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शाश्वत प्रेम

शाश्वत प्रेम

प्रेम एक मधुर अनुभूति है। यह एक हृदय में सृजित होता है तो उसकी तरंग जाकर दूसरे हृदय को स्पर्श कर बगैर किसी माध्यम के एक-दूसरे को बांधे रखता है। जहां सच्चे और गंभीर प्रेम की बात हो वहां ऐसा बंधन हमें बांध लेता है, जो चाहकर भी टूट नहीं सकता। अगर एक बार प्रेम का मधुर स्रोत मन में प्रवाहित होता है तो जीवन को अमृतमय कर देता है। हर कड़वी चीज भी अच्छी लगने लगती है। जब हृदय प्रेममय हो जाता है तो हर वस्तु, वृक्ष, लता, नदी, पशु, पक्षी, पर्वत, जड़ सभी से प्रेम हो जाता है। सभी के प्रति मन में मधुर भाव प्रकट हो जाता है। उसका हृदय छोटे शिशु की तरह कोमल हो जाता है। जब हृदय निर्मल और कोमल हो, तब वहां स्वयं परमात्मा वास करने लगते हैं।

प्रेम की परिभाषा को समझना इतना आसान नहीं है। कई बार हम जिसे प्रेम मानते हैं या प्रेम का अर्थ देते हैं, वह वाकई में कुछ और होता है। एक हृदय में दूसरे के लिए बनने वाली चाहत होती है, जिसे हम कभी-कभी प्रेम मान लेते हैं। चाहत केवल स्वार्थी होती है। कभी-कभी ये चाहत इतनी बढ़ जाती है कि इंसान खुद को नियंत्रण में नहीं रख पाता है। कामना में अंधा होकर भयंकर रूप धारण कर लेता है। इस तरह के आचरण को प्रेम मानना वास्तविकता में हमारी मूर्खता ही होगी। एक सच्चा प्रेमी जब दुनिया में किसी से शाश्वत प्रेम करने बैठता है तो सारी दुनिया में भगवत सत्ता उपलब्ध कराता है। प्रेम के एहसास को एक मधुर रस मानकर उसका स्वाद लेता रहता है। उसका मन इतना निर्मल हो जाता है कि स्वयं ईश्वर भी उससे प्रेम करने लगता है ।

हिंदू धर्म के हर देवी-देवता अलग-अलग भाव के प्रतीक हैं। श्रीरामचन्द्र को आदर्श और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक मानते हैं, तो भगवान श्रीकृष्ण और राधा को प्रगाढ़ प्रेम का प्रतीक मानते हैं। राधा-कृष्ण का प्रेम कितना निर्मल तथा कामनारहित है, वह हम देख सकते हैं। भागवत पाठ करने से यह जान सकते हैं कि केवल राधा ही नहीं, कृष्ण प्रेम में कैसे सारा गोकुल झुमता था। कृष्ण लीला दिखाकर एक साथ सारी गोपियों के साथ अलग-अलग विद्यमान हो जाते थे। ऐसा मानना है भगवान को पाने के लिए सबको अपना बनाना पड़ता है। वही प्रेम भाव रहे तो ईश्वर जरूर हमारे साथ रहेंगे।

एक सच्चे प्रेम की तीन पहचान होती है। प्रथम रूप में प्रेम में कोई भी अदला-बदली नहीं होती। एक सच्चे प्रेम के बदले प्रेम की भी अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। उसके मन में केवल एक ही बात होनी चाहिए, खुलकर प्रेम करना। दूसरा पहचान प्रेम की ये है कि प्रेम करने वाला इंसान भयासन्न हो जाता है। रास्ते में जाते हुए एक औरत एक कुत्ते से डरकर घर में घुस जाती है, लेकिन रास्ते में उसका बच्चा रह जाता है। जब उसे ध्यान आता है तो वह अपने बच्चे के लिए भयासन्न होकर बाहर आ जाती है। बच्चे के प्रति मां का अविरल प्रेम उसको भयासन्न कर देता है। तीसरी पहचान प्रेम की है, प्रेम में कोई किसी का प्रतिद्वंदी नहीं होता। सच्चा प्रेम करने वाला इंसान अपने प्रेम को ही सर्वोत्तम मानता है। उसे किसी की कोई परवाह नहीं होती है।

जहां प्रेम हो वहां द्वंद नहीं हो सकता। वहां केवल परमेश्वर ही बसते हैं। निरंतर परमात्मा को स्मरण करना, उनके प्रति सहृदय आग्रह रखना उनके लिए प्रेम है। सच्चा पे्रमी, जो उनसे कोई भी उम्मीद न रखता हो और प्रेम करता हो, उसे शाश्वत प्रेम में लीन होना कहते हैं। ऐसे प्रेम से परमात्मा मिल सकते हैं और जीवन अमृतमय हो जाएगा।

 उपाली अपराजिता रथ

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