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फिर चालू ‘लालू डिग्री’

फिर चालू ‘लालू  डिग्री’

बिहार में हुई मैट्रिक की परीक्षा में नकल का आलम यह रहा कि हाईकोर्ट को दखल देना पड़ा। हाईकोर्ट ने यहां तक कह दिया कि ऐसे शिक्षा मंत्री को हटा देना चाहिए। इस बार की परीक्षा ने पन्द्रह वर्षों के लालू-राबड़ी शासनकाल की याद ताजा करा दी, जब परीक्षार्थी किताब खोल कर खुलेआम परीक्षा देते थे। उन दिनों परीक्षार्थी बिना पढ़े पास हुए जिसे ‘लालू डिग्री’ से पास कहा गया। इस बार की परीक्षा ने एक बार फिर ‘लालू डिग्री’ की याद ताजा करा दी है।

17 मार्च को शुरू हुई बिहार बोर्ड की मैट्रिक परीक्षा में 1,100 परीक्षा केंद्रों पर 14.26 लाख से ज्यादा छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया। अनुचित तौर-तरीकों के इस्तेमाल के आरोप में परीक्षा के पहले दो दिन ही 1,000 से ज्यादा परीक्षार्थी निष्कासित हुए। लेकिन ऐसा नहीं है कि व्यापक पैमाने पर नकल राज्य में पहली बार देखी गई है। दसवीं बोर्ड की परीक्षा एक बेंचमार्क है और प्रदेश के ग्रामीण समाज में मैट्रिक पास छात्र-छात्राओं को सम्मान से देखा जाता है। ऐसा हमेशा से रहा है। 1970 के दशक में कर्पूरी ठाकुर की तत्कालीन सरकार ने अंग्रेजी विषय की अनिवार्यता खत्म कर दी थी। उस वक्त ऐलान किया गया था कि अंग्रेजी में फेल परीक्षार्थी भी ‘मैट्रिक पास’ माने जाएंगे। इस अवधारणा को व्यंग्य में ‘कर्पूरी डिवीजन’ भी कहा गया था।

25-04-2015

जैसा कि प्रदेश के शिक्षा मंत्री पी.के. शाही ने कहा है, ”नकल सिर्फ  बिहार में नहीं होती। लेकिन नकल को मिली सामाजिक मान्यता इसे अलग करती है।’’ ‘ओपन बुक एग्जाम’ की अवधारणा पर पश्चिमी देशों का ध्यान जाने के वर्षों पहले नकल के जरिए बिहार में स्टुडेंट्स इसे अजमाते रहे हैं। परीक्षार्थी के अनुकूल राज्य के तौर पर प्रदेश की ख्याति देश भर में है। इस साल पड़ोसी राज्यों झारखंड और ओडिशा से राजस्थान तक के परीक्षार्थी डिग्री पाने के लिए बिहार बोर्ड की परीक्षा में शामिल पाए गए। राज्य में नकल कराने वाले सैकड़ों गिरोह भी सक्रिय हैं, जिनकी पैठ शिक्षा विभाग और स्कूलों में है। नकल के आरोप में परीक्षार्थी भले निष्कासित हो जाएं, गिरोह के मुखिया पकड़ में नहीं आते। ये गिरोह फॉर्म भरवाने से लेकर परीक्षा दिलाने और बेहतर अंक दिलाने तक का दावा करते हैं। उसके लिए 50,000 रूपए तक वसूलते हैं।

हालांकि इसका कोई भरोसेमंद रिकॉर्ड नहीं है कि परीक्षा में नकल रोकने में दिलचस्पी लेना शिक्षकों ने कब बंद कर दिया, पर पुराना दौर देख चुके लोगों के मुताबिक 60 के दशक के आखिरी वर्षों में कुछ अन्य मसलों पर छात्र आंदोलन के साथ मैट्रिक और इंटरमीडिएट की परीक्षाओं में नकल तेजी से फैली। जल्द ही यह व्यापक तौर पर मान्य हो गई। 1996 में पटना हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाई थी और जिला जज की देखरेख में परीक्षाएं हुर्इं। तब 5,74,110 परीक्षार्थियों में से सिर्फ 12 फीसदी ही उत्तीर्ण हो पाए थे।

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वित्तरहित स्कूलों को छात्रों की संख्या और मैट्रिक पास करने की श्रेणी के हिसाब से अनुदान मिलना, सर्टिफिकेट लाओ और नौकरी पाओ के आधार पर बड़े पैमाने पर टीचर बहाली तथा संविदा आधारित नौकरियों में भी अंक के आधार पर बहाली जैसी योजनाओं का फायदा पाने की चाह में भी लोग नकल के लिए प्रेरित होते हैं।

शिक्षा मंत्री के बयान से जाहिर होता है कि सरकार नकल को लेकर गंभीर नहीं है। शाही ने विधानसभा में अपने विभाग की बजट परिचर्चा में जवाब देते हुए कहा, ”किस परीक्षा में अनुचित साधनों का इस्तेमाल नहीं होता है? मैट्रिक परीक्षा से लेकर यूपीएससी की परीक्षा तक में ऐसा इस्तेमाल होता है। एम्स की परीक्षा की सीबीआइ जांच हो रही है। किस राज्य में नकल नहीं होती?’’ शाही ने परीक्षार्थियों के अभिभावकों और उनके शुभचिंतकों को नकल का जिम्मेदार ठहरा दिया था, जिससे उनकी आलोचना हो रही थी। मीडिया में सामूहिक नकल की तस्वीरें आ जाने के बाद उस पर लगाम लगाने में उन्होंने असमर्थता जताई। विडंबना यह है कि शाही ने जो कुछ भी कहा, वह कड़वा सच है। करीब 14 लाख परीक्षार्थी और उनके चार-पांच रिश्तेदार यानी जिस परीक्षा में 70 लाख लोग शामिल हों, उसमें जनसहयोग के बिना शत-प्रतिशत शुद्धता आसान नहीं है। वहीं बीजेपी ने शाही के असमर्थता जताने पर उनके इस्तीफे की मांग की तो पटना हाईकोर्ट ने उनके बयान को संज्ञान में लिया और सरकार को नकल रोकने के लिए कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव, जिनके समर्थन पर नीतीश सरकार टिकी है, ने बक्सर के एक सुदूर देहात में एक स्कूल का उद्घाटन करते हुए यह कहकर विवाद पैदा कर दिया, ”अगर हमारी सरकार होती तो हम परीक्षार्थियों को लिखने के लिए किताब दे देते…किताब से वही जवाब लिख पाता, जिन्होंने पढ़ाई की होती। और वे जिन्होंने पढ़ाई नहीं की होती, तीन घंटे किताब में जवाब तलाशते रहते।’’ हालांकि यह एक मजाक था, लेकिन राज्य की शिक्षा पर एक सटीक कटाक्ष भी है।

पटना से कफील एकबाल

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