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कोरोना काल में टिड्डियों का हमला किसानों पर दोहरी मार

कोरोना काल में टिड्डियों का हमला किसानों पर दोहरी मार

आज कोरोना महामारी के कारण भारत ही नहीं पूरा विश्व संघर्ष कर रहा है, जिसके कारण देश की अर्थव्यवस्था थम सी गई है। इस महामारी का सबसे अधिक और गहरा प्रभाव देश की जी.डी.पी. पर पड़ा है। देश में छोटे-बड़े लगभग सभी प्रकार के उद्योगों पर गहरा असर पड़ा है। इस महामारी के संकटकाल में किसान, जोकि देश की रीढ़ कहा जाता है, जो सभी का पेट भरता है, इसलिए उसे अन्नदाता कहा जाता है, वह टिड्डियों के हमले की मार भी सह रहा है। देश की लगभग 60 से 70 प्रतिशत की आबादी कृषि पर निर्भर करती है और देश मे 14.2 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर खेती होती है। देश की जी.डी.पी. में 16 से 17 प्रतिशत योगदान कृषि क्षेत्र का है। लेकिन आज उन किसानों को गहरे संकटकाल का सामना करना पड़ रहा है।

भारत के कुछ राज्यों में  कृषि क्षेत्र टिड्डियों के काले साए के घेरे में आ चुके है। ये उडऩे वाले छोटे जीव होते है जो विशालकाय झुंड में आते है। टिड्डियों का सबसे ज़्यादा नुकसान कृषि क्षेत्र को हो रहा है। राजस्थान जो भारत का सबसे बड़ा राज्य है, जिसकी 70 प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर करती हैं, इसके 11 जिलों (जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, गंगानगर आदि ) में टिड्डियों के कारण फसलों को बहुत नुकसान हो चुका है। थार रगिस्तान का यह इलाका पाकिस्तान के सिंध प्रांत के सामने  पड़ता है। इसके कारण इन जिलों में सबसे अधिक नुकसान हो रहा है क्योंकि इसी क्षेत्र से टिड्डियों के बड़े-बड़े दल भारत में प्रवेश कर रहे है। टिड्डी दल राजस्थान, पंजाब, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में सक्रिय हैं। राजधानी दिल्ली समेत हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कई जिलों में प्रशासन ने अलर्ट जारी किया हुआ है।

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विश्व में टिड्डियों की कुल छ: प्रजातियां पाई जाती है। राजस्थान में जिन-जिन क्षेत्रों से ये दल गुजऱ चुके है वहां के किसानों से पूछने पर पता चला कि इन दलों में जो जीव देखे गये है वो काले और हलके पीले रंग के है। बड़े बुजर्गो से पूछा तो उन्होंने बताया कि 2-3 दशक  पहले भी ऐसे ही टिड्डियों के दल देखे गए थे। मगर तब इतना नुकसान नहीं हुआ था क्योंकि उस समय ये टिड्डियों के दल इतने बड़े नहीं हुआ करते थे और इन पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया गया था। पर 2-3 दशक बाद टिड्डियों का पहला दल 21 मई 2019 को देखा गया था, उसके बाद जितने भी दल आए हैं उनको देखने से पता चलता है कि हर दल में इनकी तादाद बढ़ती जा रही है और जहां-जहां से यह दल गुजर रहे हैं वहां फसलें तो लगभग नष्ट हो गयीं है और पेड़-पौधें के पत्ते तो मानो ऐेसे गायब हो गए है जैसे कि पतझड़ का मौसम चल रहा हो। किसानों के लिए मानो अकाल की सी स्थिति पैदा हो गयी है और किसान आत्महत्या तक करने को मजबूर हो गए हैं।

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प्रशासन भी इन उडऩे वाले कीट-पतगो जैसे जीवों पर नियंत्रण पाने के लिए पूरी कोशिश कर रहा है। टिड्डियों को नियंत्रित करने के लिए सरकार कीटनाशक दवाइयों का मुफ्त वितरण कर रहीं हैं और इन्हीं कीटनाशकों दवाइयों का छिडक़ाव करने के लिए ट्रैक्टर स्प्रेयर्स, पावर स्प्रेयर्स, नगर निगम/ नगर निकाय के छिडक़ाव यंत्रों, अग्निशमन विभाग की गाडिय़ों को तैयार करके रखा गया है। विदेश से भी विशेष प्रकार के हैलीकॉप्टरों और ड्रोन से स्प्रे करवाने के लिए सहायता ली जा रहीं हैं। प्रशासन के साथ-साथ हर एक किसान भाई अपनी पूरी कोशिश कर रहा है। वह ढोल-नगाड़े, पटाखे, थाली आदि बजाकर इन जीवों को अपनी फसलों के ऊपर बैठने से रोकने का पूरा प्रयास कर रहा है, क्योंकि यदि एक बार टिड्डी दल फसल के ऊपर बैठ जाए तो फसल को पूरी तरह नष्ट कर देता है। एक हेक्टेयर के झुंड मे लगभग 70,000 से 80,000 तक टिड्डीया होती है। कई बार प्रशासन के पैर भी इसके सामने लडख़ड़ा जाते है और इस पर नियंत्रण पाने में असफल हो जाते है।

फिलहाल पिछले कुछ महीनों में टिड्डियों के जो झुंड देखे गए है उनकी लंबाई 2 से 3  किलोमीटर तक आंकी गई है। किन्तु बीकानेर के खाजूवाला इलाके में पिछले 2 से 3 सप्ताहों के दौरान लगभग 10 किलोमीटर लंबा टिड्डी दल देखा गया जिसमें करोड़ों की संख्या में टिड्डियां हो सकती है। लोकस्ट वार्निंग ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में अधिकतम टिड्डी के दल खत्म कर दिए गए है, लेकिन मौसम में नमी कम होने के कारण और हवा का रुख पश्चिम से पूर्व की ओर होने के कारण टिड्डियों के बड़े-बड़े दल भारत मे प्रवेश कर रहे हैं। क्षेत्र के लोगों से पूछने पर  पता चला कि टिड्डियों के आने से कुछ समय पहले हवाएं चलने लगती है। दूर से देखने पर टिड्डियों का यह दल काले बादलों की तरह दिखता है, ऐसा प्रतीत होता है जैसे वर्षा होने वाली हो। जैसे-जैसे यह काली छाया नजदीक आती है, यह छाया एक बड़े संकट का रूप धारण कर लेती है। इसे देखकर लोगों के मन मे डर और मायूसी का माहौल बन जाता है। पहले के समय में तो टिड्डियों को प्रकृति का जीव कहा जाता था। पर अब करोना महामारी के चलते किसानों का यह मानना है कि यह प्रलय की ओर इशारा कर रहा है।

 

श्री गंगानगर से अंकुश मांझू

 

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