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नए कलेवर में राहुल गांधी

नए कलेवर में राहुल गांधी

आखिरकार, राहुल गांधी धूम-धड़ाके के साथ लौट आए हैं। बुरी तरह अकेले पड़ी कांग्रेस पार्टी भी हताशा से उबरकर राजनैतिक आंदोलन शुरू करने को उठ खड़ी हुई है। सबसे पुराने खानदान के वरिष्ठ सलाहकारों ने कांग्रेस के वारिस के लिए नई रणनीतियां तैयार कर ली हैं। ये सभी वर्षों से यही सुनने की इंतजार में रहे हैं कि कैसे राहुल को किसानों से सहानुभूति है, कैसे वे उनकी नब्ज पहचानते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से लेकर पूर्व वित्त मंत्री पी.

चिदंबरम और ग्वालियर के सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया तक सभी राहुल गांधी का संदेश पहुंचाने के लिए कतार बांधे खड़े हैं।  वाकई देश की सबसे पुरानी पार्टी और उसके वफादार कार्यकर्ता और नेता दुनिया के नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों से शिक्षा पाने के बावजूद भारत में ‘लोकतंत्र’ और ‘नेतृत्व’ का अर्थ नहीं जान पाए हैं। कांग्रेस पार्टी और उसके आला नेतृत्व की यह हालत भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के आला नेतृत्व के लिए काफी मुफीद है। भारतवर्ष के लोग अब यह बखूबी समझते हैं कि भाजपा और कांग्रेस के बीच कौन सत्ताधारी पार्टी और कौन मुख्य विपक्षी दल की भूमिका बेहतर निभा सकता है।

अब तक भाजपा का मुख्य विपक्षी दल के तौर पर ट्रैक रिकॉर्ड उम्दा रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पिछली एनडीए सरकार के सफल कार्यकाल के बाद लोगों ने भाजपा को दस साल के लिए सत्ता से बाहर कर दिया। हर किसी को याद है कि पंडित नेहरू ने अटल बिहारी वाजपेयी की श्रेष्ठ सांसद के नाते भूरि-भूरि प्रशंसा की थी और कहा था कि एक दिन वे देश के प्रधानमंत्री बनेंगे। लेकिन इस बार इतिहास ने कुछ करवट बदली। कोई राजनैतिक विश्लेषक यह भविष्यवाणी नहीं कर पाया था कि नरेंद्र मोदी इतने विशाल बहुमत के साथ कभी प्रधानमंत्री बन पाएंगे। उन पर पूरे देश में भाजपा के सबसे सांप्रदायिक, अछूत नेता का ठप्पा लगा दिया गया था, लेकिन वे गुजरात में ‘दंगों’ के बाद से हर चुनाव जीतते आ रहे थे। भारत में सेक्युलर तबका यह अच्छे से जानता है। अब मोदी 26 मई 2015 को बतौर प्रधानमंत्री एक साल पूरा करने जा रहे हैं। अब मोदी चाहे इसे स्वीकार करें या नहीं, लेकिन आम जनता और पार्टी कैडरों में मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे चला गया है। लेकिन उद्योग, बाजार और उत्पादन क्षेत्र को अभी भी उम्मीद है कि मोदी के नेतृत्व में भारत एक नया इतिहास रचेगा। बाकी सब कुछ उन राजनैतिक पंडितों के जिम्मे है, जो अपने विश्लेषण में शायद ही कभी सही साबित होते हैं। अब तो भाजपा के कैडरों में एक डर भी बैठता जा रहा है कि अगले चुनाव मोदी के नाम पर जीतने आसान नहीं होंगे। भाजपा की समस्या यह है कि जब उनके बीच के किसी का कद ऊंचा उठ जाता है तो विपक्ष से अधिक कुछ भीतरी लोग ही उसकी टांग खिंचाई में लग जाते हैं। विपक्ष, सेक्युलर मीडिया और तमाम सेक्युलर नेता चुपचाप मोदी की राजनीति को देखते रहे हैं। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी निहत्थों की तरह व्यवहार करती रही है और उसके संभावित अध्यक्ष राहुल गांधी सबसे नकारा नेता ही साबित हुए हैं।

लेकिन राहुल की हालिया वापसी के बाद कुछ भाजपा नेता भी मानने लगे हैं कि राहुल गांधी बीच बहस में उतर आए हैं। हालांकि भूमि अधिग्रहण विधेयक उस कदर किसान विरोधी नहीं है, जैसा कांग्रेस बताना चाह रही है। हकीकत तो कुछ और ही है फिर भी इस विधेयक ने कांग्रेस को काफी शह दे दी है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के दिल्ली की किसान रैली और लोकसभा में एनडीए सरकार के भूमि अधिग्रहण (संशोधन) विधेयक, 2015 के खिलाफ भाषणों की देश भर में सराहना हो रही है। करीब दो महीने के अज्ञातवास के बाद राहुल का यह नया उदय हर किसी की नजर में है।

गौरतलब है कि एनडीए सरकार ने सत्ता में आने के छ: महीने के भीतर भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास अधिनियम, 2013 में संशोधन करने का फैसला किया। सरकार ने राष्ट्रपति को 31 दिसंबर 2014 की मध्यरात्रि में एक अध्यादेश जारी करने का सुझाव दिया। इससे तूफान खड़ा हो गया और सिर्फ विपक्षी पार्टियां ही नहीं, अन्ना हजारे जैसे प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता भी सड़क पर उतर आए। तब से यह मुद्दा छाया हुआ है। इससे मौका भांपकर, पिछले साल आम चुनावों में हताशा की कगार पर धकेल दी गई कांग्रेस ने इस मुद्दे को दोनों हाथ से उठा लिया और इससे पार्टी में नई जान आ गई है। राहुल की सक्रियता भी कांग्रेस में नई ताजगी ला रही है। लेकिन उन्हें सक्रिय होने में दस से ज्यादा महीने लग गए। उनके इस नए अवतार की कई वजहें हो सकती हैं। संभव है, पार्टी के पुराने नेता उन पर दबाव बना रहे होंगे। इतने लंबे इतिहास वाली पार्टी में बिलाशक पुराने नेताओं के रूप में ऐसी रुकावटें होना लाजिमी है जो आज के दौर के राजनैतिक दर्शन के हिसाब से चलने में दिक् कत महसूस कर रहे हों। हाल में कुछ विरोधी स्वर भी उठे ही थे। इसलिए, ऐसा लगता है, राहुल उन्हे संतुष्ट करने को राजी हो गए हों और इस तरह फिर पार्टी में सक्रिय हो गए हों। ऐसे में यही उम्मीद की जा सकती है कि यह उत्साह बरकरार रहेगा और पार्टी में बेहतर तालमेल बना रहेगा। बेशक, यह देश के लिए जरूरी है क्योंकि एक कारगर विपक्ष का होना बेहद जरूरी है। लोकतंत्र का तो यही सार है।

अब कांग्रेस के बारे में यह विचार करना भी गैर-मुनासिब नहीं होगा कि जो पार्टी अब किसानों की हितैषी बन रही है, उसे पिछले लोकसभा चुनावों में किसानों के वोट क्यों नहीं मिले। इसकी कुछ वजहें इस प्रकार हैं। इकोनॉमिक टाइम्स में 30 अगस्त 2013 की रिपोर्ट में तत्कालीन कृषि राज्यमंत्री के राज्यसभा में लिखित जवाब का हवाला दिया गया है। सदन को मंत्री ने बताया था कि केंद्रीय सांख्यकी कार्यालय (सीएसओ) के ताजा अनुमान के मुताबिक 1950-51 में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि उपज/उसके सहयोगी क्षेत्रों की हिस्सेदारी 51.9 प्रतिशत थी, जो 2012-13 में घटकर 2004-05 के मूल्य पर 13.7 प्रतिशत रह गई है। 2012 में योजना आयोग के आंकड़ों के मुताबिक जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी 1998-99 में घटकर 26 प्रतिशत पर आ गई और 2012-13 में 13 प्रतिशत ही रह गई। इसके अलावा, नियंत्रक और महालेखाकार (सीएजी) की एक रिपोर्ट में महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में 53,000 करोड़ रु. के किसान कर्ज माफी घोटाले का खुलासा हुआ। यूपीए के शासनकाल में ऐसे कई और घोटालों के अलावा बड़े पैमाने पर किसानों की खुदकशी की खबरें भी सामने आईं। ये भी खबरें आईं कि 2004-05 से लेकर 2009-10 के दौर में कृषि में 1.4 करोड़ रोजगार और उत्पादन क्षेत्र में 50 लाख नौकरियां खत्म हो गईं।

आजाद भारत के इतिहास में कांग्रेस पार्टी अधिकतर समय सत्ता में रही है। इसे ध्यान में रखकर राहुल के लिए सिर्फ थोड़ी-बहुत सिखाई गई भाषण कला से प्रभावित करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन्हें किसानों और कमजोर तबकों के हितों की रक्षा के लिए संतुलित, तार्किक और संतुष्टिदायक एजेंडा भी लेकर सामने आना होगा। वरना, गरीबों के सिपाही, कर्ज माफी के पैरोकार और किसानों की दुर्दशा दूर करने वाले के रूप में उनका नया अवतार महज एक नौटंकी बनकर रह जाएगा।

दीपक कुमार रथ

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