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चर्च बिक रहे हैं यूरोप में

चर्च बिक रहे हैं यूरोप में

कभी सारी दुनिया को ईसाईयत का पाठ पढ़ाने वाले पश्चिमी देशों में एक अजूबा हो रहा है – ईसाईयत ढ़ह रही है। उसके पैरों तले से जमीन खिसकती जा रही है। इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि चर्च जाने वालों की संख्या लगातार घट रही है। कुछ देशों में तो यह मात्र पांच प्रतिशत ही रह गई है। दरअसल ईसाईयत पाश्चात्य देशों के लिए एक ऐसी वस्तु बन गई है, जिसका उनकी अपनी जिंदगी में कोई अर्थ नहीं है, न उपयोग है। वह केवल तीसरी दुनिया के देशों में एक्सपोर्ट के लिए है। ठीक वैसे ही जैसे पश्चिमी देश पुरानी दवाइयों और ‘आउट ऑफ डेट’ तकनीक को तीसरी दुनिया के देशों में डंप कर देते हैं।

असलियत यह है कि कि आधुनिक लोग अब ईसाईयत से दूर जा रहे हैं, क्योंकि उनके लिए ईसाईयत निरर्थक है। इसलिए यूरोपीय देशों में चर्च खाली पड़े रहते हैं, जहां श्रद्धालु आते नहीं, जिनकी कोई देखभाल भी नहीं करता। कई चर्चों को अब रिहाइशी मकान या अन्य कामों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। कई चर्चों को गैर-ईसाइयों को बेचा जा रहा है, जहां वे अपने पूजा स्थल या प्रार्थना घर बना रहे हैं।

इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है पादरी वर्ग। कभी एक चर्च में दो या तीन पादरी होते थे। अब एक भी नहीं होता। रविवार की प्रार्थना भी विजिटिंग पादरी ही कराते हैं। इसलिए चर्चों के कई डायोसिस का पुर्गठन किया जा रहा है। बात बिल्कुल साफ है लोगों की ईसाईयत में दिलचस्पी नहीं रही। उनके सवालों का कोई जवाब ईसाईयत के पास नहीं है। कभी पश्चिम यूरोप के हर गांव में एक और शहरों में तो बहुत सारे चर्च होते थे। चर्च अब भी हैं पर लोग वहां नहीं फटकते।

नीदरलैंड के अर्नहम शहर में कभी सेंट जोसेफ चर्च हुआ करता था, जहां बड़ी भीड़ होती थी। वहां 1,000 से भी ज्यादा ईसाई श्रद्धालु जुटते थे। अब उसका अर्नहम स्केट हॉल के रूप में पुनर्जन्म हुआ है। ईसा के जीवन के दर्जनों चित्रों और मूर्तियों के बीच दर्जनों युवा स्केटिंग करते देखे जा सकते हैं।

यह पश्चिम यूरोप के उन सैंकड़ों चर्चों में से एक है जो श्रद्धालुओं के न आने के कारण बंद हो चुके हैं या बंद होने के कगार पर हैं। इंग्लैंड से लेकर डेनमार्क तक के सभी देशों के सामने आज सवाल है कि श्रद्धालुओं के अभाव में वीरान होते जा रहे चर्चों का क्या करें? हकीकत यह है कि आखिरकार चर्चों को बेच दिया जाता है। आज जगह-जगह खाली पड़े चर्चों को यूरोप में बेचा जा रहा है। कहीं मॉल बन गए हैं, कहीं दुकानें। कुछ गैर-ईसाईयों को बेचे गए हैं, जिन्होंने वहां अपने पूजा स्थल बना लिए हैं। कई चर्चों में तो बार भी खुल गए हैं। छोटे चर्चों को लोग घरों की तरह इस्तेमाल करने लगे हैं। दरअसल खाली चर्चों के लिए ग्राहक खोजना अच्छा खासा धंधा बन गया है। इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के चर्चों की बिक्री के विज्ञापन तो ऑनलाइन मिलने लगे हैं। एक चर्च का पादरी दु:ख के साथ कहता है कि हम चर्च की इमारत में कोई जुआ-घर बनते देख नहीं सकते या कोई वासना तृप्ति के सौदागरों के हाथ में जाने नहीं देना चाहते।

चर्चों का इस तरह खाली होना और फिर बिक जाना इस बात का प्रमाण है कि ईसाई धर्म अपने ही गढ़ों में प्रभाव खोता जा रहा है, जबकि बाकी धर्मों के साथ ऐसा नहीं है। मुसलमानों और यहूदियों के पूजा-स्थलों पर अब भी काफी लोग होते हैं।

वॉल स्ट्रीट जर्नल की सामाजिक सर्वेक्षण सांख्यिकी कहती है कि यूरोप में चर्च जाने वालों की संख्या घट चुकी है। ध्यान रहे ईसाईयत सामूहिक प्रार्थना में विश्वास करती है। सप्ताह में एक बार चर्च जाना आवश्यक समझा जाता है। ये ईसाईयत के संगठन की नींव है। आज कुछ प्रतिशत ईसाई ही कम से सप्ताह में एक बार चर्च जाते हैं। चर्च जाने वालों ईसाइयों के 2012 के कुछ आंकड़ें: आयलैण्ड में 48 प्रतिशत, इटली में 39 प्रतिशत, नीदरलॅण्ड में 30 प्रतिशत, स्पेन में 25 प्रतिशत, यूके में 22 प्रतिशत, जर्मनी में 12 प्रतिशत, फ्रांस में 11 प्रतिशत और डेनमार्क में 5 प्रतिशत। इतनी ईसाई जनसंख्या सप्ताह में कम से कम एक बार चर्च जाती है। इसके कारण हजारों गिरजाघरों को बेचने की नौबत आ गयी है।

नीदरलॅण्ड के कुल 1,600 रोमन कॅथोलिक चर्चों में से दो-तिहाई चर्च अगले दस वर्षों में बंद होने का अनुमान स्वयं रोमन कॅथोलिक चर्च के नेतृत्व ने ही लगाया है। उसी प्रकार हॉलॅण्ड के 700 प्रोटेस्टंट चर्चों के भी अगले चार वर्षों में बंद होने का अनुमान है। जर्मनी के रोमन कॅथोलिक चर्च ने 515 चर्च गत दशक में बंद किए हैं। 200 डेनिश चर्च अनुपयोगी हो चुके है। इंग्लैण्ड भी प्रतिवर्ष प्राय: 20 चर्च बन्द कर रहा है। यही कहानी है सारे पश्चिमी यूरोप के चर्चों की। संख्या इतनी बड़ी है कि सारे समाज को इस समस्या का सामना करना पड़ेगा। यह कहना है ‘ग्रुट्सवेजर’ का, जो धार्मिक परम्परा को बचाने वाली संस्था के रूप में काम करती है।

अमेरिकी आर्थिक अखबार ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ में कुछ दिनों पहले छपे लेख में कहा  गया है, ‘अमेरिका अभी भी बचा हुआ है, लेकिन अमेरिका में भी चर्च जाने वालों की संख्या तेजी से घट ही रही है। आने वाले वर्षों में अमेरिका को भी इसी समस्या का सामना करना पड़ेगा।’ वॉल स्ट्रीट जर्नल का लेख कुछ भी कहे, लेकिन हकीकत यह है कि अमेरिका और कनाडा भी इस मामले में पीछे नहीं हैं। वहां भी बड़े पैमाने पर चर्च बिक रहे हैं। यह बात अलग है कि उनके आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। वैसे अमेरिका और कनाडा में भी चर्चों के बिकने के विज्ञापन कई जगह देखने को मिल जाते हैं।

अमेरिकी जनगणना ब्यूरो के दस्तावेजों से कई सनसनीखेज तथ्य उभर कर आते हैं।

  • हर साल 4,000 चर्च अपने दरवाजे बंद करते हैं, जबकि 1,000 नए चर्च शुरू होते हैं।
  • हर साल 27 लाख चर्च जाने वाले उदासीन हो जाते हैं। शोध में पाया गया कि उनको कोई ठेस लगी है या उनका किसी तरह शोषण या दुरूपयोग या उनसे दुव्र्यवहार किया गया है या इन लोगों के प्रति उदासीनता बरती गई है।
  • अमेरिका में 1990 से 2000 के बीच प्रोटेस्टेंट चर्चों की कुल सदस्यता 50 लाख कम हुई है, जबकि अमेरिका की आबादी 2 करोड़ 40 लाख बढ़ी है।

ईसाईयत अपना प्रचार करने के लिए कई तरह के नुस्खे अपनाती है। जैसे कि नर्क से बचाने और स्वर्ग में पहुंचाने के कल्पित वायदे। इनमें से एक है ‘पाप आप करें, पर ईसाईयत स्वीकार करने पर आपका स्वर्ग में स्थान आरक्षित हो जाएगा।’ अब जब विज्ञान आगे बढ़ चुका है, इसलिए पढ़ी-लिखी जनता इसे स्वीकार करने में हिचकिचाती है। उनको गालिब का यह शेर समझ में आ गया है –

हमको मालूम हो जन्नत की हकीकत लेकिन

दिल बहलाने को गालिब ये खयाल अच्छा है।

दरअसल उनके पास आज पृथ्वी पर ही दिल बहलाने के लिए काफी चीजें हैं जिनसे उनकी जिंदगी स्वर्ग बन गई है। इस कारण चर्च जाने वालों की संख्या लगातार घट रही है। आज का बुद्धिमान ईसाई ऐसे झूठे वादों के झांसे में नहीं आता। नतीजतन उसका ईसाईयत में विश्वास घट रहा है। वैसे इसके अन्य कारण भी हो सकते हैं।

वॉल स्ट्रीट जर्नल के लेख में तीन बिके हुए गिरजाघरों के रंगीन फोटो भी छपे हैं। इन बिके हुए चर्चों का उपयोग कैसे किया जा रहा है, इसका अनुमान कीजिए। ये बड़े-बड़े गिरजाघर हैं। उदाहरणार्थ ब्रिस्टल, इंग्लॅण्ड का  ‘सॅन्ट पॉल चर्च’ ‘सर्कस ट्रैनिंग स्कूल’ बना हुआ है। ऊंची दिवारों के कारण उसका ऐसा उचित उपयोग हो रहा है। दूसरा एडिन्बरो का लुथरन चर्च फ्रेन्केस्टाइन का बार बन चुका है और 19वीं शताब्दी का नीदरलॅण्ड का अर्नेहॅम चर्च कपड़ों की बड़ी दुकान बन गया है। एक चित्र में स्केटिंग की ट्रैनिंग देते हुए और दूसरे चित्र में सर्कस के कलाकारों को सिखाते हुए दिखाया गया है और तीसरे में एक कपड़ों की बहुत बड़ी दुकान दिखाई गयी है।

पश्चिम यूरोप के देशों में चर्च नगर के केंद्र, उनकी वास्तुकला आकर्षण केंद्र हुआ करती थी, वह सब अब गुजरे जमाने की बात बनती जा रही है। इन देशों में हर शहर में एक ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व की वास्तु है जिसका स्वामित्व चर्च के पास है, लेकिन उसका उपयोग करने वाले श्रद्धालु ही नहीं है लेकिन ईसाईयत की ट्रेजडी यह है कि अब इन चर्च-त्यागियों की तो घर वापसी भी नहीं हो सकती।

सतीश पेडणेकर

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