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भाजपा सरकार में साकार दलित सशक्तिकरण

भाजपा सरकार में  साकार दलित सशक्तिकरण

आरक्षण एवं दलितों के राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक तीनों पक्षों के विकास की दिशा में भाजपा की सरकारों ने ऐतिहासिक कदम उठाये हैं। इसमें संदेह नहीं कि भाजपा की सकारात्मक राजनीति की यह पहल दलितों का जीवनस्तर बदल रही है और समाज में बराबरी के भाव का विकास तेजी से हो रहा है।

जिन प्रदेशों में भाजपा की सरकारें हैं, वो भी मोदी जी के पदचिह्नों पर चलते हुए दलितोत्थान के कार्यों की प्राथमिकता बनाये हुए हैं। दलितों पर अत्याचार के प्रकरणों में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस प्रकार त्वरित कार्रवाई करते हुए अपराधियों को जेल भेजा, उसकी सराहना अन्य दलों ने भी की।

सत्तर वर्षों से दलित शब्द की रट लगायी जा रही है। पर इतने वर्षों तक देश व प्रदेश की सत्ता में बने रहने वाले राजनैतिक दलों व प्रतिनिधियों ने दलितों को वोट की राजनीति के शोषण के अतिरिक्त कुछ विशेष न दिया। दलित समुदाय लगभग वहीं पड़ा रहा, जहां वह स्वतंत्रता के समय था। यूं तो कहने को आरक्षण नामक झुनझुना बजाकर कांग्रेस दशकों से इन्हें छलती आ रही थी। किंतु दलितों की सोचनीय स्थिति की सच्चाई यह थी कि देश में अनुसूचित जाति व जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम बनने में 52 वर्ष लग गये और 1989 में यह कानून बन सका। किंतु दलितों को लेकर कांग्रेस की कपट की पीड़ा अभी भी बनी रही और इसी को ढाल बनाकर दलित वोटों के सौदागर भी जन्म लेने लगे।

दलित राजनीति, दलित चिंतन, दलित विमर्श जैसे भारी-भरकम शब्दावलियों की जुगाली करके राजनीति चमकाने वालों की भी संख्या तो बढ़ती रही, किंतु दलितों के दुख कम न हुए। ऐसा इस कारण हुआ, क्योंकि किसी समाज का उत्थान थोथी भाषणबाजी और दिखावा से नहीं होता। इसके लिये उस समाज के उत्थान की समावेशी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। इस प्रक्रिया में उसे राजनैतिक अधिकार, न्याय, अवसरों की समानता और आर्थिक सशक्तिकरण के साथ सामाजिक संरक्षण भी प्रदान करना होता है और यह सब समग्रता से करना होता है।

यह समग्रता तब दिखी जब पहली बार अटल बिहारी बाजपेयी की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार केंद्र में आयी। भारत रत्न श्रद्धेय अटल जी कहते भी थे कि जीवन को टुकड़ों में नहीं देखा जा सकता, उसे समग्रता में देखना होगा और सुशासन तब तक संभव नहीं है जब तक समस्याओं का समाधान सम्पूर्णता व समग्रता में नहीं ढूंढ़े जायेंगे। यही दर्शन उनके शासन में भी दिखा और देश के इतिहास में पहली बार उन्होंने दलितों पर अत्याचार के निवारण की दिशा में ऐसे कदम उठाये, जो आज दलित संरक्षण की धुरी बन गया है। जिस एससी/एसटी कानून को पूर्ववर्ती सरकारों ने नख-दंत हीन बना रखा था, उसे अटल सरकार ने सुदृढ़ बनाया और 46 अन्य अपराधों को उसमें जोड़कर दलितों के संरक्षण को और मजबूती दी। साथ ही अटल जी की सरकार ने एससी/एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए संविधान में 77 वां, 81वां और 82 वां संशोधन किया तथा उनकी रिक्तियों को सुरक्षित रखने का भी प्रावधान किया।

भाजपा के लिये दलित उत्थान राजनीति का प्रश्न नहीं, वरन् सामाजिक आधिकारिता के प्रति निष्ठा और कर्तव्यबोध का विषय रहा है और जनसंघ से लेकर भाजपा बनने तक की यात्रा में आज तक दलितों के हितों को सुरक्षित रखने की प्रतिबद्धता रही है। समय के साथ यह प्रतिबद्धता और सुदृढ़ हुई और यही कारण है कि 2014 में केंद्र में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा की सरकार बनी तो नये सिरे से दलित उत्थान का बीड़ा उठाया गया, जिसमें अनुसूचित जाति व जनजाति को केवल राजनैतिक अधिकार व सामाजिक न्याय देना ही सम्मिलित नहीं था, अपितु इसमें दलित समुदाय के आर्थिक सशक्तिकरण का अभियान भी सम्मिलित था। जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति (एससी एवं एसटी) (अत्याचार निवारण) अधिनियम में 23 और नई धाराओं को जोड़कर इसे और मजबूत बनाया, वहीं एससी/एसटी से जुड़े प्रकरणों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों का गठन किया तथा आरोप पत्र दाखिल होने के दो महीने के अंदर मुकदमे के निस्तारण का प्रावधान भी किया। जब 2018 में उच्चतम न्यायालय के निर्णय से इस अधिनियम कमजोर पड़ा तो मोदी सरकार ने संविधान संशोधन करके अधिनियम को पुन: शक्ति प्रदान की।

दलितों को राजनैतिक अधिकार व आर्थिक सशक्तिकरण देने में भाजपा का मुकाबला अन्य कोई दल नहीं कर सकता। भाजपा के काल में श्री रामनाथ कोविंद देश के सर्वोच्च पद पर राष्ट्रपति के रूप में प्रतिष्ठित हुए। आज देश में एससी/एसटी समुदाय के सर्वाधिक सांसद व विधायक भाजपा के हैं और केंद्रीय मंत्रिमंडल में दलित समुदाय को जितना प्रतिनिधितत्व भाजपा सरकारों में मिला, उतना किसी अन्य दल की सरकार में नहीं दिया गया। इसी प्रकार मोदी सरकार द्वारा वंचितों के आर्थिक सशक्तिकरण के प्रारंभ की गयी मुद्रा योजना के आधे से अधिक लाभार्थी दलित व वंचित समुदाय के लोग रहे हैं। इसके अतिरिक्त मोदी सरकार ने दलितों के आर्थिक सशक्तिकरण के लिये स्टैंडअप इंडिया योजना प्रारंभ कर देश के बैंकों की प्रत्येक शाखा को 10 लाख से 1 करोड़ तक का ऋण देकर एससी/एसटी समुदाय के लोगों को उद्यमी बनाना अनिवार्य कर दिया है।

राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता में भले ही विरोधी दल लोगों को भ्रमित करने का प्रयास करें, किंतु सच यह है कि दलित कल्याण के लिये मोदी सरकार द्वारा उठाये गये कदमों का लाभ सीधा समुदाय के लोगों तक पहुंच रहा है। जिन प्रदेशों में भाजपा की सरकारें हैं, वो भी मोदी जी के पदचिह्नों पर चलते हुए दलितोत्थान के कार्यों की प्राथमिकता बनाये हुए हैं। अभी कुछ ही दिन पूर्व उत्तरप्रदेश के जौनपुर में कुछ धर्मांध मुसलमानों द्वारा दलितों की बस्ती जला दी गयी, आजमगढ़ में छेडख़ानी का विरोध करने पर जिहादी तत्वों ने दलितों के साथ मारपीट की। इन प्रकरणों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस प्रकार त्वरित कार्रवाई करते हुए अपराधियों को जेल भेजा, उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अंतर्गत कठोर कारवाई करने का निर्देश दिया और पीडि़त दलित परिवारों की आर्थिक सहायता की, उसकी सराहना अन्य दलों ने भी की। बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्षा बहन मायावती ने दलितों पर अत्याचार की रोकथाम और अपराधियों पर त्वरित कार्रवाई के लिये योगी सरकार की प्रशंसा की तो सु.भा.स.पा. के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने योगी सरकार के इस सराहनीय कदम को दलितों का हितसंवर्द्धन करने वाला माना।

यद्यपि भ्रम व विभाजनकारी राजनीति करने वाले लोग भ्रम का वातावरण बनाने का प्रयास करते रहते हैं। अभी उच्चतम न्यायालय के एक प्रकरण को लेकर ये दल दलितों में भ्रम की स्थिति बनाने का कुचक्र रच रहे हैं। जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी सार्वजनिक रूप से कहा है कि भाजपा के रहते अनूसूचित जाति व जनजाति का आरक्षण कोई नहीं छीन सकता। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने कहा, ‘हम आरक्षण के पक्ष में हैं। मोदी सरकार व भाजपा आरक्षण के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार इस संकल्प को दोहराया है। सामाजिक समरसता व सभी को समान अवसर प्रदान करना हमारी प्राथमिकता है।’

यह सच है कि आरक्षण व दलितों के राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक तीनों पक्षों के विकास को लेकर भाजपा व उसकी सरकारें गंभीर रही हैं और इस दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाये हैं। इसमें संदेह नहीं कि भाजपा की सकारात्मक राजनीति की यह पहल दलितों का जीवनस्तर बदल रही है और समाज में बराबरी के भाव का विकास तेजी से हो रहा है। यह सभी का उत्तरदायित्व है कि समाज के समग्र विकास की यह धारा बढ़ती रहे और दलगत राजनीति से ऊपर उठकर समतामूलक व न्याय आधारित समाज के निर्माण में योगदान दें।

 

हरीश चंद्र श्रीवास्तव

(लेखक राजनैतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)

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