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नए भारत का शिलान्यास 

नए भारत का शिलान्यास 

जब अस्सी के दशक में संघ परिवार ने राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का आरंभ किया तो उस समय करोड़ों राम भक्तों के मुख मे कई नारों मे से एक नारा था: सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीँ बनाएँगे। 5 अगस्त को प्रभु राम के भव्य मंदिर के शिलान्यास होने के साथ ही यह सच्चाई मे बदल गया। राम मंदिर के शिलान्यास के लिए आयोजित समारोह भव्य था और प्रधानमंत्री मोदी का भाषण विशेष था। इससे पहले किसी भी नेता ने राम पर कभी इस प्रकार का भाषण नहीं दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने देश की कई भाषाओं मे लिखी गई रामायण का नाम गिनाया और उन्होंने यह भी बताया की भगवान राम केवल भारत ही नहीं, बल्कि इंडोनेशिया, कम्बोडिया, थाईलैंड, मलेशिया और अन्य देशों में भी एक आदर्श के रूप में माने जाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने जिस प्रकार से भाषण दिया, वह केवल एक ज्ञानी वक़्ता के लिए ही सम्भव हैं। राम के बारे में बताते हुए, उन्होंने भारतीय तथा अन्य भाषाओं में राम के बारे में में जो लिखा गया है उसका सटीक वर्णन किया। ध्यान देने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उन्होंने एक भी शब्द ऐसा नहीं बोला, जिससे सांप्रदायिक सद्भाव को ठेस पहुंचे। उस दिन मोदी का भाषण एक भक्त और एक राजनेता का मेल था। उन्होंने विजयी होने की बात कभी नहीं की, लेकिन अपने भाषण में पूरी तरह से समावेश की बात की। सरसंघचालक मोहन भागवत के भाषण में भी यह सार उभर कर आया। वास्तव में अयोध्या भारतीयों द्वारा साम्राज्यवादी सरोगेट्स: इस्लामिक कट्टरपंथियों और धर्मनिरपेक्षवादियों की पकड़ से उनके वास्तविक इतिहास को पुन: प्राप्त करने के लिए एक संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है। ये  साम्राज्यवादी सरोगेट्स दोषपूर्ण शाही आंदोलनों के अवशेष हैं। वे अब अपने अतीत के साम्राज्यवाद के प्रतिनिधियों के रूप में अपने विशेषाधिकारों और पदों को संरक्षित करने की कोशिश नकारात्मकता के द्वारा कर रहें हैं, क्योंकि नकारात्मकता उनकी मुख्य रणनीति रही है। लेकिन अयोध्या में शिलान्यास ने उनकी नकारात्मकता की पोल खोल दी है।

इस परिप्रेक्ष्य में यहाँ यह चर्चा करना आवश्यक हैं कि कुछ लोग यहाँ धर्मनिरपेक्षता का अलाप लगा रहे हैं। ये वो लोग हैं जो अपने आप को बुद्धिजीवी और उदारवादी मानते हैं। यहाँ यह कहना आवश्यक हैं कि इस सोच ने देश के बहुसंख्यक समाज को दोयम दर्जे का समाज बना दिया हैं। वो जो नरेंद्र मोदी के शिलान्यास मे जाने पर प्रश्न खड़ा कर रहे हैं, उन्हें यह जान लेना चाहिए कि संविधान ख़ुद रामराज्य की बात करता हैं। ये लोग कहते हैं की सरकार और धर्म को अलग-अलग होना चाहिए। उस समय धर्म और सरकार अलग-अलग क्यों नहीं होता था, जब देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति इफ़्तार पार्टी का आयोजन करते थे? क्या ऐसा तब था जब पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी सिर्फ अपनी आस्तीन पर नहीं बल्कि सिर पर धर्म को धारण किए हुए थे? धर्मनिरपेक्षता का मंतलब यह नहीं होता हैं कि कोई नेता या प्रधानमंत्री अपने धर्म का पालन ना करे। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने भी इफ़्तार पार्टी का आयोजन किया और ऐसे ही कई प्रधानमंत्रियों ने किया। उस समय धर्मनिरपेक्षता ख़तरे मे नहीं आयीं। यदि धर्मनिरपेक्षता केवल हिंदूओ को निशना बनाने के लिए हैं, तो यह स्वीकार्य नहीं हैं। राम भारत की संस्कृति और राष्ट्र के प्रतीक हैं। यह बात पुरा विश्व जानता हैं। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने भूमिपूजन मे जाकर कोई ग़लती नहीं कीं। राम मंदिर की स्थापना 1947 के बाद ही हो जानी चाहिए थीं। कोर्ट ने भी मंदिर बनाने की अनुमति पुरातत्व विभाग के द्वारा पेश किए गए सबूतों के आधार पर दी। पुरातत्व विभाग ने अपनी रिपोर्ट में कहा की कि मस्जिद की अपनी कोई नींव नहीं थी और यह एक सतही संरचना थी जो उन स्तंभों पर बनाई गई थी, जो चरित्र में गैर-इस्लामी थे। इस सन्दर्भ में संघ परिवार तथा भाजपा दोनो यही मानना रहा हैं कि जिस प्रकार से सरदार पटेल ने सोमनाथ का निर्माण कराया, उसी प्रकार से राम मंदिर का निर्माण भी देश में भाईचारे को बनाने में सहायता करेगा। यहाँ यह नहीं भुला जा सकता कि कैसे कांग्रेस और अन्य दलों ने बाबरी ढांचे को धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक बनाकर कानूनी और राजनीतिक रूप से राम मंदिर का विरोध किया था। लेकिन इस शिलान्यास ने इन सभी को शांत कर दिया है।

 

दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

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