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जे.बी. पटनायक एक बहुमुखी प्रतिभा

जे.बी. पटनायक एक बहुमुखी प्रतिभा

एक लेखक, विचारक और स्टेट्समैन के रूप में जानकीबल्लभ पटनायक (जे.बी. पटनायक) का देहावसान से न सिर्फ ओडिशा, बल्कि पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। तीन बार ओडिशा के मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, राज्यपाल, त्रिपुरा संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में उन्होंने समाज की न सिर्फ सेवा की, बल्कि इस्टर्न टाईम्स और प्रजातंत्र के संपादक के रूप में और ‘पौरूष’ के संस्थापक के रूप में उन्होंने तीन दशकों तक समाज का मार्गदर्शन भी किया। चाहे वे सत्ता में रहे हों या बिना सत्ता के, उनकी प्रासंगिकता हमेशा बनी रहती थी। पटनायक वास्तव में बहुमुखी प्रतिभा के धनी और अप्रतिम व्यक्तित्व के मालिक थे। जीवन के बदलते समय में वे बाधाओं और प्रतिकूल परिस्थितियों से कभी हारे नहीं और न ही गुमनामी के अंधेरे में कभी खोए। वे अपनी अंतिम सांस तक सक्रिय रहे। सही अर्थों में वे असली योद्धा थे।

जे.बी. पटनायक ने एक मामूली और विनम्र शुरूआत की थी। खुरदा जिले के रामेश्वर गांव में 1927 में पैदा हुए पटनायक अपने विद्यार्थी जीवन से ही लेखन और राजनीति में समाए रहे। उच्च शिक्षा के बाद उन्होंने एक अंग्रेजी दैनिक ‘द इस्टर्न टाईम्स’ में सब-एडिटर की नौकरी शुरू की और अपनी पत्रकारिता की समझ और कुशाग्र बुद्धि से संपादक के पद तक पहुंचे। उनके कंधे पर 25 साल की युवा अवस्था में ही उडिय़ा दैनिक प्रजातंत्र के संपादन का भार आ गया था। अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा के कारण उन्हें अपने गुरू डॉ. हरेकृष्ण महताब का संरक्षण खोना पड़ा, जिसके कारण उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। उन्होंने पौरूष नाम से एक मासिक पत्रिका की शुरूआत की। उन्होंने अपनी पत्रिका का पंचलाईन रखा ‘दैव्यातन कुले जन्मा, मदयातम् च पौरूषम्’, जिसका अर्थ है ‘उच्च परिवार में जन्म लेना ईश्वर के हाथ में है, लेकिन कार्य करना और सफलता प्राप्त करना व्यक्ति के हाथ में है’।

जेबी ने संस्कृत के श्लोकों को अपने जीवन में भी उतारा। बिना किसी राजनीतिक गॉडफादर के संरक्षण के वे इंदिरा गांधी के शासन में तीन बार केन्द्रीय मंत्री बने-पहली बार उपमंत्री, दूसरी बार राज्यमंत्री और तीसरी बार कैबिनेट मंत्री। वह 1980 से लेकर 1989 तक ओडिशा के लगातार दो बार मुख्यमंत्री बने और तीसरी बार 1995 से 1999 तक ओडिशा के मुख्यमंत्री रहे। वे चार बार ओडिशा के कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष रहे। 2004 से 2009 तक वह ओडिशा विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे। पटनायक ओडिशा विधानसभा के लिए पांच बार और लोकसभा के लिए दो बार चुने गए। 2009 से लेकर 2014 तक वे असम के राज्यपाल रहे। अपने जीवन के अंतिम दिनों तक वे त्रिपुरा संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति रहे।

कहा जाता है कि कुछ व्यक्ति नाम, पद और शक्ति के लिए लालायित रहते हैं, लेकिन कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके पीछे प्रसिद्धि, पद और शक्ति भागती है। जेबी पटनायक इसी तरह के व्यक्ति थे। हम उनकी भूमिका और योगदान को विधानसभा, लोकसभा और राजभवन की चारदीवारियों तक सीमित नहीं कर सकते, बल्कि साहित्य, संस्कृति और भाषा में भी उनकी सशक्त उपस्थिति रही। उन्हें पत्रकारिता में योगदान, साहित्यिक योगदान और संस्कृत का प्रसार करने वाले व्यक्ति के रूप में याद किया जाएगा।

जेबी अपने अंत:करण से कांग्रेसी थे। यद्यपि वे कांग्रेस की राजनीतिक विचारधारा के प्रति वफादार थे, लेकिन राष्ट्रवाद, सभ्यता, संस्कृति, प्राचीन इतिहास और विरासत पर उनका नजरिया उनकी पार्टी से अलग था। उनकी अवधारणा संघ और भाजपा के ज्यादा करीब थी, लेकिन उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने की कभी कोशिश नहीं की। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रशंसक भी थे, खासकर बाबुराव पलधीकर के, जिन्हें ओडिशा में संघ का संस्थापक माना जाता है। जेबी को संघ के नजदीक लाने में दो व्यक्तियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पहले व्यक्ति थे, स्व. देबेन्द्रनाथ मोहंती, जो राष्ट्रदीप के संपादक रह चुके थे और कभी जेबी के अधीन काम कर चुके थे। दूसरे व्यक्ति हैं संघ के वरिष्ठ प्रचारक आर.वी. रामाराव, जिन्होंने गुनपुर में बाढ़ प्रभावित लोगों के प्रकोप से जेबी को बचाया था। संघ के साथ अपनी नजदीकी की वजह से जेबी को राजनीतिक प्रताडऩा भी झेलनी पड़ी। मुख्यमंत्री रहने के दौरान असंतुष्टों का उनके खिलाफ सबसे बड़ा आरोप संघ के साथ उनकी नजदीकी का था। लेकिन, उन्होंने इसकी कभी परवाह नहीं की। रामजन्मभूमि, रामसेतु, संस्कृत का प्रसार, गौ-सुरक्षा पर उनका नजरिया कांग्रेस के नजरिये के बिल्कुल खिलाफ था, और वे खुलकर इसके पक्ष में बोलते रहे। इसके कारण पार्टी हाईकमान के क्रोध का शिकार भी बनना पड़ा। ऑर्गनाईजर के तत्कालिन सब-एडीटर (वर्तमान में उदय इंडिया के संपादक) दीपक कुमार रथ के आग्रह पर उन्होंने ‘आइडियोलॉजीज इन पोलिटिक्स’ (राजनीति में विचारधाराएं) शीर्षक से ऑर्गनाईजर में एक शानदार लेख लिखा था। उनके राजनीतिक आकाओं को छोड़कर उनके आलेख की हर किसी ने तारीफ की। इसके बाद ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की ओर से उन्हें नोटिस दिया गया कि बताएं भाजपा-संघ की पत्रिका में उन्होंने लेख क्यों लिखा। लेकिन जेबी ने इसकी परवाह नहीं की। जब संघ नेता बाबुराव पालधीकर ने अंतिम सांसे ली तब जेबी अकेले कांग्रेसी थे, जिन्होंने कटक के संघ कार्यालय में जाकर अपनी श्रद्धांजली दी। जेबी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा किए गए कार्य अमर रहेंगे।

शिव नारायण सिंह

(लेखक ‘राष्ट्रदीप’ के संपादक है)

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