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राहुल गांधी: अनिच्छुक से बने जुझारु नेता

राहुल गांधी: अनिच्छुक से बने जुझारु नेता

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने 56 दिनों के प्रवास के बाद अपने नए आक्रामक अवतार में वापसी कर न केवल सत्तारूढ़ पार्टी को अचंभित कर दिया है, बल्कि अपनी पार्टी के नेताओं को भी खुशी से आश्चर्य में डल दिया है। साथ ही बड़े पैमाने पर लोग ये सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि गांधी-नेहरू परिवार के वंशज के दृष्टिकोण में इस भारी बदलाव का कारण क्या है? एक अनिच्छुक और मीडिया से बचने वाले नेता के अपने रूप को छोड़कर राहुल गांधी ने संसद में पहली बार अपनी धमक दी। बिन बताए विश्राम से वापस लौटने के बाद राहुल गांधी अचानक तेज और उग्र नेता के रूप में तब्दील हो गए।

राहुल गांधी ने खुद को गरीबों और युवाओं के नेता के रूप में पेश करते हुए कहा कि कृषि संकट किसानों की आत्महत्या का मुख्य कारण बन गया है और मोदी सरकार इस पर कुछ नहीं कर रही है। ऐसा कहकर उन्होंने मोदी सरकार के लिए चुनौती भरा महौल खड़ा कर दिया है। राहुल गांधी ने पिछले दिनों राष्ट्रीय राजधानी में प्रभावशाली रैली को संबोधित करते हुए किसानों को आश्वासन दिया था कि वह और उनकी पार्टी मिलकर ‘कॉर्पोरेट समर्थक’ मोदी सरकार के, जो भूमि अधिग्रहण बिल लाकर किसानों के हित का त्याग कर रही है, खिलाफ किसानों का समर्थन करेगी। भट्टा परसौल भूमि अधिग्रहण मामले में राहुल को मुंह की खानी पड़ी थी। अपनी उस छवि को ठीक करने के लिए भी राहुल इस मामले में आक्रामक दिखाई दे रहे हैं। राहुल उस वक्त किसानों के हित के लिए आगे क्यों नहीं आए, जबकि सत्ता में उनकी खुद की सरकार थी? राहुल के इस नए राजनीतिक जुझारू नेता के स्वभाव से स्पष्ट होता है कि उनके ऊपर लोकसभा में पहले दिन से ही किसानों के मुद्दे को लेकर दबाव रहा। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर किसान-विरोधी सरकार होने का इलजाम लगाते हुए कहा कि ये ‘सूट-बूट की सरकार’ है। ये कहकर राहुल ने नरेन्द्र मोदी को उस आलोचना की याद दिला दी जो अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबाम की भारत यात्रा के दौरान 10 लाख का सूट पहनने पर उन्हें झेलनी पड़ी थी। राहुल किसानों के मुद्दे को लेकर मैदान में उतर आए हैं जो देश के युवाओं को लुभाने की एक कोशिश है, ताकि युवा एक बार फिर उनके समर्थन में उतर आएं। राहुल ने सरकार पर आरोप लगाया कि वो इंटरनेट का बंटवारा करते हुए कॉरपोरेट को बेच देना चाहती है। राहुल ने कहा कि सरकार कि ट्राई के साथ बातचीत बंद होनी चाहिए। उन्होंने इसके लिए एक कानून की मांग की। भूमि अध्यादेश पर पहले से ही एकजुट विपक्ष के संघर्ष का समना कर रही भाजपा राहुल के जुबानी हमलों को बेअसर करने के लिए सक्रिय हो गई है। भले ही भाजपा मंत्री शून्यकाल में उठाए गए मुद्दों का जबाव नहीं दे रहे हैं, लेकिन दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद और संसदीय मामलों के मंत्री एम. वेंकैया नायडू ने राहुल के आरोपों का खंडन किया। रविशंकर प्रसाद ने आश्वासन देते हुए कहा कि सरकार लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए नेट नियूट्रीलिटी मुद्दे पर निर्णय लेगी। उन्होंने लोगों को ये याद दिलाकर कि यूपीए दो सरकार के द्वारा ट्विटर का इस्तेमाल करने वाले बहुत से लोगों को अवरूद्ध कर दिया गया था राहुल को और आक्रामक बना दिया।

हालांकि राहुल की आक्रामक, स्वेच्छक और निर्णायक नेता की छवि जो राहुल को कांग्रेस के उपाध्यक्ष पद से खारिज करने के लिए काफी थी, वही छवि भाजपा के लिए मुश्किलों को बढ़ाने वाली बन गई है। राहुल में आया परिवर्तन इस तथ्य से साफ नजर आता जब उन्होंने कहा कि नरेन्द्र मोदी देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिनकी प्रशंसा अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा टाईम्स मैग्जीन में छपे एक लेख में की गई। साथ ही उन्होंने ये व्यंग्य भी किया कि ओबामा से पूर्व अमेरिका के राष्ट्रपति ने पूर्व सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव की प्रशंसा भी की थी जो कि अमेरिका के हित का समर्थन साधने वाले व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे, लेकिन बाद में वो ही सोवियत संघ के विघटन की वजह बने।

मोदी के लिए इस तरह के व्यंग्य काफी परेशान करने वाले हैं, वह भी उस वक्त जब नरेन्द्र मोदी एक-के-बाद एक विदेश यात्रा करके अपनी छवि को बनाने में लगे हैं, अपनी मजबूत सरकार का प्रदर्शन कर रहे हैं और पिछली यूपीए सरकार को भारत में हुए घोटालों के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए उसकी आलोचना कर रहे हैं। जब किसान गजेन्द्र सिंह ने राष्ट्रीय राजधानी में आप की रैली के दौरान आत्महत्या कर ली उस वक्त केवल राहुल गांधी ही उसे देखने के लिए अस्पताल पहुंचे। राहुल के इस रवेयै से न केवल उनका नया अवतार झलक रहा है, बल्कि उनकी सहजता भी इस बात से स्पष्ट नजर आ रही है। जबकि ये वही राहुल गांधी हैं जो निर्भया सामूहिक बलात्कार के दौरान पूरी तरह से गैर-मौजूद रहे थे। इसकी वजह से उन्हें लोगों का भारी विरोध झेलना पड़ा था।

राहुल की कमान में कांग्रेस को लगातार चुनावी हार का सामना करना पड़ा, जिससे ना सिर्फ लोकसभा में उसकी क्षमता कम हुई बल्कि कार्यकर्ताओं का भी मनोबल गिरा। वही कांग्रेस उनमें आये बदलावों से बेहद खुश दिख रही है। लोकसभा में विपक्ष के नेता जैसा महत्वपूर्ण पद खो देने वाली कांग्रेस राहुल के खुलकर सामने आने से काफी उत्साहित है। लेकिन पार्टी के बहुत लोगों का यह भी सोचना है कि राहुल का यह नया रूप लम्बे समय तक रहेगा या फिर राहुल फिर जरुरी मौकों पर गायब रहने के अपने पुराने ढर्रे पर लौट जाएंगे।

कांग्रेस महासचिव बी.के. हरिप्रसाद का कहना है कि ”राहुल का खुलकर सामने आना पार्टी के लिए बहुत अच्छा है। लोगों की उम्मीद उनसे काफी बढ़ गयी है।’’ राहुल के नए अवतार पर टिप्पणी करने से बचते हुए उन्होंने कहा कि मोदी सरकार की विफलता ही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल द्वारा सरकार पर हमले का कारण है।

यह स्वीकारते हुए कि राहुल अब ज्यादा आत्मविश्वास से भरे और खुले नजर आ रहे हैं, दूसरे कांग्रेस महासचिव शकील अहमद का कहना है  कि ”यह एक सच है कि उनका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ है। वह अब ज्यादा खुले दिख रहे हैं। ज्यादातर चीजें जो अब सामने आ रहीं हैं वह पहले भी उनके अंदर थीं, लेकिन वह लोगों के सामने नहीं आ रही थी, क्योंकि राहुल मीडिया से दूर रहते थे।’’ किसानों के हितों का मुद्दा हो या नेट नूट्रलिटी का, यह सारे मुद्दे उनके दिल के करीब हैं।  छुट्टियों पर जाने से पहले राहुल ने सभी वरिष्ठ नेताओं को बता दिया था कि वह आत्मचिंतन के लिए जा रहे हैं।  ये सभी मुद्दे काफी मंथन के बाद निकले हैं और उन्हें अब समझ आ गया होगा कि उन्हें क्या करना है और कैसे करना है। उनकी यह कोशिश नजर आ रही है।

राहुल के कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में ताजपोशी पर अहमद का कहना है कि यह एक खुला मुद्दा है। सोनिया गांधी हमारी सबसे बड़ी नेता हैं और राहुल भी यही मानते हैं। कांग्रेसजनों के मन में इस बात को लेकर कोई भी दुविधा या सवाल नहीं है।

मीडिया में आ रही खबरें कि सोनिया और राहुल के मध्य उनके नए अवतार को लेकर कोई दुराव है, उसे नकारते हुए अहमद ने याद दिलाया कि हाल ही में जब सोनिया से राहुल की ताजपोशी के बारे में पूछा गया था तो उन्होंने कहा था कि यह सब कुछ राहुल पर निर्भर करता है। सो यह साफ है कि जो भी फैसला होगा वह मां-बेटे की सहमति से होगा।

इन सब के बीच, कांग्रेस के पुराने सैनिक पार्टी में आने वाले पीढ़ीगत बदलाव से काफी चिंतित हैं। सोनिया से नजदीकियों की वजह से सत्ता का स्वाद चखने वाले इन नेताओं को यह चिंता सता रही है कि राहुल के नेतृत्व में वह अंधेरे में धकेल दिए जाएंगे। सूत्रों की मानें तो इन नेताओं के लिए सबसे दिल जलाने वाली बात तो लोगों के बीच फैलाया जा रहा वह सन्देश है, जिसमें कहा जा रहा है कि 55 साल से ऊपर के लोगों के लिए राहुल की टीम में कोई जगह नहीं है।

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह, दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और उनके पुत्र और भूतपूर्व सांसद संदीप दीक्षित द्वारा सोनिया को पार्टी अध्यक्ष बनाये रखने सम्बंधित बयानों से राहुल के लिए मुश्किल खड़ी  हो सकती है। हालांकि इनके बयानों को राहुल द्वारा अजय माकन और प्रताप सिंह बाजवा को दिए जा रहे बढ़ावे के विरोध के तौर पर भी देखा जा सकता है। लेकिन, राहुल की टीम विरोध के स्वरों को दबाने के लिए पूरी तरह तैयार है और इसी कड़ी में कई कांग्रेस सचिव संदीप के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग कर चुके हैं।

कांग्रेस की संस्कृति समझने वाले राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि छोटे-मोटे झटकों के अलावा यह पीढ़ीगत बदलाव काफी आसानी से हो जायेगा। हालांकि उनकी तरफ से राहुल के लिए एक चेतावनी भी है। राजग सरकार से अच्छी तरह निपटने के लिए  और अपनी खोयी जमीन वापस पाने के लिए, उन्हें अपने वरिष्ठ सहयोगियों को साथ रखना ही होगा।

 अन्नपूर्णा झा

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