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विकृत भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन हो

विकृत भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन हो

इतिहास किसी देश के लिए उतना ही महत्व रखता है जितना कि किसी देश के लिए उसका संविधान। भारत का संविधान कुशलता के साथ लिखा गया है लेकिन यही बात इसके इतिहास के विषय में नहीं कही जा सकती है। भारतीय इतिहास का लिखित रूप काफी हद तक आधा-अधूरा है और घटनाओं का वर्णन करते समय भारी पक्षपात, झूठ और मनगढ़ंत कहानियों का सहारा लिया गया है। अक्सर ऐसा कहा जाता है कि जीतने वाले ही इतिहास लिखते हैं और भारतीय इतिहास के विषय में यह बात खास तौर पर कही जा सकती है।

अंग्रेज़ों से सत्ता हासिल करने वाले भारतीय राष्ट्र्रीय काँग्रेस के नेताओं को चाहिए था कि वे इतिहास की घटनाओं को उसी स्पष्ट और तथ्यात्मक रूप से सामने रखते जिस रूप में वे घटी थीं, लेकिन ऐसा करने के बजाए उन्होंने यह तय किया कि वे इतिहास की पुस्तकों को ऐसा रूप देंगे जो उनके एक-पक्षीय दृष्टिकोण और विकृत धर्मनिरपेक्षता वाली विचारधारा के अनुकूल हों। नतीजा यह हुआ कि स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाया जाने वाला देश का ज़्यादातर इतिहास घटनाओं को मुस्लिम और यूरोपीय आक्रमणकारियों के नज़रिए से देखता है।

 

महानता दरकिनार

इस मंशा के कारण, प्राचीन वैदिक सभ्यता, मध्यकालीन हिंदू राज्यों की भूमिका और हिंदू धर्म ग्रंथों के प्रभाव से इस विशाल उपमहाद्वीप में समरूप भारतीय संस्कृति के विकास की बातों को दरकिनार कर दिया गया। स्वदेशी आध्यात्मिक विचार, धर्म और दर्शन की विचारधाराओं के योगदान से मंदिर और महलों के स्थापत्य, कला, विज्ञान, चिकित्सा, अंतरिक्ष, खगोल विद्या आदि जैसे जो अनोखे विषय सामने आए उनके साथ या तो पुरानी पड़ चुकी बातों जैसा व्यवहार किया गया या बहुत हुआ तो उनकी चर्चा महज संदर्भ के रूप में कर दी गई।

उन भारतीय इतिहासकारों ने बेहिसाब नुकसान पहुँचाया जो आजादी के बाद के भारत की हालत के लिए उसकी दासता और गुलामी के दौर को ही सबकुछ बताने की तैयारी में जुटे थे। आखिर उस देश का भविष्य कितना उज्ज्वल होगा जो देश अतीत की अपनी महानता को भुला दे? देश की छवि ऐसी बनाई गई कि वह बीते ज़माने में हुए आक्रमणों और शक्तिशाली विदेशी राजाओं, साम्राज्य निर्माताओं और धर्मपरिवर्तन को खुली छूट देने वाले विदेशी धर्मावलंबियों की दासता से बचकर निकले एक शिकार की तरह दिखे जो किसी तरह अपना शासन चलाने का प्रयास कर रहा है। ऐसी छवि से आत्म-सम्मान और उत्साह से भरे समाज का विकास नहीं हो सकता है।

 

खुलेआम तोड़-मरोड़

सत्ता के खेल में, सफलता ही सबकुछ होती है। भारतीय इतिहासकारों के दिमाग पर अकबर, शाहजहाँ और औरंगज़ेब जैसे मुगल शासक कुछ ज़्यादा ही हावी थे जिसके कारण उन्होंने छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप, कृष्णदेवराय जैसे निर्भीक भारतीय राजाओं और भारत के उन अनगिनत साहसी क्षेत्रीय शासकों को उपयुक्त श्रेय नहीं दिया जिन्होंने मुगलों की सत्ता को खुलकर चुनौती दी।

अगर भारतीय शूरवीरों को पूरी तरह नजऱअंदाज़ नहीं किया गया, तब भी इतिहास की हमारी किताबों में उन्हें एक या दो संक्षिप्त पैराग्राफ तक सीमित कर दिया गया। उस समय के सत्ताधीशों की ओर से खींचे गए संकीर्ण दायरे में रहकर काम करने वाले स्वार्थी इतिहासकारों की ओछी हरकतों के कारण इतिहास में लड़ी गई लड़ाइयों में दिखाई गई वीरता और साहस का वर्णन इतिहास की हमारी किताबों में किया ही नहीं गया। आज की तारीख में भी, हम देखते हैं कि भारत के शहरों और सडक़ों के नाम विदेशी आक्रांताओं के नाम पर हैं न कि देश के उन वीर सपूतों के जिन्होंने दिलेरी से उनका मुकाबला किया। यह इतिहास की सरासर विकृति नहीं तो और क्या है!

 

लोगों के जीवन से जुड़ी घटनाएँ

इतिहास का अर्थ मात्र राजाओं, युद्धों, विजय और पराजय का वर्णन करना ही नहीं होता। पराये राज्यों को युद्ध से जीतने और साम्राज्य खड़ा करने के अलावा, यह आम लोगों, विद्वानों और कलाकारों, व्यवसायियों और किसानों के जीवन से जुड़ी घटनाओं की जानकारी भी देता है। भारत के लोगों का यह सौभाग्य है कि उन्हें एक प्राचीन सभ्यता, अनोखी आध्यात्मिक जीवनशैली, समृद्ध संस्कृति, कला और स्थापत्य के अनुपम रूप और इन सबके साथ उच्च शिक्षा और उत्कृष्ट विचारधारा विरासत में मिली है। हमारे देश के इन ऐतिहासिक पहलुओं पर भारतीय इतिहास ने आखिर कितनी गहराई से गौर किया है?

शून्य के आविष्कार से लेकर खगोल विद्या और ज्योतिषशास्त्र में उत्कृष्टता प्राप्त कर आसमान की ऊँचाई को छूने तक, हमारे पूर्वजों ने अज्ञात को भी ज्ञात में बदलने का पथ प्रशस्त किया था। बेहद सीमित संसाधनों के बावजूद आविष्कार करने और अपनी क्षमता को बढ़ाने के साथ ही ज्ञान के दायरे का विस्तार करने में वे कभी पीछे नहीं रहे। आखिर कौन सा देश अपने ही विख्यात नहीं बल्कि शैक्षणिक और वैज्ञानिक क्षेत्र के महापुरुषों को भुला देगा जिन्होंने अब तक के अछूते क्षेत्रों और रहस्य से भरे क्षेत्रों की ओर कदम बढ़ाया?

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शिलाओं का सौंदर्य

भारतीय मंदिर की अद्भुत स्थापत्य कला ने जानकारों और दुनियाभर के पर्यटकों को उस वास्तुविद्या और सूझबूझ के कारण अभिभूत कर दिया जिनकी सहायता से मंदिरों का निर्माण किया गया और उनके कारण ही वे समय के थपेड़ों और आक्रमणों को झेलने के बाद भी खड़े हैं। उनके निर्माण के हज़ारों साल बाद भी, जानकार और कला के पारखी आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि हैरान करने वाली इन विशाल संरचनाओं को कहीं किसी दूसरे ग्रह से आए लोगों ने अपनी उन्नत और श्रेष्ठ तकनीकी कौशल से तो इस रूप में नहीं ढाला था। अगर ऐसा है, तो जिन लोगों ने इन परियोजनाओं को स्वीकृति दी और जिन लोगों ने इनका निर्माण किया उनके बीच आखिर किन साधनों से संपर्क हुआ होगा?

कहीं इन सबके पीछे संचार के श्रेष्ठ कौशल या दैवी शक्ति का हाथ तो नहीं था? अगर ऐसा नहीं था, तो इस विशाल उपमहाद्वीप और सुदूर पूर्व (कंबोडिया के अंकोरवाट में दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर जिसमें विशाल चट्टानों की कला और महीन नक्काशी का प्रयोग है और बाली के मंदिर) तक फैले ऐसे निर्माण भारतीय वास्तुकारों के कौशल और उनकी प्रतिभा का परिणाम थे, तो सोचिए इस विषय में उनकी जानकारी कितनी उन्नत रही होगी? और सीमित औजारों और उपकरणों के बावजूद निर्माण में शामिल उनके कारीगर कितने मेहनती और समर्पित रहे होंगे, यह सोचकर कोई भी हैरत में पड़ जाता है।

क्या अतीत की कुछ बातें ऐसी हैं जिन पर आज के भारत ने गौर नहीं किया है? क्या जिन देवताओं के पूजन और वंदन के लिए उन मंदिरों का निर्माण किया गया उनके प्रति समर्पण या आस्था के कारण ही वह संभव हुआ जो असंभव प्रतीत होता है? आखिर किन कारणों से हम उन बातों को भूल गए और ज्ञान तथा अद्भुत कौशल के बीच ऐसी गहरी खाई पैदा हो गई कि आज हम उनका प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं? क्या अचानक और चौंकाने वाले ढंग से उस ज्ञान और कौशल के विलुप्त हो जाने का कारण यह था कि विदेशी आक्रमणकारियों ने इस कला का ज्ञान रखने वालों को समाप्त कर दिया क्योंकि उनकी दिलचस्पी स्थानीय कौशल और प्रतिभा को बढ़ावा देने में नहीं बल्कि इन मंदिरों में इकठा किए गए धन को लूटने और अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करने में थी?

क्या वास्तुकारों के परिवारों और कला के छात्रों को इस कारण मौत के घाट उतार दिया गया ताकि वे पारिवारिक परंपरा और उस कला को आगे न ले जा सकें, जिससे ‘मूर्तिपूजक’ धर्म के प्रचार में सहायता मिलती है और आक्रमणकारियों के धर्म और दुष्प्रचार को आगे बढ़ाना कठिन हो जाता है? आखिर स्थापत्य की ऐसी कितनी अद्भुत कृतियों को लूटा, तहस-नहस और ध्वस्त कर दिया गया ताकि विदेशी मतों के धार्मिक स्थलों, मकबरों और आक्रमणकारियों के सम्मान में दूसरी इमारतों को खड़ा किया जा सके? निष्पक्ष इतिहासकारों से मिलने वाले विश्वसनीय प्रमाणों के बिना इन प्रश्नों के उत्तर कौन दे सकता है? अयोध्या में जहाँ एक हिंदू मंदिर था वहाँ बाद में मुगल ढाँचा खड़ा किया गया था इस पर फैसला सुनाने में अदालत को 70 साल लग गए।

 

ऐतिहासिक भूल का सुधार

ऐतिहासिक अन्याय को पीढ़ी दर पीढ़ी झेलने वाले लोगों से सुनी-सुनाई बातों के बजाए धरती के नीचे दबे ऐसे पुरातात्विक चमत्कारों को जहाँ मंदिर हुआ करते थे, सामने लाने के लिए भूगर्भीय उत्खननों की शुरुआत करना कहीं अधिक आसान होगा। यह सबकुछ और इससे भी कहीं अधिक बातों का पता तब चलेगा जब विकृत भारतीय इतिहास को फिर से लिखा जाएगा। हमारे देश के साथ जो ऐतिहासिक अन्याय किया गया है उसे पलटने के लिए ऐसा किया जाना आवश्यक है।

 

सुनील गुप्ता

 

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