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संरक्षण की बाट जोहता एशिया का एकमात्र हमाम

संरक्षण की बाट जोहता एशिया का एकमात्र हमाम

सुल्तान जहां बेगम, जिन्होंने एशिया के अपनी तरह के एकमात्र हमाम को दान में दिया था, उसकी  हालत आज कोई बहुत अच्छी नहीं है। हमाम को चलाने वालों की चार पीढिय़ां इस धरोहर के संरक्षण में खप गईं। अगली पीढ़ी चाहती है कि सेहत बनाने वाले इस प्राकृतिक कौशल का संरक्षण होना चाहिए और सरकार को अपनी नजरें इस हमाम पर इनायत करनी चाहिए।

हमाम के मौजूदा वारिस मो. खलील हैं, जिनकी पिछली चार पीढिय़ां इस धरोहर के संरक्षण में लगी रहीं। मो. खलील के बेटे मो. जमील बताते हैं कि सुल्तान जहां बेगम ने यह हमाम उनके बुजुर्गो को दान में दिया था। उसके बाद से पीढ़ी दर पीढ़ी उनका परिवार इस अद्भुत भेंट की शान को बरकरार रखे हुए हैं। हर साल दीवाली से होली तक गर्म करके इसकी पहचान को जिंदा रखा है। इसकी शिल्पकला के बारे में इन लोगों का कहना है , ”ऐसी कलाकारी न तो कभी हुई है और न ही होगी। महंगाई के इस दौर में भी हम हमाम को जिंदा रखे हुए हैं। इसका संचालन पंरपरा को निभाने के लिए ही किया जा रहा है। इससे होने वाली आय से सिर्फ हम लोगों को पेट ही पल पाता है। इस हमाम को गर्म करने के लिए प्रतिदिन तीन क्विंटल लकड़ी लगती है।’’

25-04-2015

यह हमाम जिस इमारत में बना है, वह चूने और अन्य धातुओं से मिलकर बनी है। र्इंट और पत्थर का इसमें कहीं भी इस्तेमाल नहीं हुआ है। हमाम के संचालक बताते हैं कि हर साल बारिश का पानी इस हमाम की इमारत में भर जाता है, क्योंकि यह चूने जैसी अन्य वस्तुओं  से बनी है। हमाम की शिल्पकला अद्भुत है। इसकी बनावट और तरकीब भी अनूठी है। हमाम में प्रवेश के पहले एक कक्ष है, जिसमें सर्दी में भी सामान्य वातावरण बना रहता है। इस कक्ष से लगा 12 फीट लंबा एवं चौड़ा एक ऊंचा कमरा है, जो सामान्य से अधिक गर्म और नमी से भरपूर रहता है। इस कमरे से लगी दो छोटी गैलरियां हैं, जिनमें शीतलता रहती है। इन गैलरियों से लगे कमरों में फर्श से उठती भाप शरीर को ऊष्मा से तर कर देती है। वाष्पयुक्त कक्ष की वास्तुशिल्प की विशेषता यह है कि पानी के दो खुले हौजों (टंकियों) में से एक ठण्डा रहता है।

इस कमरे के फर्श के भीतर तांबे की 3 इंच मोटी परत बिछी है। गर्म हौज के नीचे तांबा धातु है। इस कमरे के ऊपर छत में मोटे कांच का रोशनदान है। कमरे की नालियों से ताजी हवा आती है। इस कक्ष के नीचे भट्टी बनी है, जहां हमाम के दूसरी ओर लकडिय़ां भर कर जलाई जाती हैं, जिसके दहकते ही कमरा गर्म हो जाता है और गैलरियां ठण्डी।

हमाम में महिलाओं एवं पुरूषों के लिए अलग-अलग व्यवस्था है। सुबह 11 से शाम 4 बजे तक हमाम सिर्फमहिलाओं के लिए खुला रहता है। महिलाओं को नहलाने का काम हमाम की महिलाएं ही करती हैं। इसके बाद शाम 7 बजे से सुबह 4 बजे तक यह पुरूषों के लिए खुलता है। यहां आते समय हल्का भोजन करके आएं और टॉवेल भी साथ लाएं। नहाने में एक घंटे का समय लगता है।

हमाम के दीवाने

45 वर्षीय मो. हुसैन पिछले 35 सालों से यहां नियमित आ रहे हैं। वे अभी नहाकर ही बाहर निकले थे। अपने  चेहरे की चमक और तंदरूस्त शरीर का कारण बताते हुए वे कहते हैं , ”यहां आने से इंसान कभी रोगी नहीं होता। मैं उस समय से यहां आता हूं जब मालिश के डेढ़ रूपये लगा करते थे।’’ वे बताते हैं कि यहां जिस्म की पूरी सफाई हो जाती है, जो घर पर रोजाना के स्नान से नहीं हो पाती है। हड्डियों की बीमारी, रक्तचाप सब कुछ ठीक रहता है। यह सबके लिए लाभदायक है। वे कहते हैं, ”यह हमारी धरोहर है। इसे बचाने के लिए भी हमें आगे आना चाहिए।’’ 60 वर्षीय जावेद जैदी कहते हैं कि हमाम बहुत जरूरी और सेहत के लिए फायदेमंद है। पूरा जिस्म तरोताजा हो जाता है। हर शख्स को यहां आना चाहिए। हमाम में पहली बार आए 38 वर्षीय तरूण प्रजापति कहते हैं, ”यहां के बारे में लोगों से सुनकर आया हूं, लेकिन जैसा सुना था उससे भी ज्यादा मजा आया यहां।’’ इसी तरह 25 साल के योगेश वर्मा भी यहां पहली बार आकर खुश हैं और हर साल यहां आने का मन बना लिया है। अपने पिता मो. जुबेर के साथ आए 20 वर्षीय मो. सोहेल कहते हैं, ”मेरे दादा भी यहां आया करते थे। पिताजी भी आते हैं। बुजुर्ग से हमाम के बारे में इतना सुना है कि मैंने भी यहां शुरू कर दिया।’’

किसने और क्यों बनवाया

कदीमी हमाम से प्रसिद्ध इस हमाम का निर्माण गौंड शासकों के शासनकाल में हुआ था। संभवत: इसका निर्माण समय सन् 1718 था। जानकारों के अनुसार उस समय भोपाल में निजामशाह गौंड शासक हुआ करता था और बैरागढ़ (संत हिरदाराम नगर) उसकी राजधानी थी। दूर-दूर से उसके मेहमान हाथी-घोड़ों से यात्रा करके आते थे। यह यात्रा कई दिनों की होती थी। अपने मेहमानों की थकावट को दूर कर उन्हें तरोताजा करने के लिए गौंड शासकों ने इस हमाम का निर्माण करवाया था। इसी तरह नवाबी दौर में नवाब परिवार और शाही मेहमानों की सेवा के लिए हमाम का संचालन नवाब के खास हज्जाम हम्मू खलीफा द्वारा किया जाता था। कुछ लोगों के मुताबिक, एक मान्यता यह भी है कि पुराने समय में सूबे में आने वाले लोगों को हमाम में इसलिए नहलाया जाता था, ताकि उनके साथ आनी वाली गंदगी और बीमारियां सूबे में प्रवेश न कर पाएं।

भोपाल से अंजु अग्निहोत्री

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