ब्रेकिंग न्यूज़ 

जनता को निरीह बनाते तंत्र के संरक्षण में अपराधियों का राजनीतिकरण!

जनता को निरीह बनाते तंत्र के  संरक्षण में अपराधियों का राजनीतिकरण!

उत्तर प्रदेश के कानपुर के बिकरू गांव में बीती 3 जुलाई को दुर्दांत बदमाश विकास दुबे ने आठ पुलिसकर्मियों की नृशंस हत्या कर दी। पुलिस ने भी इन हत्याओं के जिम्मेदार अपराधी विकास दुबे व उसके गिरोह के पांच लोगों को पुलिस मुठभेड़ में मार गिराया और अब दुबे के गिरोह, उसके अवैध आर्थिक साम्राज्य के साथ ही नेताओं, नौकरशाहों और पुलिस तंत्र में उसके संरक्षकों की कुंडली निकालने का प्रयास कर रही है। विकास द्वारा उज्जैन के महाकाल मंदिर में नाटकीय आत्मसमर्पण करने के बाद उसे कानपुर लाते समय हुए मुठभेड़ में मार दिये जाने को लेकर विपक्षी दल सरकार पर निशाना साध रहे हैं। यद्यपि पुलिस ने कहा था कि विकास को मध्यप्रदेश पुलिस ने दबोचा था और उत्तर प्रदेश पुलिस उसे कानपुर ला रही थी कि रास्ते में गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त होकर पलट जाने के बाद विकास पुलिस निरीक्षक की बंदूक छीनकर भागने का प्रयास कर रहा था। पुलिस ने उसे रोकने को कहा तो उसने पुलिसकर्मियों पर गोली चला दी। आत्मरक्षार्थ पुलिस को जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी, जिसमें विकास मारा गया।

इस घटना के आपराधिक आयाम और पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठ रहे प्रश्नों के बीच कुछ ऐसे विषय फिर उठ खड़े हुए हैं, जिन पर दशकों से बहस होती आ रही है। समाजवादी पार्टी और बहुजन पार्टी से विकास के संबंधों के विषय में अब बहुत कुछ छिपा नहीं रह गया है। ऐसे में सत्ता के संरक्षण में संगठित अपराधी को पनपाने के आरोप फिर से लगने लगे हैं। ये आरोप निराधार नहीं कहे जा सकते हैं। एक अपराधी मनोवृत्ति ही नहीं, आपराधिक घटनाओं और नृशंस हत्याओं के गंभीर अपराधों में संलिप्तता का ऐसा अभियुक्त किस प्रकार सत्ता, नौकरशाही और पुलिस प्रशासन को अपनी कठपुतली बनाये रखा और वोट के सौदागर दल ऐसे अपराधी को भी मलाई खिलाते रहे !

विकास दुबे कोई एक नहीं है। दाउद इब्राहीम, सोहराबुदृदीन, अबू सलेम, मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, सहाबुद्दीन, रामवृक्ष यादव जैसे सैकड़ों नाम हैं, जो अपराध के दलदल में आकंठ डूबे होने के बावजूद पहले सत्ता शीर्ष पर बैठे ‘पहलवानो’ के अखाड़े के लठैत बने और फिर इसी लठैती के बल पर उन्होंने अपना आपराधिक साम्राज्य खड़ा किया तथा देश—विदेश में सैकड़ों—हजारों करोड़ की अवैध संपत्ति भी बनायी। जहां विकास दुबे ने स्वयं साक्षात्कार में बहुजन समाज पार्टी को अपने परिवार जैसा बताया और बाद में उसकी पत्नी समाजवादी पार्टी की आजीवन सदस्य बनी और चुनाव लडक़र जीती। मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, शहाबुद्दीन जैसे लोगों का समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी अथवा लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के साथ खुला संबंध और राजनीतिक संबद्धता जगजाहिर रही है। कहते हैं कि राजनीति के अपराधीकरण का प्रारंभ इंदिरा गांधी के समय कांग्रेस ने किया। 20 दिसम्बर 1979 को देवेंद्र पांडे और भोला पांडे नामक दो युवकों ने 126 यात्रियों को ले जा रही इंडियन एयरलाइंस की विमान संख्या 410 का अपहरण कर विमान अपहरण जैसा गंभीर अपराध किया। बाद में इंदिरा गांधी ने इन्हें कांग्रेस का टिकट देकर विधायक बनवाया। इसी प्रकार इंदिरा गांधी पर खालिस्तानी आतंकवादी भिंडरवाले को आधार देने के भी आरोप लगते रहे हैं। अपराधियों को माननीय बनाने का यह क्रम रुकने के बजाय बढ़ता ही गया और आज स्थिति यह है कि कोई ऐसा राजनीतिक दल नहीं है जिसमें गंभीर आपराधिक प्रकरणों के अभियुक्तों का जमावड़ा न हो।

सत्ता प्रतिष्ठान में इन अपराधियों की कितनी पैठ होती है, इसका अनुमान इससे लगाइये कि विकास दुबे हत्या और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर अपराधों का अभियुक्त था और हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास का दंड मिलने के बाद भी वह न केवल कारागर से बाहर आया, बल्कि प्रभावशाली ढंग से अपने आपराधिक कारोबार को चलाने के साथ ही राजनीतिक यात्रा भी सफलतापूर्वक प्रारंभ कर दी। यही हाल मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, सहाबुद्दीन जैसे लोगों का भी है कि सत्ता किसी दल की रही हो, राजनैतिक संरक्षण उन्हें मिलता रहा है। इसी राजनीतिक संरक्षण में इन जैसे लोगों जिनका जीवन कारागार की कालकोठरी में कट जाना चाहिये, वो न केवल राजसी जीवन बिताते रहे हैं, बल्कि जनता के राजनीतिक भाग्य का निर्णय करने में भी सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं।

माफिया, राजनेता और नौकरशाही की साठगांठ के विषय में अनेकों बार प्रश्न उठे हैं। किंतु इस कड़ी के महत्वपूर्ण भाग अभियोजन और न्यायिक प्रक्रियाओं पर खुलकर बात नहीं की जाती है। यह प्रश्न प्राय: गोल कर दिया जाता है कि इस देश में न्यायपालिका सर्वोच्च है और न्यायपालिका की दृष्टि और शक्ति से इस खतरनाक गठजोड़ एवं इससे समाज पर पडऩे वाले दुष्प्रभाव पर अंकुश लगाने का कोई प्रभावी तंत्र या उपाय क्यों नहीं विकसित हो पाया। यह भी प्रश्न पूछा जाना चाहिये कि 60 गंभीर धाराओं के दोषसिद्ध अपराधी को उच्चतर न्यायालय से राहत कैसे मिल जाती है, जमानत कैसे मिल जाती है? चूक किससे और कहां होती है?

वैसे एक दृष्टिकोण तो यह कहता है कि राजनैतिक संरक्षण और नौकरशाही की मिलीभगत ही अभियोजन के पक्ष को इतना कमजोर कर देती है कि प्रकरण की सुनवाई काल में ही अपराधी को बच निकलने का मार्ग मिल जाता है। न्यायालय अपराधी को दंड देना चाहता है, किंतु लचर अभियोजन और साक्ष्यों के अभाव में अपराधी विधि के फंदे से बच निकलते हैं।

वैसे एक दृष्टिकोण तो यह कहता है कि राजनैतिक संरक्षण और नौकरशाही की मिलीभगत ही अभियोजन के पक्ष को इतना कमजोर कर देती है कि प्रकरण की सुनवाई काल में ही अपराधी को बच निकलने का मार्ग मिल जाता है। कई बार न्यायालय अपराधी को सजा देना चाहता है, किंतु लचर अभियोजन और साक्ष्यों के अभाव में अपराधी विधि के फंदे से बच निकलते हैं।

तो क्या न्यायपालिका इस बात को नहीं समझ पाती है? यह कैसे मान लिया जाये कि देश के इतने जटिल विषयों को सुलझाने वाली न्यायपालिका इस समस्या को समझ नहीं पाती है! क्या हर छोटे—बड़े विषयों पर स्वत: संज्ञान लेने वाली न्यायपालिका को  इस ओर कोई प्रभावी कदम उठाने के लिये सरकार को विवश नहीं करना चाहिये? यह बात ठीक है कि न्यायपालिका ने कई प्रकरणों में तल्ख टिप्पणी करते हुए सरकारों को निर्देश दिये हैं कि न्यायिक प्रक्रिया की उन कमियों को दूर किया जाये, जिसका लाभ उठाकर अपराधी बच जाते हैं और अभियोजन व साक्ष्य के स्तर पर सांस्थानिक सुधार किये जाये, जिससे कि अपराधियों के विरुद्ध मजबूत साक्ष्य एकत्र करने के साथ ही किसी भी स्तर पर ऐसी चूक न हो कि अपराधी को बचने का मार्ग मिल सके।

यद्यपि उच्चतम न्यायालय ने राजनीति में अपराधियों के प्रवेश को रोकने के लिये अनेक पहल की है और आदेश दिये हैं। परिणामस्वरूप राजनीति से जुड़े व्यक्तियों के प्रकरणों की त्वरित सुनवाई के लिये न्यायालयों के गठन के साथ अनेक सकारात्मक परिणाम भी आये हैं। किंतु राजनीति और अपराध की गलबहियां ऐसी हो गयी हैं कि केवल राजनीतिक क्षेत्र में सुधार या निरोधात्मक उपायों से परिणाम नहीं आने वाले हैं। इसके लिये न्यायिक सुधार के साथ ही पुलिस सुधार भी उसी परिमाण में करना होगा।

1977 में राष्ट्रीय पुलिस आयोग की स्थापना की गई थी। आयोग ने पुलिस सुधार की अनुशंसा रिपोर्ट दी, पर सरकारें उस पर कुंडली मारकर बैठ गयीं और वह रिपोर्ट धूल फांकती रही। 1996 में उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह आयोग की अनुशंसाओं को लागू कराने के लिये सर्वोच्च न्यायालय गये। सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रकरण में गाइडलाइन जारी की। इस गाइडलाइन में दो विशेष बातें यह थीं कि एक तो पुलिस को राजनीति के प्रभावों से मुक्त करने और उनके कामकाज की निगरानी के उचित व्यवस्था बनाने की बात कही गयी थी और दूसरे अनुसंधान व विधि प्रवर्तन के लिये पुलिस की अलग—अलग इकाई बनाने की बात कही गयी थी।

पुलिस की अनुसंधान इकाई और विधि प्रवर्तन की इकाई की अलग व्यवस्था नहीं की जा सकी है। पुलिस की वर्तमान व्यवस्था में साक्ष्य एकत्रीकरण में अवैज्ञानिक व अ—पेशेवर ढंग अभियोजन के कमजोर होने का बड़ा कारण बना हुआ है। अनुसंधान के लिये विशेष प्रशिक्षण व विशेषज्ञ दलों की प्रणाली न होने के कारण सामान्य पुलिसकर्मी दोनों काम करता है। परिणाम यह होता है न्यायालय में अभियोजन लचर हो जाता है और अंतत: अपराध और साक्ष्य के बीच संबंध ही नहीं सिद्ध हो पाता है, जिससे अपराधी छूट जाता है। इसके अतिरिक्त अपराधियों के राजनैतिक संरक्षण के कारण पुलिस की कार्रवाई पर भी कहीं न कहीं प्रभाव पड़ता है, जिससे ऐसी स्थितियां बनती हैं कि जांच एजेंसी को राजनैतिक प्रभाव में आकर अपराधी के विरुद्ध अनुसंधान में पीड़ित पक्ष के साथ होने के बजाय अपराधी के साथ खड़े होने को विवश होना पड़ता है। इसका दुष्परिणाम से न्यायिक प्रक्रिया में अपराधी स्वयं को अधिक सुविधाजनक स्थिति में पाता है और लूपहोलों का दुरुपयोग करके दंड से बच जाता है।

इन विविध पक्षों को देखते हुए अब तो यह लगने लगा है कि जैसे राजनीतिक दल और उसके नेता अपने हितों के लिये व्यवस्थाओं को दीनहीन और दंतहीन बनाकर रखना चाहते हैं। यह स्थिति तब और गहरे पैठ बना चुकी है, जब अपराधी अब राजनेता की कठपुतली बनने के बजाय स्वयं ही राजनेता बनने लगे हैं। विधायिका और कार्यपालिका के साथ न्यायपालिका के भीतर भी इधर अनेक ऐसे प्रकरण आये हैं, जिससे साधारण जनता का तंत्र से विश्वास कमजोर हुआ है। इस विश्वास को बनाये रखने की जिम्मेदारी लोकतंत्र के तीनों स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की है और इसके लिये आवश्यक है कि ये तीनों अंग एक—दूसरे पर जिम्मेदारी टालने के बजाय परस्पर विचारविमर्श कर समन्वय के साथ समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करें, अन्यथा कर्तव्यनिष्ठ पुलिसकर्मियों की बलि यूं ही चढ़ती रहेगी और साधारण नागरिक पीड़ित होने की उस मनोदशा में पहुंचते रहेंगे, जहां से उबर पाना अति कठिन दिखने लगता है।

 अमित श्रीवास्तव

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.