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मां और बेटे का कांग्रेस राग

मां और बेटे का कांग्रेस राग

बेटा लापता है। मां अचानक राजनीतिक रूप से बहुत सक्रिय हो गई हैं। उन्होंने अन्य विपक्षी दलों के साथ दो मार्च निकाले- पहला मार्च उन्होंने डॉ. मनमोहन सिंह को सीबीआई नोटिस आने पर निकाला जिसमें मनमोहन सिंह को अभियुक्त ठहराया गया था। दूसरा, प्रधानमंत्री के घर के बाहर निकाला भूमि अधिग्रहण विधेयक के विरोध में। वह सभी विरोध और प्रदर्शनों की अगुवाई कर रहीं हैं। उन्होंने ये भी कहा कि वह किसानों से मिलने जाएंगी।

ये सब देखने और सुनने में पुराने वक्त जैसा ही लग रहा है। जैसा कि हमेशा देखा गया है कि कांग्रेस पार्टी के नेता हमेशा विपक्ष में अन्य दलों के नेताओं के द्वारा किए गए अभियान में शामिल रहते थे, लेकिन राहुल इस तरह के अभ्यास में नजर नहीं आते थे। इसके दो कारण थे। पहला कि वो संसद में कभी-कभी ही आते थे। दूसरा, उन्होंने वाद-विवाद या प्रतिनिधि मंडल में भी कम ही अपनी हिस्सेदारी दर्ज कराई।

अब राहुल भले ही ‘अदृश्य’ हो गए हैं, लेकिन सोनिया गांधी अब लोगों के बीच नजर आने लगीं हैं, चाहें तो अपने बेटे की शर्मनाक तरीके से लापता होने के कारण या फिर राजवंश को बचाने के लिए, ताकि इतिहास बनने से पहले उसे बचाया जा सके या फिर दोनों कारणों से। उनका ये बयान कि राहुल गांधी की गैर-मौजूदगी में वो सब अपनी तरफ से कर रहीं हैं ये मीडिया का दिखाया गया आधा-अधूरा सच है। हकीकत ये है कि जितनी भी नियुक्तियां या फिर नीतिगत घोषणाएं हो रही हैं वो सब रिमोट कंट्रोल के जरिए राहुल ही कर रहे हैं।

ये राष्ट्रीय परिहास बन गया है, लेकिन ये कैसे माना जाए कि सारे रिमोट कंट्रोल निर्णय राहुल के द्वारा लिए जा रहे हैं, जबकि उनके पास रिमोट कंट्रोल शायद है भी नहीं और हो भी नहीं सकता। वह सिर्फ किसी और के आदेश पर कार्य कर रहे हैं, ये बात सोनिया को भी ज्ञात है।

सभी प्रकार के सवाल उठाये जा रहे हैं। क्या वह एक अग्रिम परीक्षण पर हैं, यदि एक के बाद एक गांधी परिवार के सभी सदस्य भारत छोड़ कर चले गए हैं, क्या वो भी इसी कड़ी का एक हिस्सा बन गए हैं और भारत छोड़ कर चले जाएं? वह अपनी इस बात पर अटल हैं कि जब तक सोनिया उनसे ये वायदा नहीं करतीं कि वो उनकी बहन प्रियंका को महासचिव बनाएंगी तब तक वो वापस नहीं आयेंगे। दूसरा सवाल ये उठता है कि वो गए कहां हैं (शायद अपने विशाल सैनिक फार्म में),  और वापस कब आयेंगे? सवाल यह भी है कि वह ऐसा क्या चाहते हैं जो पार्टी को उनके लिए करना चाहिए?

हमेशा से ही गांधी परिवार के लिए स्थाई समस्या का सबब रहे डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा कि राहुल स्पेन में हैं। वो वहां क्या कर रहे हैं? ये अभी तक स्पष्ट नहीं है। लेकिन, अगर आप ये बात उनसे पूछेंगे तो वह जबाव में कहेंगे कि वो फ्लामेंको (एक प्रकार का स्पेनिश नृत्य) का रोमांच ले रहे हैं। खैर, राहुल क्या कर रहे हैं और क्या नहीं, और वह कहां हैं और कहां नहीं, इन सब का कोई फर्क नहीं पड़ता। बहरहाल ये बात महत्वपूर्ण है कि उन्हें इस बात का एहसास हो गया है कि उनकी मां ने भारतीय राजनीति की पेचीदगियों को बहुत ही कठिन तरीके से सीखा है। वह कांग्रेस और पार्टी के लिए अप्रासंगिक हो गए हैं। यही कारण है कि सोनिया गांधी ने फिर से सक्रिय नेतृत्व शुरू कर दिया है। वह प्रदर्शनों का नेतृत्व कर रही हैं और लोकसभा में भी बोलती नजर आ रही हैं। प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति भवन चले जाने के बाद वह सबसे वरिष्ठ और अनुभवी कांग्रेसी सांसद हैं। और, जिस तरह से वह काम कर रही हैं तो उनका बेटा पार्टी के लिए किसी काम का नहीं रहा और न ही उनके लिए। सोनिया सिर्फ  वंशवादी कारणों से ये सब नहीं कर रही हैं। कांग्रेस की कमान को राहुल गांधी द्वारा संभालने में असफल होने के बाद अब सोनिया गांधी को खुद प्रभार संभालने की जरूरत है।

सूत्रों का कहना है कि सोनिया का मानना है कि किसानों के माध्यम से पार्टी एक बार फिर से जी उठेगी। साथ ही उनका मानना ये भी है कि भूमि अधिग्रहण विधेयक के प्रस्ताव से भाजपा ने खुद ही किसानों के दिलों में कांग्रेस के लिए जगह बना दी है। इसमें मुख्य तथ्य यह है कि जिनकी भूमि अधिग्रहण की गई है, अगर वो इसे नकारना चाहें तो उनके पास ये हक भी नहीं है कि वो अपनी जमीन वापस पाने के लिए मुकदमा कर सकें। भाजपा ने उन्हें ये हक नहीं दिया है।

शायद इसीलिए उनके सलाहकारों ने उन्हें किसानों के मोर्चे पर सक्रिय होने की सलाह दी है। इस बात को ध्यान में रखते हुए पार्टी ने घोषणा की है कि दिल्ली में 19 अप्रैल को रामलीला मैदान में बड़ी किसान रैली कि जाएगी, जिसमें 4-5 लाख लोग जुटेंगे। पार्टी सूत्रों का यह भी कहना है कि राहुल की रहस्यमयी अनुपस्थिति के बाद ये राहुल की पहली सार्वजनिक उपस्थिति हो सकती है।

25-04-2015

वक्त काफी रोचक है। सोनिया किसानों को इस बात का विश्वास दिलाएंंगी कि कांग्रेस उनके अधिकारों से समझौते के लिए किसी भी तरह से तैयार नहीं है। पार्टी के सभी वरिष्ठ नेता, राज्य के प्रमुख और विधायक दल के नेता रैली में शामिल होंगे।

इस रैली के संबंध में सोनिया पहले ही मध्य प्रदेश के किसानों से मिल चुकी हैं। यही नहीं, उन्होंने राजस्थान और हरियाणा का भी दौरा किया, जहां सोनिया ने बेमौसम बरसात के कारण बर्बाद हुई फसलों के लिए किसानों के साथ संवेदना जताई। वह पंजाब भी जाने वाली थीं, लेकिन खराब मौसम की वजह से यात्रा टाल दी गई। किसानों से सहनुभूति प्रकट करना मात्र एक रणनीति हो सकती है, जिसका भविष्य में किसानों को भुगतान भी करना पड़ सकता है। इसके लिए एक स्वतंत्र मूल्यांकन की जरूरत है कि आखिर ये प्रयास 2014 में क्यों विफल रहा। सोनिया को ये सोचने कि जरूरत है कि उनके संगठन में आमूल-चूल परिर्वतन के साथ ही जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को विकसित करने की आवश्यकता है। सोनिया को इसके साथ ही एक और तथ्य पर यानी अपने दामाद के विषय में विचार करने की भी आवश्यकता है।

धरना-प्रदर्शन की जो राजनीति है वह 2015 में कारगर नहीं है। विपक्षी पार्टी के घिसे-पीटे बयान पिछली सदी के प्रदर्शनों की याद दिलाते हैं। इस सदी में बहुत से किसानों ने शहरों की तरफ रूख कर लिया, क्योंकि उन्होंने खेती-बाड़ी में बहुत अपना भाग्य अजमा लिया था। सोनिया गांधी के सहनुभूतिपूर्ण रवैये से अब उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसा कि तवलीन सिंह ने सोनिया के इस रवैये के लिए उपयुक्त शब्द प्रयोग किया है ‘पाखंड’। सोनिया गांधी ने मोदी सरकार के लिए जमीनी स्तर पर मोर्चा खोल  दिया है। उन्होंने कहा, ”हम अपने किसानों को कभी निराश नहीं होने देंगे।’’ माफ कीजिए सोनिया जी, रॉर्बट वाड्रा याद हैं न?

ट्विटर पर पता चलता है कि ज्यादातर लोग ये नहीं भूल पाये हैं कि उनके दामाद रॉबर्ट वाड्रा मुनाफा कमाने के लिए राजस्थान और हरियाणा में किसानों की जमीन खरीदेने के मामले में गंभीर रूप से संलिप्त थे। वाड्रा की रणनीति बाजार में एकाधिकार करने की थी। किसानों से सस्ते दाम पर जमीन खरीद कर बढ़े हुए भाव पर जमीन बेचकर मुनाफा कमाना था। उस वक्त यूपीए को संभालने वाली सोनिया गांधी ने क्यों नहीं वाड्रा को रोका जब वो किसानों से फायदा उठाकर अरबों रूपए बनाने की जुगत में लगे थे। और क्या सोनिया बताएंगी क्यों मनरेगा ने सिर्फ  खैरात और खाईयां ही पैदा की हैं, न कि लोगों को नौकरियां या संपत्तियां दी हैं?

अगर बात करें राहुल की। वह तब तक वापस नहीं आएंगे जब तक कि उनकी मां उनसे ये वायदा नहीं करती कि उनकी बहन प्रियंका को महासचिव बनाया जाएगा, तो ये अफवाह सच भी हो सकती है। सोनिया ने हाल की रिपोर्ट में कहा था कि उन्होंने पार्टी का प्रबंधन राहुल और प्रियंका के लिए किया गया था। ये देखना काफी रोचक होगा कि प्रियंका इस भूमि अधिग्रहण विधेयक के विरोध प्रदर्शन में मौजूद रहेंगी या नहीं। अगर प्रियंका  इस रैली में मौजूद रहतीं हैं तो इसका साफ मतलब होगा कि प्रियंका के विषय में फैली अफवाह गलत है। और इतने वर्षों के बाद अखिर सोनिया ने ये निर्णय ले लिया है कि राहुल न सिर्फ राजवंश के लिए अपितु पार्टी के लिए भी एक खतरा हैं।

भाग्य का पहिया भी कैसे चलता है। राजीव की पत्नी होने के नाते सोनिया का राजनीति में आने का कड़ा विरोध हुआ था। उनके बारे में कहा जा रहा था कि सोनिया राजवंश की जिम्मेदारी को निभाने में असफल हो जाएंगी। राजीव गांधी के दुखद अंत के बाद सोनिया पार्टी से दूर ही रहीं, जबकि उन पर पार्टी के नेताओं का काफी दबाव रहा। जब सोनिया को इस बात का एहसास हुआ कि कांग्रेस शिखर से नीचे की ओर सरक रही है तो उन्होंने बातौर अध्यक्ष पार्टी की कमान संभाली। एक लंबे अर्से के प्रयासों के बाद सोनिया को ये समझ में आ गया है कि राहुल पार्टी को बर्बाद कर रहे हैं। इस हताशा के बाद उन्होंने विपक्षी पार्टियों को एकजुट कर दुश्मन से लडऩे की नीति को अपनाते हुए भाजपा के खिलाफ प्रदर्शन करने का मन बना लिया है। लेकिन, अपनी पराजय का मुंह देखने के बाद वो शायद ये भूल गईं हैं कि ये नीति 80 के दशक से निरपवाद रूप से विफल रही है।

सोनिया के सलाहकारों का ये विश्वास है कि किसी भी चीज को पाने के लिए बार-बार कोशिश करते रहनी चाहिए, एक दिन सफलता हासिल जरूर होगी। इसी विश्वास पर सोनिया ने पार्टी के लुप्त होते भाग्य को पुनर्जीवित करने के लिए 17 नबंवर को दिल्ली में नेहरू अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने के बहाने सभी विपक्षी नेताओं को धर्मनिरपेक्ष बयानबाजी के साथ आमंत्रित किया। सम्मेलन में सोनिया ने धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा भी उठाया। वर्तमान सरकार की खिलाफत के लिए इस मुद्दे ने सभी विपक्षी पार्टियों को एक दूसरे के साथ गोंद की तरह जोड़ दिया और वे एकजुट हो गए। उनके मुताबिक, ”धर्मनिरपेक्षता के बिना भारत नहीं हो सकता धर्मनिरपेक्षिता अधिक जरूरी है। ये भारत जैसे विविध देश के लिए आवश्यक है।’’ उनका ये कहना कि हमें धर्मनिरपेक्षिता को बचाना है इसका मतलब है कि भारत को मोदी से बचाना। सोनिया ने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा, ”भारत की आत्मा की रक्षा के लिए बहादुर सेक्युलर सिपाही बनो।’’

ये मात्र एक मुखौटा था लोगों को रिझाने के लिए, अर्थात वोट बैंक की राजनीति के लिए। धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाली सोनिया को 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान तब संकोच नहीं हुआ, जब वो दिल्ली जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी से मिलने गईं थीं और उनसे खास अपील की थी कि ‘धर्मनिरपेक्ष वोट’ के विभाजन को रोकने के लिए वह मुसलमानों से अपील करें। तब क्या हुआ था जब 2006 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला हक है? गांधी परिवार की राजनीति से संप्रदायिकता की बदबू आ रही है। लेकिन, अब समय बदल गया है। लोगों को कांग्रेस पार्टी की रणनीति समझ में आ गई है कि वह अपनी राजनीति भुनाने के लिए लोगों में धर्मनिरपेक्षता का भय पैदा करके सिर्फ वोट बटोरना चाहती हैं। 2014 के चुनाव में देखा भी गया कि कैसे कांग्रेस का धर्मनिरपेक्षता खतरे में है का प्रोपेगेंडा कैसे घ्रुवीकरण में बदला और कैसे हिंदू मतदाताओं ने एकमत होकर दृढ़ संकल्प कर लिया कि वो भाजपा और मोदी को वोट देंगे।

ये भी कहा जाता है कि वह अनुच्छेद 66(ए) की वास्तुकार हैं, जिसे हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने निरस्त कर दिया। ये धारा राजनेताओं के बीच काफी लोकप्रिय थी। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी कि हर हफ्ते इस धारा के तहत औसतन दो मामले दर्ज किए जाते थे। अगर आपातकाल के दौरान मीसा ऐक्ट लागू हो सकता है तो एक्ट 66(ए) उसके सामने बहुत हल्का है।

निरपेक्षवादी सिद्धंत का एक और लक्षण है- कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष सिर्फ एक अस्थाई पद होता था। पार्टी में हर साल एक अध्यक्ष का चुनाव होता था और कभी-कभी कोई एक ही व्यक्ति दुबारा भी चुना जा सकता है। उदाहरण के लिए सुभाष चन्द्र बोस दो बार जाता था और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मौलाना आजाद 6 साल के लिए पार्टी अध्यक्ष चुने गए। इंदिरा गांधी की बात करें तो वह वास्तविक तौर पर कांग्रेस की प्रधानमंत्री रहीं और कांग्रेस अध्यक्ष नाममात्र की।  नेहरू और इंदिरा गांधी के बीच अंतरिम अवधि के दौरान पद महत्वपूर्ण बन गया। संजीव रेड्डी को शक्ति का भ्रम था जब तक कि  इंदिरा गांधी ने कमजोर अध्यक्षों की पुरानी परंपरा को पुन:स्थापित कर दिया। हालंकि सोनिया ने पार्टी अध्यक्ष पद का एक गंभीर पद बना दिया है। उन्होंने पार्टी को गांधी परिवार की जागीर बना दिया। इसलिए कोई भी दूसरा व्यक्ति पार्टी अध्यक्ष पद पर नहीं बैठ सकता था।

मूल गांधी होने के नाते पार्टी का मालिक कौन है इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन अब सोनिया ने खुद ही पार्टी की सक्रिय अध्यक्ष के रूप में अपना अभिषेक कर लिया है। सोनिया राहुल की मां हैं और वह जानती हैं कि पार्टी के लिए क्या सही है। राजनीति के लिए राहुल में प्रतिभा और योग्यता की कमी है। संभवतया ये बात तय हो गई थी कि उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए चुना जाएगा, लेकिन अपने अत्मनिरीक्षण के शायद दौरान राहुल ने खुद इस बात को स्वीकार किया  कि वह राजनीति को ज्यादा पसंद नहीं करते और न ही वह इस काम को सीखने के लिए कड़ी मेहनत और निरंतर प्रयास करना चाहते थे।

राजनीति में 24&7 कार्य होता है और राहुल इस काम से कुछ ही हफ्तों में थक गए। इसलिए वह खुद को दुबारा इस कार्य के लिए ऊर्जावान बनाने के लिए विदेश के भ्रमण पर निकल गए। उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं है कि उनके इस विदेश भ्रमण के दौरान पार्टी के सामने क्या परेशानियां आ रही होंगी।

जब वह यहां थे तब भी उनके दिमाग में विचारों का लेखा-जोखा चलता रहता था, लेकिन फिर भी वह अपने काम के प्रति गंभीर नहीं रहे। राहुल ने खुद भी इस बात को असामान्य रूप से स्वीकार किया है कि उन्हें सोचने के लिए वक्त की अवश्यकता थी और उन्होंने ज्यादातर वक्त सोचने में गुजार दिया है।–मां से दूर!

हमें उनसे सहानुभूति होनी चाहिए, पर क्या वो इसके पात्र हैं? 10 साल तक प्रधानमंत्री को जो विशेषाधिकार मिलते हैं, उनका उन्होंने उसका आनंद लिया है। उन्होंने अपनी पार्टी के लिए जो आधा-अधूरा काम किया है, इससे ज्यादा की उनसे उम्मीद भी नहीं की जा सकती। जहां तक सोनिया गांधी का सवाल है, अगर वह पार्टी को दुबारा उभार लेती हैं तो उनके बेटे और बेटी के लिए आने वाला समय अच्छा हो सकता है।

विजय दत्त

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