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चुनौती अमानीशाह नाले की

चुनौती अमानीशाह नाले की

एक जमाने में गुलाबी नगर जयपुर में प्रवाहित प्राकृतिक नदी ‘द्रव्यवती’ काल की मार में सीवरेज, फैक्ट्रियों के प्रदूषित पानी, अतिक्रमण एवं अवैध निर्माणों के चलते अमानीशाह नाले के रूप में अभिशप्त हो गई, अब उसे चीन के शंघाई शहर तथा अहमदाबाद के साबरमती रिवर फ्रंट की तर्ज पर विकसित किए जाने की वसुंधरा सरकार की परियोजना को पलीता लगाने में भू माफिया तथा निहित स्वार्थी तत्व बाज नहीं आ रहे हैं।

उच्चतम न्यायालय ने जयपुर को वल्र्ड क्लास सिटी बनाने के निर्देश के साथ राजस्थान उच्च न्यायालय को एम्पॉवर्ड कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्यवाही करने को कहा है। दो पूर्व न्यायाधीशों की इस कमेटी ने भी अपनी सिफारिश में अमानीशाह नाला क्षेत्र में जगह-जगह पर सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाकर उसके पानी से पार्क आदि विकसित करने की सिफारिश की है। राजस्थान उच्च न्यायालय ने पहले इस क्षेत्र की सेन्ट्रल लाइन तय करने के निर्देश दिये थे। जद्दोजहद के बाद जयपुर विकास प्राधिकरण ने नाले के डेमोक्रशन हेतु जगह-जगह चेतावनी बोर्ड तथा पिलर भी लगाए थे, लेकिन भू-माफिया प्राधिकरण को धत्ता बताने में कोई गुरेज नहीं कर रहे हैं।

25-04-2015

प्राधिकरण के सूत्रों के अनुसार अमानीशाह नाला प्राधिकरण के लगभग आधा दर्जन जोन क्षेत्र इसके अन्तर्गत आते है। अभी चौथे जोन के सांगानेर क्षेत्र में कपड़ा रंगाई-छपाई की फैक्ट्रियों के पीछे सीताबाड़ी इलाके के गुलाब विहार के आस-पास भू-माफियाओं ने नाले के प्राकृतिक बहाव को बदलने के मकसद से जगह-जगह नई खुदाई कर दी तथा मलवा डालकर नाले के बहाव को मोडऩे का प्रयास किया। इन तत्वों का दुस्साहस देखिए कि प्राधिकरण द्वारा लगाये गए चेतावनी बोर्ड के नजदीक मेड़ बनाकर कब्जा करने से नहीं चूके। मिट्टी के नये टीले बनाने से नाले का गंदा पानी गुलाब विहार तथा आस-पास की कॉलोनियों में फैलने से वहां रहने वालों का जीना दूभर हो गया है।

दिसम्बर माह के तीसरे सप्ताह में मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे के समक्ष अमानीशाह नाले की तस्वीर बदलने की भावी योजना के बारे में ‘मैसर्स टाटा संस’ तथा उसकी भागीदार चीन की कंपनी ‘शंघाई अर्बन कंस्ट्रक्शन ग्रुप’ की ओर से प्रस्तुति दी गई। चीन की इसी कंपनी ने शंघाई में अमानीशाह नाले के अनुरूप करीब 45 कि.मी. लम्बाई में बहने वाली टैक-सी नदी क्षेत्र का सौंदर्यीकरण किया है। मुख्यमंत्री ने इस संबंध में विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) तैयार करने के निर्देश देकर लगभग साढ़े तीन दशक के लम्बे अंतराल के बाद अभिशाप बने अमानीशाह नाले की तकदीर बदलने के लिए ठोस कदम उठाने का मार्ग प्रशस्त किया है। इस परियोजना पर 250 से 300 करोड़ रूपये खर्च होने का अनुमान है। अब यह तो वक्त बताएगा कि प्राकृतिक द्रव्यवती नदी से परिवर्तित अमानीशाह नाला कब शंघाई शहर या अहमदाबाद के साबरमती रिवर फ्रंट के अनुरूप बदल पाएगा।

जयपुर विकास प्राधिकरण से जुड़े जोन के अधिकारियों तथा इंजीनियरों के सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक तो इस क्षेत्र में उपलब्ध करीब 800 बीघा सरकारी जमीन के बड़े हिस्से को मनोरंजन पार्क, खेल मैदान, क्लब, पिकनिक स्थल तथा पर्यटन से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों के लिए नीलामी से मिलने वाली धनराशि से अमानीशाह नाले की कायाकल्प की जा सकती है। अमानीशाह नाले के लगभग 40 कि.मी. क्षेत्र में से करीब 33.50 कि.मी. जमीन प्राधिकरण और शेष नगर निगम जयपुर के क्षेत्राधिकार में है।

दरअसल 1981 की अतिवृष्टि में जयपुर के नाहरगढ़ की पहाडिय़ों की पश्चिमी तलहटी में एकत्रित बरसाती पानी से शहर के पश्चिमी भाग में उत्तर से दक्षिण में करीब 40 कि.मी. लम्बे क्षेत्र में बहकर ढूंढ नदी में मिलने वाली इस द्रव्यवती नहर क्षेत्र की बाढ़ ने इस नदी की हदों को बांधकर नाले के रूप में परिवर्तित करने वाले अतिक्रमणों तथा अवैध निर्माणों से जुड़ी गंभीर समस्या को उजागर किया था। द्रव्यवती से अमानीशाह नाले में बदले इस जल प्रवाह में नाहरी का नाका नाला, गंदा नाला तथा जवाहर नाला समेत कई छोटे-मोटे नाले मिलते हैं, जिस पर कई बांध भी बने हुए हैं। इनमें से श्रीरामचन्द्रपुरा तथा गूलर बांध से तो खेतों में सिंचाई भी होती रही है।

कंसल्टिंग इंजीनियरिंग सर्विसेज (सी.ई.एस.) संस्था के माध्यम से वर्ष 1985-86 में कराये गये अध्ययन से तैयार रिपोर्ट के अनुसार इस नाले का जलग्रहण क्षेत्र 148.5 वर्ग किमी. था और 1981 में आयी बाढ़ के दौरान बंबाला पुल पर 992.39 घन मीटर एवं मजार बांध पर 324.97 घनमीटर प्रति सेकेण्ड अनुमानित अधिकतम बहाव माना गया। वह रिपोर्ट ठंडे बस्ती में चली गई और करीब दो दशक के बाद 2001-02 में अमानीशाह नाले के क्षेत्र का सर्वे करके अलाइनमेंट निर्धारित किया गया। इस पर 161.40 मीटर से 201.20 मीटर चौड़ाई के अनुसार सीमांकन कार्य की शुरूआत तो हुई, लेकिन मौके पर करीब 70 प्रतिशत लम्बाई में सीमांकन कार्य पूरा होने के साथ विरोध होने पर यह काम बीच में ही रूक गया। जुलाई, 2003 में प्राधिकरण ने नाले की चौड़ाई निर्धारित करने के लिए आठ सदस्यों की समिति गठित की, जिसमें तत्कालीन विधायक और बाद में गुजरात के राज्यपाल रहे स्वर्गीय नवल किशोर शर्मा भी शामिल थे।

समिति ने 1985-86 में सी.ई.एस. की अध्ययन रिपोर्ट के आधार पर मजार बांध से बंबाला पुल तक नाले की चौड़ाई निर्धारित की। विडंबना यह रही कि नदी के पाट खोजने की गर्ज से कराई गई अध्ययन रिपोर्ट के बीस साल बाद इसे आधा-अधूरा माना गया। फिर मौके की स्थिति के अनुसार अलाइनमेंट में जरूरी संशोधन के लिए उपसमिति गठित की गई। इस उपसमिति ने जून 2005 की रिपोर्ट में नाले के बहाव को यथावत रखते हुए पक्का नाला बनाने के लिए तकनीकि प्रस्ताव की सिफारिश की।

अमानीशाह नाले को बरसाती नाले के रूप में डिजाइन करने का काम नवम्बर 2005 में नई दिल्ली की मैसर्स स्पॉन कंसल्टेंट्स प्रा. लि. को सौंपा गया। कंपनी ने डिजाइन का प्रारंभिक प्रारूप प्रस्तुत किया और जून 2007 में प्रमुख शासन सचिव की अध्यक्षता में इसकी प्रस्तुति हुई, जिसमें नाले के बांधों के जलभराव क्षेत्र तथा आर्मी क्षेत्र के नाले को कच्चा रखने का सुझाव आया। फिर जनवरी, 2008 की बैठक में कंसल्टेंट की ओर से प्रस्तावित नाले की चौड़ाई एवं गहराई के अनुमोदन के साथ नाले की प्रस्तावित मध्य रेखा (अलाइनमेंट) के अनुमोदन से पूर्व मौके की जांच करने को कहा गया। सेन्ट्रल लाइन के निर्धारण पर राज्य सरकार के पांच विभागों की माथा पच्ची के बाद फरवरी 2009 में रिपोर्ट फाइनल की गई। इसी साल नाले की चौड़ाई का मामला उच्च न्यायालय में पहुंच गया। समाजसेवी पी.एन. मेंदोला की याचिका पर सितम्बर 2009 में न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में नाले की चौड़ाई 150 से 210 फीट रखने के निर्देश दिए।

कोर्ट के आदेश के अनुसार नाले की चौड़ाई से प्रभावित 482 आवासीय-गैर आवासीय निर्माण हटाए गए। उधर इस मसले को अदालत तक ले जाने वाले पी.एन. मंदोला तथा सर्वे ऑफ इंडिया में सुपरिटेंडिंग सर्वेयर रहे सुरेश चंद शर्मा ने द्रव्यवती नदी को संवारने के लिए एक दर्जन सुझाव भी दिए। लेकिन इसमें सुराख करने वाले भू-माफिया तथा निहित स्वार्थी तत्वों से भी साचेत रहकर उनसे कड़ाई से निपटने की दोहरी जिम्मेदारी भी सरकार तथा प्रशासन को निभानी होगी।

जयपुर से गुलाब बत्रा

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