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यह कोरोना तो समाज व्यवस्था ही बदल कर रख देगा

यह कोरोना तो समाज व्यवस्था ही बदल कर रख देगा

बेटा : पिताजी।

पिता : हां बेटा।

बेटा : पिताजी, यह कोरोना वायरस क्या बीमारी है? इसने तो जीना क्या मरना भी हराम कर रखा है।

पिता : यह तो चीन का सारी दुनिया को एक नायाब तोहफा है। न पहले इसका नाम सुना था और न ही फिलहाल किसी भी चिकित्सा पद्धति में इसका कोई इलाज है।

बेटा : इसने तो सारी दुनिया में कोहराम मचा रखा है। लाखों लोग मर चुके हैं और उससे भी अधिक अभी संक्रमित हैं। वैसे रिपोर्ट के अनुसार लगभग 55 प्रतिशत रोगी ठीक भी हुए  हैं।

पिता : हैरानी की बात तो यह है कि जिस चीन  ने इसे पैदा किया और फैलाया वह अब दावा कर रहा है कि वह इस वायरस से मुक्त हो चूका है।

बेटा : पर चीन के दावे का विश्वास भी नहीं किया जा सकता है। वहां के तानाशाहों ने सच्चाई को लोहे की सलाखों के पीछे कैद कर रखा है। अब समाचार तो यह भी हैं कि चीन के कुछ इलाकों में प्रकट हो रहा है।

पिता : यह बात तो तेरी ठीक है। इस बीमारी ने तो बड़े-बड़े, शक्तिशाली से शक्तिशाली देशों को भी नहीं छोड़ा है। अमरीका, बर्तानिया, फ्रांस, जर्मनी, इटली आदि तो सब से अधिक प्रभावित हुए है। दुनिया में बड़े-बड़े  शक्तिशाली देश जो सब को डराते फिरते हैं, कोरोना के आगे सब लाचार हो गए हैं। अब तो सारे विश्व में इस महामारी से मरने वालों की संख्या तेजी से एक करोड़ पहुंचने वाली है।

बेटा : कोरोना की मार तो पिताजी लोगों की जान ही नहीं ले रही है, उसने तो सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था को चौपट होने के कगार पर ला खड़ा कर दिया है। हमारा देश भी इस से अछूता नहीं हैं। पहले लॉकडाउन ने बड़ी परेशानी खड़ी कर राखी थी। तब ऐसा लगता था कि सारा जीवन ही थम गया है।

पिता : इन  हालात में बेटा इसके सिवाये  तो और कोई चारा भी न था। जब व्यक्ति बीमार पड़ जाता है तो उसे दवाई खानी पड़ती है। परहेज करना पड़ता है। घर से बाहर आना-जाना बंद करना पड़ जाता है।

बेटा : यह तो मैं मानता हूं कि यदि अपने आपको व देश को बचाना है तो यह सब करना ही  होगा, कुछ परेशानियां तो सहनी ही पड़ेंगी।

पिता : तो फिर?

बेटा : इस लॉकडाउन ने तो परिवार, आचार-व्यवहार की शक्ल-सूरत ही बदल कर रख दी है। समाज के उठने-बैठनें, पारिवारिक रहन-सहन में बड़ा बदलाव करना पड़ेगा। घर के छोटे-बड़े सदस्य, विशेष कर कामकाजी पुरुष-महिलाओं की दिनचर्या बड़ी बदल गयी है।

पिता : मतलब?

बेटा : इस महामारी के फैलने से पहले दिन के समय घर पर कौन मिलता था?

पिता : औरतें और वह भी तब जब वह नौकरी न करती थीं। यदि घर की महिलायें नौकरी पर जाती थीं तो घर का ताला तभी खुलता था जब बच्चे स्कूल से लौटते थे।

बेटा : बिल्कुल ठीक। घर में इकट्ठे तो प्रात: का नाश्ता भी सब एक साथ  नहीं कर पाते थे  क्योंकि हर एक का काम पर घर से निकलने का समय अलग होता था। घर में साथ बैठकर दोपहर के भोजन का तो चलन ही समाप्त हो गया था। दोपहर का भोजन भी तब ही बनता था जब रविवार या कोई अन्य छुट्टी होती थी।

पिता : और छुट्टी वाले दिन भी तब जब उस दिन कोई तीज-त्यौहार न हो। वरन उस दिन व्रत भी रखना पड़ जाता है।

बेटा : हां, इकट्ठे बैठकर तो बस रात का भोजन ही हो पाता था।

पिता :भला हो इस कोरोना वायरस का जिसने हम सबको इकट्ठे बैठकर प्रात: का नाश्ता, दोपहर का भोजन और शाम की चाय पीने का मजा तो ताजा कर दिया।

बेटा : हम तो लॉकडाउन की तकलीफों के लिए ही इसे कोस रहे हैं। इसके कारण हमें जो सुअवसर मिल रहे हैं, उन्हें हम नजरंदाज कर रहे हैं।

पिता : हमें किसी चीज के केवल नकारात्मक पहलुओं पर ही जोर नहीं देना चाहिए, उसके सकारात्मक पक्षको भी देखना चाहिए।

बेटा : पर इसके नकारात्मक पहलू भी तो बहुत हैं। दिहाड़ीदार मजदूर व छाबड़ी लगा कर अपनी आजीविका कमाने वालों के लिए यह बड़ा दुखदायी समय बन गया है। वह तो बेचारे दिन में जो कमाते उसी से रात को अपने भोजन का सौदा खरीद कर घर लौटते  थे। उसी से अपना जीवनयापन करने वाले, रिक्शा-तीन पहिया व टैक्सी वाले- उन सबके लिए तो यह सब काला समय ही बन गया है जो पहले कभी नहीं घटा।

पिता : बेटा, ऐसे समय में तकलीफ तो सहनी ही पड़ती है। हां, ऐसे लोगों के लिए सरकार को तो अवश्य आगे आना चाहिए और उनकी सहायता करनी चाहिए। कई सरकारें और गैर सरकारी संगठन भी  ऐसा कर रहे  हैं।

बेटा : वह तो बीमारों को दवाइयां तक भी उपलब्ध करवा रहे हैं। कोई 150 देशों को तो भारत ने दवाइयां भी भेजी थीं।

पिता : जरूरतमंदों की सहायता करना तो बेटा हमारे धर्म और संस्कृति का अभिन्न अंग है।

बेटा : कई परेशानियां और भी तो हैं।

पिता : जैसे?

बेटा : जब हम किसी को मिल नहीं सकते तो मोबाइल फोन और टीवी ही सहारा रह गया है घर की बोरीयत को दूर करने और अपना मनोरंजन करने का। मेरा एक दोस्त बता रहा था कि उसके घर में तो बड़ी परेशानी खड़ी हो गई है। वह रोज प्रात: ही घर से अपने काम पर निकल जाता था। बच्चे भी स्कूल चले जाते थे। उन सब की गैरहाजिरी में घर में राज उसकी बीवी का ही होता था। वह खुश रहती थी। पड़ोसनों व अपनी सहेलियों से गप्पें हांकती रहती थीं। अपने मर्दों का मजाक उड़ाने का मजा भी चखती रहती थीं। वास्तव में कफर्यू तो इन महिलाओं की आजादी पर लग गया है। बड़ा विघ्न तो उनकी अपनी दिनचर्या पर पड़ गया लगता है।

पिता : अब सारा दिन पतियों की उपस्थिति उनको अखरती होगी।

बेटा : हां, ऐसा ही लगता है।

पिता : अब बच्चों को भी टीवी देखने और मोबाइल से चिपके रहने के अतिरिक्त मनोरंजन का और कोई साधन ही नहीं रह गया है। इस कारण बच्चों को रोकना भी अब ठीक नहीं लगता। वह सारा दिन पढाई तो कर नहीं सकते। बाहर खेल भी नहीं सकते।

बेटा : पिताजी, अब देखा जाये तो हम सब को सरकार ने हॉउस अरेस्ट कर दिया है।

पिता : यह भी तो सौभाग्य की ही बात है न। पहले तो हॉउस अरेस्ट बड़े-बड़े नेताओं को किया जाता था पर भला हो इस कोरोना वायरस का जिसने हम जैसे छोटे लोगों को भी यह गौरव प्रदान कर दिया है।

बेटा : बात तो आपकी ठीक है। इस हॉउस अरेस्ट में न हम घर से बाहर निकल सकते हैं और न किसी के घर जा ही सकते हैं। न किसी को हम अपने घर बुला सकते हैं और न कोई हमारे घर आ ही सकता है चाहे वह हमारा कितना भी सगा सम्बन्धी क्यों न हो।

पिता : स्कूल में छुट्टियों के कारण अब माता-पिता को बच्चों की चिंता भी नहीं।  सारा दिन तो अब घर में ही सब की आंखों के सामने रहते हैं।

बेटा : स्कूल में कभी एक दिन की छुट्टी घोषित हो जाये तो बच्चे खुशी में उछलने लगते थे। अब छुट्टियां इतनी हो गयी हैं कि वह छुट्टियों से ही बोर होने लगे हैं। अब दोस्तों से मिलने और उनके साथ खेलने के लिए तरसते हैं।

पिता : एक और परेशानी हो गयी है। अब तो हमारा समाज व कानून बड़ा दरयादिल हो गया है। कहते है कोई भी महिला व मर्द अपनी आपसी मर्जी व सहमति से किसी से भी सम्बन्ध बना सकते हैं और वह अपराध भी नहीं है।

बेटा : पिताजी, अब हमारा देश आजाद है। इतनी स्वछंदता तो मिलनी ही चाहिए।

पिता : तू कब से उदारवादी हो गया है? क्या तूने भी कुछ ऐसी  ही हरकत तो नहीं शुरू कर दी है?

बेटा : नहीं पिताजी। यदि मैं कुछ करता भी तो आपको पता न लग जाता?

पिता : यही कारण है कि पीछे जो जोड़े दिल्ली में इंडिया गेट और लोधी गार्डन में इक_े घूमते  फिरते थे वह आजकल सब घर में ही बैठकर कोरोना को कोस रहे  हैं।

बेटा : अब तो सारे देश का ही यह हाल है। लगता है कोरोना को किसी की बद्दुआ भी नहीं लग रही।

पिता : कुछ फायदे भी हैं। इसका असर जेबकतरों, गले के गहनों को छीनने वालों, चोर-उचक्कों और दूसरों पर भी पड़ रहा है। उन बेचारों का तो धंधा ही चौपट हो गया लागत है।

बेटा : उनको भी डर लगता होगा कि वह अपना हाथ उस पर ही न डाल बैठें जो कोरोना वायरस का मरीज हो और इस तरह उलटे उन्हें लेने के देने पड़ जाएं।

पिता : पर अब चलो लॉकडाउन की जगह अनलॉक-1 शुरू हो गया है। कुछ राहत तो मिली है।

बेटा : क्या राहत मिली है? सामाजिक दूरी तो अभी भी बना कर रखनी होगी। और तो छोडो माता-पिता अपने बेटे-बेटी को गले नहीं लगा सकते, इस पर मनाही है। अब तो पति-पत्नी को भी दो मीटर की दूरी बनाये रखनी है वरन संक्रमण का खतरा है।

पिता : हां  मंदिर तो आप जा सकते हैं  पर अपने भगवान् के चरणों में पड़ कर कुछ प्रार्थना नहीं कर सकते। न प्रसाद लेकर हम जा  सकते हैं और न प्रसाद हमें मंदिर से ही मिलेगा। चरणामृत भी नहीं मिलेगा। एक ही घर के यदि पांच सदस्य इकठ्ठा मंदिर चले गए तो समझो मंदिर सारा भर जायेगा क्योंकि उन्हें आपस में 2 गज की दूरी बनाये रखनी है।

बेटा : बाहर निकलने पर मास्क तो अवश्य पहननी पड़ेगी ही। इस कारण एक दूसरे को पहचानना भी मुश्किल हो रहा है।

पिता : पर अब आतंकियों को भी अपनी पहचान छुपाये रखना आसान हो गया है।

बेटा : रेस्तरां में जाने का अब मजा ही खराब हो जायेगा। यदि एक परिवार के 6 सदस्य एक-साथ किसी रेस्तरां में चले गए तो समझो कि वह रेस्तरां ही पूरा भर गया। इस प्रकार वहां भी एक समय में दो परिवार से ज्यादा लोग नहीं बैठ पायेंगे।

पिता : इतनी दूर बैठकर सब की सहमति से आर्डर देने में भी परेशानी हो जाएगी। इसलिए घर से निकलने से पहले ही सबकी सहमति से परिवार को आर्डर पहले ही लिखकर ले जाना ठीक रहेगा।

बेटा : यही नहीं। यदि किसी को अपनी धर्मपत्नी या प्रेयसी को इंडिया गेट या लोधी गार्डन में मिलना हो तो वह मिलना भी क्या हुआ जब 6-। फुट की दूरी बनाये रखना अनिवार्य हो। फिर उनको फ्लाइंग किस की तर्ज पर एक फ्लाइंग मिलन का भी तरीका निकलना पड़ेगा।

पिता : इस से पूर्व तो बेटा हम किसी दोस्त के घर बिन बुलाये ही चले जाते थे, पर अब जाने से भी डर लगने लगा है कि किसी के घर जाने या उसके हमारे घर आने से कहीं हमें कोरोना का संक्रमण ही न हो जाये।

बेटा : यह बड़ा दुर्भाग्यर्पूण होगा। कोरोना को फैलने से रोकने के कारण अपनाई जा रही यह सामाजिक दूरी समय बीतने पर सामाजिक जीवन का यह स्थाई अंग ही न बन बैठे। हाथ मिलाने की प्रथा तो हमने पश्चिमी देशों सी ही सीखी। भला हो इस कोरोना का  जिसने अब हाथ मिलाने की इस प्रथा को तिलांजली देने पर मजबूर कर दिया है और अब सारे देश ही भारत की  हाथ जोड़ कर नमस्ते करने की प्रथा को अपनाने पर मजबूर हो गए हैं।

पिता : बेटा, सब से बुरा हाल तो फिल्म शूटिंग में होगा। प्रेमी और प्रेमिका को तो प्रेमालाप अब 2 गज की दूरी से ही करना पड़ेगा। ऐसे वातावरण में प्रेमी-प्रेमिका प्रेम का नाटक नहीं विरह की दूरी बनकर रह जायेगा। यदि वह दूरी नहीं बनायेंगे तो यह सरकार के आदेश का उल्लंघन करने का अपराध बन बैठेगा।

बेटा : पिताजी, अब तो ऐसा लग रहा है कि स्वाधीनता के बाद हमने जो सामजिक दूरी पाटने का प्रयास किया था, कोरोना अब सामाजिक दूरी को ही बढ़ा कर रख देगा, दो परिवारों के बीच ही नहीं, समाज के बीच भी जिसे लांघ पाना संभव नहीं जब तक कि यह कोरोना किसी तरह  देश से पूरी तरह मिट नहीं जाता।

पिता : कोरोना तो बेटा लगता है कि यह हमारे भाईचारे को भी बहुत बड़ी चोट पहुंचाएगा। इसलिए हम सबको अपने पर नियंत्रण रख कर इसे हर सूरत में भगाना पड़ेगा ताकि हम कोरोना से पहले का जीवन लौटा सकें।

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