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चीन ब्रह्मपुत्र क्यों चाहता है

चीन ब्रह्मपुत्र क्यों चाहता है

 ये सच है कि चीन दुनिया के सबसे तेज बांध निर्माताओं में से एक है। 1949 में चीन के पास सिर्फ 22 बांध थे, लेकिन ये आंकड़ा 2011 में बढ़कर 25,000 तक पहुंच गया। चीन की 16 प्रतिशत बिजली जल विद्युत से आती है। चीन की जल परियोजनाओं पर पहले ही पर्यावरण को नुकसान पहुचाने के अलावा नीचले हिस्से के पड़ोसी देशों में रहने वाले लोगों को विस्थापित करने के आरोप लगते रहे हैं।

”इस शताब्दी में तेल से ज्यादा महत्वपूर्ण जल है।’’ पूर्व संयुक्त राष्ट्र महासचिव बुतरस बुतरस-घाली ने ठीक ही इस तथ्य पर जोर दिया कि भविष्य में तेल की तुलना में जल ज्यादा महत्वपूर्ण होगा और ये सच भी होता दिखाई दे रहा है। इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है चीन और भारत के बीच जल को लेकर चल रही रस्साकशी। चीन और भारत सर्वोच्च शक्ति के रूप में उभर रहे हैं और विकास के इस संघर्ष में दोनों देशों को तेजी से पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है। ये समस्या और भी जटिल होती जा रही है, क्योंकि भारत की अधिकतर नदियां चीन से निकलती हैं। ये समस्या उन नदियों के साथ ज्यादा है जो चीन-भारत की सीमा को पार करती हैं और इसमें सबसे महत्वर्पूण है ब्रह्मपुत्र नदी। ये नदी भारत और बांग्लादेश जैसे नीचले क्षेत्रों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है। ये नदी अपने रास्ते में पडऩे वाले सभी क्षेत्रों के लिए जीवन और अजीविका का एक स्रोत है, लेकिन चीन ने वॉटर डायवर्सन परियोजना के तहत इस नदी पर बांध निर्माण की श्रृंखला का काम शुरू कर दिया है। इसके कारण नदी के प्रवाह और ढर्ऱे में परिर्वतन होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। इसके चलते नदी के नीचले क्षेत्र में रहने वाले लोगों को गंभीर समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

25-04-2015

ये सच है कि चीन दुनिया के सबसे तेज बांध निर्माताओं में से एक है। 1949 में चीन के पास सिर्फ 22 बांध थे, लेकिन ये आंकड़ा 2011 में बढ़कर 25,000 तक पहुंच गया। चीन की 16 प्रतिशत बिजली जल विद्युत से आती है। चीन की जल परियोजना पर पहले ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के अलावा नीचले हिस्से के पड़ोसी देशों में रहने वाले लोगों को विस्थापित करने के आरोप लगते रहे हैं। थाईलैंड, वियतनाम, लाओस और कंबोडिया जैसे चीन के दक्षिण-पूर्वी देश पानी के मुद्दे पर पहले ही अपने पड़ोसी देश चीन के आमने-सामने हैं, लेकिन मेकॉन्ग नदी पर बांधों के निर्माण की वजह से रिश्ते और भी तीखे बनते जा रहे हैं। इस नदी पर बांध के निर्माण से नदी के जल प्रवाह में बाधा और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा है।

चीन और भारत के जल विवाद को समझने के लिए हमें सबसे पहले चीन के भौगोलिक ढांचे को समझने की आवश्यकता है। चीन में दुनिया की आबादी की लगभग 20 प्रतिशत जनसंख्या रहती है, लेकिन ये लोग यहां पर पानी की कमी की समस्या का सामना कर रहे हैं, क्योंकि यहां पर पानी के सिर्फ 7 प्रतिशत स्रोत ही मौजूद हैं। चीन के अपने तीन मुख्य जल स्रोत हैं: ग्लेश्यिर, भूजल और सतही जल। चीन के पर्यावरण संरक्षण मंत्रालय ने भी इस बात को माना है कि चीन की नदियों का एक चौथाई जल प्रदूषित हो गया है और इस जल को पीने, कृषि या औद्योगिक उपयोग के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। इस समय चीन कि सबसे बड़ी समस्या उसके शुद्ध जल की कमी नहीं, बल्कि उसके उद्योगों और उसके विशाल जनसंख्या द्वारा जल संसाधनों का आवश्यकता से अधिक दोहन करना है। चीन अधिकतर अपनी जल की पूर्ति देश में ही पूरी कर लेता है, लेकिन पानी का सही वितरण न होने के कारण, अधिकतर मीठे जल के संसाधन देश के दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम क्षेत्रों में स्थित हैं और उत्तरी चीन के हिस्से ज्यादातर सूखे हैं।

25-04-2015

चीन ने दो मुख्य वॉटर डायवर्सन प्रोजेक्ट तैयार किए हैं: दक्षिण-उत्तर वॉटर डायवर्सन और ग्रेट वेस्टर्न रूट डायवर्सन प्रोजेक्ट। दक्षिण-उत्तरी वॉटर डायवर्सन पहली बार 1952 में माओ जेडोंग ने प्रस्तावित किया और 2050 तक इसके पूरे होने का अनुमान लगाया गया। यह परियोजना लगभग 44.8 लाख क्यूबिक मीटर दक्षिणी जल के स्थांतरण के लिए जानी जाती है। इसके द्वारा चीन के उत्तरी हिस्से में मुख्यता बीजिंग और तियानजिंग में यांग्त्जी नदी के जल को सुरंगों, जलसेतु और नहरों की एक श्रंखला द्वारा पहुंचाया जाएगा।

हालांकि विवाद का मुद्दा ग्रेट पश्चिमी रूट डायवर्सन प्रोजेक्ट को लेकर है, जिसका सीधा असर भारत और बांग्लादेश के निचले तट राज्यों पर पड़ेगा। ये प्रोजेक्ट ब्रह्मपुत्र नदी के ‘ग्रेट बेंड’ पर बांध के निर्माण में भी शामिल है। इसे शूमातन पॉइंट के नाम से जाना जाता है। यहां से नदी यू-टर्न लेकर भारत में पूर्व की ओर बहने लगती है। अरूणाचल प्रदेश में और उसके बाद असम के मैदानी इलाकों को पार करते हुए अंत में बांग्लादेश से होकर बहती है। भारत के लिए ये मुख्य चिंता का विषय है, क्योंकि ये नदी भारत के पूर्वोत्तर भाग के लिए जीवनदायनी है, लेकिन चीन की मायावी रणनीति के कारण भारत कुछ कर पाने की बजाए असहाय होता जा रहा है।

ब्रसेल्स संस्थान के समकालीन चीनी अध्ययनकर्ता जोनथान होल्सलाग का कहना है, ”वास्तव में चीन लगातार अध्ययन कर रहा है कि कैसे हिमालय से पानी निकालकर अर्थिक केंद्र और पश्चिम में देश के विशाल बंजर इलाकों तक पहुंचाया जाए।’’ 2002 में  राज्य परिषद ने दक्षिण-उत्तर वॉटर डायवर्सन को मंजूरी दे दी। इस परियोजना का एक हिस्सा हांग्जों और बीजिंग के बीच उन्नयन का विषय बन गया है। दूसरा मार्ग बीजिंग को यांग्त्जी नदी से जोड़ता है। तीसरा, इस बात की उम्मीद है कि नदी के पानी को तिब्बत और यूनान की पीली नदी की ओर कर दिया जाए। लेकिन, ब्रह्मपुत्र का पश्चिमी मार्ग डायवर्जन बहस का मुद्दा है। ये योजना 80 के दशक में ही विकसित हो गई थी। चीनी सैन्य प्रतिष्ठान के द्वारा इसका समर्थन किया गया। सेना चीनी पीपुल्स राजनीतिक सलाहकार सम्मेलन का गठन करने में कामयाब रही जो कि देश का सर्वोच्च राजनीतिक सलाहकार निकाय था। 1997 में वैज्ञानिक और सलाहकार सम्मेलन के सदस्य हे जुऑक्सीयु ने एक अनुमानित तौर पर दावा किया कि पश्चिमी मार्ग चीन में 133 मिलियन हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में वृद्धि कर सकता है। इससे चीन में कृषि समस्याओं का हल निकल सकेगा और साथ ही चीन के 160 करोड़ लोगों को रोजगार भी प्राप्त हो सकता है। उन्होंने कहा कि इस परियोजना को लागू करने से चीन में बेरोजगारी खत्म हो सकती है और हर चीनी के लिए पर्याप्त भोजन प्राप्त हो सकता है।

25-04-2015

पश्चिमी मार्ग के लिए पहला विकल्प अरुणाचल प्रदेश से 30 किलोमीटर दूर  लोंगबाई के पास यारलुंग के ग्रेट बेंड पर एक बांध का निर्माण करना है। ग्रेट बेंड में यह नदी दो पहाड़ों के बीच की घाटी से बहती है और लगभग 2500 मीटर की दूरी पर उतरते हुए एक मोड़ बनाती है। यारलुंग के ग्रेट बेंड पर बांध बनाने पर यह थ्री गॉर्जेस बांध से तिगुनी ऊर्जा पैदा कर सकता है। यारलुंग से पानी लाजिया घाटी में एक बड़े जलाशय में एकत्र किया जा सकता है और बाद में इसे येले नदी या चंगाई झील की तरफ मोड़ा जा सकता है। चंगाई झील से यह पानी आंतरिक मंगोलिया में गजान नूर, जिंगजिआंग में उरुमची और तारीम डेजर्ट में उपलब्ध कराया जायेगा। इससे शुओतीआं नहर परियोजना के रूप में जाना जाता है। यह पूरी परियोजना, जो वॉटर करिडोर्स चंगाई झील और येलो नदी तक पानी पहुंचाएंगे, 50 से 200 बिलियन क्यूबिक पानी जमा करने की क्षमता रखता है, जो कि ब्रह्मपुत्र के कुल औसत वार्षिक निर्वहन के एक तिहाई से ज्यादा होगा।

हॉलॉग ने कहा, ”बड़े  बांधों  के  निर्माण के क्या परिणाम होंगे, इससे लगभग हर कोई अवगत है, क्योंकि इनसे बहाव के उपयोग के लिए उपलब्ध पानी की मात्रा में कमी आएगी। प्राकृतिक बाढ़ चक्र में बाधा आएगी और साथ ही तटवर्ती, समुद्री, और मत्स्य पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था में भारी परिवर्तन आएगा।’’ आने वाले वक्त में, जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ ग्लेश्यिर से निकलने वाली नदियां जैसे कि ब्रह्मपुत्र में भी इसके बुरे प्रभाव देखने को मिलेंगेे। जिस दर से तापमान लगातार बढ़ रहा है उससे हिमनद पिघलने की संभावना और अधिक बढ़ गई है। पर्यावरण में इस तरह के बदलाव से मुख्य रूप से नदी का प्रवाह कुछ वक्त के लिए तो बढ़ेगा, लेकिन भविष्य में नदी का जल स्तर घटता जाएगा जो कि लोगों के लिए काफी घातक होगा। अगर चीन लगातार बांध निर्माण के क्रम में इसी तरह आगे बढ़ता रहा, तो आगे आने वाले वक्त में लगातार सिकुड़ती हुई नदी के परिणामों को बीजिंग द्वारा नियंत्रण किया जाएगा, जो कि भारत के लिए विनाशकारी सिद्ध होगा।

रोहन पाल

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