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न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका में वाकयुद्ध

न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका में वाकयुद्ध

राजस्थान में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कामकाज तथा रवैये को लेकर इन तीनों इकाईयों के स्तर पर की गई तल्ख टिप्पणियों से लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का माहौल गरमा गया है। पहले विधानसभा के 9 अप्रैल को समाप्त बजट सत्र में राजस्थान सिविल न्यायालय (संशोधन) विधेयक 2015 पर हुई बहस में सदस्यों ने कार्यपालिका के कथित निकम्मेपन तथा न्यायपालिका को अपने क्षेत्र में अतिक्रमण का अवसर देने के लिए चेताया, वहीं न्यायपालिका को अपनी सीमा में कार्य करने सम्बन्धी टिप्पणियां की गई। राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की खण्डपीठ द्वारा 16 अप्रैल को एक याचिका की सुनवाई के दौरान न्यायपालिका के प्रति कार्यपालिका की बेरूखी पर मौखिक टिप्पणी से वाक्युद्व का नया दौर शुरू हो गया। इस तल्ख टिप्पणी में नवम्बर में प्रस्तावित राजस्थान रिसर्जेंट में निवेश के लिए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की जापान यात्रा तक को निशाना बनाया गया।

1मुख्य न्यायाधीश सुनील अंबवानी एवं न्यायाधीश वी.एस. सिराधना ने ए.पी.पी. के रिक्त पदों को भरने एवं अन्य सुविधाएं बढ़ाने सम्बन्धी वर्ष 2000 से विचाराधीन राजस्थान सहायक अभियोजन अधिकारी संघ की याचिका पर सुनवाई करते हुए अपनी मौखिक तल्ख टिप्पणी में न्याय व्यवस्था की अनदेखी पर नाराजगी व्यक्त की और कहा कि न्याय प्रणाली को अन्तिम नहीं, प्राथमिकता दी जाए। खण्डपीठ की यह भावना थी कि यदि कोर्ट की टिप्पणियां जापान चली जायें तो कोई उद्यमी नहीं आयेगा, क्योंकि उसे पता चल जायेगा कि वह यहां मुकदमे में फंस सकता है। उद्यमी मुकदमे मे फंसकर रिसर्जेंट राजस्थान का सपना पूरा करने नहीं आता। जापान से निवेश लाओगे और यहां श्रमिक ने मुकदमा कर दिया तो उद्यमी छोड़कर चला जायेगा और सरकार का सपना पूरा नहीं हो पायेगा। इसलिए राज्य में न्याय प्रणाली को अन्तिम नहीं प्राथमिक बनाओ। खण्डपीठ का कहना था कि सरकार न तो न्यायालय खोलने की वित्तीय स्वीकृति देती है और ना ही नये पदों पर भर्ती करती है और न ही उनको धन मुहैया कराती है।

विधानसभा में बहस में भाग लेने वाले विधायकों का कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 212 के तहत सदन में उनके द्वारा कही गई बात पर न्यायिक परीविक्षा नहीं हो सकती। भाजपा के जोगाराम पटेल, प्रह्लाद गुंजल, मदन राठौड़, बंशीधर खण्डेला तथा वरिष्ठ विधायक राजेन्द्र सिंह और घनश्याम तिवाड़ी ने कार्यपालिका और न्यायपालिका को लेकर गंभीर टिप्पणियां की।2_Page_1

राव राजेन्द्र सिंह ने डॉक्ट्रिन ऑफ बेसिक पिंरसिपल्स, केशवानंद भारती केस तथा संविधान संशोधन का अधिकार केवल विधायिका तक सीमित होने सम्बन्धी सिद्वांत को विस्तार से रेखांकित करते हुए सदन से आग्रह किया कि हम (विधायिका निरंतर) अपनी प्रक्रिया को नजरअंदाज करते जा रहे हैं जिससे दूसरी इकाई आपके अधिकार पर अतिक्रमण करती जा रही है। उन्होंने हाल ही में जयपुर में नेशनल हाइवे ऑथोरिटी ऑफ इण्डिया की मीटिंग का हवाला दिया, जिसमें दिल्ली-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 8 के बारे में जिक्र हुआ। प्राधिकरण के जो अधिकारी आये थे, उन्होंने कहा कि अब उच्चतम न्यायालय ही इसकी मॉनिटरिंग करेगा। एन.एच. 8 में कहां डाइवर्जन रहेंगे, कहां पुलिया बनेगी, कहां बाईपासेज बनेंगे, वह कार्यपालिका के परव्यू क्षेत्र से भी बाहर निकल गया। यह सारा कार्य न्यायपालिका के गलियारों से होने लगेगा तो निर्वाचित कार्यपालिका क्या कार्य करेगी, यह भी बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह है। इसलिए मैं निवेदन करना चाहता हूं कि वैधानिक चरित्र को अगर हमने नजरअंदाज किया और सदन ने अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ा और सिर्फ औपचारिकता पूरी करने तक का दायित्व निभाया तो एक न एक दिन प्रजातंत्र की कुछ प्रमुख व्यवस्था जिसका नाम विधायिका है उस पर अतिक्रमण होकर हम किसी और व्यवस्था को जन्म दे देंगे। विधायिका का कार्य मर्यादित आचरण के साथ संविधान की मर्यादा को भी ध्यान में रखकर करना चाहिए और इस प्रकार के कृत्य किसी भी ईकाई के द्वारा क्यों न हो हमें इस सदन में आकर उस पर चर्चा करके उस पर विवेकपूर्ण टिप्पणी करनी चाहिए।

राव राजेन्द्र सिंह यहीं तक नहीं रूके उन्होंने तल्ख शब्दों में कहा, मुझे आप यह बताइये 200 विवेक मस्तिष्क (राजस्थान विधानसभा की सदस्य संख्या) कोई निर्णय लेते हैं। 200 लोगों के विवेक को एक या 5 व्यक्ति (न्यायपालिका) अपने विवेक से प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं। 542 विवेकशील लोग-बाग पार्लियामेंट में बैठकर, किसी एक न्यायाधीश का एक मस्तिष्क उनके विवेक पर प्रश्नचिन्ह लगा देता है। आखिर नैतिक सिद्वांत भी है या नहीं है? किसी भी ईकाई को इस प्रकार निर्णय लेने से पहले यह बात सोचनी चाहिए कि इतनी बड़ी संख्या में सर्व-सम्मति से अगर कोई चीज वहां से लागू होती है या वहां से उसको सहमति मिलती है तो उनके विवेक पर प्रश्नचिन्ह लगाने से पहले अपनी मानसिकता जरूर टटेाल लें कि कहीं वह स्वार्थ से वशीभूत होकर, अहंकार से वशीभूत होकर तो प्रश्नचिन्ह नहीं लगा रहा, वरना सदन में कार्यपालिका और विधायिक दोनों को एक रूप होकर इस संविधान की मर्यादा का संरक्षण करना चाहिए।

3_Page_2भाजपा के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने कोयला खान आवंटन तथा 2 जी स्पेक्ट्रम प्रकरण में न्यायपालिका के हस्तक्षेप का उदाहरण देकर कहा कि जब विधानसभाएं और लोकसभा राजनीतिक कारण से आवाज को दबाने की कोशिश करती है, तो उस समय आदमी को अन्तिम सहारा कहां मिलता है? वह भारत के सर्वोच्च न्यायालय में जा सकता है। उन्होंने कहा कि जब प्रशासन फेल होता है, राजनीतिक नेता फेल होते हैं तब न्यायिक सक्रियता बढ़ती है। न्यायालयों में मुकदमों के अंबार लगे हुए हैं, लेकिन आधी पार्टी कौन है उसमें? देश भर की विधानसभाएं हैं, आधी पार्टी सरकारें हैं। ज्यादा रिट किसकी है? सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों की रिटे हैं, जिनका फैसला सरकारी स्तर पर नहीं हो पाता है। रिजर्वेशन और प्रमोशन की रिटे हैं, इसलिए हमको न्यायपालिका के साथ खुद के अंदर भी देखना होगा। जब तक हम हमारा सही नहीं करते तब तक नहीं होगा। आज तक कभी भी विधानसभा की प्रक्रियाओं में न्यायपालिका का हस्तक्षेप नहीं था। झारखण्ड की विधानसभा में इस प्रकार का उदाहरण प्रस्तुत हुआ कि वहां के कोर्ट ने अपने पर्यवेक्षक भेजे और उसके बाद विधानसभा के अन्दर मतदान का रिजल्ट घोषित किया गया। यह हमने ही तो क्रिएट किया। हमारा ही अधिकार था कि विधानसभा में विधायक को अयोग्य होने पर उसकी अयोग्यता घोषित करते थे। हरियाणा विधानसभा में हुड्डा साहब के समय चार माननीय विधायकों की सदस्यता खत्म होनी थी। विधानसभा अध्यक्ष ने लटकाए रखा, फैसला नहीं किया। अन्त में हरियाणा, पंजाब उच्च न्यायालय को फैसला करके निर्देश देना पड़ा कि छ: माह में आप फैसला करो। फिर भी निर्णय नहीं माना गया तो फिर कोर्ट को यह फैसला करना पड़ा कि उनको वोट का अधिकार नहीं होगा, उनको गाड़ी नहीं मिलेगी। अगर वह अध्यक्ष यह फैसला उसी निर्धारित अवधि में कर देते तो न्यायालय को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं मिलता। कई बार हम अनावश्यक रूप से न्यायपालिका को बुलाते हैं। आज भी आम आदमी का प्रेस और न्यायपालिका में विश्वास है। यही विश्वास हमको कार्यपालिका और विधायिका में भी पैदा करना होगा। हम स्वयं उसको पैदा करेंगे तो सब अपनी मान मर्यादा में रहेंगे।

3_Page_2श्री तिवाड़ी ने राजस्थान में एक अधिकारी के खिलाफ 2000 पृष्ठों में चालान तथा 462 गवाहों की सूची पेश करने का उल्लेख किया और कहा कि इस हालात में मुकदमा तो लम्बा चलेगा ही। उन्होंने कहा कि न तो हमने एविडेंस ऐक्ट में संशोधन किया, वही अंग्रेजीराज की आईपीसी तथा सीआरपीसी, वही एविडेंस ऐक्ट, सारा का सारा वही पुराना रखा है। वह जिम्मेदारी तो न्यायपालिका की नहीं है, वह तो कार्यपालिका की है, विधायिका की है। हम उसमें परिवर्तन नहीं कर रहे हैं इसलिए संसदीय परम्पराएं जहां-तहां टूट रही हैं। कानून पारित करते समय पक्ष-विपक्ष का ध्यान छोड़कर उस कानून की बारीकियों में जाना चाहिए। कई कानून जिद्द करके ले आते हैं। प्रजातंत्र में जिद्द भी जरूरी नहीं है। जिस समय प्रजातंत्र में ‘मैं’ आ जाता है, उस समय प्रजातंत्र खतरे में पड़ जाता है। प्रजातंत्र में ‘हम’ होना चाहिए।

चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए विधि एवं संसदीय कार्य मंत्री राजेन्द्र राठौड़ ने कहा कि सदन में बहुत कम अवसर ऐसे आते हैं जब न्यायपालिका पर और न्याय प्रशासन पर चर्चा होती है। 12वीं विधानसभा में चर्चा के दौरान कई माननीय सदस्यों ने न्यायपालिका के बारे में अपनी सटीक टिप्पणियां कीं और उसके बाद माननीय उच्च न्यायालय ने कई माननीय सदस्यों के विरूद्व सम्मन भी जारी किये। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के तीनों स्तम्भ अपने-अपने कार्यक्षेत्र के अन्दर स्वतंत्र व निर्भीक रूप से काम करें। कोई अंग इस लक्ष्मण रेखा को पार नहीं करे, जो संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार खिंची गई है। विधि मंत्री ने आपातकाल तथा हाल ही में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों, मुख्यमंत्रियों और विधि मंत्रियों की बैठक में मुकदमों के अंबार तथा न्यायिक सुधार के बारे में हुई चर्चा का उल्लेख किया।

विधि मंत्री ने गंगापुर के विधायक मानसिंह द्वारा उठाये गये न्यायिक सक्रियता एवं जनहित याचिका सम्बन्धी मुद्दे के संदर्भ में एक तल्ख टिप्पणी की कि कई बार पीठासीन अधिकारी यह सोच लेता है कि सारे अधिकार उन्हीं में निहित हो गये हैं। अपने आपको नीति निर्माता जब समझने लग जाते हैं तो वो कानून की व्याख्या करने के अलावा कई प्रकार के आदेश जारी करने लग जाते हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने जयपुर के रामनिवास बाग के बारे में उच्च न्यायालय के तीन अलग-अलग फैसलों का उल्लेख किया, जिनका आपस में कोई तालमेल नहीं था। उन्होंने कहा कि संविधान के तीनों अंगों का संतुलन कहीं छोटा-मोटा गड़बड़ाता है तो एक-दूसरे पर जो नजरें हंै उन नजरों में थोड़ा बहुत टेढ़ापन आ जाता है। परन्तु हमारी संविधान की मूल आत्मा है कि तीनों स्तम्भ ठीक चलें और निश्चित तौर पर ठीक तरह से चलने ही चाहिए।

यह तो आने वाला वक्त बताएगा कि लोकतंत्र के इन स्तम्भों के बीच छिड़ा वाक्युद्व भविष्य में क्या रूप लेता है।

 जयपुर से गुलाब बत्रा

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