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न कोई उम्मीद न कोई भविष्य …और फफक पड़े लाचार हालात के मारे बीड़ी मजदूर

न कोई उम्मीद न कोई भविष्य …और फफक पड़े लाचार हालात के मारे बीड़ी मजदूर

विकास के वट वृक्ष तले सूखता बुन्देलखण्ड के चित्रकूट के घाट पर न तो संतों की भीड़ है और न ही चन्दन घिसने के लिए तुलसीदास जी हैं। और न ही बुंदेलखण्ड की व्यथा सुनने के लिए कोई तैयार है। बुंदेलखण्ड के जिन आदिवासी, हरिजन एवं मुस्लिम परिवारों के पास खेती योग्य जमीन व रोजगार का कोई साधन नहीं है, वे अपनी आजीविका चलाने के लिए बीड़ी बनाने को मजबूर हैं। हालात के मारे ये मजदूर अत्यंत खराब स्थिति में बीड़ी बनाते हैं। मजदूरों के घरों के चारों ओर गंदगी और सड़ते तेंदू पत्तों के ढेर वातावरण को बोझिल बना रहे हैं। सीलन भरी झोपड़ी के अन्दर तेल की ढि़बरी की रोशनी में देर रात तक बीड़ी बनाने का काम किया जाता है, तब जाकर घर के लोगों की भूख मिट पाती है। ‘बीड़ी नहीं बनाओ तो खेओ का’ ऐसा कहते हुए तपेदिक (टी.बी) रोगी बीड़ी मजदूर हल्काई सहरिया बताते हैं कि टी.बी. चिकित्सालय के डॉक्टर ने बीड़ी बनाने से मना किया है ताकि उसकी जिंदगी बच सके, लेकिन वह अपनी भूख के कारण जर्दे की दुर्गंध और तेंदू पत्ते की सड़ांध के बीच बीड़ी बनाने को मजबूर हैं। यह दारूणगाथा सिर्फ अकेले हल्काई की नहीं है, न जाने कितने हल्काई पेट की आग बुझाने की खातिर लम्हा-लम्हा मौत के मुंह में ले जाने वाले पेशे में लगे हैं। औसतन पांच से 15 फिट ऊंचे तेंदू के पेड़ के पत्ते से बीड़ी बनायी जाती है।

बीड़ी निर्माण के लिए सबसे अच्छा पत्ता छोटे पेड़ का माना जाता है, क्योंकि यह ज्यादा मुलायम होता है और इससे पतली और सुन्दर बीड़ी बनती है।

इस पत्ते का स्वाद तम्बाकू के पत्ते से मेल खाता है। बीड़ी बनाने के दौरान मजदूर एक ही मुद्रा में लगातार दस से बारह घंटे बैठा रहता है, जिसके कारण कमर दर्द, हाथ-पैर के जोड़ों में जकडऩ और गर्दन में दर्द, पाचन तंत्र की समस्या के साथ जर्दे की धौंस आंखों पर कुप्रभाव डालती है और नथुनों से फेंफड़ों में घुसकर श्वसनतंत्र को भी प्रभावित करके जान लेवा तपेदिक का संक्रामक रोग बांटती हंै। बीड़ी उद्योग मुख्य रूप से महिला कामगारों पर टिका है। उनकी स्थिति अत्यंत शोचनीय है। बीड़ी निर्माता श्रम कानूनों से बचने के लिए ठेकेदार के माध्यम से बीड़ी बनवाने को चोर रास्ता खोल चुके हैं। प्रति हजार बीड़ी के लिए 500 ग्राम तेंदू पत्ता 180 ग्राम जर्दा तथा 60 मी. धागे का बंडल दिया जाता है। तैयार बीड़ी में छाट के नाम पर सौ से दो सौ तक बीड़ी निकाल दी जाती है। गुणवत्ता का मानक ठेकेदार की मनमर्जी पर निहित है। छांट के नाम पर महिला श्रमिकों का दैहिक शोषण तक होता है।

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श्रम कानूनों के अन्तर्गत बीड़ी श्रमिक अन्य श्रमिकों की तरह सवैतनिक अवकाश, बोनस, भविष्य निधि तथा महिला श्रमिक प्रसूति अवकाश के हकदार हैं, लेकिन पैसे के बल पर पूरे जनपद में बीड़ी निर्माता खुलेआम नियम-कानूनों की धज्जियों उड़ा रहे हैं।

कोई श्रमिक आवाज उठाता है तो उसे बीड़ी बनाने के कार्य से महरूम कर दिया जाता है। पेट की आग के आगे हारता श्रमिक असहाय है। श्रमिक यूनियन बनाने के अनेक बार प्रयास हुए, लेकिन बीड़ी निर्माताओं की राजनीतिक पकड़ व प्रशासन के असहयोग के कारण मंजिल मिलने से पहले ही बिखर गयी। आदिवासी महिला मलीदा बताती हैं कि सट्टेदार एक हजार बीड़ी बनाने पर तीस रूपये मजदूरी देता है व शिकायत करने पर देख लेने की धमकी  देता है और थाने में बंद करा देता है। मध्य प्रदेश की सीमा से लगे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र मडावरा, पाली, नाराहट, डोगरा में हजारों श्रमिकों को दो वक्त की रोटी का सहारा बीड़ी बनाना है। पठारी और सिंचाई सुविधा से वंचित क्षेत्र में जाने का आसरा बनी बीड़ी व्यवसाय मजदूरों के शोषण के नित्य नये तरीके ईजाद कर रहा है। आई.एफ.टी.यू. कोषाध्यक्ष रामनरेश त्यागी के नेतृत्व में प्रगतिशील बीड़ी मजदूर यूनियन के सदस्यों ने श्रम कार्यालय में प्रदर्शन कर अपनी मांगों के तीन ज्ञापन श्रमायुक्त को प्रस्तुत किए।

ज्ञापन में मजदूरों ने मांग की है कि सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम मजदूरी दरें सभी बीड़ी मजदूरों, रोलरों व पैकरों को दिया जाए, सभी को बीमा कार्ड व पे स्लिप दिया जाए और स्वास्थ्य कार्ड तथा घर बनवाने, लड़कियों की शिक्षा व शादी के लिए सरकारी योजनानुसार अनुदान भुगतान किया जाए।

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क्रन्दन के बीच कई कारूणिक कथाएं सुनाई देती रही। सुनने वालों की आंखों के कोर भी गीले होते रहे। रो-रोकर अपना हाल बताने वालों में भूख और कर्ज से परेशान बीड़ी मजदूर पेंशन व राशन के लिए वर्षों से भटक रहे कुछ जागरूक जन और ऐसे युवक भी थे जिन्हें अपनी और अपने गरीब समुदाय के हक के लिए लिखा-पढ़ी करने के गुनाह में असरदारों ने पुलिस से सांठ-गांठ कर थाने की यातना तथा जेल भिजवाया था। किस विकास के खुल गए, यारों आज किवाड़। डरे-डरे हतप्रभ खड़े, जंगल, नदी, पहाड़।

अशोक अन्जुम के दोहे की तरह है। कुदरत का कहर और शासन की उपेक्षा ने बीड़ी मजदूर को इस कदर बेबस कर दिया है कि वे जान से प्यारी अपनी भूमि को राम भरोसे छोड़कर दो जून की रोटी की तलाश में पलायन कर रहे हैं, जो पलायन नहीं कर पा रहे हैं उन्हें जीने के लिए रोज जंग लडऩी पड़ रही है।

बुंदेलखंड से सुरेन्द्र अग्निहोत्री

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