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ब्रह्मपुत्र का क्या होगा?

ब्रह्मपुत्र का क्या होगा?

चीन और भारत के बीच जल वितरण संधि नहीं होने के कारण समस्या दिन-ब-दिन और भी जटिल होती जा रही है।इसलिए प्रस्तावित बांधों के कारण चीन लाभ की स्थिति में होगा। कमजोर मौसम के दिनों में चीन अपनी इच्छा के अनुरूप भारत को ब्रह्मपुत्र नदी के पानी से वंचित कर सकने में सक्षम होगा।

तिब्बत स्वायत क्षेत्र के जंगमु में ब्रह्मपुत्र नदी (तिब्बत में यारलुंग सांगपो के नाम से विख्यात) पर पहले से ही प्रस्तावित 510 मेगावॉट की हाईड्रो इलेक्ट्रिक परियोजना और डागु, जिएक्सु एवं जियाचा क्षेत्र में इसी तरह की तीन और परियोजनाएं शुरू करने की घोषणा के साथ ही भारत और चीन के बीच संघर्ष के लिए एक और बिंदू मिल गया है। उपरोक्त सभी परियोजनाएं नदी के बीचों-बीच बननी हैं, जिसमें नदी पर बड़े बांधों का निर्माण भी शामिल है। हाल ही में कनाडाई पर्यावरणविद् माइकल बकले ने कहा है कि ब्रह्मपुत्र नदी के बीचों-बीच चीन पांच झरनेदार बांध बना रहा है और 20 अन्य बांध ब्रह्मपुत्र और इसकी सहायक नदियों पर बनाने की योजना बना रहा है। असम की एक गैर-सरकारी संस्था जन जागृति द्वारा की गई गणना के अनुसार, तिब्बत में 35 बांध बनने वाले हैं, जिसमें 8 ब्रह्मपुत्र नदी पर और 27 बांध इसकी सहायक नदियों पर बनेंगे। लेकिन, विडंबना यह है कि ब्रह्मपुत्र नदी पर भारत की खुद की नजरें हैं, जो पारिस्थितिकी तंत्र के विनाश में थोड़ा ही सही, लेकिन योगदान दे सकता है।

इस नदी के अस्तित्व के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है। इससे भारत और बांग्लादेश, दोनों प्रभावित होंगे। भारत सरकार को इससे अवगत होना चाहिए, लेकिन इस मुद्दे को नजरअंदाज करने का सरकार का अजीब रवैया है। कुछ समय पहले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश को आश्वासन दिया था कि भारत को चिंतित होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि चीन द्वारा निर्मित बांध प्रवाह वाले हैं। तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने फरवरी 2014 को अपनी सरकार के जल संसाधन मंत्रालय को सत्यापित करने के लिए कहा था कि वाकई ये बांध प्रवाह वाले हैं या जल के प्रवाह को रोकने वाले। तत्कालीन यूपीए द्वारा यह भी निर्णय लिया गया था कि रक्षा मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और अंतरिक्ष मंत्रालय संयुक्त रूप से इस मुद्दे पर चीन से बात करेंगे। तो क्या नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली वत्र्तमान सरकार इस कदम का अनुसरण कर रही है? इस मामले में अभी तक कुछ भी स्पष्ट नहीं है।

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इस दहशत के कारण भी हैं। 1 मार्च 2012 को सीयांग नदी (ब्रह्मपुत्र नदी को अरूणाचल में इसी नाम से जाना जाता है) पासीघाट में पूरी तरह सूख गई थी। बेहद चौड़ाई वाले इस स्थान पर नदी में पानी असीमित मात्रा में रहता है। हालांकि नदी अपने प्रवाह की गति को प्राप्त कर रही है, लेकिन अभी तक अपने पूर्व पौरूष को नहीं प्राप्त कर सकी है।

भारत की सरकार चीन के स्पष्टीकरण से कभी संतुष्ट नहीं हुई। झांग्मू बांध के निर्माण को चीन लंबे समय से इंकार करता रहा है और भारत ही नहीं बल्कि अन्य देशों के लगातार पूछताछ पर चीन ने इसकी अवधारणा और परियोजना की प्रगति को 2010 में स्वीकार कर लिया। यहां तक कि अगर बांध प्रवाहशील हैं भी तो उसमें भी पानी की बड़ी मात्रा को जमा करने की जरूरत होगी। इसके कारण ब्रह्मपुत्र नदी की पोषक तत्वों वाली गाद से युक्त मिट्टी से, जो असम को उर्वर बनाती है, उत्तर-पूर्वी भारत वंचित रह जाएगा। ऊपर वर्णित सभी बांध एक-दूसरे से बेहद नजदीकी रूप से संबंधित हैं। इसके कारण ब्रह्मपुत्र नदी के अविरल प्रवाह में बाधा आएगी। संभावना यह भी है कि तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर इतने सारे हाईड्रो प्रोजेक्ट्स वाले बांधों के कारण असम को मानसून के महीनों में वत्र्तमान से 64 प्रतिशत कम और साल के अन्य महीनों में 85 प्रतिशत कम जल प्राप्त होगा।

चीन और भारत के बीच जल वितरण संधि नहीं होने के कारण समस्या दिन-ब-दिन और भी जटिल होती जा रही है। इसलिए प्रस्तावित बांधों के कारण चीन लाभ की स्थिति में होगा। कमजोर मौसम के दिनों में अगर चीन की इच्छा होगी तो वह भारत को ब्रह्मपुत्र नदी के पानी से वंचित कर सकने में सक्षम होगा। उसी तरह मानसून के महीने में वह मनमाने ढंग से बांधों से पानी छोड़ सकता है, जिसके कारण उत्तर-पूर्वी राज्यों में बाढ़ से बड़े पैमाने पर तबाही मच सकती है।

25-04-2015

इस मसले पर भारत अभी भी कुछ कहने से हिचकिचा रहा है, जबकि संभावित खतरे के प्रति बंाग्लादेश पहले ही सचेत हो चुका है। बांग्लादेश पहले ही बीजिंग को विरोध-पत्र भेज चुका है और उसकी एक प्रति नई दिल्ली को भी भेजी है। अगर, जैसा कि कहा जा रहा है, ब्रह्मपुत्र नदी के बेहद नजदीक प्रस्तावित मेडॉग में अपने भारी हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट को चीन आगे बढ़ाता है तो यह भारत और बांग्लादेश के हितों के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित होगा। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि ब्रह्मपुत्र की उत्पत्ति कैलाश पर्वत के नजदीक आंग्सी ग्लेशियर से होती है और दक्षिणी तिब्बत में 1790 किलोमीटर यात्रा करने के बाद नामचा बारवा पर्वत के पास वृहद मोड़ लेकर (यू टर्न) यह भारत में प्रवेश करती है। इसे नदी का महामोड़ (ग्रेट बेंड) कहा जाता है। यहां 2000 मीटर नीचे जल के प्रवाह के कारण दुनिया की सबसे बड़ी घाटी बनती है।

अब इस तरह के संकेत मिल रहे हैं कि मेडॉग परियोजना को लेकर चीन बेहद गंभीर है। तेजी से बढ़ रही पूंजीवादी विकास की प्रक्रिया में जल और ऊर्जा जैसे संसाधनों का अधिकतम दोहन चीन की जरूरत है और इसमें तालमेल बैठाने के लिए चीन ने 2011-15 वाली 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 120 मिलियन किलोवॉट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा था।

चीन को भारी-भरकम इंजीनियरिंग परियोजनाओं में बेहद रूचि है और ब्रह्मपुत्र के ग्रेट बेंड के नजदीक एक परियोजना अमल में आ जाती है तो यह यांग्त्जे नदी पर बनी ‘थ्री गॉर्जेज डैम’ से लगभग दुगनी होगी, जो अपनी तरह की दुनिया की सबसे बड़ी परियोजना होगी। यह परियोजना अकेले 38-49 गीगावॉट बिजली का उत्पादन करेगी, जबकि भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 33 गीगावॉट है।

भूविज्ञान चीन के पक्ष में नहीं है और यह भारत के लिए संभावित खतरा है, क्योंकि जिस जगह पर यह परियोजना संचालित होनी है वह जगह भूगर्भीय खतरा रेखा के बेहद करीब है, जहां भारतीय प्लेट्स यूरेशियन प्लेट्स से टकराते हैं। इन भारी-भरकम संयंत्रों और उनके बांधों को भूकंप (7.9 रेक्टर स्केल) के लगातार खतरों से जुझना पड़ेगा, जैसा कि 2008 में थ्री गॉर्जेज डैम तबाह हुआ था और परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर आर्थिक एवं जान-माल का नुकसान हुआ था। इस तरह की स्थिति दुबारा उत्पन्न हो सकती है और इससे असम एवं अरूणाचल प्रदेश का बड़ा हिस्सा भयंकर बाढ़ की चपेट में आ सकता है।

दिसंबर 2014 में चीन यांग्त्जे नदी के पानी को अपनी राजधानी बीजिंग सहित उत्तर के बंजर इलाके में सफलतापूर्वक मोड़ चूका है। यह भारत में भय का एक अन्य द्वार खोलने के लिए पर्याप्त है। तो क्या ब्रह्मपुत्र नदी अगला लक्ष्य है? आखिरकार माओत्से तुंग से लेकर वत्र्तमान राजनीतिक नेतृत्व तक, हर राजनीतिक नेता दक्षिण के अतिरिक्त पानी को  उत्तर में स्थानांतरित करने का विचार करते आए हैं। तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति जियांग जेमिन ने 1999 में ‘ग्रेट वेस्टर्न एक्सटै्रक्शन प्लान’ की घोषणा की थी, जिसमें जल की भारी मात्रा को तिब्बत से पीले सागर में स्थानांतरित करने की योजना शामिल थी। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2008 में इस मुद्दे को चीनी प्रमुख के सामने उठाया था। लेकिन तब तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने दो टूक जबाव देते हुए कहा था कि चीन में पानी की कमी के कारण जल का विस्थापन जरूरी है।

यह सच है कि पूंजीवाद के तेज विकास में बहते चीन को जल संसाधन की भारी मात्रा में जरूरत है, लेकिन चीन को भी नीचे नदी तट पर बसे देशों की आवश्यकताओं और खतरों को याद रखना चाहिए। हालांकि मौसम भी चीन के प्रति समान रूप से उदार नहीं है। देश के दक्षिणी हिस्से में 80 इंच सालाना वर्षा होती है, वहीं उत्तरी हिस्से में यह सिर्फ 8-16 इंच सालाना है। लेकिन, चीन ने उत्तर में 20 मिलियन जनसंख्या वाले बीजिंग और 12 मिलियन जनसंख्या वाले तियानजिंग जैसे शहरों को स्थापित किया। परिणाम यह हुआ कि इन इलाकों में भू-जल का विनाशकारी उपयोग हुआ। 1999 से अब तक बीजिंग का भूजल स्तर 2.9 मीटर घट चुका है। अगर 1959 से देखा जाए तो भूजल में 59 मीटर की कमी आ चुकी है।

चीन में पानी की कमी खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है। चीन में 300 मिलियन लोगों को पेयजल उपलब्ध नहीं है, वहीं 600 में से 400 शहर एवं महानगर पानी की कमी से जूझ रहे हैं। इसके बावजूद तथ्य यह है कि चीन के पास 2.8 ट्रिलियन क्यूबिक मीटर जल भंडार है, लेकिन चीन की विशाल जनसंख्या के कारण प्रति व्यक्ति यह जल भंडार मात्र 2300 क्यूबिक मीटर है। इसलिए पानी के लिए चीन कीइस भूख को देखकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए और आने वाले दिनों में विभिन्न एशियाई देशों के बीच इस मुद्दे पर भू-रणनीतिक तनाव के लिए तैयार रहना चाहिए। चीन के उत्तरी भाग में देश की कुल जनसंख्या का 44.3 प्रतिशत हिस्सा और 59.6 प्रतिशत कृषि भूमि है, लेकिन देश के कुल जल संसाधन का सिर्फ 4.5 हिस्सा ही इस क्षेत्र में है। इस क्षेत्र में प्रति व्यक्ति जल भंडार बेहद कम, सिर्फ 747 क्यूबिक मीटर है। इसलिए यहां की कृषि भूमि और उद्योग, दोनों ही दबाव में हैं।

चीनी नेतृत्व द्वारा देश के दक्षिण से उत्तर में भारी मात्रा में पानी के विस्थापन की परिकल्पना की गई है। इसके दो वर्ग हैं। पहले स्तर के अंतर्गत यांग्त्जे नदी से 45 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी को देश के उत्तरी और पश्चिमी भाग में स्थानांतरित करना शामिल है। इसके पहले भाग का परिचालन शुरू हो गया है। दूृसरी योजना के तहत ब्रह्मपुत्र नदी से 50 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी को पंप कर पीले सागर में डालने का लक्ष्य रखा गया है।

ब्रह्मपुत्र नदी योजना में तकनीकी व्यवहार्यता को लेकर चीनी नीति-निर्माताओं के बीच विवाद है। विशेषज्ञों के एक समूह का मानना है कि इस परियोजना को पूरा करना असंभव है, क्योंकि इससे क्षेत्र की भूगर्भीय और स्थलाकृति की स्थितियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। दूसरा समूह इन परियोजनाओं को पूरा करने के पक्ष में है।

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इन परिस्थितियों में चीन को संयम और बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करना चाहिए, क्योंकि हिमालयी नदी बेसिन चीन, भारत, बांग्लादेश और नेपाल के 1.3 बिलियन लोगों के जीवन का आधार है। स्थिति और भी भयावह होती जा रही है, क्योंकि अगले दो दशकों में इन बेसिनों में प्रति व्यक्ति जल की वार्षिक उपलब्धता में 13-35 प्रतिशत कमी आएगी। मुंबई स्थित स्ट्रेटिजिक फोरसाइट ग्रुप की गणना के अनुसार, हिमालय का 70 प्रतिशत ग्लेशियर अगले 100 वर्षों में पूरी तरह पिघल जाएंगे। हिमालय से निकलने वाली 10-20 प्रतिशत नदियां पूरी तरह इन्हीं ग्लेशियरों पर निर्भर हैं।

ब्रह्मपुत्र नदी के जल को नियंत्रित करने के लिए भारत और चीन के बीच जल्दी ही प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाएगी। नई दिल्ली पहले ही ब्रह्मपुत्र नदी पर 800 मेगावॉट की क्षमता वाले हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट को स्वीकृति दे चुकी है। पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति ने ब्रह्मपुत्र की दो सहायक नदियों – लोहित और सुबनसिरी, पर इसी तरह की अन्य परियोजनाओं को शुरू करने का सुझाव दिया था। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया था कि इन परियोजनाओं की शुरूआत उन स्थानों पर करनी चाहिए जो भारत-चीन सीमा के नजदीक हो। स्पष्ट है कि इसका उद्देश्य चीन को चुनौती देकर सौदेबाजी की अपनी क्षमता को बढ़ाना है। लेकिन, यह ब्रह्मपुत्र के लिए विनाशकारी साबित होगा।

अगर भारत और चीन इस मुद्दे पर प्रतिस्पर्धा करते हैं तो बांग्लादेश के लिए स्थिति दयनीय हो जाएगी। बारिश से तंग देश होने के बावजूद बांग्लादेश जलापूत्र्ति के लिए अंतर्राष्ट्रीय नदियों जैसे बाहरी स्रोतों पर पूरी तरह निर्भर है। यह प्रति वर्ष 1106 क्यूबिक किलोमीटर जल बाहरी स्रोतों से प्राप्त करता है। इसमें से 600 क्यूबिक किलोमीटर पानी अकेले ब्रह्मपुत्र नदी से प्राप्त होता है। बांग्लादेश की आंतरिक जल क्षमता सिर्फ 105 क्यूबिक किलोमीटर है। अत: उस स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है, जब ब्रह्मपुत्र नदी का जल ऊपरी क्षेत्रों में ही रोक कर प्रयोग किया जाएगा।

 अमिताव मुखर्जी

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