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मुक्ति का मार्ग तलाशती बेडऩी

मुक्ति का मार्ग तलाशती बेडऩी

भाग्य को कोसती राई नृत्य कर दर्शकों को मनोरंजन प्रदान करने वाली बेडऩी जाति की लोक नर्तकियां अपना शरीर बेचकर दो जून की रोटी जुटाने के लिए विवश हैं। लम्हा-लम्हा अपने अतीत के गौरवशाली वक्त को भूलकर गर्त में गिरने को विवश राई नर्तकी की कहानी कभी हमें रूलाती है तो कभी करूणा के सागर में हिलोरे मारने को भेज देती है। बुन्देलखण्ड के पठारी भू-भाग में रहने वाली बेडिय़ा जाति की जिन्दगी पठार की तरह ही सख्त हो गयी है। पानी के लिये पाताल तोड़ कुएं की तरह इन्हें भी पेट रूपी पाताल की उदरपूर्ति के लिये क्या-क्या नहीं करना पड़ रहा है।

राई नृत्य से लोक नृत्य को जोडऩे वाली नृत्यांगना जाति के रुप में पहचानी जाने वाली बेडऩी देह के दम पर भूख मिटाने को विवश हैं। बेड़नियों के जीवन में अंधेरा-ही-अंधेरा है, जहां से रोशनी की खुशनुमा सुबह को दहलीज पर आने की कोई राह नहीं है। कभी दबंगों और जमीदारों की अंकशायिनी बनने को मजबूर रही बेडऩी आजादी के इतने साल बाद भी खुद को आजाद नहीं मान पा रही हैं।

गीत-संगीत, गायन-वादन एवं नृत्य में अपना जीवन व्यतीत कर देने वाली बेडिय़ा जाति ने लोकनृत्य से शास्त्रीय नृत्य के मार्ग को देशी पद्धति में आरम्भ कराने का मार्ग प्रशस्त किया। बेडिय़ा जाति ने राई लोकनृत्य को अपने श्रम और कौशल से नई मंजिल पर स्थान दिलाया है। अपनी कला से शास्त्रीय नृत्य के मार्ग को देशी पद्धति में आरम्भ कराने का मार्ग प्रशस्त किया। लय और ताल के खेल में अपने वरिष्ठों से पारंगत होकर लोगों के मनोरंजन के साथ-साथ कला का जादू बिखेरती रही हैं। शास्त्रीय नृत्य की जननी ही लोकनृत्य है। भारतीय परम्परा में नृत्य के तीनों भेदों में से नाट्य को रसाश्रित और नृत्य को भावाश्रित माना गया है।

बुन्देलखण्ड में प्राकृतिक प्रकोप जल संकट के चलते बना रहता है। यहां किसान दाने-दाने के लिए परेशान हैं। सुखिया कहती है, जब किसान ही भूखे हैं तो शादी आदि कार्यक्रमों में नृत्य के लिऐ कैसे बुलाएं? पेट की भूख के लिए शरीर की भूख मिटाने के अलावा कोई चारा ही नहीं है।

ललितपुर जनपद के मंडावरा ब्लॉक मुख्यालय से सटे रनगंव में रहने वाली बेडिय़ा जाति की महिलाएं मनोरंजक संसाधनों की बहुतायत तथा लोगों की बदलती पसंद के चलते हाल के वर्षों में जिस्मफरोशी की ओर अग्रसर हुई हैं। सामंती काल में नृत्य और नृत्यांगना का समाज में विशेष स्थान था, लेकिन राजे-रजवाड़ों के पतन के बाद रनगांव (ललितपुर), बिजावर (छत्तरपुर), पथरिया (सागर) आदि स्थानों पर बड़ी संख्या में रहने वाली बेडिय़ा जाति पर दुखों का पहाड़ टूटा पड़ा है। आज देह बेचने को मजबूर बेडऩी जाति अपनी उत्पत्ति गंधर्व से मानती हैं। यह बात इनके भीतर अन्दर तक समा गयी है।

इस समाज की भी अजब गाथा है। यदि किसी बेडऩी का बकायदा ब्याह हो जाए तो वह धंधा नहीं करती है। मांग, बिंदी व दूसरे सुहाग चिन्ह तो हरेक बेडऩी धारण करती है। बेडऩी शादीशुदा औरतें मुक्ति का एकमात्र साधन विवाह को ही मानती हैं। ऐसा नहीं है कि यहां की महिलाएं इस गर्त से बाहर निकलना नहीं चाहती हैं। समाज का संकुचित नजरिया और सरकार की नाकाफी कोशिशें इन्हें आगे नहीं आने दे रही हैं। बेड़नियों से शादी करने वालों को मिलने वाली सहूलियतें और सामाजिक-आर्थिक लाभ की सरकारी घोषणाओं की हकीकत महज कागजों तक ही सीमित है।

सामाजिक तथा आर्थिक कारणों से वेश्यावृत्ति को मजबूर नृत्यांगनाओं का अतीत अत्यंत गौरवशाली रहा है। कभी सांस्कृतिक जागरण का संवाहक रहा राई नृत्य, आइटम सॉन्ग की चमक-दमक के आगे फीका पड़ गया है। शादी विवाह समारोह में कभी आन का प्रतीक रहा राई नृत्य से जन साधारण का मोह समाप्त हो रहा है। ग्राम रनगांव की बेडऩी लीला ललितपुर जिला पंचायत की सदस्य तक बनके अपने समाज का कोई भला नहीं कर पायी है। एक बेडऩी का दर्द कुछ इस तरह छलकता है – ”पुलिस चौकी के सिपाही डंडे के जोर पर हमारे घर की युवा लड़कियों को मुफ्त में हमबिस्तर करने के लिए ले जाते हैं।’’

इनकी जिन्दगी की कड़वी सच्चाई रोंगटे खड़े कर देने वाली हैं। राजस्वला होते ही युवा बेडऩी की नथ उतराई की रस्म का रिवाज है। इस रस्म के लिए दो हजार से पांच हजार रूपये तक का सौदा होता है। इतनी राशि देने वाले व्यक्ति की अंकशायनी बनने को विवश युवा बेडऩी की संवेदनाओं को पैसे की चमक के आगे मसल दिया जाता है। अपनी अंतव्र्यथा बयान करते दुलारी बताती है कि सोलह साल की उम्र में 60 वर्ष के व्यक्ति ने दो हजार रूपये में उसके साथ यह रस्म अदा की थी।

इस रस्म को बेड़नियों का समुदाय बुरा नहीं मानता, उत्सव के रूप में मनाता है। इस उत्सव के साथ ही अंधेरे दिनों की शुरूआत होते है रूह कांप उठती है। दुलारी कहती है कि एक दिन में पांच से दस पुरूषों को खुश करने में अंग-अंग दुखने लगते हैं, लेकिन घर वालों की मार और समाज के चलन के आगे सारी जिन्दगी दैहिक शोषण के जाल में मछली की तरह तड़पने के सिवाय कुछ शेष नहीं रह जाता है। मन, कामनाएं, सपनें, सोच और सेक्स की इच्छा की आजादी समाप्त हो जाती है। चंद पैसों के कारण आयातित लोगों द्वारा शारीरिक शोषण गुलामों की तरह होता है। भय-भूख और परम्परा के नाम पर देह के दवानल से मुक्ति का मार्ग मौत आने तक अनवरत चलता रहता है।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

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