद्भुत प्रतिभा को बड़ी बारीकी से पहचाना और एक कुशल शिल्पी के रूप में दुनिया को एक ऐसा वैज्ञानिक दिया जिनके नाम से आज भी आविष्कारों के सबसे अधिक पेटेंट दर्ज हैं।

महाभारत काल में महान धनुर्धारी एकलव्य की ऐतिहासिक उपलब्धियों की कहानी महज इस सत्य को प्रमाणित करता है कि गुरु और गुरुकुल के अभाव में भी एक छात्र स्वाध्याय के माध्यम से अपनी मेधा के उस पराकाष्ठा पर पहुंच सकता है जिसके बारे में कल्पना नहीं किया जा सकता है। विश्व की तारीख में ऐसे कई मिशाल हैं जो केवल यही साबित करते हैं कि जीवन में करियर निर्माण किसी करिकुलम और क्लास रूम के कॉन्फिगरेशन पर निर्भर नहीं करता है। रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के संस्थापक धीरूभाई अंबानी को बचपन से ही स्कूल और पढ़ाई में रूचि नहीं थी। वे वीकेंड के दिनों में गिरनार पहाडिय़ों पर सैलानियों को पकौड़े बेचा करते थे। इतनी बड़ी कंपनी की स्थापना और एक सक्सेसफुल इंटरप्रेन्योर बनने के लिए उन्होंने कभी किसी फॉरिन यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट की डिग्री हासिल करने के बारे में कदाचित ही सोचा होगा।

लेकिन इसका अर्थ कदापि यह नहीं है कि छात्रों के जीवन से लेकर राष्ट्र निर्माण में स्कूल की कोई भूमिका ही नहीं है। परिवार से दूर स्कूल शिशु में अनुशासन, टीम स्पिरिट, लीडरशिप, सहयोग, सहानुभूति, प्यार, दया, राष्ट्रभक्ति और कई अहम पारिवारिक और सामाजिक संस्कारों और मूल्यों को पिरोता है और सबसे अधिक आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करता है। मानव जीवन और राष्ट्र के विकास के परिप्रेक्ष्य में स्कूलों की अहम भूमिका का जब प्रश्न उठता है तो प्राय: यह कहा जाता है कि 1815 की वॉटरलू की लड़ाई एटन के खेल के मैदान में जीती गयी थी। इस कथन का सार यह है कि ब्रिटेन की मिलिट्री पॉवर और युद्ध में सफलता ब्रिटिश स्कूलों के द्वारा अपने स्टूडेंट्स को सिखाये गये संस्कारों और मूल्यों के कारण संभव हो पाया था। ऐसा कहा जाता है कि उस समय एटन इंग्लैंड का सबसे प्रसिद्ध स्कूल था जहां स्टूडेंट्स को सेना, सिविल सेवाओं और चर्च में करियर निर्माण के लिए प्रेरित किया जाता था। यदि इन सब बातों को नजरअंदाज भी कर दें तो इस सत्य से कदाचित हम सभी मुश्किल से इनकार कर पायें कि हम सभी के जीवन में किसी-न-किसी फेवरिट टीचर के व्यक्तित्व और कृतित्व के कुछ-न-कुछ अंश निश्चित तौर पर ताउम्र तक जीवित रहते हैं।

किन्तु संप्रति कोविड -19 के रोकथाम के लिए आवश्यक सोशल डिस्टेंसिंग और सोशल स्पेसिंग के कारण स्कूली व्यवस्था में जिस तरह से स्टैगरिंग (कार्यों को ऐसे बांटना ताकि वे अलग-अलग शिफ्ट में किये जा सकें) को इम्प्लेमेंट करने की प्लानिंग हो रही है तो उसके मद्देनजर यह प्रश्न बार-बार अपने सिर उठा लेता है कि क्या अब सनातनी स्कूलों के दिन लदने वाले हैं? क्या स्कूल अपने संपूर्ण उपादानों के साथ फिर कभी वजूद में लौट पायेगा? और यदि वर्तमान कोरोना काल स्कूली व्यवस्था के अस्त्तिव के लिए कठिन परीक्षा की घड़ी है तो फिर हमें अपने बच्चों के शैक्षिक विकास के विकल्पों के बारे में बड़ी गहनता से सोचने की दरकार है।

इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी के मौजूदा दौर में ऑनलाइन स्टडी मैटेरियल्स की प्रचुरता और स्टडी टूल्स की सुगम उपलब्धता हमारे लिए एक वरदान के रूप में है। इसलिए इस फ्रंट पर कोई समस्या नहीं है। स्कूलों के अभाव में घर-परिवार में शिशु से लेकर किशोर और व्यस्क छात्रों के स्टडी के लिए एक रूटीन निर्माण और टाइम टेबल की तैयारी सबसे बड़ी जरूरत है। सबसे अधिक इस रूटीन को स्ट्रिक्टली फॉलो करने की जिम्मेदारी का भी हमें ध्यान रखना होगा। हर दिन के लिए असाइनमेंट को फिक्स करना और फिर फीडबैक और असेसमेंट को ईमानदारी से लागू करना भी अहम् जिम्मेदारियों में शुमार किये जा सकते हैं। परीक्षाओं के पैटर्न और मोडस ओपेरंडी दूसरे सबसे बड़े प्लेटफार्म हैं जहां गंभीरता से निर्णय लेने की जरूरत है। अब तक चल रही परीक्षा पद्धति को जारी रखना व्यावहारिक रूप से मुमकिन नहीं है, इसीलिए घर पर ही कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट एक प्रभावी मेथड बचा रहता है। लेकिन इस दिशा में चुनौतियों कम नहीं हैं।

ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में मुफलिसी की मार झेल रहे माता-पिता के लिए अपने बच्चों के लिए ऑनलाइन लर्निंग के लिए आवश्यक इन्टरनेट सुविधाओं के साथ लैपटॉप, डेस्कटॉप और स्मार्टफोन की व्यवस्था कर पाने की समस्या सबसे बड़ी चुनौती के रूप में हमारे सामने खड़ी हो जाती है। इस दिशा में स्थायी समाधान के लिए सरकार के द्वारा आर्थिक सहायता के साथ-साथ आधारभूत नीतियों में युगांतकारी परिवर्तन की सख्त जरूरत है। ऑनलाइन स्टडी के इंफ्रास्ट्रक्चर फैसिलिटीज को देश के लगभग 27 फीसदी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे परिवारों के बच्चों के लिए उपलब्ध कराना सरकार की बड़ी चुनौतियों में शुमार होता है। साथ ही घर पर अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए स्कूलों की तरह ही एक धार्मिक माहौल प्रदान करने की पेरेंट्स की जिम्मेदारी कम चुनौतीपूर्ण कार्य नहीं है। इक्कीसवीं सदी के आधुनिक भारत के तेजी से बढ़ते ग्रोथ रेट और पांच ट्रिलियन इकॉनमी बनाने के लक्ष्य के रास्ते कोरोना महामारी के अवरोध को शिक्षा और शिक्षक के बदलते स्वरुप के माध्यम से आसानी से दूर किया जा सकता है – लेकिन इसको साकार करने की राहें आसान नहीं है।

 

श्रीप्रकाश शर्मा

(लेखक प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, मामित, मिजोरम, हैं)

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