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भारत और बांग्लादेश के बीच नदी जल साझेदारी पर नीति

भारत और बांग्लादेश के बीच नदी जल साझेदारी पर नीति

सदियों से प्राकृतिक संसाधनों के स्रोत राष्ट्रों के बीच निरंतर विवाद का कारण रहे हैं। भारत और बांग्लादेश के बीच जल कलह की एक प्रमुख वजह है।  दोनों पड़ोसी देश आपस में 54 नदियों को साझा करते हैं। इनमें से गंगा, ब्रह्मपुत्र, मेघना और तीस्ता प्रमुख नदियां हैं। दोनों देशों को एकजुट करने वाली बहुत-सी चीजें हैं – साझा इतिहास और साझी विरासत, संस्कृतिक और भाषाई संबंध, संगीत का जुनून, साहित्य और कला। भारत बांग्लादेश के साथ ब्रिटिशराज से आजादी के लिए संघर्ष के इतिहास को ही साझा नहीं करता, बल्कि ये 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान मजबूत सहयोगी भी रहे।

दोनों देश सार्क (साउथ एशियाई एसोसिएशन फॉर रीजनल को-ऑपरेशन), बिम्स्टेक (बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी-सेक्टोरियल, टेक्निकल एंड इकोनॉमिक को-ऑपरेशन), आईओआर (इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन) और राष्ट्रमंडल के साझा सदस्य हैं।

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भारत और बांग्लादेश के बीच काफी कुछ तालमेल होने के बावजूद भी दोनों देशों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिनमें से एक जल बंटवारे को लेकर है। इन नदियों की उत्पत्ति हिमालय से होती है। भारत और बांग्लादेश से गुजरते हुए ये बंगाल की खाड़ी में जा कर गिरती हैं। नदी का ऊपरी हिस्सा होने के कारण भारत हमेशा से इन स्रोतोंं पर अपनी दावेदारी करता रहा है। भारत ने बांग्लादेश में बहकर जाने वाले जल की मात्रा को भी नियंत्रित किया है। नदी का निचला हिस्सा होने के कारण बांग्लादेश की अद्वितीय स्थालाकृति है। यहां नदियों के बहाव मेंं मौसमी बदलाव आते रहते हैं, जिसके कारण शुष्क मौसम में पानी की कमी होने का खतरा बढ़ जाता है। नतीजतन बांग्लादेश नदी के बहाव के लिए भारत के द्वारा बनी बाउंड्री पर निर्भर है। इस परिदृश्य को देखते हुए कहा जा सकता है कि जब बंटवारा अक्सर दो पड़ोसियों  के बीच तनाव का स्रोत रहा है।

गंगा जल समझौता

संक्षिप्त में गंगा की भौगोलिक विशेषताओं की रूपरेखा काफी महत्वपूर्ण है, जो कि भारत और बांग्लादेश के माध्यम से बहते हुए 2,500 किलोमीटर की लंबी यात्रा तय करती है। गंगा की उत्पत्ति गंगोत्री से होती है, जो भारत में हिमालय पर्वत श्रृंखला के दक्षिणी ढाल पर स्थित है और दक्षिण-पूर्व दिशा में बांग्लादेश की ओर मुड़ जाती है। गंगा की मुख्यधारा दो भागों में विभाजित हो जाती है, जो कि भारत में भागीरथी-हुगली और बांग्लादेश में पद्मा के नाम से जानी जाती है। बांग्लादेश में लगभग 120 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद पद्मा दक्षिण-पूर्व में मुड़ जाती है, जहां से यह बांग्लादेश के ह्दय ब्रह्मपुत्र में जाकर मिलती है। उसके बाद इन दोनों नदियों का संयुक्त प्रवाह दक्षिण की ओर बहता है और जाकर बंगाल की खाड़ी में गिरता है। ये भौगोलिक विशेषता भारत और बांग्लादेश को ऊपरी नदी तट और निचले नदी तट राज्यों के रूप में विभाजित करती है। 1950 के दशक में भारत के पश्चिमी बंगाल में गंगा पर फरक्का बैराज बनाने के प्रस्ताव ने दोनों देशों को संभावित दावों पर बातचीत करने के लिए तैयार किया। बांग्लादेश की आजादी में फरक्का बैराज से जुड़े विवादों को सुलझाने के क्रम में एक नया आयाम मिला।

बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति ने बांग्लादेश मुक्ति में भारत की भूमिका की सराहना की और भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने की अपनी चाहत को व्यक्त किया। नतीजतन, मैत्री, सहयोग और शांति की संधि पर मार्च 1972 में हस्ताक्षर किया गया। इस संधि के अनुसार दोनों देशों ने जल संसाधन, सिंचाई, बाढ़ और चक्रवात नियंत्रण के लिए और आम हितों की दिशा में काम करने के लिए एक संयुक्त नदी आयोग (जेआरसी) की स्थापना की।

फरक्का बैराज 42 किलोमीटर लंबी एक फीडर नहर द्वारा गंगा की जलधारा को हुगली नदी की ओर मोडऩे के लिए 1974 में बनाया गया था। संयुक्त नदी आयोग (जेआरसी) ने संयुक्त रूप से उपलब्ध जल संसाधनों के अधिकतम उपयोग के लिए वृद्धि के सभी संभावित संसाधनों का पता लगाने और खराब मौसम में पानी के बंटवारे के लिए एक पारस्परिक रूप से स्वीकार्य फॉर्मूला खोजने की मांग की। 1974 में गहन वर्ता के बावजूद जेआरसी समझौते तक नहीं पहुंच सका। फरक्का बैराज अभियान 1975 में शुरू किया गया और तभी से गंगा के जल बंटवारे और नियंत्रित करने के लिए दोनों देशों के बीच विवाद का मुख्य स्रोत बन गया।

कोलकाता में औद्योगिक और घरेलू इस्तेमाल और पश्चिम बंगाल के अन्य भागों में सिंचाई प्रयोज्यों के लिए पानी की मांग में वृद्धि के साथ, जल के बंटवारे को लेकर विवाद तेज हो गया था। फरक्का बैराज के  निर्माण के पीछे का उद्देश्य कोलकाता बंदरगाह पर पानी की गहराई को बढ़ाने और गंगा नदी की भागीरथी-हुगली शाखा का सूखे के दौरान प्रवाह को बढ़ाना था।  नवंबर 1977 में जल बंटवारे को लेकर दोनों देशों के बीच पांच साल का प्रस्ताव रखा गया। हालांकि बुनियादी मुद्दा अनसुलझा ही रहा, जिसकी वजह से समझौता 1982 में खत्म हो गया।

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अंत में भारत के प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा और उनकी बांग्लादेशी समकक्ष शेख हसीना ने 1996 में एक व्यापक द्विपक्षीय संधि पर हस्ताक्षर किया। इस संधि ने तीन साल के जल बंटवारे समझौते की स्थापना की, जिसमें बांग्लादेश को पानी की आपूर्ति करने की गारंटी की बात हुई। इस वजह से बांग्लादेश को निचले नदी तट के रूप में मान्यता दी गई।

1966 की संधि में जरूरी सुरक्षा उपाय निहित नहीं थे। हालांकि वहां पर विभिन्न प्रवधान हैं, जो कि सीमित सुरक्षा प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए,11 मार्च से 10 मई की अवधि में वैकल्पिक 10 दिनों के अनुभाग में 35,000 क्यूसेक पानी देने का दोनों ओर से प्रवधान है। संधि का एक महत्वपूर्ण पहलू ये है कि जब जल का बहाव 50,000 क्यूसेक से नीचे चला जाएगा तो इस आपातकालीन स्थिति को समझते हुए दोनों देशों की सरकारें तत्काल विचार-विमर्श के लिए तैयार होंगी। इस संधि के तहत एक विवाद निपटारे की व्यवस्था रखी गई, ताकि बहाव पर संयुक्त निगरानी की व्यवस्था से तथ्यों पर असहमति की संभावनओं को खत्म किया जा सके।

कुछ महीने बाद ही संधि को अपने पहले परीक्षण से गुजरना पड़ा, क्योंकि गंगा में पानी की वास्तविक उपलब्धता फरक्का बैराज पर उम्मीद से कम हो गई थी। दूसरा मुद्दा भारत में फरक्का बैराज में जारी पानी की मात्रा के बीच और संबंधित हॉर्डिंग पुल पर पहुंचने की विसंगति से संबंधित है। हार्डिग पुल पर गंगा के चैनल बहुत बड़े हैं और 1.5 लाख क्यूसेक की क्षमता वाले हैं, लेकिन गलत बहाव के कारण तलछट वितरण और रेतीकरण, इसके प्रवाह को मापने में मुश्किल पैदा करता है। एक बहुत बड़ी समस्या गोराई हम्प्प की भी है। बांग्लादेश का कहना है कि भारत के द्वारा फरक्का में गंगा के पानी के बहाव को नियंत्रित करने से दक्षिण-पश्चिमी खुलना क्षेत्र में बड़ी समस्याएं उत्पन्न हो गईं हैं। यहां पर पानी में लवणता की मात्रा और साथ ही कृषि, मत्स्य पालन और सुंदरी क्षेत्र की प्रजातियों के संरक्षण में मुश्किलें पैदा हो रही हैं। इस क्षेत्र में पानी की मुश्किलें पैदा हो रही हैं क्योंकि गंगा सूखती जा रही है। ये सच है कि ऐसी स्थितियां हैं, लेकिन ये कहना गलत होगा कि ये फरक्का की वजह से है। पिछली एक शताब्दी से देखा जा रहा है कि गंगा धीरे-धीरे पूर्व और उत्तर की ओर खिसकती जा रही है।

PAGE 40-43_Page_2दशकों से फरक्का पर चला आ रहा विवाद और कपटपूर्ण वार्ता का मुद्दा हल करने के सामाजिक और राजनीतिक महत्व को रेखांकित करता है। इस समस्या का तकनीकी पहलू और दोनों देशों के लिए जल की साझेदारी की मात्रा का निर्णय के साथ-साथ  जल के बहाव को बढ़ाने के उपायों की खोज भी करनी चाहिए। इसके अलावा बांग्लादेश इस मुद्दे से निपटने के लिए अपने शीर्ष नेताओं पर निगाहें टिकाकर बैठा है। यह सत्तारूढ़ सरकारों के प्रदर्शन को पहचानने के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण पैमाना माना जा रहा है। समय-समय पर इस मुद्दे पर विवाद के बावजूद, भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी संधि पिछले 19 सालों से अच्छी तरह से काम कर रहा है। वार्ता में पश्चिमी बंगाल के मुख्यमंत्री की सक्रिय भागीदारी ने संधि को व्यवहार्य बनाने में बहुत मदद की है। गंगा नदी जल संधि दक्षिण एशिया में ऊपरी और नीचले नदी तट के पडोसियों के बीच शांतिपूर्ण वार्ता को उदाहरणों में पेश किया गया है।

तीस्ता जल बंटवारा समझौता

तीस्ता बारहमासी नदी है, जो कि बर्फ और बारिश दोनों की वजह से इसमें हमेशा जल रहता है। इसकी उत्पत्ति हिमालय में चोलमु (त्यो लहमु) झील से हुआ है, जो कि सिक्किम में है और समुद्र के स्तर से 5500 मीटर की ऊंचाई से निकलती है और बंगाल की खाड़ी में विलय होने से पहले लगभग 315 किलोमीटर की दूरी तय करती है। इसमें से लगभग 130 किलोमीटर बांग्लादेश से होते हुए बहती है। तीस्ता का तेज अवरोहण इस नदी को दुनिया का सबसे तेजी से बहने वाली नदी बनाता है। ये सिवोक तराई क्षेत्र में निस्तारण होने से पहले विद्युत उत्पन्न करने की विशाल क्षमता रखता है।

54 नदियों में से गंगा के बाद सबसे महत्वपूर्ण नदी तीस्ता ही है, जिसे भारत और बांग्लादेश दोनों ही बांटते हैं। तीस्ता दोनों देशों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन बांग्लादेश के लिए कुछ ज्यादा ही। उत्तर-पश्चिम बांग्लादेश में देश के सबसे बड़े हिस्से में चावल की खेती होती है, जो कि सिंचाई के लिए इस नदी पर निर्भर है। ये नदी भारत से निकलती है और निल्फामरी जिले से बांग्लादेश में प्रवेश करती है। कुरिग्राम में ब्रह्मपुत्र से विलय होने से पहले ये रंगपुर, लालमोनिर्हत और गैबंध जिलों से होकर 45 किलोमीटर बहते हुए यहां पहुंचती है। सितंबर से मार्च के सूखा मौसम में बांग्लादेश को तीस्ता के जल की कृषि संबंधित गतिविधियों के लिए अत्यंत अवश्यकता होती है। रंगपुर में 7,50,000 हेक्टेयर सिंचाई परियोजना तीस्ता पर निर्भर है। इस क्षेत्र में चावल की खेती सबसे महत्वपूर्ण है और ये क्षेत्र हर साल शुष्क मौसम में तीव्र जल की कमी का सामना करता है। भारत के दो राज्यों, पश्चिमी बंगाल और सिक्कम, सिंचाई और जल विद्युत उत्पादन के लिए तीस्ता नदी पर निर्भर हैं। दो बैराज – एक भारत में और दूसरा बांग्लादेश में, सिंचाई की सुविधा के लिए पानी उपलब्ध कराने के लिए बनाए गए हैं।

भारत में गोजलदोबा पर बने तीस्ता नदी बैराज बांग्लादेश में नीचे की ओर जाने वाले जल के बाहव को नियंत्रित करता है। उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में सिंचाई क्षमता में वृद्धि के लिए, बांग्लादेश ने लालमोनिर्हत जिले में तीस्ता नदी पर दलाई बैराज का निर्माण किया, ताकि नहर नेटवर्क के जरिए सिंचाई का पानी उपलब्ध कराया जा सके। दलाई बैराज शुष्क मौसम के दौरान आपर्याप्त जल प्रवाह के कारण गैर-कार्यात्मक हो जाता है। वहीं बारिस के मौसम में ये शुष्क मौसम के विपरीत काम करता है। गोजलदोबा बैराज से अत्यधिक जल प्रवाह होने के कारण बाढ़ और नदी के तट-कटाव होने लगता है, जिससे नीचले इलाकों की फसलें नष्ट हो जाती हैं। बांग्लादेश काफी लंबे समय से तर्क देता आ रहा है कि भारत ने गोजलदोबा बैराज का निर्माण दलाई बैराज से ऊपर, ऊपरी तटीय इलाके में किया है, जिसके चलते शुष्क मौसम में जल का प्रवाह काफी कम हो जाता है। यही नहीं, मानसून के मौसम में जल प्रवाह तेज हो जाने से नीचले क्षेत्रों में बाढ़ और तट कटाव की स्थिती पैदा हो जाती है। सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता, खासतौर पर शुष्क मौसम में, दोनों देशों के बीच लंबे समय से तनाव का कारण बनी हुई है। बांग्लादेश नदी का 20 प्रतिशत खुद के इस्तेमाल के लिए चाहता है और बाकी के जल को दोनों देशों के बीच गोजलदोबा बैराज से साझा करने के लिए तैयार है।

PAGE 40-43तीस्ता नदी लंबे समय से भारत और बांग्लादेश के बीच विवाद का विषय रहा है। यह 1952 से ही विवादित मुद्दा है, जब बांग्लादेश पाकिस्तान का हिस्सा था। इस विषय पर भारत और बांग्लादेश के बीच गंभीर चर्चा तब हुई जब बांग्लादेश एक स्वतंत्र देश बन गया। 1980 के दौरान दोनों देशों ने उन तरीकों का स्वागत किया जिसके द्वारा तीस्ता के जल को दोनों देशों के बीच साझा किया जा सके। 1980 के मध्य के दौरान दोनों देश एक अस्थाई समझौते पर पहुंचे, लेकिन उसके बाद कोई ठोस परिणाम नहीं प्राप्त हुए।

शेख हसीना ने 10 जनवरी 2010 को अपनी भारत यात्रा के दौरान भारत के साथ तीस्ता जल बंटवारे के मुद्दे पर मसौदा समझौते का आदान-प्रदान किया, जिसके बाद दो दिवसीय मंत्रीस्तरीय बैठक संयुक्त नदी आयोग का आयोजन किया गया। जब बांग्लादेश ने एक अंतरिम समझौते पर मसौदा प्रस्तुत किया तो भारत ने भी उस वक्त शुष्क मौसम के  दौरान नदी के पानी के  बंटवारे का मसौदा पेश किया। इस बैठक के बाद ये निर्णय निकलकर सामने आया कि एक साल के भीतर तीस्ता नदी के जल बंटवारे को लेकर एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। ये बांग्लादेश के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में कृषि उत्पादन के लिए समर्थन प्रदान करेगा। दोनों देशों के बीच जल की मात्रा के बंटवारे को लेकर एक सवाल अनुत्तरित रह गया है।

मार्च 2010 के 37वें संयुक्त नदी आयोग (जेआरसी) की बैठक के दौरान बांग्लादेश ने अंतरिम समझौते का प्रस्ताव रखा, जबकि भारत तीस्ता के जल बंटवारे पर सिद्धातों के बयान की पेशकश की। वार्ता के अंत में, पहली बार दोनों तरफ से तीस्ता नदी के जल बंटवारे पर मसौदे का आदान-प्रदान किया गया।

भारत में जल राज्य का विषय है। भारत और बांग्लादेश की तीस्ता जल बंटवारे की वार्ता के दौरान दोनों राज्य पश्चिम बंगाल और सिक्कम भी शामिल थे। संभवतया इस मसौदे पर ममता बनर्जी द्वारा हस्ताक्षर किया गया होगा तो वो अब इस बात से पीछे नहीं हट सकतीं, लेकिन फिर भी ममता ने 2012 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ बांग्लादेश का दौरा करने से इंकार कर दिया था। उन्होंने दावा किया था कि इस मुद्दे पर उनकी राय नहीं मांगी गई थी, जबकि तीस्ता उनके राज्य से होकर बहती है। भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी संधि एक मिसाल है और वर्तमान में दोनों दोशों की सरकारों के बीच व्यवहारिकता के चलते तीस्ता जल बंटवारे समझौते पर हस्ताक्षर किया गया। इस बर्ताव की वजह से दोनों देशों के बीच गंगा संधि भी संभव हुई। इस वक्त ममता बनर्जी ने सह-संचालिता प्रदान की। इससे दोनों देशों को लाभ ही प्राप्त नहीं होगा, बल्कि भारत और बांग्लादेश भूमि हस्तांरतरण, सीमा विवाद, समुद्री सीमा निपटान और पारगमन अधिकार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को हल करने में सक्षम हो जाऐंगे।

नरेन्द्र मोदी जैसे करिश्माई प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार और बांग्लादेश की उदार प्रधानमंत्री शेख हसीना मिलकर इस मुद्दे का समाधान निकाल सकते हैं। मोदी ने कहा था, ”बंगबंधु ने बांग्लादेश को स्थापित बनाया और उनकी बेटी शेख हसीना इसे बचाया।’’

मधुमंती सेन गुप्ता

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