ब्रेकिंग न्यूज़ 

भारतीय ईसाईयों के ‘दु:ख’ के पीछे की कहानी

भारतीय ईसाईयों के ‘दु:ख’ के पीछे की कहानी

एक अमेरिकी मित्र ने मुझे हाल ही में लिखा कि भारत में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारतीय समाज के धार्मिक आधार पर बंटने की बढ़ती मीडिया रिपोर्ट की जमीनी हकीकत के बारे में मुझे लिखना चाहिए। लेकिन, मोदी सरकार में बढ़ते धार्मिक ध्रुवीकरण की ओर इशारा करते हुए मेरे मित्र को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि सामान्यत: पीडि़त मुसलमान नहीं हैं, जो भारत की जनसंख्या में 14 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़े अल्पसंख्यक धार्मिक समूह हैं, बल्कि महज 2.5 प्रतिशत की जनसंख्या वाला ईसाई समुदाय है। उन्होंने रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के समर्थक पूरे देश में चर्चों पर हमले, ननों के बलात्कार, हिंदुओं की घर वापसी और उनके त्योहारों पर छुट्टियां रद्द कर ईसाईयों को प्रताडि़त कर रहे हैं।

आखिर, सच्चाई क्या है? उत्तर पाने लिए मैं दो उदाहरण देता हूं। इसमें एक पुरानी घटना है, जबकि एक हाल में घटी हुई। पुरानी घटना का संबंध मध्य प्रदेश के झबुआ जिले से है। केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा के सत्ता में रहने के दौरान 23 सितंबर 1998 को क्रिश्चियन मिशनरी सेंटर पर हमला किया गया और तीन कैथोलिक ननों के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। तब मध्य प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में थी और दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे। आज दिग्विजय सिंह सांसद हैं और सांप्रदायिकता के खिलाफ सबसे मुखर कांग्रेस नेता भी।

उस दिन कुछ लोगों का समूह जिले के नवपाड़ा गांव के प्रीति शरण नाम के कैथोलिक मिशन चर्च सह चिकित्सालय में घुसा। मरीज को तुरंत चिकित्सकीय सहायता की जरूरत बताकर उन लोगों ने बिल्डिंग में घुसने की मांग की। चर्च में उपस्थित लोगों के नाम पर सिर्फ चार नन थीं, जो पुद्दुचेरी की रहने वाली थीं और टूटी-फूटी हिंदी जानती थीं। उन्होंने दरवाजे को तुरंत नहीं खोला। इसके बाद दरवाजे पर मौजूद गैंग जबरदस्ती अंदर घुस गया। अंदर घुसकर इस गैंग ने लगभग दो घंटे तक तीन ननों के साथ सामूहिक बलात्कार किया और चर्च की नकदी एवं अन्य समानों को लूटा। नन लगातार मदद के लिए चिल्लाती रहीं, लेकिन उन्हें मदद नहीं मिली।

मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया कि जब से भाजपा के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने केन्द्र में सत्ता हासिल की है, तब से ईसाईयों को योजनाबद्ध तरीके से लक्ष्य बनाया जा रहा है। तब झबुआ का प्रतिनिधित्व करने वाले तत्कालीन कांग्रेस (आई) सांसद कांतिलाल भूरिया ने आरोप लगाया था कि ऐसी खुफिया चेतावनी मिली थी कि राज्य की कांग्रेस सरकार को बदनाम करने के लिए पड़ोसी राज्यों – गुजरात और राजस्थान के विश्व हिंदू परिषद के कुछ कार्यकत्र्ता हमले करने के लिए मध्य प्रदेश में घुस चुके हैं। मध्य प्रदेश ईकाई कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माक्र्ससिस्ट) के सचिव शैलेन्द्र शैली ने घोषणा की थी कि झबुआ घटना के मुख्य आरोपी कट्टर हिंदू हैं।

लेकिन जांच में खुलासा हुआ कि सामूहिक बलात्कार के सभी 12 आरोपी दरअसल जनजातीय ईसाई थे। लेकिन, तब तक जो नुकसान होना था वह नुकसान हो चुका था और हिंदुओं एवं केन्द्र सरकार की छवि धूमिल कर राजनीतिक का सफलतापूर्वक लाभ लिया जा चुका था।

उसी तरह से, 15 मार्च को पश्चिम बंगाल के नादिया जिले में सत्तर साल की नन के साथ हुई सामूहिक बलात्कार की हालिया घटना का चर्च और गैर-भाजपा दलों द्वारा भत्र्सना करते हुए इसके पीछे हिंदू कट्टरवादियों का हाथ बताया गया। लेकिन, जारी पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि यह घटना ईसाई विरोधी नहीं, बल्कि चर्च के लाखों रूपए की चोरी करने की योजना थी, जिसका विरोध नन ने किया था। इस घटना के अरोपी भारत में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशी मुसलमान हैं। इनमें से अधिकांश आरोपियों को पकड़ लिया गया है। लेकिन, 17 साल पुराने मध्य प्रदेश के मामले में भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को धूमिल किया जा चुका था। भारत की छवि को धूमिल करने में सबसे अधिक योगदान ‘धर्मनिरपेक्ष’ पत्रकारों, सामाजिक कार्यकत्र्ताओं, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक दलों (खासकर कांग्रेस और वामपंथी दलों) का रहा।

हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि चर्च और ईसाई नेताओं पर हमलों के लिए हिंदू संगठनों पर आरोप लगे हैं। 2013 में बंगलुरू के ईसाई धर्मगुरू के.जे. थॉमस की हत्या का आरोप भी हिंदूवादी संगठनों पर लगा था, लेकिन यह घटना चर्च की आंतरिक लड़ाई साबित हुई जिसमें तीन अन्य पादरी शामिल थे। इस घटना के पीछे चर्च की संपत्ति पर कब्जा जमाना था। हत्या की वजह चर्च के अंदर भाषाई आधार पर उत्पन्न आपसी प्रतिद्वंद्विता थी। उसी तरह, 2014 में मुबई के विले पारले चर्च को अपवित्र किया गया। इस काम को एंजेलो परेरा नाम के ईसाई ने शराब के नशे में अंजाम दिया था।

इन घटनाओं से पता चलता है कि भारत में अल्पसंख्यकों या ईसाईयों पर कोई हमला नहीं किया गया। इन कृत्यों की कड़े शब्दों में निंदा की गई और राष्ट्रीय स्तर पर मांग की गई कि दोषियों को भारतीय न्याय व्यवस्था, जिसकी ईमानदारी और निष्पक्षता पर शायद ही सवाल उठता है, के तहत कड़ी से कड़ी सजा दी जाए। भारत में हर आपराधिक कृत्य को सांप्रदायिक रंग दे दिया जाता है। तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादी इस बात को नहीं समझते कि पीडि़त और दोषी को धर्म के आधार पर देखकर धर्मनिरपेक्षता को वे बढ़ा नहीं रहे हैं। लगभग 11 महीने पुरानी मोदी सरकार के शासन में चर्च पर हमले और उसमें तोड़-फोड़ की कई घटनाएं हुईं हैं, लेकिन 7 अप्रैल को ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ ने एक रिपोर्ट जारी की, जिससे स्पष्ट है कि इस तरह की घटनाएं पहले भी हुईं हैं और बिना किसी सांप्रदायिक रंग के।

टाईम्स ऑफ इंडिया द्वारा हासिल की गई एक गुप्त रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस के सत्ता में रहने के दौरान 26 मई 2013 से 31 मार्च 2014 के बीच तथाकथित ईसाई विरोधी हमलों के 10 मामले सामने आए। इसमें से 9 मामले चर्च में तोड़-फोड़ और एक पादरी की हत्या से संबंधित है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा से संबंधित इन 10 मामलों में से 5 मामलों में अभी भी जांच जारी है, जबकि 4 मामलों में 16 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। एक मामले में मानसिक रूप से असंतुलित का हाथ पाया गया।

टाईम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, ”इसके बदले, मोदी सरकार के शासन में 26 मई 2014 से 31 मार्च 2015 तक 11 मामले सामने आए। इसमें 6 मामले दिल्ली से संबंधित हैं और एक-एक मामले मध्य प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल से संबंधित है। पूर्वी दिल्ली और रोहिणी के दो अलग-अलग मामलों में चर्च में लगी आग के पीछे शॉर्ट-सर्किट पाया गया। जसोला चर्च हमले, जिसमें खिड़की के शीशे टूटे थे, में बच्चों द्वारा अनजाने में फेंका गया पत्थर था। चार मामलों – दिल्ली के विकासपुरी, हरियाणा के हिसार, मध्य प्रदेश के जबलपुर और नवी मुंबई के चर्चों में हुई तोड़-फोड़ की जांच हो चुकी है और इसमें 14 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। तीन में से दो मामलों को अभी तक नहीं सुलझाया जा सका है और इसमें चोरी का संदेह जताया जा रहा है।’’

सबसे बड़ी बात है कि तोड़-फोड़ की ऐसी घटनाएं आम चोरी की घटनाओं जैसी ही है। इसी दौरान हिंदू मंदिरों और मस्जिदों पर भी हमले हुए। दिल्ली पुलिस के अनुसार, 2014 में दिल्ली में 206 हिंदू मंदिरों में, 30 सिक्ख गुरूद्वारों में, 14 मस्जिदों और 3 चर्चों में चोरी की घटनाएं हुईं। 206 मंदिरों और 3 चर्चों के आंकड़ों की तुलना कीजिए। लेकिन, मीडिया एकांकी रूप से चर्च पर हुई घटनाओं को उभारती है और भारत में ईसाईयों पर हमले की हाईप क्रिएट करती है।

मीडिया की इस तरह की प्रवृत्ति का असर यह हुआ कि उच्चतम न्यायालय का न्यायधीश, सेवानिवृत्त एडमिरल और सेवानिवृत्त शीर्ष पुलिस अधिकारी ने मोदी सरकार में ईसाई विरोधी रूख का आरोप लगाते हुए 25 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आधिकारिक जन्मदिन मनाने (हालांकि इस कार्यक्रम में भाग लेना पूरी तरह स्वेच्छा पर था) और गुड फ्राईडे (आधिकारिक छुट्टी, लेकिन अगले दिन शनिवार और रविवार होने की वजह से छुट्टी थी)के दिन उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा सभी राज्यों के मुख्य न्यायधीशों के लिए तीन-दिवसीय सम्मेलन बुलाने की बात कही। उनके कहने का निष्कर्ष यह था कि मोदी ईसाईयों की धार्मिक छुट्टी को कम कर रहे हैं। धर्मनिरपेक्षतावादियों (ऊपर दिए गए नामों सहित) की हिंदू पर्व-त्योहारों के साथ भी ऐसा किया जाए।

मेरा व्यक्तिगत मत है कि भारत में आधिकारिक छुट्टियों की संख्या में कमी लाई जाए। लेकिन धार्मनिरपेक्षता के नाम पर ईसाईयों और मुसलमानों की धार्मिक छुट्टियों की तरह हिंदुओं की छुट्टियों को कम करने की मांग सरासर पागलपन होगा, क्योंकि इस देश की सभ्यता और संस्कृति हिंदुओं द्वारा पोषित की गई है, जो कि इस देश की जनसंख्या का 80 प्रतिशत हिस्सा हैं। ऐसी मांग की स्थिति आग पर चलने के समान है। यदि आप एक बार किसी सभ्यता को स्वीकार कर लेते हैं तो उससे जुड़ी संस्कृति को संकीर्ण धार्मिकता के नाम पर घटा नहीं सकते। अगर ऐसा होता है तो होली और दीपावली जैसा त्योहार हिंदुओं के लिए त्योहार नहीं रह जाएगा। दूसरे शब्दों में कहें तो धर्म समाज की संस्कृति को प्रभावित करते है, लेकिन संस्कृति धर्म के अलावा खुद में बहुत सी अन्य चीजें भी समाहित किए हुए होती है। इसमें व्यवहार, खाद्य और सरकारी छुट्टियां शामिल हैं। दरअसल जिंदगी के हर पहलू के निर्माण का यह रास्ता है।

यहां मैं पाकिस्तानी लेखक अजिमुस्साह हैदर की याद दिलाना चाहूंगा, जिनका दावा है कि उन्हें ‘भारतीय मूल’ के होने पर गर्व है। निश्चित रूप से वे हिंदुत्व के समर्थक नहीं है, लेकिन पूरे उपमहाद्वीप में प्रचलित किसी कार्य के शुभारंभ पर नारियल तोडऩे और दीप प्रज्ज्वलित करने की परंपरा को सांप्रदायिक रंग का वे समर्थन भी नहीं करते। हैदर ने भारतीय अल्पसंख्यकों को किसी भी राजनीतिक दल के वोट बैंक नहीं बनने की अपील करते हुए कहा था, ”किसी भी देश की बहुसंख्यक समुदाय की संस्कृति और परंपरा वहां के सार्वजनिक जीवन में निश्चित रूप से दिखाई देगी।’’

उसी तरह, भारत में ईसाईयों को प्रताडि़त करने का दावा राजनीतिक स्वभाव का है। प्रताडि़त करने के दावे उन्हीं लोगों द्वारा प्रचारित किए जाते हैं, जिन्हें भाजपा और मोदी से चिढ़ है। दुर्घटनाओं को जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के पीछे यह कहावत कि ‘दुनिया की सबसे बड़ी खाई, न्याय के कारण और इसकी मांग करने वाले लोगों के उद्देश्य के बीच की है’, सटीक बैठती है।

प्रकाश नंदा

crmпозиция сайта в гугл