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प्रेम का आधार है-त्याग

प्रेम का आधार है-त्याग

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आधुनिक युग में प्रेम की परिभाषा बदल चुकी है। प्रेम में शुद्धता के बजाए वासना की बू ज्यादा आती है। जहां राधा और कृष्ण के प्रेम की व्याख्या आज भी लोगों के लिए अद्भुत प्रेम का प्रतीक है, वहीं कलियुग का प्रेम वासना और प्राप्ति का साधन मात्र बनकर रह गया है। ऐसे में लेखक प्रमोद कुमार अग्रवाल ने ‘राधा की पाती कृष्ण के नाम’ शीर्षक की कहानी में राधा और कृष्ण के जीवन काल से जुड़ी भिन्न-भिन्न रस और कृष्ण के  जीवन की अनेकों घटनाओं के साथ उनकी प्रेम लीलाओं का वर्णन किया है।

13 अध्याय की इस पुस्तक के हर अध्याय में कृष्ण के जीवन की अलग-अलग घटनाओं का वर्णन किया गया है। उनके बाल्यकाल के प्रेम से लेकर उनके विवाह, कालिया नाग के दमन और गोपियों के चीर हरण से लेकर विरह वेदना तक का स्मरण करते हुए कृष्ण के जीवन के हर पहलू को बड़ी खूबसूरती के साथ इस पुस्तक में वर्णन किया है।

राधा और कृष्ण एक रूप हैं। उनके प्रेम का आधार है कर्तव्य-परायणता तथा विश्व कल्याण की भावना।

राधा और कृष्ण के पवित्रतम पे्रम संबंध को ‘राधा की पाती, कृष्ण के नाम’ के माध्यम से परिलक्षित किया गया है, जिसमें संयोग है, वियोग है तथा त्याग की पराकाष्ठा है। रस एवं महारस के माध्यम से दोनों के लौकिक प्रेम को नृत्य द्वारा प्रस्तुत किया गया है, जो सांसारिक मानव को आनंद, सुख तथा शांति प्रदान करेगा। आधुनिक काल में कामना और प्रेम की एकरूपता के विरूद्ध यह एक धर्मयुद्ध है। लेखक को आशा है कि आधुनिक पीढ़ी इस कृति से प्रेरणा ग्रहण कर प्रेम के वास्तविक रूप को समझेगी और उसे ग्रहण करेगी। उसे आनंद एवं सुख की अनुभूति होगी।

राधा और कृष्ण, दोनों एकरूप हैं। दोनों ने मृत्युलोक में रहते हुए मानव जैसा आचरण किया, लेकिन फिर भी उनके कार्य अद्वितीय थे। इसलिए उन्हें ईश्वर माना गया। मनुष्य रूप में कृष्ण ने मूलत: प्रेम को पांच रूपों में व्यक्त किया – परम शिशु के रूप में, प्रियतम के रूप में, परम अज्ञात के रूप में, परम स्वामी के रूप में और परम मित्र के रूप में। जब दो शरीर तथा आत्मा में एकता की अनुभूति होती है, तभी प्रेम उत्पन्न होता है और ऐसी स्थिति में पुरूष-स्त्री भेद का ज्ञान ही नहीं रहता। पति-पत्नी के लौकिक संबंध का नाम प्रेम नहीं है, काम तथा कर्तव्य-परायणता है, जिसका आधार है – भोग, कर्म और इंद्रिय तृप्ति। जबकि, प्रेम का आधार है – त्याग। इस तथ्य को इस पुस्तक में विस्तार से समझाया गया है।

लेखक डॉ. अग्रवाल वैश्विक साहित्य पत्रिका के संपादक तथा वैश ग्लोबल विधि पत्रिका के संपादक तथा वैश ग्लोबल विधि प्रतिष्ठान के प्रबंध साझीदार हैं। भारतीय प्रशासनिक सेवा से अवकाश ग्रहण करने के पश्चात साहित्य-रचना के माध्यम से समाज के उत्थान में समर्पित हैं। हिंदी और अंग्रेजी में प्राय: पचास पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें तीन खंडों में प्रकाशित एक दर्जन उपन्यास भी सम्मिलित हैं। तुलसीकृत ‘रामचरितमानस’ को यथार्थ एवं नाट्य रूप में प्रस्तुत करने वाली कृति ‘रामचरितमानस नाट्य रूप’ तथा राम के ‘मानस’ में उद्घोष ‘मैं राम बोल रहा हूं’ इनकी कृतियां भारतीय संस्कृति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं।

पूज्य श्री जगन्नाथजी के पुरी-मंदिर के द्वार पर लिखे श्री राधा और श्री कृष्ण के प्रेमोद्गारों ने लेखक को  ‘राधा की पाती, कृष्ण के नाम’ कृति प्रणयन करने की प्रेरणा दी, जिसकी वजह से लेखक ने ये पुस्तक पूज्य श्री जगन्नाथजी को समर्पित की है।

 प्रीति ठाकुरкарандашлобановский александр

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