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प्रवासी श्रमिकों के लिए रोजगार व्यवस्था समय गहरे आत्ममंथन का

प्रवासी श्रमिकों के लिए रोजगार व्यवस्था  समय गहरे आत्ममंथन का

वैश्विक महामारी कोविड-19 की रोकथाम के लिए जिस प्रकार देश में लॉकडाउन लगाये गये हैं, उसके परिणामस्वरूप अफरातफरी में देश के मुख्तलिफ हिस्सों से श्रमिकों का अपने घर वापसी का सिलसिला बदस्तूर जारी है। इसके मुतल्लिक कई अहम् प्रश्नों के उत्तर लाजिमी हो जाते हैं। सबसे अहम प्रश्न यह उठता है कि आखिर कल तक जो श्रमिक अपने गृह राज्यों से बाहर दूसरे राज्यों के छोटे-बड़े शहरों में रोजगार से  अपने परिवार का पेट पाल रहे थे, उनके लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था कैसे और कब होगी और सबसे अधिक कौन करेगा?

इस सत्य से आसानी से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारत के तथाकथित ‘बिमारो’ राज्यों के रूप में बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और ओडिशा से रोजगार और बेहतर मजदूरी के लिए कुशल और अकुशल श्रमिकों का साल-दर-साल बड़े पैमाने पर पलायन होता है। प्रवासी श्रमिकों की त्रासदीपूर्ण पलायन की यह स्थिति महज देश में बेरोजगारी के खस्ता हाल को ही नहीं बल्कि विकास के मुद्दे पर क्षेत्रीय असंतुलन और घोर उपेक्षा को भी साफ-साफ परिलक्षित करता है। ऐसी दयनीय स्थिति में प्रवासी मजदूरों के लिए उनके राज्य सरकार रोजगार दिलाने और आर्थिक रूप से मदद करने में कितने सहायक होंगे यह अनुमान लगाना कोई कठिन कार्य नहीं है।

बिहार सरीखे राज्य में जहां देश की आजादी के बाद राष्ट्र के तीव्र विकास के लिए जिस प्लांड इकॉनमी का प्रारंभ हुआ था वह सात दशकों के बाद भी प्राय: 10 करोड़ आबादी को मुंह चिढ़ाता प्रतीत होता है। अन्य राज्यों से बिल्कुल परे बिहार के बारे में आज भी यही कहा जाता है कि वर्ष 2000 में इससे अलग हुए झारखण्ड के बाद बिहार में केवल तीन चीजें ही बची रह गयी हैं – बाढ़, बालू और बलवा। सालाना अभिशाप के रूप में विशेषकर उत्तरी बिहार में बाढ़ की विभीषिका किसी से छुपी हुई नहीं है। किसानों के पास पूंजी के अभाव में सिंचाई से महरूम कृषि योग्य भूमि और दियरा क्षेत्र में हजारों मील पसरे बालू के ढेर में मुफलिसी का जीवन जीने को अभिशप्त परिवारों की पथराई आंखें कभी आकाश को निहारती हैं तो कभी सरकार को बलवा के रूप में आपराधिक घटनाओं से आज भी बिहार महफूज नहीं है। उद्योगों के नाम पर यदि बिहार की राजधानी पटना और उसके आस-पास के क्षेत्रों के  कतिपय छोटे-बड़े कारखानों को छोड़ दें तो शेष जिले आज भी औद्योगीकरण की प्रक्रिया से मुकम्मल तौर पर अछूते हैं।

शेष राज्यों के रूप में ओडिशा, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के हालात भी कोई संतोषजनक तस्वीर पेश नहीं करते हैं। इन सभी राज्यों में पूंजी के अभाव और आर्थिक तंगी की वजह से कृषि की स्थिति बद से बद्तर होती जा रही है। उद्योगों में डिमांड डेफिशियेंसी के फलस्वरूप देश एक बड़ी मंदी के भवंर में फंसा हुआ है। करोड़ों ग्रामीण और शहरी शिक्षित युवा बेरोजगार हैं और हताशा में अपनी योग्यता और मर्यादा के इतर कोई भी नौकरी पाने के लिए बेसब्र हैं।

वर्तमान में ज्वलंत प्रश्न यह नहीं है कि आखिर राष्ट्रीय महत्व के बेरोजगारी सरीखी समस्या के समाधान के लिए दोषी कौन हैं? आकस्मिकता का प्रश्न यह है कि प्राय: चार करोड़ प्रवासी श्रमिक जो देश के विभिन्न महानगरों और छोटे-बड़े शहरों से अपने घर वापस लौट रहे हैं तो फिर इनलोगों के गुजारे के लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था कैसे होगी? इन सभी प्रवासी मजदूरों के सामने आसन्न समस्या पेट भरने की है, परिवार के गुजारे की है और सबसे अधिक उदासी और अवसाद से खुद को सुरक्षित रखने की है।

1929 की वैश्विक मंदी से संबंधित एक वाकया काफी रुचिकर है। फ्रेंक्लिन डी. रूजवेल्ट 1933 में  जब संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति बने तब यह वैश्विक मंदी अपनी पराकाष्ठा पर थी। तबके अर्थशास्त्रियों ने इस समस्या के तत्काल समाधान के लिए राष्ट्रपति रूजवेल्ट को यह सलाह दिया था कि वे श्रमिकों को रोजगार के लिए सुबह गड्ढे खोदने के लिए और शाम में उन्हीं गड्ढों को भरने के लिए मजदूरी दें। इससे उनके पास आय का सृजन होगा, वे अपनी जरूरत की सामग्रियों को खरीदने के लिए बाजार आयेंगे, आर्थिक गतिविधियां शुरू हो जाएंगी, अंतत: इससे मार्किट डिमांड बढेंगी और फिर अर्थव्यवस्था चल पड़ेगी। अर्थशास्त्रियों के इस सलाह में एक बहुमूल्य सन्देश यह छुपा हुआ है कि भारत में प्रवासी मजदूरों के गुजारे के संकट के समाधान के लिए मौजूदा दौर में केंद्र और राज्य सरकारों को कई अदद कल्याणकारी कार्यक्रमों को शीघ्रता से चलाने की दरकार है। शुरू में ऐसा करना बेशक राजस्व व्यय में वृद्धि करेगा और पहले से बढ़े राजकोषीय घाटे में और इजाफा करेगा, लेकिन दीर्घकालीन योजना के रूप में यह पहल जरूरतमंद और लाचार श्रमिकों के लिए रोजी-रोटी की व्यवस्था के साथ बाजार के हालात में भी सुधार लायेगा।

हिंदुस्तान सरीखे कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देश में खेती-बारी की हम अनदेखी नहीं कर सकते हैं। इसे प्राथमिकता के तौर पर पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रहे कृषकों को फ्री नहीं तो कम-से-कम अनुदानित कीमतों पर कृषि आगतों की आपूर्ति से न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में वृद्धि होगी बल्कि श्रमिकों का शहरी क्षेत्रों की तरफ माइग्रेशन को रोकने में भी काफी सहायता मिलेगी। इस सत्य को झुठलाना आसान नहीं होगा कि कृषि की प्रगति और इस कार्य में शामिल परिवारों के लिए जब तक आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जाती है तब तक कोई भी सरकारी योजना बहुत लंबा सफर तय नहीं कर पाएगी।

अंतत: इस दिशा में राज्य सरकार भी फटेहाल श्रमिकों के लिए वैकल्पिक रोजगार प्रदान करने की महती जिम्मेदारी से भाग नहीं सकती है। राज्यों में कच्चे मालों की सुलभ उपलब्धता के आधार पर विशिष्ट उद्योगों के विकास को युद्ध स्तर पर प्रारंभ करने की जरूरत है। घरेलू उद्योगों की संभावनाओं की नए सिरे से तलाश करनी होगी ताकि रोजगार के अवसरों में वृद्धि की जा सके। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आत्मनिर्भरता के सपने को साकार करने का रास्ता राज्य सरकारों के आत्मनिर्भर बनने की योजना से ही शुरू होती है। देश के श्रमिक राष्ट्र के विकास की आधारशिला हैं। उनके कुशल और मेहनती हाथों से देश का मुस्तकबिल बना है और आगे भी बनाया जा सकता है। लेकिन यह तभी मुमकिन है जब आज संकट में फंसे उनके जीवन को सहयोग और सहारा देने के लिए सरकार तत्परता से आगे आयें और संजीदिगी से हर संभव प्रयास करें।

 

श्रीप्रकाश शर्मा

(लेखक प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, मामित, मिजोरम, हैं)

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