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भारत में ईसाईयों पर ‘हमले’ की सच्चाई

भारत में ईसाईयों पर ‘हमले’ की सच्चाई

हाल ही में टीवी चैनलों में उछलने वाले चर्चों पर तथाकथित हमले महज छोटे-मोटे अपराधियों की कारस्तानी ही पाए गए। इनमें ‘हिंदू अतिवादियों’ का कोई लेना-देना नहीं है। दूसरे देशों में ऐसी वारदातें स्थानीय अखबारों में भी मुश्किल से ही जगह पाती हैं। आखिर, क्यों टीवी चैनल इन्हें लगातार उछालते रहे?

दुनिया में शायद ही कोई ऐसा दूसरा देश है जहां दूसरे धर्मों के लोग भारत की तरह सुरक्षित हैं। हिंदू हमेशा उन सभी को अपने यहां आश्रय देते हैं जो खुद अपने देश में प्रताडि़त हैं। यहूदी बड़े सम्मान से यह स्वीकार करते हैं कि भारत ही एकमात्र देश है जहां उनका कभी उत्पीडऩ नहीं हुआ। थॉमस ऑफ काना (पैगंबर थॉमस कभी भारत नहीं आए थे) के नेतृत्व में सीरियाई ईसाईयों को चौथी सदी में शरण दी गई थी। पर्शिया में मुसलमान आक्रांताओं से बचकर भागे पारसी 10वीं सदी में यहां आए। हाल के दौर में 1959 में करीब 1,00,000 तिब्बती बौद्धों को भारत में शरण दी गई, जबकि महज 12 साल पहले ही अंगे्रज यहां से गए थे और देश बंट चुका था और भयंकर गरीबी से पस्त था।

इसके विपरीत अमीर तथा ताकतवर अमेरिका ने 1991 में ही एक हजार तिब्बती परिवारों को शरण दी, जबकि वह आकार में भारत से तीन गुना बड़ा है और उसकी आबादी भी भारत से की आबादी का एक-चौथाई के बराबर है। भारत ने कभी उन्हें स्वीकार करने में हिचक नहीं दिखाई, जिनका जीवन संकट में हो और जो अपने धर्म की रक्षा करना चाहते हों। इसकी वजह यह है कि भारत के लोग धर्म के आधार पर आदमी-आदमी में फर्क नहीं करते।

उनका मानना है कि हम सभी विशाल मानव परिवार के हिस्से हैं और सभी में एक ही ईश्वर का वास है। उनके लिए धर्म कोई पहचान नहीं, बल्कि स्वाभाविक, आदर्श जीवनशैली है।

फिर, आजकल ऐसा क्या हो गया कि भारत में ईसाईयों पर हमलों की इतनी चर्चा शुरू हो गई? क्या हिंदू असहिष्णु हो गए हैं?

नहीं, हिंदुओं के रवैए में कोई फर्क नहीं आया है। हाल के दिनों में कई टीवी चैनलों पर जो चर्च पर हमले जोर-शोर से उछाले गए, वे छोटे-मोटे अपराधियों की करतूत ही पाई गई। इन हमलों से ‘हिंदू अतिवादियों’ का कोई लेना-देना नहीं है। दूसरे देशों में तो ऐसी खबरें स्थानीय अखबारों में भी बमुश्किल जगह बना पाती हैं। तो, फिर ये खबरें टीवी चैनलों पर कई दिनों तक क्यों छाई रहीं? क्यों ईसाई प्रवक्ताओं को इतनी तरजीह दी गई कि वे ‘हिंदू दक्षिणपंथियों’ पर झूठे आरोप मढें और यह दावा करें कि ईसाईयों पर हमले हो रहे हैं?

यह चर्चों का कोई सुनियोजित एजेंडा लगता है। यह जांच-पड़ताल का विषय है कि क्यों कई टीवी चैनलों ने इसे तरजीह दी। एक चर्च में बाहर खिड़की का एक शीशा टूटा, दूसरे में शॉर्ट-सर्किट की वजह से आग लगी, एक कॉन्वेंट स्कूल में 8,000 रु. की चोरी हुई, फिर एक जगह हिंदू-मुसलमानों की भीड़ ने पत्थर फेंके। ये वारदातें तो शर्तिया तौर पर घंटों तक सुर्खियों में छा जाने का वजूद नहीं रखतीं।

इसके अलावा, पश्चिम बंगाल में एक स्कूल में ताला तोड़कर 12 लाख रु. की चोरी और एक 72 वर्षीय नन के साथ सामूहिक बलात्कार की वारदात जरूर गंभीर है। यह घटना निश्चित रूप से निंदनीय है और यह खबर फौरन दुनिया भर में पहुंच भी गई। यह वारदात उस धारणा के माकूल बैठती है जो पिछले दो साल से बलात्कार को लेकर भारत की गलत तस्वीर पेश करने की कोशिश हुई है। वेटिकन रेडियो ने इसे भारत का शर्म बताया। यह सोशल मीडिया पर भी खूब उछला। आखिर में पता चला कि इस घटना में बांग्लादेशी मुसलमानों का हाथ है, जिसे पाकिस्तान की आईएसआई से शह मिली थी।

इस बार अजीब रूप से मीडिया मौन था। बीबीसी ने एक पट्टी चलाई कि भारत में नन सामूहिक बलात्कार के सिलसिले में एक गिरफ्तारी हुई है। उन्होंने यह नहीं बताया कि पकड़ा गया शख्स बांग्लादेशी मुसलमान है। न वेटिकन, न कोई कार्डिनल या बिशप ने इस मामले में उस गलतबयानी के लिए माफी मांगी कि यह वारदात आरएसएस-विहिप के पुनर्धर्मांतरण अभियान से जुड़ी हुई थी।

‘हिंदू अतिवादियों’ के खिलाफ मीडिया और ईसाईयों के प्रतिनिधियों का अभियान जल्दी खत्म होता नहीं लगता। संभव है, नई वारदातें हों और ईसाईयों के नुमाइंदे फिर ‘सच’ को तोड़-मरोड़कर पेश करने लगें कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते हिंदुओं ने ईसाईयों के खिलाफ ‘हमले’ शुरू कर दिए हैं और ईसाई असहाय और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। टीवी के एंकर फिर सवाल लेकर आएंगे कि ”क्या आप भारत में असुरक्षित महसूस करते हैं?’’ और सभी ईसाई प्रवक्ता कहना शुरू करेंगे, ”हां’’ और दावा करेंगे कि मोदी के सत्ता में आते ही नफरत की हिंसक वारदातें बढ़ गई हैं।

इसके विपरीत, हिंदू भाइयों की पीठ में छूरा घोंपने के अभिायान से दूर रहने वाले और सच्चाई जानने वाले लोग ईसाई पादरियों पर दोनों समुदायों में नफरत के बीज बोने की कोशिशों के आरोप लगाते हैं। मगर, रॉबर्ट रोजारियो या हिल्दा राजा जैसे ईसाईयों को ईसाई पक्ष रखने के लिए नहीं बुलाया जाता, क्योंकि वे हिंदुओं को बदनाम करने का हिस्सा नहीं बनेंगे।

जनमत तैयार करने में मुख्यधारा मीडिया की काफी बड़ी भूमिका है। चर्चों के पास वित्तीय और राजनैतिक ताकत काफी है। भारत की छवि दुनिया भर में खराब करने में एक तीसरी ताकत भी सक्रिय है। उसकी मंशा है कि भारत की छवि भी उसी की तरह हो जाए, जैसी उसकी है। यह पाकिस्तान है। संडे गार्जियन में 12 मार्च को खुलासा हुआ कि पाकिस्तान खुफिया सेवा ने भारत में मानवाधिकार के मामले में छवि पाकिस्तान जैसी बदनाम करने के मकसद के लिए अपना बजट छह गुना बढ़ा दिया है, ताकि अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय धर्म स्वतंत्रता आयोग उसका दर्जा घटा दे।

यह मकसद कुछ हद तक तो भारत को बलात्कार के मामलों में बदनाम करके हासिल कर लिया गया है। पश्चिम में पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत को अब एक पैमाने से नापा जाने लगा है। यही नहीं, भारत की छवि कुछ हद तक नकारात्मक बन गई है। उसकी ‘महिला विरोधी रवैए’ के लिए निंदा होती है, जबकि मुस्लिम देशों को बख्श देना नजरिए का दोष ही जान पड़ता है। फिर भी, नुकसान कितना बड़ा हो गया है, यह एक जर्मन प्रोफेसर द्वारा भारत को बलात्कार के खातिर निंदा करने से जाहिर हो जाता है।

दुर्भाग्य से, जब यह दुष्प्रचार शुरू हुआ तो भारत में भी इस मुद्दे को संदर्भों में बताने की कोई कोशिश नहीं हुई। ऐसा लगता है कि एक बार फिर भारत उतना ही नुकसान करने वाले दुष्प्रचार को रोकने के लिए कोई हरकत नहीं दिखा रहा है, जब यह झूठ फैलाया जा रहा है कि हिंदू ईसाइयों के खिलाफ नफरत भरी हिंसा फैला रहे हैं। मुझे कई बार आश्चर्य होता है कि हिंदुओं को इस मीडिया अभियान का विदेश में होने वाले असर का एहसास भी है कि नहीं।

बेशक, लोगों को यह एहसास भले उस कदर न हो, पर सरकार को तो यह जानना ही चाहिए कि भारत न बलात्कार के मामलों में सबसे बदनाम देशों में है, न हिंदू लोग दूसरे धर्म के लोगों के बारे नफरत और भेदभाव रखते हैं। यह भी देखना चाहिए कि भारत की मौजूदा आबादी 127 करोड़ है और उसकी तुलना अपराध के आंकड़ों में दूसरे देशों से करना नाजायज है। अगर अमेरिका, कनाडा, सभी यूरोपीय देशों और रूस तथा ऑस्ट्रेलिया में होने वाले अपराधों को जोड़ दिया जाए, तब जाकर भारत में होने वाले अपराधों से तुलना हो सकती है। क्या मीडिया को हर मुद्दे पर संतुलित रिपोर्टिंग करने को कहा जा सकता है? क्या किसी को याद है कि कुछ 20 साल पहले एड्स को लेकर मीडिया ने कैसा हो-हल्ला मचाया था? कहा गया था, ”इस मामले में दक्षिण अफ्रीका के बाद भारत दूसरे नंबर पर है।’’ किसी ने यह नहीं बताया कि उस समय भारत की आबादी 100 करोड़ थी जबकि दक्षिण अफ्रीका में 5 करोड़।

अगर मीडिया निष्पक्ष होती तो उसे एहसास होता कि पिछले 10 महीनों में ईसाईयों के खिलाफ 160 वारदातों, जिसमें छोटी-मोटी चोरी और किसी शराबी के पत्थर फेंकने की घटना भी जुड़ी हुई है, के कारण यह हल्ला मचाने की कोई वजह नहीं बनती है कि ”ईसाई भारत में सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं।’’ आखिर मीडिया पश्चिम के हाथों में क्यों खेलना चाहती है, जिसे हर वक्त भारत को पीटने के लिए एक छड़ी की तलाश रहती है?

इंग्लैंड में पिछले साल ही यहूदियों के खिलाफ करीब 1,000 नफरत भरे अपराध हुए। अगर इसे आबादी के अनुपात में रखा जाए तो यह भारत में ऐसे 20,000 अपराधों के बराबर बैठता है। अमेरिका में कई सिखों, हिंदुओं और मुसलमानों को सिर्फ उनके धर्म के आधार पर मार दिया गया। क्या अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय धर्म स्वतंत्रता आयोग ने भारत की निंदा करने के पहले अमेरिका और यूरोप को अपनी निगरानी फेहरिश्त में रखा है?

ऐसे कई सबूत हैं जिनसे पता चलता है कि ईसाईयों का भारत में उत्पीडऩ नहीं होता, बल्कि उनको तरजीह ही दिया जाता है। आबादी में ईसाईयों का प्रतिशत बढ़ता हा जा रहा है। उनके पूजा स्थल कई गुना बढ़ गए हैं और सरकारी हस्तक्षेप से सर्वथा मुक्त हैं, जबकि हिंदू मंदिरों के साथ ऐसा नहीं है। अनेक ईसाई उच्च पदों पर हैं। मिशनरियां धड़ल्ले से दावा करती हैं कि वे भारत में हजारों चर्च स्थापित करने की योजना बना रही हैं और ‘इस पीढ़ी में पूरे देश का बपतिश्मा कर देंगी’ (बकौल ईसाई युवा पत्रिका ब्लेसिंग्स)। ईसाई और दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों को विशेष सुविधाएं प्राप्त हैं और उन्हें छात्रवृत्तियां और कई तरह के लाभ मिलते हैं। ईसाई अपने स्कूलों में छात्रों को अपने धर्म की शिक्षा दे सकते हैं, जबकि उन स्कूलों में नैतिक शिक्षा के अध्यापक हिंदू छात्रों को श्रीकृण या हिंदू दर्शन का जिक्र तक नहीं कर सकते। अब जरा इस हालात की तुलना पाकिस्तान से कीजिए तो यह जाहिर हो जाएगा कि ‘समान रूप से दोषी अभियान’ किस कदर झूठ पर आधारित है और दुनिया भर में गलत धारणाएं फैला रहा है।

इस दुष्प्रचार का सामना कैसे किया जाए? निश्चित रूप से रक्षात्मक रवैए और ईसाईयों के प्रति विशेष ध्यान देकर तो नहीं ही किया जा सकता। इसका एक ही रास्ता है कि ‘सबको न्याय, तुष्टीकरण किसी का नहीं’ का मंत्र अपनाया जाए। नन सामूहिक बलात्कार की गूंज दुनिया के आठों कोनों में ‘सांप्रदायिक अपराध’ के तौर पर इसलिए हुई कि पीडि़ता ईसाई थी। जरा सोचिए, मुसलमान या ईसाईयों द्वारा बलात्कार या हत्या की शिकार किसी हिंदू लड़की के परिजन कैसा महसूस करते होंगे, जब न मीडिया और न पुलिस ही उन मामलों में दिलचस्पी लेती है, क्योंकि हिंदू अगर उत्पीडऩ का शिकार बनें तो वह उस कदर सांप्रदायिक अपराध नहीं होता? अपराध को तो अपराध ही माना जाना चाहिए, उसमें धर्म का घालमेल नहीं होना चाहिए।

हिंदुओं को रक्षात्मक होने की कोई वजह नहीं है। भारत में ईसाईयों के असुरक्षित होने का दावा करने वाले उनके नुमाइंदे बेईमान हैं। भारत जैसा दूसरा देश खोजना मुश्किल होगा, जहां अल्पसंख्यक ईसाई हिंदुओं के बीच इतने सुरक्षित हों और उन्हें इतनी तरजीह मिलती हो। अगर किसी को रक्षात्मक होने की दरकार है तो वे ईसाई पादरी हैं और उन्हें इस बात का शायद एहसास भी हो। शायद इसी वजह से ज्यादा हो-हल्ला मचा रहे हैं कि ‘आक्रमण ही रक्षा का बेहतर उपाय’ है। जब उन्हें विरोधी उतने ही जोरदार मिल जाएंगे तो वे आक्रामक रुख छोड़ देंगे। यहां जोरदार विरोध का मतलब दबंगई से नहीं है। इसका अर्थ है कि जोरदार तरीके से सच को सामने रखा जाए और अपने धर्म का पालन किया जाए। इसका यह अर्थ भी नहीं है कि ईसाई पंथ के अधार्मिक, विभाजक पहलुओं की ओर इशारा न किया जाए।

हम आज 21वीं सदी में जी रहे हैं, जब विज्ञान भी अपने अनुसंधानों के जरिए मानने लगा है कि सच्चाई के विविध पहलू होते हैं। प्रत्यक्ष पहलू तो इस ब्रह्मांड की एकरूपता ही है। हमारा सार तत्व एक ही वस्तु से निर्मित है। भारतीय ऋषि इस तथ्य को सदियों पहले से जानते थे।

इससे अधिक बड़ा घृष्णा-अपराध क्या है: क्या किसी चर्च में किसी शराबी का पत्थर फेंकना या किसी सम्मानित पादरी का बिना कोई प्रमाण यह ऐलान करना कि हिंदू अगर किसी चर्च के सदस्य नहीं बने तो वे नर्क की आग मेंं झुलसने को अभिशप्त हैं और इस तरह ईसाई बच्चों को इसमें अंधआस्था रखना सिखाते हैं? क्या टीवी के एंकर ऐसे भेदभावपूर्ण, निराधार आरोपों का अपना विरोध करेंगे, जो वाकई नफरत की आग भड़का सकते हैं? क्या हिंदू (और बौद्ध तथा निरीश्वरवादी वगैरह) इसका जवाब चर्चों से मांगेंगे?

ईसाई पहले यहां शरणार्थियों की शक्ल में आए, फिर गोवा पर आधिपत्य जमाने के बाद उत्पीडऩ पर उतर आए। अब वे पश्चिम से भारी-भरकम रकम पाकर हिंदुओं के खुले दिमाग वाले नजरिए को बदलने का सुनियोजित मिशन चलाते हैं, ताकि वे ‘हम भी ईसा मसीह में श्रद्धा रखते हैं’ से ‘हम सिर्फ ईसा मसीह में ही श्रद्धा रखते हैं’ कहने लगें।

ईसाई पंथ में दूसरे धर्मों के प्रति असहिष्णुता और अनादर निहित है। उसका मकसद एकदम स्पष्ट है : सभी को ईसा मसीह का ही अनुयायी होना चाहिए। हिंदू धर्म खत्म हो जाना चाहिए। अगर वे अंतरधर्म सम्मेलनों में कुछ कहते हैं तो वह सिर्फ छलावा है। ईसाई धर्म का प्रसार भारत के हित में नहीं है।

ईसाई और इस्लाम के विपरीत हिंदू धर्म का कोई एजेंडा नहीं है। उसमें कभी यह बात नहीं रही कि दूसरे धर्मों को मिटा देना है। भारत में हमेशा से एक सत्य तक पहुंचने के अनेक पंथ रहे हैं। भारत का यह कर्तव्य है कि वह अपनी अमूल्य धरोहर का सम्मान करे और अपने लोगों तथा दुनिया को उसकी अहमियत बताए। उसका कर्तव्य यह भी है कि वह अपने लोगों को विभाजनकारी विचारधाराओं के छलावे, धमकी और लोभ-लालच से बचाए।

चर्च अपने बेतुकी मान्यताओं को पश्चिम के ईसाईयों के बीच फैलाने में अब कामयाब नहीं हो पा रहा है, फिर भी उसकी वित्तीय और राजनैतिक ताकत बेपनाह है। दुनिया भर में हिंदुओं और हिंदू धर्म को बदनाम करने के लिए उनके पास अकूत पैसे हैं। इस लड़ाई में भारत उनकी बराबरी नहीं कर सकता, क्योंकि उसका अपना ही मीडिया पाला बदल चुका है।

शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने यूरोप दौरे के दौरान यह बता पाएं कि चर्च भारत में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण अभियान चला रहा है, क्योंकि वह मानता है कि ऐसा नहीं करने से हिंदू नरक में चले जाएंगे। उन्हें इसकी फिक्र छोड़ देनी चाहिए। हिंदू नरक में नहीं जाएंगे। ज्यादातर यूरोपीय इस बात से सहमत हो जाएंगे।

हालांकि मुझे नहीं मालूम कि ‘ईसाई पर हमले बढ़ रहे हैं’ जैसे मीडिया अभियान से कितना नुकसान हुआ है। मैंने जर्मनी में अपने एक रिश्तेदार से इसका पता किया। और हां, उसने कहा कि भारत में ईसाईयों पर हमले हो रहे हैं….

(1980 में भारत आईं जर्मन मूल की मारिया विर्थ भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं पर लिखती हैं।)

मारिया विर्थ

दिल्ली वारदात की हकीकत और अफसाना

 नीलाभ कृष्ण

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राजधानी दिल्ली में क्या वाकई ईसाई समुदाय पर हमले हो रहे हैं? दिसंबर 2014 से देश भर में और खासकर दिल्ली में चर्चों पर हमले की बात जोर-शोर से प्रचारित की गई। इसमें देशी-विदेशी मीडिया ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी गणतंत्र दिवस के अवसर पर अपने भारत दौरे के दौरान एक सभा में भारत में बढ़ रही धार्मिक असहिष्णुता का हवाला दिया। उन्होंने भाजपा का कहीं नाम तो नहीं लिया, लेकिन इसे मोदी सरकार को चेतावनी के रूप में देखा गया।
पिछले साल दिसंबर से दिल्ली में चर्चों पर हमले की पांच विशेष घटनाओं की खबरें चल रही हैं, जिसे मौजूदा केंद्र सरकार के तहत ‘हिंदू अतिवाद’ में इजाफे के तौर पर प्रचारित किया गया, लेकिन इन मामलों की हकीकत और अफसानेे को जानना हमारे लिए जरूरी है।
इन पांच वारदातों में पहली घटना पूर्वी दिल्ली के दिलशाद गार्डेन में सेंट सेबास्टियन चर्च में आगजनी की है। वारदात के फौरन बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित विशेष जांच टीम (एसआइटी) इसकी जांच कर रही है।
दूसरी घटना दक्षिण पश्चिम दिल्ली में जसोला की है। वहां कथित तौर पर कुछ असामाजिक तत्वों ने पत्थर फेंक कर चर्च के शीशे तोड़ दिए। पुलिस की जांच में पता चला कि बाहर खेल रहे कुछ बच्चों में से किसी ने पत्थर उछाला तो वह चर्च के शीशे से जा लगा। इससे कोई सांप्रदायिक मंसूबे का पता नहीं चला है।
तीसरी घटना पश्चिम दिल्ली की रोहिणी की है, जहां कथित तौर कुछ तत्वों ने क्रिसमस ट्री को जलाकर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाडऩे की कोशिश की। बाद में पुलिस जांच में पता चला कि आग शॉर्ट सर्किट की वजह से लगी थी। चौथी घटना विकासपुरी की है, जहां कथित तौर कुछ लोगों ने चर्च में तोडफ़ोड़ की कोशिश की, लेकिन बाद में पता चला कि यह नशे में धुत किसी शराबी की कारस्तानी थी। यह घटना सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई थी इसलिए उसे फौरन पकड़ लिया गया। यहां भी किसी सांप्रदायिक मंसूबे का पता नहीं चला।
पांचवी घटना वसंत विहार की है, जहां कैथोलिक चर्च में डकैती की बात कही गई। पुलिस ने इसे 8,000 रु. चोरी का मामला बताया। यहां भी कोई सांप्रादायिक मामला नहीं था।
फस्र्ट पोस्ट डॉटकॉम में उद्धृत दिल्ली पुलिस के अपराध के आंकड़ों के मुताबिक 2014 में शहर में कुल 1,55,654 वारदाते हुईं, जिसमें 10,309 डकैती और 42,634 दूसरी चोरियों की हुईं। 2014 में 2013 के मुकाबले दोगुनी वारदातें हुईं। इससे भी अहम यह है कि सिर्फ चर्चों में ही तोडफ़ोड़, आगजनी या चोरी की वारदातें नहीं हुईं। बकौल दिल्ली पुलिस, 2014 में 206 मंदिर, 30 गुरुद्वारे, तीन चर्च (दिल्ली में कुल 200 से ज्यादा चर्च हैं) और 14 मस्जिदों में ऐसी वारदातें हुईं। यह भी साफ है कि ये वारदातें मोदी सरकार के आने से ही नहीं हुईं, बल्कि दिल्ली में हर साल ऐसी वारदातें दर्ज की जाती हैं।

ऑपरेशन इक्वल ब्लेम

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द संडे गार्जियन की एक रिपोर्ट के मुताबिक गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) की जांच से पता चला है कि पश्चिम बंगाल के रानाघाट की घटना में बांग्लादेश के खुलाना जिले में आधारित एक उग्रवादी संगठन का हाथ है। रानाघाट में एक स्कूल से 12 लाख रु. चोरी की गई और एक 72 वर्षीय नन के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया।
इस संगठन ने ‘दो अलग-अलग धर्मों के लोगों को इस वारदात के लिए भेजा था और कुछ घंटों में उनकी बांग्लादेश में वापसी की भी व्यवस्था की थी’। इससे असली अपराधियों को पकडऩा मुश्किल हो गया। इससे भी चिंताजनक दावा यह है कि स्कूल के इलाके की पुलिस को ‘इस वारदात के बारे में पहले से जानकारी थी और उसने अपराधियों को बचकर निकल भागने दिया।’ हालांकि इन सूत्रों के मुताबिक किसी राजनैतिक दल का इसमें हाथ नहीं था। यह भी बताया गया कि ‘स्थानीय पुलिस के कुछ लोगों ने वारदात के बाद जांच-पड़ताल में जानबूझकर देरी की ताकि सबूत मिट जाए’ और ‘वारदात के छह दिन पहले से ही आपराधियों की इलाके में मौजूदगी की सीसीटीवी फुटेज होने के बावजूद स्थानीय पुलिस उन्हें पहचानने के लिए स्थानीय लोगों को नहीं ला सकी।’ उनका यह भी कहना है कि आपराधियों के भाग जाने के बाद ‘सीबीआई सिर्फ इलाके के सामान्य अपराधियों तक ही पहुंच पाई, क्योंकि असली अपराधी तो रफू-चक्कर हो गए थे।’
इस घटना को एकदम अलग नजरिए से देखा जाना चाहिए। पिछले दस महीने से केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के कामकाज शुरू करने के बाद से ही आरोप लगने लगा कि सरकार हिंदू अतिवादियों को शह देती है। रिपोर्ट के मुताबिक जीसीसी की राय है कि नरेंद्र मोदी की एनडीए सरकार के 24 मई 2014 को सत्ता संभालने के बाद से ही पाकिस्तान की आईएसआई ने ‘अपने समान बदनामी’ की एजेंडे का बजट छह गुना बढ़ा दिया। आईएसआई का यह एजेंडा मानवाधिकार के मामले में भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि पाकिस्तान के बराबर के लिए है। जीसीसी नेपाल और बांग्लादेश में आईएसआई की गतिविधियों पर नजर रखती है। उसके विश्लेषकों के मुताबिक आईएसआई ने 2011 में अपने बजट का एक हिस्सा भारत में चर्चों पर हमले के लिए अलग कर दिया, ताकि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में भारत की छवि पाकिस्तान के बराबर हो जाए, जहां
1980 के दशक से ईसाई समुदाय के लोगों की हत्या, उनके धर्म परिवर्तन की वारदातें जारी हैं। पिछले साल ऐसी गतिविधियां बड़े पैमाने पर हुईं।
रिपोर्ट का यह भी दावा है कि आईएसआई ने एक अमेरिकी सुरक्षा विशेषज्ञ को पिछले चार साल से इस काम में लगा रखा है कि वह दुनिया भर में ऐसे एनजीओ और लोगों को तैयार करे जो ‘भारत की छवि ईसाईयों और मुसलमानों पर उत्पीडऩ की दिखाने के लिए सक्रिय हों।’ इसी कोशिश का नतीजा है कि अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय धर्म स्वतंत्रता आयोग ने धार्मिक असहिष्णुता के मामले में भारत को पाकिस्तान के दर्जे में ही रखा है।
यह अब कहा जा सकता है कि नफरत की हिंसा में जो लोग भी शामिल हैं, वे आईएसआई के मंसूबे को ही पूरा कर रहे हैं, ताकि अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की बदनामी हो।

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