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जरूरी है ‘गौरैया’ का संरक्षण

जरूरी है ‘गौरैया’ का संरक्षण

प्रकृति के सौंदर्य का अनुभव पक्षियों के बिना संभव नहीं है। पंचतत्व से निर्मित और पोषित इस प्रकृति में पर्वत, समुद्र, नदियां, जलाशय, वायु और सौर ऊर्जा के साथ-साथ पृथ्वी सहित सभी ग्रह-नक्षत्र शामिल हैं। पर्यावरण के संरक्षण के लिए जिस तरह जल, वायु और वृक्ष आवश्यक है, वैसे ही पारिस्थितिकीय संतुलन के लिए वन्य-प्राणियों, जलीय-जीवों तथा पक्षियों का अहम स्थान है। पक्षियों में एक छोटी सुन्दर घरेलू चिडिय़ा का नाम है गौरैया। 20 मार्च को इसके संरक्षण के लिए विश्व गौरया दिवस मनाया जाता है।

‘गौरया’ पक्षी की घटती संख्या को देखते हुए इस प्रजाति के संरक्षण की आवश्यकता महसूस की गई। यह दिवस मनाने की शुरूआत वर्ष 2010 में हुई। इस दिन पक्षियों के संरक्षण के प्रति मानवीय कत्र्तव्यबोध और जन जागरूकता लाने के उद्देश्य से विश्व के कई देशों में कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। ‘गौरैया’ पक्षी के संरक्षण के लिए सरकार, संस्थाएं, समाज और व्यक्ति सभी के द्वारा प्रयास किये जाने चाहिए। पक्षियों के प्रति मनुष्य का रवैया उदार, संवेदनशील और सम्मानजनक होगा तो उनका अस्तित्व बना रहेगा। पिछले कुछ दशकों में गौरैया सहित अनेक पक्षियों की संख्या कम हुई है, जो चिंता का विषय है। यह पक्षी विश्व के कई देशों में पाया जाता है। हमारे घर-आंगन में यह चिडिय़ा हर कहीं फुदकती दिखाई देती थी। इसकी चीं-चीं की मधुर आवाज अब कम सुनाई देती है। इसका कारण है मानवीय गतिविधियों का बढ़ता दखल, बढ़ता शोर और प्रदूषण। इनके प्राकृतिक और कृत्रिम आवासों को नष्ट करना या छेडऩा। दाना-पानी की कमी। खेतों में रासायनिक खाद के इस्तेमाल से भूमि की उर्वरा शक्ति में कमी आने के कारण दानों में पोषक तत्वों की कमी। इसके अतिरिक्त वनों का नष्ट होना तथा वृक्षों में कमी आना भी एक प्रमुख कारण है।

इन कारणों के अतिरिक्त ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसे प्राकृतिक कारण भी हैं। इन सबके बावजूद मनुष्य चाहे तो अपनी इच्छाशक्ति और प्रयासों से पक्षियों के संरक्षण के प्रति सहयोग कर सकता है। विशेष रूप से ग्रीष्म ऋतु में पक्षियों को आवास और दाना-पानी को लेकर विशेष कठिन परिस्थतियों से गुजरना पड़ता है। उनके आवास में दखल को कम करके तथा दाना-पानी की समुचित व्यवस्था करके हम उनका सहयोग कर सकते हैं। शोर में कमी करके भी सहयोग कर सकते हैं।

‘गौरेया’ चिडिय़ा अन्य पक्षियों की तुलना में मानव समाज के सबसे नज़दीक है। इसलिए इसे घरेलू चिडिय़ा कहा जाता है। यदि भवनों में इसे उपयुक्त स्थान नहीं मिलता तो यह पेड़ों तथा झाडिय़ों के झुरमुट में अपना घोंसला बनाती है। इस चिडिय़ा की खासियत है कि यह सर्दी और गर्मी दोनों मौसम में खुश रहती है। अंग्रेजी में इसे ‘स्पेरो’ Sparow (Perching Birds) कहते हैं। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में ‘केकर वार्म’ पर नियंत्रण के लिए आरंभ में इस चिडिय़ा को 1857 में पहली बार लाया गया, क्योंकि यह फसल के हानिकारक कीड़ों को खाकर ‘पर्यावरण मित्र’ बन जाती है। बाद में इसकी प्रजाति और संख्या में वृद्धि हुई। अमेरिका में आज यह होम ‘लैंडबर्ड’ है।

भारत में इसकी दो उपजातियां मिलती हैं। नर और मादा में अंतर होता है। इसके पंख कुछ सफेद, कुछ बादामी तथा कुछ भूरे होते हैं। इसकी चोंच भूरे रंग की तथा मोटी होती है। वैसे गौरेया साल भर अंडे देती है, परन्तु ज्यादातर यह फरवरी से मई तक अंडे देती है। इसके अंडे राख के रंग के होते हैं जिन पर भूरी चित्तियां होती हैं। धूल में यह चिडिय़ा मस्ती करती है, जैसे नहा रही हो। यह आपस में लड़ती भी खूब हैं। इनकी आवाज मध्यम होती है।

‘गौरैया’ की दूसरी जाति ‘जंगली चिड़ी’ के नाम से जानी जाती है। भारत में यह करीब सभी स्थानों पर पाई जाती है। इसके गले में पीला निशान होता है। मादा गौरैया के गले में पीला निशान नहीं होता है। पीठ पर लाल-भूरे धब्बे होते हैं। यह चिडिय़ा कम घने वन क्षेत्र तथा खुले क्षेत्र में विचरण करती है। झुण्ड में तथा जोड़े में दोनों तरह से आहार-विहार करती है। कुछ स्थानों पर यह स्थायी निवास करती है तथा कई बार यह कुछ स्थानों पर प्रवास हेतु यात्रा करती है। इसकी दो उपजातियां होती हैं। पहली कुछ पीली तथा दूसरी गहरे रंग की होती हैं। सामान्य गौरैया की तरह यह घरों के आसपास नहीं रहती। यह ग्रामीण तथा शहरी अंचलों में दिखाई देती है। कटाई के बाद यह चिडिय़ा खेतों में दाना चुगती पाई जाती है।

यह फूलों का रस पीती तथा कीट-पतंगों को खाती है। जमीन से 8-10 फुट ऊपर तथा वृक्षों पर यह अपना घोंसला बनाती है। एक बार में यह 3 से 4 अंडे देती है। अंडे पीले, हरे तथा सफेद होते हैं। इन पर भूरी चित्तियां होती हैं। गौरैया की तीसरी प्रजाति तूती के नाम से है, जो घरेलू चिडिय़ा नहीं है। यह ज्यादातर बगीचों में विचरण करती है। आकार में यह छोटी होती है तथा इसके गले का निचला हिस्सा पीला होता है।

मनुष्य का कत्र्तव्य है कि प्रकृति अंश इन वन्य-प्राणी और पक्षियों के प्रति वे उदार तथा सहृदय हों, तभी गौरैया सहित अन्य पक्षियों का संरक्षण संभव है।

श्रीराम माहेश्वरी

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