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गांधी दर्शन और एकल विद्यालय

गांधी दर्शन और एकल विद्यालय

महात्मा गांधी सच्चे अर्थों में धरती पुत्र थे। उनके हृदय में ग्राम व ग्रामीण का चिंतन कितनी गहराई तक व्याप्त था, यह उनके शब्दों से व्यक्त होता है। ”यदि गांव समाप्त हो गये तो भारत भी समाप्त हो जायेगा। भारत भारत नहीं रहेगा। दुनिया में उसका अपना मिशन ही समाप्त हो जायेगा(हरिजन पृ. 423)। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी इस ज्वलंत सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता। तेजी से बढ़ता शहरीकरण और गांवों से होता पलायन एक बड़ी चुनौती बन चुका है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री की आदर्श ग्राम योजना की बड़ी आवश्यकता है। समय के इस आह्वान को एकल विद्यालय योजना ने 25 वर्ष पूर्व ही सुन लिया था और आज एक समाधान के रूप में सफल प्रयोग बनकर सामने आई है। इस लेख में दो विषयों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है। गांधीजी की नई तालीम तथा ग्राम स्वराज की परिकल्पना आज भी प्रासंगिक है। अनेकों राष्ट्रीय समस्याओं का निदान इसमें सम्भव है।

यह आश्चर्यजनक सत्य है कि 25 वर्ष पूर्व 1988-89 में एकल विद्यालय योजना का प्रारूप बना था। तब इसके प्रणेताओं ने गांधीजी के ‘स्वराज’ व अम्बेडकर की सामाजिक समरसता के बारे में सोचा भी नहीं होगा, परन्तु एकल ने हजारों गांवों में इन दोनों महान आत्माओं के सपनों को जमीन पर उतारने का कार्य सहजता से किया। बीतते समय के साथ एकल ने जितना विस्तार लिया उतनी ही गहराई और ऊंचाई भी प्राप्त की। असंख्य नये-नये प्रयोग करते हुये अपनी खोज को जारी रखा और धरती के सत्य को स्थापित किया।

25-04-2015

यद्यपि गांधीजी का सपना उनके जीवन काल में पूर्ण न हो सका, परन्तु ‘एकल’ आशा की किरण के साथ ऐसे तमाम लोगों को आश्वस्त करेगा जिनके दिल में गांधी के सपने आज भी ताजे हैं। लालकिले के प्राचीर से ‘प्रधानमंत्री आदर्शग्राम योजना’ की घोषणा ने गांवों से लेकर नगरों तक के हजारों एकल कार्यकर्ताओं और लाखों सहयोगियों को आनंदित किया। ‘एकल’ इसी आदर्श ग्राम की कल्पना को सत्य करने का नाम है। प्रधानमंत्री की इस योजना को तेजी से पूर्ण करने के लिये ‘एकल’ पर भरोसा कर सकते हैं। गांव को शिक्षा से समृद्धि की ओर ले जाने का मार्ग एकल ने सफलतापूर्वक प्रशस्त किया है।

‘आदर्श भारतीय गांव इस तरह बसाया और बनाया जाना चाहिये, जिससे वह सम्पूर्णतया निरोग रह सके। उसके झोंपड़ी और मकानों में काफी प्रकाश और वायु आ-जा सके। ये ऐसी चीजों के बने हों जो पांच मील की सीमा के अन्दर उपलब्ध हो सकती हैं। हर मकान के आसपास या आगे-पीछे इतना बड़ा आंगन हो, जिसमें गृहस्थ अपने लिए साग-सब्जी लगा सके और अपने पशुओं को रख सके।’ (पृ. 33, ग्राम-स्वराज्य)

गांधीजी ने गांव में स्वास्थ और स्वच्छता की आवश्यकता पर बल दिया। एकल की स्वास्थ्य शिक्षा एवं आरोग्य योजना में गांव की बेटी-बहू को ही प्रशिक्षित करके उन्हें शिक्षिका एवं आरोग्य सेविका के रूप में स्थापित किया गया। ये युवतियां कम पढ़ी-लिखी होने के बावजूद अपने ही गांव में अनेकों बीमारियों की रोकथाम के उपाय सरलता से सीख लेती हैं। गांधीजी ने गांव में घर के पीछे साग-सब्जी उगाने की बात कही थी। इस दिशा में एकल ने क्रान्तिकारी कार्य किया। एकल गांव के हर घर के पीछे पोषण-वाटिका लगाने का प्रशिक्षण देकर साग-सब्जी-फल की पैदावार की। गांव की महिलाएं, जिसमें 70 प्रतिशत  एनीमिया से ग्रसित होती हैं, उन्हें इससे बहुत लाभ हुआ। घर का कचरा व गंदा पानी सोख्ता गड्ढा बनाकर उसमें डाला जो बाद में घरेलू खाद के रूप में उपयोग किया गया।

गांधीजी का विश्वास या गांव की समस्याओं एवं जरूरतों का समाधान गांव में ही पूर्ण हो सकता है। एकल ने उनके विश्वास को सच्चाई में परिणित किया और प्रामाणित किया कि ग्रामीणों के द्वारा गांव में ही सुख-सुविधा-समृद्धि सम्भव है। एकल ने एक अनोखा प्रयोग किया। शहर को गांव की ओर मोड़ाने के लिए ‘चलो गांव की ओर’ नारा दिया। नगर और गांव की दूरी को कम करने के लिये अनोखे कार्यक्रमों को जन्म दिया, जैसे नगरों से वनयात्रा, गांव को गोद लेना, स्नेह सम्पर्क तथा संरक्षक परिवार बनाकर नगरवासी को ग्रामीण से जोड़ा। नगर की ऊर्जा, प्रतिभा, भावना एवं आर्थिक सहयोग को दायित्व बोध के साथ ग्रामोंमुखी बनाने का अद्भुत कीर्तिमान स्थापित किया। हजारों नगरवासियों ने ग्रामयात्रा की और गांवों को गोद लिया। इस प्रकार नगर संगठन एवं ग्राम संगठन का सुन्दर समन्वय प्रस्तुत हुआ। छोटे-बड़े नगरों के सम्भ्रांत लोग वनवात्रा करने के साथ गांवों से जुडऩे लगे।

गांधीजी ने जिसे नई तालीम कहा उसे एकल ने जीवनोपयोगी शिक्षा (Functional Education) कहा। एकल विद्यालय के हर छात्र को ‘ Earn While you learn का नारा दिया। पढऩे के साथ वृक्षारोपण, स्वच्छता, गोबर खाद बनाने का प्रशिक्षण एवं प्रेरणा दी, ताकि ग्रामीण क्राफ्ट अर्थात रेशम, साबुन, टोकरी, कपड़ा, हल्दी जैसे हर प्रकार के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया गया।

गांधीजी के ‘ग्राम-स्वराज’ पर विचार

‘ग्राम-स्वराज्य की मेरी कल्पना यह है कि वह एक ऐसा पूर्ण प्रजातंत्र होगा, जो अपनी महत्व की जरूरतों के लिए अपने पड़ोसी पर भी निर्भर नहीं करेगा और फिर भी बहुतेरी दूसरी जरूरतों के लिए, जिनमें दूसरों का सहयोग अनिवार्य होगा, वह परस्पर सहयोग से काम लेगा।’

‘बुनियादी तालीम के आखिरी दर्जे तक शिक्षा सबके लिए लाजिमी होगा। जहां तक हो सकेगा, गांव के सारे काम सहयोग के आधार पर किये जाएंगे।’

‘गांव का शासन चलाने के लिए हर साल गांव के पांच आदमियों की एक पंचायत चुनी जायेगी। इसके लिए नियमानुसार एक खास निर्धारित योग्यता वाले गांव के बालिग स्त्री-पुरूषों को अधिकार होगा कि वे अपने पंच चुन लें। इन पंचायतों को सब प्रकार की आवश्यक सत्ता और अधिकार रहेंगे।’

‘व्यक्ति ही अपनी इस सरकार का निर्माता भी होगा। उसकी सरकार और वह दोनों अहिंसा के नियम के वश होकर चलेंगे।’

‘हम जो भी काम करें उसमें मुख्य विचार मानव के कल्याण का ही होना चाहिये।’

‘मेरी राय में भारत की, न सिर्फ भारत की बल्कि सारी दुनिया की, अर्थ-रचना ऐसी होनी चाहिये, जिसमें किसी को भी अन्न और वस्त्र के अभाव की तकलीफ न सहनी पड़े। दूसरे शब्दों में, हर एक को इतना काम अवश्य मिल जाना चाहिये कि वह अपने खाने-पहनने की जरूरतें पूरी कर सके।’

‘सच्ची योजना तो वह होगी, जो हिन्दुस्तान की समूची मनुष्य-शक्ति का अच्छे से अच्छा उपयोग करे।’

(उपरोक्त सभी उद्धरण गांधीजी की पुस्तक ग्राम स्वराज्य से)

एकल की कार्य योजना एवं नये प्रयोग तथा उपलब्धियां

एकल ने पंचमुखी शिक्षा (जीवनोपयोगी शिक्षा) के द्वारा गांधी-दर्शन को जमीन पर उतारा तथा वनवासी एवं ग्रामीण समाज की सर्वांगीण उन्नति का मार्ग प्रशस्त किया।

  • एकल विद्यालय: एक गांव में एक शिक्षक 30 बच्चों (16-14 वर्ष आयुवर्ग) को 3 घंटे में 7 विषयों का अनौपचारिक पद्धति से पढ़ाता है।
  • स्वास्थ्य शिक्षा एवं आरोग्य योजना: पूरे गांव को, विशेष कर माता एवं बच्चों को स्थानीय उपलब्ध प्राकृतिक सम्पदा जैसे नीम, तुलसी आदि का प्रयोग करके स्वस्थ एवं शारीरिक स्वच्छता रखना सिखाता है। आरोग्य योजना में बीमारी के इलाज की सुविधा दी जाती है।
  • ग्राम विकास एवं ग्रामोत्थान: विकास शिक्षा के माध्यम से जल सरंक्षण, गो-सेवा, गोबर खाद, ग्रोमूत्र कीटनाशक, वन संरक्षण, पशुपालन आदि का ज्ञान दिया जाता है। ग्रामीण उत्पादन पर जोर तथा रासायनिक खाद के विष के स्थान पर जैविक खाद का प्रयोग सिखाया जाता है। गो, गंगा, धरती माता के सम्मिलित आर्शीवाद से गांव में सुख, शान्ति, समृद्धि आ सकती है।
  • जागरण शिक्षा: (स्वराज शिक्षा) गांव के नवयुवकों तथा ग्राम समिति को
  • सरकारी योजनाओं को प्राप्त करने का तरीका, साथ ही अपने दायित्वों का निर्वाह करने की शिक्षा दी जाती है। इसका माध्यम सत्संग है।
  • संस्कार शिक्षा: इसमें बच्चों तथा बड़ों में प्रकृति प्रेम, देशभक्ति, बड़ों का सम्मान, श्रमदान एवं नशा मुक्ति की प्रेरणा दी जाती है।

एकल विद्यालय की यात्रा सन 1988-89 में दक्षिणी बिहार (झारखण्ड) में धनबाद के आसपास के 60 गांवों से प्रारम्भ हुयी और आज लद्दाख से केरल तक, असम से गुजरात-राजस्थान तक, 55 हजार गांवों में  पहुंच गई है। सीमावर्ती जंगल हो या दुर्गम पहाड़ी इलाका, एकल की यात्रा बढ़ती रही।

25-04-2015

एकल की गतिमान सफलता का रहस्य दो सिद्धांतों पर टिका है, स्थानीय सहभागिता एवं स्थानीय स्वामित्व। इसी आग्रह ने एकल को गांधीजी के ‘अंतिम जन’ अर्थात गरीबतम उपेक्षित जन तक पहुंचाया। ग्रामीण के साथ, ग्रामीण के लिये, ग्रामीण के द्वारा ही इस विशिष्ट योजना को आगे बढ़ाया गया। इस पद्धति ने उनमें स्वाभिमान का भाव तथा महात्वकांक्षा को जगाया। यही ऊर्जा एकल की सफलता का आधार बनी। जमीनी सेवाव्रती कार्यकर्ता हो, आचार्य हो या स्वास्थ्य एवं विकास के कार्यकर्ता हों, सभी उसी गांव से उसी समाज से होना अनिवार्य रखा। इससे स्थानीय नेतृत्व एवं स्वामित्व को प्रोत्साहन मिला। प्रत्येक गांव में शिक्षा, आरोग्य, विकास, संस्कार, जागरण, ग्रामोत्थान, महिला एवं युवा की 7 समितियों में 8 व्यक्ति प्रति समिति के हिसाब से 56 महिला-पुरूष-युवा को एकल की गतिविधियों में सक्रिय सहभागी बनाया। इस प्रकार गांव की शिक्षा, विकास एवं समृद्धि के लिये गांव के लोगों को ताकत दी। अपने सपने स्वयं पूर्ण करने व स्वावलम्बी एवं सक्षम बनने की प्रेरणा दी। इस हेतु अनेकों प्रकार के प्रशिक्षणों का आयोजन निर्धारित किया गया। विशेषकर युवा को जागृत किया गया। ‘जल, जंगल, जमीन, जन, जानवर यह तुम्हारी सम्पति है। इसका संवर्धन-संरक्षण तुम्हारा दायित्व है।’’ इसके लिये ग्रामोत्थान  केन्द्र (Resource Center) बनाया गया, जहां ग्रामीणों को प्रशिक्षित किया जाता है।

‘हमारे गांव की सेवा करने से ही सच्चे स्वराज्य की स्थापना होगी, अन्य सब प्रयत्न निरर्थक सिद्ध होंगे’ (पृ. 30, ग्राम-स्वराज्य)। गांधीजी की आत्मा ग्राम स्वराज में बसती थी। एकल अभियान उनके इस सपने को एकल योजनाओं के माध्यम से पूर्ण करने में प्रयासरत है। ग्राम पंचायत तथा ग्रामीण समाज के सशक्तिकरण के लिये एक ओर सरकारी योजनाओं का ज्ञान देना तथा उन्हें प्राप्त करने का तरीका बताया जाता है तो दूसरी ओर, अपने दायित्वों के निर्वाह को वरीयता देना सिखाया जाता है। प्रकृति संरक्षण हेतु विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। ये सभी प्रशिक्षण साप्ताहिक सभा में दिये जाते हैं। ग्रामीणों को आरटीआई (RTI) का प्रयोग सफलतापूर्वक सिखाया गया है।

उल्लेखनीय है कि एकल योजना में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका बड़े स्तर पर सुनिश्चित की जाती है। 55 हजार गांवों में 70 प्रतिशत शिक्षक महिलायें हैं, जो अपना गांव नहीं छोड़तीं। इसलिये एकल विद्यालय का ड्राप आऊट रेट (12-20 प्रतिशत) अपेक्षाकृत सर्वशिक्षा अभियान से बहुत कम है। 100 प्रतिशत आरोग्य सेविका महिलायें हैं। प्रत्येक गांव की समिति में महिला सदस्य अनिवार्य है। इस प्रकार 2.5 से 3 लाख महिलायें एकल की गतिविधियों में निरन्तर सक्रिय भूमिका निभाती हैं। नशामुक्ति में बहनें ही अग्रणी भूमिका निर्वाह करती हैं तथा ग्राम कोष स्वावलम्बन संग्रह में भी वे अग्रणी हैं। एकल गांवों में युवकों का पलायन 20 प्रतिशत कम हुआ है तथा रासायनिक खाद का प्रयोग घटा है।

गांधीजी स्वदेशी के हिमायती थे, परन्तु वे विकास, आधुनिकता, मशीनरी एवं टेक्नोलॉजी के खिलाफ नहीं थे। उनका आग्रह था कि हमें, विशेषकर हमारे गांवों को इनका गुलाम नहीं बनाना है। जितनी आवश्यकता है उतना ही उसका उपयोग करो। ‘श्रम’ की महत्व को बरकरार रखते हुये आधुनिकीकरण को स्वीकार करना चाहिये। पश्चात्य का अंधानुकरण नहीं करना चाहिये। एकल ने आधुनिक एवं पारंपारिक ज्ञान तथा विधा के बीच सुन्दर एवं संतुलित समन्वय स्थापित किया है।

टेक्नोलॉजी के बारे मे गांधीजी के विचार – ”मैं अधिक से अधिक विकसित यंत्रों के उपयोग का भी समर्थन करूंगा, यदि उसमें भारत की दरिद्रता और उससे पैदा होने वाला आलस्य मिट सके। परन्तु, मैं उनकी विवेकहीन वृद्धि के खिलाफ हूं। मैं यंत्रों का बाहरी विजय से प्रभावित होने से इनकार करता हूं। मैं तमाम नाशकारी यंत्रों का कट्टर विरोधी हूं।’’ एकल पद्धति में टेक्नोलॉजी का प्रयोग आवश्यकता के अनुसार किया गया है। एकल ने झारखंड तथा उत्तर प्रदेश के (GRC) बहुमुखी विकास केन्द्रों में कम्प्यूटर शिक्षा लैब स्थापित किया है।

‘गो आधारित कृषि एवं कृषि आधारित विकास’ को आधार बनाकर गांव एवं शहर के बीच की दूरी को कम करने का उपक्रम एकल में किया गया है। देश की प्राकृतिक सम्पदा-संरक्षण एवं कृषि से समृद्धि की परंपरा को कायम रखते हुये एकल योजना एक जन अभियान बन चुकी है। देश और दुनिया के सैकड़ों नगरों के समृद्ध सक्षम महिला-पुरूष युवा इस अभियान को प्रशस्त कर रहें हैं। लाखों ग्रामवासी एवं हजारों नगरवासी एकल अभियान के सहयोगी हैं। गांव बचेगा तो देश बचेगा। देश बचेगा तो विश्व बचेगा। ओम् विश्वशान्ति:।

 मंजु श्रीवास्तव

(लेखिका एकल संस्थान की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।) 

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