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अक्षय तृतीया पुण्य तथा वैभव का अक्षय पात्र

अक्षय तृतीया पुण्य तथा वैभव का अक्षय पात्र

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि इस नश्वर संसार में ऐसी कोई तिथि है जिसका महात्म्य इतने सारे स्वरूपों में श्रद्धेय तथा पूज्यनीय हो – महर्षि वेदव्यास का श्रीगणेशजी के साथ महाभारत के लेखन का शुभारम्भ, सतयुग का प्रथम दिन, भागीरथी नदी का धरती पर अवतरण, विप्र सुदामा का अपने मित्र भगवान कृष्ण के राजप्रासाद में आगमन, पांडवों के द्वारा गिरिधर गोपाल के द्वारा अक्षय पात्र का भेंट दिया जाना, भगवान विष्णु के छठे अवतारस्वरुप श्रीपरशुराम का जन्म, सृष्टि के सृजक ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का जन्म और ना जाने कितने ही पराक्रमों से भरा हुआ हो? सम्पूर्ण वेद तथा पुराण में इतने महामंडित तथा अनंत मंगलदायी तिथि को अक्षय तृतीया के नाम से जानते हैं। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला व्रत अक्षय तृतीया सर्वसिद्ध, पुण्यदायी तथा मंगलकारी व्रत के रूप में अक्षय महिमा वाला माना जाता है। इस तिथि की हिन्दू कैलेंडर में सबसे पवित्र दिन के रूप में गणना की जाती है। यही कारण है कि इस अवसर पर मानव जीवन के सभी पुण्य तथा शुभ कार्य करने की परम्परा रही है। कहते हैं कि वेदों में यह एक मात्र ऐसी तिथि है, जिसका महात्म्य वर्णनातीत तथा सर्वशुभदायी है। ‘आखा तीज’ के नाम से भी प्रसिद्द इस व्रत के बारे में यह मान्यता है कि इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उसका अक्षय तथा पुण्य प्राप्त होता है, जो कि जन्म-जन्मान्तर तक शाश्वत बना रहता है। वैसे तो वर्ष के सभी बारह महीनों के शुक्ल पक्ष की तृतीया की तिथि सिद्धिदायक तथा मंगलदायी होती है, लेकिन वैशाख के शुक्ल पक्ष की तृतीया की सिद्धि सबसे अधिक महिमामयी तथा अनश्वर होती है।

भविष्य पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि इस अक्षय तृतीया के दिन सतयुग का प्रारभ हुआ था और यह कारण है कि इस तिथि को युगादि तिथि भी कहा जाता है। यह दिवस परशुरामजी  के अवतरण की तिथि भी मानी जाती है। वेदों के मुताबिक इस दिन सृष्टि के सृजक ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का भी आविर्भाव हुआ था और तभी से इस शुभदायी तिथि को अक्षय तृतीया कहते हैं। इसी तिथि को अठारह दिन तक चलने वाला महाभारत का युद्ध भी खत्म हुआ था। शुभ तथा मांगलिक कार्यों तथा अनंत महात्म्य के इस शुभ दिन के बारे में कहा जाता है कि बिना पंचांग देखे इस दिन किसी भी शुभ तथा मंगलदायी कार्य को सम्पन्न किया जा सकता है और उन वरदायी कार्यों से प्राप्त होने वाला पुण्य अक्षय होता है, शाश्वत होता है और अनश्वर होता है। ऐसी भी मान्यता है कि इस दिन अपने पितरों को किया गया तर्पण तथा पिंडदान या किसी अन्य प्रकार का दान भी अक्षय फल देने वाला होता है। अक्षय तृतीया के दिन किया गया जप, तप, दान एवं यज्ञ भी अक्षय वरदान देने वाला होता है, जिसका महात्म्य कभी भी नष्ट नहीं होता है। इस दिन छात्रों के द्वारा किया गया स्वाध्याय भी कभी नष्ट नहीं होता है और सदा के लिए वरदायिनी माना जाता है। इस दिन यदि कोई व्यक्ति अपने अपराधों को मन से स्वीकार कर खुद को प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है तो उसके जन्म-जन्मान्तर के पापों का दोष मिट जाता है और व्यक्ति फिर से सदगुणी और धर्मानुयायी हो जाता है।

स्कन्द पुराण तथा भविष्य पुराण की बातें माने तो इस बात का उल्लेख मिलता है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रेणुका के गर्भ से साक्षात भगवान विष्णु ने श्रीपरशुराम के रूप में जन्म लिए और तभी से इस शुभ दिन को भगवान श्रीपरशुराम की भी पूजा की जाती है और यह दिवस परशुराम जयंती के नाम से भी जाना जाता है। सौभाग्यवती तथा कुंवारी कन्या इस दिन गौरी – पूजा करती हैं तथा प्रसाद के स्वरुप मिठाई, फल तथा भींगे हुए चने बांटती हैं। विवाहित स्त्रियों पुण्य भाग्य के स्वरुप सुहाग की लम्बी उम्र तथा कुंवारी कन्या को सौभाग्यशाली वर प्राप्त होता है। और सबसे बड़ी बात यह है कि इस दान- धर्म तथा पूजा का पुण्य-प्रताप इस लोक से परलोक तक नष्ट नहीं होता है।

अक्षय तृतीया के दिन पारंपरिक उल्लास तथा धार्मिक आस्था के साथ धन-धान्य तथा समृद्धि की देवी श्रीलक्ष्मीजी की तथा सिद्धिविनायक श्रीगणेशजी की पूजा की जाती है। इस दिन भगवान विष्णु की भी विधि – विधान से पूजा की जाती है। इस अवसर पर तुलसी के पूजन की भी परम्परा रही है। नैवेद्य में जौ या गेहूं का सत्तू, ककड़ी और चने के दाल का अर्पण किया जाता है। ब्राह्मणों को दान दिए जाने की भी परम्परा रही है। इस अवसर पर बच्चों के द्वारा गुड्डे-गुड्डियों के विवाह रचाए जाते हैं क्योंकि इसी दिन से फिर मांगलिक वैवाहिक कार्य शुरू हो जाते हैं।

अक्षय तृतीया का महात्म्य इस इस सर्वविदित सत्य तथा दर्शन को ईश्वर के भक्तों में आत्मसात कराता है कि अच्छे कर्म, सदाचरण तथा भक्ति-भाव से ओत-प्रोत जीवन को ईश्वर के द्वारा पुण्य, सुख, समृद्धि तथा वैभव केवल इसी जन्म में ही नहीं बल्कि जन्म-जन्मान्तर तक प्राप्त होते रहता है। मानवीय कष्टों तथा पुनर्जन्म के चक्कर से मुक्ति तथा मोक्ष का मार्ग अक्षय तृतीया इस लौकिक संसार में अलौकिक सुख तथा परमानन्द की प्राप्ति का द्वार है।

 श्रीप्रकाश शर्मा

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