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क्या मोदी की ख्याति का सूर्यास्त हो रहा है?

क्या मोदी की ख्याति का सूर्यास्त हो रहा है?

जैसा कि सामान्य लोगों की भावनाओं को लेकर मीडिया टिप्पणीकारों, टीवी एंकरों और कांग्रेस के प्रवक्ताओं का दावा है कि अपने चुनावी वादों में एक भी वादे को पूरा नहीं करने के कारण मोदी से लोगों का मोहभंग होता जा रहा है। ऐसा दावा किया जा रहा है कि ‘मन की बात’ के जरिए मोदी लगातार दावे कर रहे हैं, लोग उनसे तंग आ चुके हैं। तो वास्तविकता क्या है?

चुनावी अभियान के दौरान उनके वादे से लंबे समय से पॉलिसी पैरालिसिस से ग्रस्त देश में उम्मीद की एक नई रौशनी दिखी थी। निश्चित रूप से मोदी ने अपनी हंसमुख और मिलनसार छवि को सामने लाने के लिए ‘चार्म डेफिसिट डिस्ऑर्डर’ पर काम किया, ताकि उन क्षेत्रों में अपनी पकड़ बनाएं जो कांग्रेस का गढ़ थे।

मोदी न सिर्फ जीते, बल्कि भारी बहुमत से जीते और गठबंधन सरकार की परंपरा को तोड़ दिया। अपने 11 महीने के शासनकाल के पिछले कुछ महीनों में ही मोदी को असंतोष का स्वर सुनने को मिलने लगा। यह सिर्फ उनके विरोधियों का ही नहीं, बल्कि उन लोगों का भी है जिन्होंने मोदी को यूपीए की बीमारी से परेशान देश के लिए दवा बताया था।  व्यापक जनादेश उन्हें कुछ देर के लिए खुशी दे सकता है, लेकिन उनकी स्वयं में जिम्मेदारी भी है।

शहजादा और मैडम कहकर उन्होंने उम्मीदवार मोदी के बजाय लोगों के सामने अपनी एक स्टेट्समैन वाली छवि को ज्यादा प्रोजेक्ट किया। मोदी अपनी प्रतिशोधी छवी को पीछे छोडऩा चाहते हैं। भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय बैठक में लालकृष्ण आडवाणी बोले नहीं, लेकिन मंच पर मौजूद रहे और जैसा कि भाजपा के पदाधिकारियों ने गर्व से मीडिया को बताया, मोदी के भाषण के दौरान तालियां भी बजाईं।

आरोप यह भी लगाया जा रहा है कि पॉलिसी पैरालिसिस से मोदी सरकार भी पीडि़त है, क्योंकि प्रधानमंत्री कार्यालय में सारी शक्तियां और निर्णय-क्षमता निहित है। इस तरह मोदी शासन से नीति-निर्माण तक और नियुक्ति से लेकर स्थानांतरण तक सब कुछ नियंत्रित कर रहे हैं। एक साप्ताहिक मैगजीन का दावा है कि लंबित फाईलों की संख्या इस साल के मार्च के मध्य तक 6,000 पहुंच गई हैं, जबकि मनमोहन सिंह के शासनकाल में यह संख्या 1500 थी। नेतृत्वविहिन संगठनों की सूची तैयार की जा रही है और संयुक्त सचिव एवं निदेशक स्तर के अधिकारियों की नियुक्ति और स्थानांतरण का निर्णय अभी लिया जाना है। आरोप यह भी है कि मोदी ने मंत्रिमंडल नियुक्ति समिति को भी बेमानी बना दिया है।

आरोपों और आलोचनाओं की बहुतायत इशारा करती है कि 2019 के आम चुनावों में मोदी के दुबारा सत्ता में लौटने की संभावना बेहद धूमिल है। सुशासन और बेहतर प्रशासन का दावा धाराशायी हो चुका है। लेकिन इंडिया टुडे-सिसरो द्वारा देश का मूड भांपने के लिए कराए गए सर्वेक्षण में सिर्फ 22 प्रतिशत लोगों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रदर्शन को बेहतरीन पाया है, जबकि 38 प्रतिशत लोगों ने उनके कामकाज को अच्छा कहा है। सिर्फ 11 प्रतिशत लोगों ने उनके प्रदर्शन को खराब माना है। सत्ता में आने के बाद मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि 34 प्रतिशत लोगों ने माना है कि देश की आंतरिक छवि में सुधार हुआ है। सिर्फ 13 प्रतिशत लोगों का मानना है कि भ्रष्टाचार को कम करना मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है। ये आंकड़ें आलोचकों का मुंह बंद करने के लिए पर्याप्त हैं।

25हालांकि, अगर आज आम चुनाव हो तो सर्वे के अनुसार, मोदी को पहले से कम सीटें मिलेंगी, लेकिन मोदी पर विश्वास और उम्मीदें अभी भी बरकरार हैं। 12 हजार लोगों में से लगभग 52 प्रतिशत लोगों ने माना कि मोदी विकास और सुशासन का प्रतिनिधित्व करते हैं। निदेशक और संयुक्त सचिव के 80 पद खाली होने के बावजूद यह अपने आप में विरोधाभासी है कि सारे निर्णय प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा लिए जाते हैं।

न्यूजीलैंड में सबसे कम नौकरशाही हैं। यदि कार्य प्रभावित नहीं हो तो क्या हमें इन 80 सीटों को भरने की जरूरत है? हम अक्सर नौकरशाहों की लालफीताशाही की शिकायत करते हैं, जिसके कारण विलंब और नीतियों को लागू करने में नियमों की अपनी व्याख्या के कारण कई तरह की अड़चनें आती हैं। भारत सरकार के एक सचिव का कहना है, ”हम बेवजह ही बहुत अधिक काम के बोझ की शिकायत करते हैं, जो हमें देर तक कार्यालय में रहने को विवश करता है। मैं इसकी शिकायत नहीं करता। मैं अपना काम खत्म कर सात बजे तक अपने घर चला जाता हूं।’’ वह एक महत्वपूर्ण मंत्रालय के प्रभारी हैं, जो हमेशा लोगों की निगाहों में रहते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात, जो आलोचकों और विपक्षी दलों को चुप रहने पर मजबूर करता है, खासकर सोनिया गांधी और उनके कृपापात्रों को, कि 69 प्रतिशत लोगों ने कहा कि मोदी के नेतृत्व वाली सरकार या तो उम्मीदों से बेहतर काम कर रही है या उम्मीदों के अनुसार। ये 69 प्रतिशत लोग निश्चित रूप से व्यक्तिगत या राजनैतिक ईष्र्या एवं घृणा से प्रधानमंत्री के कार्यों को नहीं देखते। लेकिन कुछ बुद्धिजीवी और सोनिया गांधी के रणनीतिकार मोदी पर हमला करने के लिए नए-नए मुद्दे उठाते रहते हैं। एक तटस्थ विश्लेषक का कहना है, ”दोस्त, बहुत ज्यादा समय नहीं है। विभिन्न योजनाएं एक बार क्रियान्वित हो गईं तो उनके परिणाम आलोचकों के मुंह पर ताले लगा देंगी।’’

तथ्य यह है कि मई में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से 25 से ज्यादा योजनाएं शुरू की गई हैं। इनमें से एक है जन धन योजना। इस योजना के तहत गरीब लोगों का शून्य शेष के आधार पर बैंकों में खाता खोला जाता है और बदले में उन्हें एक लाख रूपए का बीमा मिलता है। 15 अगस्त 2014 को शुरू हुई इस योजना के तहत 26 जनवरी 2015 तक भारत के गांवों में 75 मिलियन खाते खुल गए और इन खातों में पांच हजार करोड़ रूपए की राशि जमा हो गई। स्वच्छ भारत अभियान का मजाक उड़ाया गया, लेकिन इस बात के संकेत हैं कि इसका प्रभाव पड़ा है। रेलवे प्लेटफॉर्म, डिब्बे, कार्यालय और उनके शौचालयों को देखा जा सकता है।

बजट के दौरान एक अन्य योजना, ‘मुद्रा’ की घोषणा की गई, जिसके बारे में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘वित्तहीन लोगों के लिए कोष’। उन्होंने कहा, ”इस देश में लघु उद्योग चलाने वाले लाखों पुरूष एवं महिलाएं हैं, जिनका देश में महत्वपूर्ण योगदान है, लेकिन संस्थागत वित्त से बाहर हैं।’’ ऐसे लाखों लोग मुद्रा के तहत वित्तीय सहायता प्राप्त करने के योग्य हैं। यह बहुत ही कम दर पर ऋण की सुविधा प्रदान कराता है। इस योजना के तहत हॉकर और वेंडर जैसे नीचले पायदान के कारोबारी, जिनके पास स्थायी पते का प्रमाण-पत्र है, वे इस योजना का लाभ उठाने के योग्य हैं। वित्त पोषण के अलावा इसमें वित्तीय समाधान के लिए तकनीक के उच्चतम प्रयोग की भी व्यवस्था है। एक बार फंडिंग की शुरूआत हो गई तो इससे लाखों-करोड़ों लोगों को लाभ मिलेगा।

पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के चिंतित होने का कारण है कि यदि आज चुनाव हो जाएं तो भाजपा को वर्तमान से 27 सीटें कम प्राप्त होंगी। वर्तमान में भाजपा की 282 सीटें हैं। कांग्रेस को 53 सीटें मिलेंगी, जो वर्तमान सीटों से 9 अधिक है। मोदी अभी भी प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे पसंदीदा व्यक्ति हैं। तटस्थ विश्लेषक इस बात से सहमत नहीं है कि वर्तमान सरकार की ख्याति में गिरावट शुरू हो गई है। मोदी के पास अगले चार साल अभी शेष है। ये चार वर्ष मोदी को वापसी का मौका देंगे। जन धन जैसी योजनाओं के परिणाम आने के बाद उनसे लाभान्वित मोदी के प्रबल समर्थक बन जाएंगे।

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देश की अर्थव्यवस्था की सुधार की बात पर 36 प्रतिशत लोगों ने कहा कि इसमें सुधार हुआ है, जबकि 29 प्रतिशत लोग ऐसा नहीं मानते। पिछले साल की 5.6 प्रतिशत की अपेक्षा इस वित्तीय वर्ष में अनुमानित सकल घरेलू उत्पाद 7.5 प्रतिशत है। उम्मीद की जा रही है कि महंगाई दर 6 प्रतिशत के नीचे रहेगी। प्रख्यात अर्थशास्त्री आर. कृष्णन ने कहा है कि बीमा, खनन और कोयले में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को 49.5 प्रतिशत तक किया जाएगा और इस प्रक्रिया को पारदर्शी किया जाएगा जिससे भ्रष्टाचार और पक्षपात को समाप्त किया जा सके।

अपनी मौद्रिक नीति में भारतीय रिवर्ज बैंक ने कहा कि वर्तमान कटौतियों में संचरण, महंगाई, सरकारी खर्चे की गुणवत्ता में बदलाव, अमेरिका में ब्याज दर में बदलाव की फेडरल रिजर्व जैसी गतिविधियों जैसे संकेतों के कारण आर्थिक गतिविधियों एवं सहज तरलता में तेजी आई है। आरबीआई ने 2016 के लिए अब तक का सबसे कम महंगाई पूर्वानुमान लगाया है, जो 5.8 प्रतिशत है। इसके पहले यह पूर्वानुमान 6 प्रतिशत था। साथ ही यह भी उम्मीद की गई है कि इस साल के अगस्त तक यह मूल्य 4 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा।

सरकार और केन्द्रीय बैंक ने अभी हाल ही में एक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें केन्द्रीय बैंक ऐसी मौद्रिक नीति बनाएगा जिससे खास महंगाई दर हासिल करने का लक्ष्य हो। केन्द्रीय बैंक ने कहा है, ”सरकार और केन्द्रीय बैंक के बीच फरवरी 2015 में मौद्रिक नीति की रूपरेखा के करार से 2015-16 और आगे के वर्षों की मौद्रिक नीति को आकार मिलेगा।’’

कृष्णन ने भूमि अधिग्रहण बिल पर सोनिया गांधी के आंदोलन को खारिज करते हुए इसे राजनीतिक तमाशा बताया। उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी के पास कोई मुद्दा नहीं है, इसलिए किसानों को लुभाने के लिए तथ्यों के साथ खिलवाड़ कर रही हैं। इस बिल के तहत किसी भी आदिवासी और वन्य भूमि का अधिग्रहण नहीं होगा। इसके तहत 30 लाख नौकरियों का सृजन होगा। क्षतिपूर्ति की राशि को छुआ नहीं गया है। भूमि का अधिग्रहण सिर्फ सार्वजनिक और निजी भागीदारी की स्थिति में होगा, जैसे कि सड़क, बिजली, पुल और रक्षा आदि। इन्हें निजी क्षेत्रों में नहीं दिया जाएगा। पश्चिमी एजेंसियों की राशि पर चलने वाले कुछ एनजीओ भारत की विकास प्रक्रिया में बाधा डालना चाहते हैं। उन्होंने चुनिंदा मामलों की रिपोर्टिंग करने के लिए मीडिया को उकसाया। ’57 प्रतिशत लोग धर्मांतरण विरोधी कानून के पक्ष में’ जैसे समाचार को पूरी तरह ब्लैक आउट कर दिया है। मोदी सरकार द्वारा राज्यों को संसाधनों का आबंटन 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत करने से अर्थव्यवस्था में सुधार होगा।

24_Page_2साक्षी महाराज जैसे संघी, संरक्षण और वीवीआईपी रूतबा खो चुके बुद्धिजीवियों का दल और नैतिकताविहीन पत्रकारों के बावजूद मोदी के पास सब कुछ है। जिस बीज को उन्होंने बोया  है, वह एक दिन जरूर अंकुरित होगा। हिंदुत्व को लेकर मोदी अभी राहत पा सकते हैं। अभी तक 16 प्रतिशत लोगों का मानना है कि मोदी धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं। जो हिंदुत्व लागू करने की बात कर रहे हैं, उन पर संघ के बड़े लोगों का हाथ है।

अन्य बातें जो भाजपा की छवि को नुकसान पहुंचा रही है, वह है भाजपा नेताओं द्वारा बेवजह विवाद पैदा करना। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सम्मानित करने का उदाहरण ही ले लीजिए। क्रिसमस पर बिना कोई आंच पहुंचाए सुशासन दिवस के रूप में मनाया गया था। लेकिन इसकी वजह से बेवजह की बकवास को जन्म दे दिया गया, जिसकी वजह से सरकार को आत्मरक्षा करनी पड़ी। कहा गया कि हिंदुत्व के दबाव में क्रिसमस के दिन वाजपेयी के जन्मदिवस को सुशासन के रूप में मनाया गया।

प्रधानमंत्री ने हमेशा खुद को एक तेजी से सीखने वाले व्यक्ति के रूप में प्रदर्शित किया है। चुनावों में मिला भारी बहुमत मोदी की सबसे बड़ी संपत्ति है। उनका पहला साल बेहद मायावी रहा। दिल्ली में चुनावी हार के बाद मोदी ने स्वयं को एक परिपक्व और चालाक नेता के रूप में प्रदर्शित किया।

एक लड़ाकू के रूप में वे आसानी से हार मानने वाले व्यक्ति नहीं हैं। वास्तव में उन्होंने जो सोचा है उसे पाया है और यही चीज साबित करती है कि अगले 10 सालों तक वे साउथ ब्लॉक में रहेंगे।

विजय दत्त

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