ब्रेकिंग न्यूज़ 

करोनाकाल में ऑनलाइन शिक्षा कितनी कारगर?

करोनाकाल में ऑनलाइन शिक्षा कितनी कारगर?

इस कोरोना महामारी ने भारत की अर्थव्यवस्था को अस्त व्यस्त कर दिया है। इस के कारण जो अर्थव्यवस्था के मजबूत स्तंभ है जिन पर भारत खड़ा है, उन पर महामारी का गहरा प्रभाव पड़ा है। यह महामारी दीमक की तरह भारत की अर्थव्यवस्था के स्तंभों को पिछले चार महीनों से खोखला किए जा रही है। इनमें से एक स्तंभ शिक्षा का है । कोरोना महामारी से भारत में लगभग 32 करोड़ छात्रों की शिक्षा प्रभावित हुई है। जिसमें 15.81 करोड़  लड़कियां और 16.25 करोड़ लडक़े शामिल है। वैश्विक स्तर की बात करे तो, इस महामारी से दुनिया के 193 देशों के 157 करोड़ छात्रों की शिक्षा प्रभावित हुई है। जो विभिन्न स्तरों पर दाखिला लेने वाले छात्रों का 91.3 प्रतिशत है। ओर जो देश का भविष्य है।

शिक्षा अर्थव्यवस्था की ढाल है  यही कमजोर पड़ जाएगी तो अर्थव्यवस्था का फिर से उभर पाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि हर देश के विकसित होने के पीछे शिक्षा का बड़ा महत्व होता है। बीते चार महिनों से सभी प्रकार के व्यवहारिक रूप चल रहे शैक्षिक संस्थान बंद पड़े हैं। शिक्षा को लेकर विद्यार्थियों के व्यवहारिक जीवन पर जो प्रभाव पड़ा है, भविष्य को देखते हुए उनकी मन की गहराईयों को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता । उनकी सोचने की क्षमता सीमित हो गयी है, उनको अपना भविष्य खतरे में नजर आ रहा है। उनको लगता है कि उनके सपने अधूरे रहेगे। भविष्य में आगे बढऩे के लिए समय का साथ होना महत्वपूर्ण होता है, पर उस समय का लॉकडाउन के कारण दुरूपयोग हो रहा है। समय ऐसे निकल रहा है, जेसे हाथ से बालू रेत फिसल जाती है। इस करोना वायरस के आने से पहले विद्यार्थियों का ध्यान सिर्फ  शिक्षा पर होता था। परंतु इन बीते हुए चार महिनों में विद्यार्थियों के मस्तिष्क पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा है कि वे अपने भविष्य की चिंता में उलझ कर रह गए हैं। उनकी आशाएं निराशाओं में बदलने लगी है। भविष्य में कुछ कर पाने का उत्साह कम होता जा रहा है।

16

यही हाल उच्च शिक्षा केंद्रों का भी है। करीब 38,500 कॉलेज और 760 विश्वविद्यालयों पर तालाबंदी से उच्च शिक्षा पूरी तरह से प्रभावित हो रही है । वहीं लाखों निजी कोचिंग सेंटर इसके प्रभाव की जद में हैं। देश भर में उच्च शिक्षण संस्थानों में नामांकन प्रक्रिया ठप है। छात्रावासों के खाली होने और उसके चलते छात्रों के घर लौट जाने से नियत समय पर होने वाली उनकी परीक्षाएं अनिश्चितकाल के लिए टाल दी गई हैं।

कुछ विद्यालयों ने विद्यार्थियों के भविष्य के बारे में सोचते हुए और उनका शिक्षा के प्रति उत्साह बढ़ाने के लिए शिक्षा की कार्यशैली को सोशल मीडिया से जोड़ दिया है, ताकि विद्यार्थी स्कूल की बजाय घर में रहते हुए स्मार्ट फोन के माध्यम से अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे सके। सरकार भी ऑनलाइन कक्षाओं को बढावा दे रहीं हैं। ताकि इस महामारी और लॉकडाउन का शिक्षा पर कोई प्रभाव न पड़े। परंतु हमारा देश इतना भी विकसित नहीं है कि देश का हर एक छात्र इस सुविधा का लाभ उठा सके। देश के 30 प्रतिशत छात्र ही ऑनलाइन कक्षाओं का लाभ उठा पाते है। और इन 30 प्रतिशत छात्रों में से भी अधिकतर छात्र इतनी सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद जो शिक्षा वे ऑनलाइन कक्षाओं के माध्यम से ग्रहण कर रहे हैं, उस ज्ञान को वे अपनी व्यावहारिक शिक्षा में उपयोग नहीं कर पाते हैं। शेष 70 प्रतिशत विद्यार्थियों में से कुछ विद्यार्थी अर्थिक अभाव के कारण इन सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पाते हैं। भारत का एक बड़ा तबका गरीबी  रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहा है।  ऐसे में उसके लिए ऑनलाइन कक्षा और पुस्तकों के ऑनलाइन होने से कोई लाभ नही है। ऑनलाइन साधन बहुत महंगे आते है जिन्हें  कम ही परिवार खरीदने में समर्थ होते है। ऐसे में उनके लिए ऑनलाइन शिक्षा लेने की बात महज एक सपना ही है। देश में ऐसे लाखों गरीब परिवार है जो पहले काम करके जीवन यापन कर रहे थे। ऐसे में काम धंधे बंद हो जाने से आय के सारे साधन बंद हो गए है।  जिससे कई गरीब परिवार के बच्चें परिवार की गरीबी से शिक्षा से वंचित रह सकते है।

ऑनलाइन शिक्षा में कुछ सामग्री ऐसी भी मौजूद है जो बच्चों के लिए अनुकूल स्थिति प्रदान नहीं करती। इंटरनेट की सुविधाओं का अभाव होने के कारण वे ऑनलाइन शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। देहाती इलाकों में शिक्षा के क्षेत्र में विकास पहले से ही कम था परंतु लॉकडाउन के कारण सबसे ज्यादा शिक्षा पर प्रभाव इन्हीं क्षेत्रों में पड़ा है। अगर बात वार्षिक परीक्षाओ की करी जाए तो सबसे ज्यादा निराशा 10 वीं और 12 वीं कक्षा के छात्रों को हुई है क्योंकि अन्य कक्षाओ के छात्रों को बिना परीक्षा दिए ही आगामी कक्षा में पढऩे के लिए बढावा दिया गया है। परंतु 10 वीं और 12 वीं कक्षाओ के छात्रों की रुकी हुयी परीक्षाएं नहीं ली जाएगी।

17

10 वीं और 12 वीं में पढऩे वाले बच्चों का मन कुछ ज्यादा ही संवेदनशील होता है। छोटी-छोटी बातें भी इस उम्र में उन्हें बहुत प्रभावित करती हैं। ज्यादा लंबी अनिश्चितता उनके मन-मस्तिष्क पर गलत प्रभाव डाल सकती है। वैसे भी मौजूदा संकट से बच्चे बहुत परेशान हैं। अर्थव्यवस्था और रोजी- रोजगार के क्षेत्र से आ रही नकारात्मक खबरें उन्हें निराश कर रही हैं। मान लिया जाए कि कुछ दिनों में हालात सुधर गए तो भी लंबे समय तक खाली बैठने के बाद अचानक फिर से परीक्षा देने में वे सहज नहीं महसूस कर पाएंगे। सिलेबस में ढील देने का कदम भी बेहद अहम है। विपरीत परिस्थितियों में पैदा मानसिक दबाव को देखते हुए विद्यार्थियों को थोड़ी राहत जरूर दी जानी चाहिए । अभी महामारी के बढ़ते खतरे के कारण सरकार भी परीक्षा लेने में कतरा रहीं हैं। फिलहाल कि स्थिति को देखते हुए कई राज्यों की सरकारों ने परीक्षाएं रद्द भी कर दी है ताकि काफी हद तक महामारी को रोकने का प्रयास किया जा सके।भारत में कोरोना वायरस के प्रकोप के दौरान छात्रों को एक-दूसरे के संपर्क  में नहीं आने के चलते यह निर्णय लिया गया है।

 

अंकुश मांझू

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.