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नरेन्द्र मोदी क्यों हैं चीन, पाकिस्तान और कांग्रेस के निशाने पर भारत को महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकेगा

नरेन्द्र मोदी क्यों हैं चीन, पाकिस्तान और कांग्रेस के निशाने पर  भारत को महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकेगा

पाकिस्तान को तो चीन के साथ जाना ही था क्योंकि भारत के सामने वह बौना साबित हो चुका था और चीन को भारत से बैर रखने वाले देशों की तलाश थी। पर इस जोड़ी में कांग्रेस पार्टी ने जुड़ कर उसे तिकड़ी बना दिया। अब भारत सरकार को पाक के बाद चीन के साथ साथ कांग्रेस को भी झेलना है। कांग्रेस पर घर के भेदिये की तरह काम करने के आरोप भी लग रहे हैं।

 

भारत के दुश्मन देशों को भारत को महाशक्ति बननें की दिशा में बड़ते हुये देख कर रातों में नींद नहीं आ रही है। ये सभी देश जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी का और लम्बे समय तक प्रधानमंत्री बना रहना पाकिस्तान और चीन के मंसूबों पर पानी फेर देगा। इधर कांग्रेस पार्टी को भी यही चिन्ता सता रही है यदि मोदी देश को विकास की ओर अग्रसर करते हुये महाशक्ति बनानें की ओर थोड़े भी सफल हुये तो बची खुची कांग्रेस का फट्टा साफ हो जायेगा। यही कारण है कि अपने जीवन भरण के अंतिम दौर की लड़ाई लड़ती कांग्रेस मोदी को नीचा दिखाने में देश को नीचा दिखाने से भी परहेज नहीं कर रही। एक नही दर्जनों उदाहरण है जब कांग्रेस पार्टी की गतिविधियां और उसके नेताओं के बोल राष्ट्र का अहित करनें से भी नहीं चूकते।

 

भारत ने 1952 में की थी भयंकर भूल:

चीन ने 1962 में भारत के साथ दोस्त बनकर दगा किया जबकि 1952 में जबरन कब्जा करनें पर भारत ने चीन के खिलाफ कुछ करना तो दूर कुछ बोला तक नहीं था। अमेरिका, ब्रिटेन आदि देश चीन के खिलाफ आवाज उठा रहे थे उस समय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने बजाय अमेरिका का साथ देने के चीन का ही साथ दिया था। यदि हमने उस समय तिब्बत का साथ दिया होता तो शायद चीन को तिब्बत छोडऩा पड़ता या फिर पीछे तो हटना ही पड़ता। लेकिन हमनें कम्युनिस्त तानाशाह चीन के विस्तारवाद का विरोध नहीं किया। यह भयंकर भूल भारत को कैंसर साबित हुई जिसके निदान का 65 वर्षों तक कोई प्रयास नहीं किया गया। खानापूर्ति होती रही, झड़पें होती रहीं। न तो हम चीन से कभी अपनी 46000 वर्ग किमी0 जमीन खाली करा पाये न ही उसके लिये अंतर्राष्ट्रीय जगत में अपने पक्ष में माहौल पैदा कर पाये। बाद में तिब्बत के नेताओं को भारत में शरण देनें से कोई लाभ नहीं हुआ। तिब्बत की सरकार भी भारत रह कर भी बनी जो मात्र कागज पर है। उस सरकार को कोई मान्यता नहीं दी सिवाय रोने-धोने। के बेचारे तिब्बती अब क्या कर सकते है।

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भारत कूटनीति में चीन के सामने फेल होता रहा:

चीन यू.एन.ओ. में सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बना, पर भारत नही बन सका। ये बात और है कि रूस ने कश्मीर के मामले पर हमारा साथ दिया और वीटो पावर का इस्तेमाल भी हमारे हक में कइ बार किया। पर चीन के मामले में हमनें 50 साल से अधिक चुप्पी साध कर काटे। यहां तक कि कश्मीर क्षेत्र को भी भारत के संविधान के तहत नही ला सके जो कि हमारा हर तरह से सिद्ध अधिकार था। उल्टे कश्मीर से लाखों पंडित निकाल दिये गये फिर भी सरकारें सोती रही कश्मीर पर मुसलमानों का पूरा आधिपत्य हो गया। पाकिस्तानी घुसपैठिये आतंकवादी वहां की सरकार से मनचाहे फैसले करवाने लगे। किसी भी सुबह हम सोकर उठते और समाचार मिलता कि पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जा कर लिया। अब 370 धारा हटा कर कश्मीर भारत के संविधान में पूर्णत: आ गया। पर यही काम अक्साई चीन या भारत की चीन द्वारा हड़प की गई सम्पूर्ण जमींन को वापिस लेने के लिये भारी जोखिम उठाना पड़ेगा।

 

मनमोहन सिंह सरकार ने सेना की अनदेखी की:

एक अंधा भी कह देगा कि भारतीय सेना के साथ 1962 के चीन हमले के बाद भी हम सोते रहे। 50 साल देश की सेना को ताकतवर बनानें के लिये बहुत होते हैं। उधर चीन कड़ी मेहनत और सही नीति निर्धारण के कारण शक्तिवान होता गया। उसनें अपनी सेना को आधुनिक हथियारों से सुसज्जित कर लिया। आज विश्व की तीन शक्तिशाली सेनाओं में चीन भी एक है। अगर हम देखें तो हथियारों के मामलें में सेना को नजर अंदाज करने का काम मनमोहन सिंह सरकार के 10 साल में हुआ है, ये बात और है कि हमारे जवानों की दम, उत्साह और बहादुरी में कभी कमी नहीं आयी। मनमोहन सिंह की सरकार ने लगभग सभी सेना की मांगे ठुकरायी।  ये समझ पाना मुश्किल है कि सिंह साहब किस मजबूरी के शिकार थे या किसी साजिश में फंस गये थे। सेना को 10 साल बुलेट प्रूफ जेकेट नहीं देना, राफेल जैसे शक्तिशाली हवाई जहाज की खरीद की फाईल 10 साल लटकाये रखना और लम्बी दूरी की क्रूज मिसाइल नहीं खरीदना क्या सेना और देश को कमजोर करना नहीं था। लोहित नदी पर अरूणांचल जाने वाले पुल के निर्माण को अधूरा रखना अरूणांचल में रोड और हवाई अड्डा नही बनाना ये सब या तो चीन से डरने के कारण हुआ या फिर किसी साजिश के तहत। एक तरह से ये बातें चीन जैसे दगाबाज को जमींन-भोज पर आमंत्रित करने जैसा था। क्या मनमोहन सिंह इण्डियन आर्मी के गुनाहगार नहीं है जिन्होनें उनकी सुरक्षा की हर मांग को ठुकराया या नजर अंदाज किया है।

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इन प्रश्नों के उत्तर देने होंगे राहुल कांग्रेस को:

कांग्रेस जबसे केन्द्र में सत्ता से बाहर हुयी है विपक्ष की भूमिका में जीरो साबित हुयी है। यही कारण है कि उसे दुबारा चुनाव में जनता ने बुरी तरह नकार दिया। राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय जगत में भी कांग्रेस पार्टी के कार्य कलाप देश को नीचा दिखाने वाले रहे। नोटबन्दी जी.एस.टी. बेरोजगार, किसान, मजदूर, नौजवानों की समस्यायों की बातों से हटकर राफेल खरीद और सी.बी.आई. की नियुक्तियों  में उलझ कर रह गयी। सी.बी.आई. में अफसरों की तैनाती,  सी.ऐ.जी., रिजर्व बैंक आदि में नियुक्ति से आम जनता को क्या लेना देना है। यहां तक कि नरेन्द्र मोदी ने मंहगा सूट पहिना है वो विदेश में ज्यादा रहते हैं, चाय बेचने वाला देश कैसे चलायेगा आदि समस्यायें कांग्रेस को अधिक महत्वपूर्ण लगी। सारे के सारे कांग्रेस के काम जनता केन्द्रित न होकर केवल और केवल नरेन्द्र मोदी केन्द्रित हो गये।

पाकिस्तान को तो चीन के साथ जाना ही था क्योंकि भारत के सामने वह बौना साबित हो चुका था और चीन को भारत से बैर रखने वाले देशों की तलाश थी। पर इस जोड़ी में कांग्रेस पार्टी ने जुड़ कर उसे तिकड़ी बना दिया। अब भारत सरकार को पाक के बाद चीन के साथ साथ कांग्रेस को भी झेलना है। कांग्रेस पर घर के भेदिये की तरह काम करने के आरोप भी लग रहे हैं।

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मैं राहुल गांधी एंड कंपनी से राजीव

फाउंडेशन को चीन से मिले फंड की बात नहीं करता न ही उनकी चीन या अन्य देशों की यात्राओं की चर्चा। जिन बातों का देश, अखंडता और सुरक्षा से सीधा संबंध है, इसका जबाब उन्हें आज नही तो कल देना ही होगा। बेहतर आज दे दे नही तो चुनाव में कांग्रेस के विरोधी दल उनका जबाब जनता की अदालत में मांगेगे ही मांगेगे।

देश पर खतरा मंडरा रहा था। पाक से संबंध किसी तरह नहीं सुधर पा रहे थे। पाक आतंकी हमले करवा रहा था। कश्मीर की सुरक्षा विशेष तौर से खतरे में थी और चीन अपनी सैन्य शक्ति बड़ा रहा था। इन हालातों में खुद मनमोहन सरकार ने 10 साल राफेल लड़ाकू हवाई जहाज नहीं खरीदा और जब मोदी सरकार ने उसका बजट तैयार किया और खरीदनें के आदेश दिये तो उसकी खरीद प्रक्रिया हर हालत में रूकवाने की कोशिश की गयी। रिटायर्ड फौजी और सेना के अफसर ही नहीं पूरी दुनिया जानती है कि राफेल युद्ध में गेम चेंजर है।

भले कांग्रेस पार्टी सरकार के भ्रष्ट होने की बात करते रहते हैं। ये उनका अधिकार क्षेत्र था। सुप्रीम कोर्ट से मांफी मांग कर, राफेल खरीद पर कोर्ट के फैसले के बाद भी राफेल पर जमें  हुये हैं राहुल गांधी। मनमोहन सरकार से सेना ने 1.5 लाख बुलेट प्रूफ  जाकेट मांगी थी। क्यों नहीं दी गयी? अरूणांचल में लोहित नदी पर पुल और हवाई अड्डा रोड आदि क्यों नही बनाया? जबाब दें नही तो ये शक की सुई सदा उन्हें चुभोती रहेगी।

दूसरा 370 धारा अस्थायी थी, जो कश्मीर में भारत के संविधान को लागू करने में एक अड़चन थी। उसकी समाप्ति का क्यों कांग्रेस ने विरोध किया। क्या कांग्रेस नही चाहती थी कि कश्मीर में भारत का संविधान लागू हो जाये। क्यों अपनी आवाज पाक के सुर में सुर मिलाकर संसद में पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी ने मामले को यू.एन.ओ. में लम्बित होने का जिक्र किया।

तीसरी बात सीसीए कानून का विरोध भी कांग्रेस पार्टी ने जम कर किया भारत की बदनामी करने का प्रयास हुआ। क्या ये सच नहीं है कि गांधी जी इसके पक्षधर थे। क्या कांग्रेस पार्टी का ये स्वयं का प्रस्ताव नहीं था। क्या मनमोहन सिंह जी ने स्वयं पार्लियामेंट में तत्काल उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाड़ी से नहीं कहा था कि जल्द ही पाकिस्तान में बसे अल्पसंख्यकों को भारत में आने के लिये कदम उठाया जाये। वकौल गांधी जी ‘‘पाक के अल्पसंख्यक (हिन्दू, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध) जो वहां रह गये भविष्य में जब कभी आना चाहें तो आने देगी। भारतीय सरकार उन्हें आने देगी रोजगार और निवास हेतु सुविधायें देने में मदद करेगी’’

बाद में यही लाईन कांग्रेस पार्टी ने जवाहर लाल नेहरू के समय में ली और मनमोहन सिंह ने यही कहा। पर कांग्रेस पार्टी ने इसमें मुसलमानों को जुड़वाने की जिद की, जिससे दुश्मन देशों को खिलाफ बोलने का अवसर मिला और हमारी विश्व भर में खिल्ली उड़ाने का बहाना भी।

चौथी बात बंगलादेश के शरणार्थियों के लिये इन्दिरा गांधी ने कहा था कि 1971 के बाद आये बंगलादेशियों को हर सूरत में वापिस जाना ही होगा, मैं समय सीमा नही बता सकती। बाद में राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री की हैसियत से आसान गण परिषद आदि से समझौते पर दस्खत किये कि 1971 के बाद आने वाले बंगलादेशियों को नागरिकता नहीं मिलेगी। पर कांग्रेस पार्टी आज उसके उलट बात कर रही है।

ये सारी बातें नरेन्द्र मोदी या उनकी सरकार के खिलाफ नहीं देश के खिलाफ है। मोदी के चक्कर में कांग्रेस पार्टी देश के हितों के खिलाफ ही आवाज उठाने लगे। आज नहीं तो कल वर्तमान नहीं तो भविष्य में इन बातो का जबाब कांग्रेस से जरूर मांगा जायेगा। कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि नरेन्द्र मोदी को नीचा दिखाने के लिये चीन और पाकिस्तान की टीम में कांग्रेस भी शामिल हो गयी है। कांग्रेस ने इस तिकड़ी में शामिल होकर अपनी ही नहीं देश की छवि भी बिगाड़ रही है।

 

डॉ0 विजय खैरा

 

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