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हमारी टैक्स प्रणाली ‘पेनलेस’ और ‘फेसलेस’ हो 

हमारी टैक्स प्रणाली ‘पेनलेस’ और ‘फेसलेस’ हो 

देश का ईमानदार टैक्सपेयर राष्ट्रनिर्माण में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है, जब देश के ईमानदार टैक्सपेयर का जीवन आसान बनता है, वो आगे बढ़ता है, तो देश का भी विकास होता है, देश भी आगे बढ़ता है।

बीते 6 वर्षों में हमारा फोकस रहा है, क्चड्डठ्ठद्मद्बठ्ठद्द ह्लद्धद्ग ठ्ठड्ढड्डठ्ठद्मद्गस्र स्द्गष्ह्वह्म्द्बठ्ठद्द ह्लद्धद्ग ठ्ठह्यद्गष्ह्वह्म्द्गस्र और, स्नह्वठ्ठस्रद्बठ्ठद्द ह्लद्धद्ग ठ्ठद्घह्वठ्ठस्रद्गस्र. आज एक तरह से एक नई यात्रा शुरू हो रही है। ॥शठ्ठशह्म्द्बठ्ठद्द ह्लद्धद्ग ॥शठ्ठद्गह्यह्ल- ईमानदार का सम्मान। देश का ईमानदार टैक्सपेयर राष्ट्रनिर्माण में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। जब देश के ईमानदार टैक्सपेयर का जीवन आसान बनता है, वो आगे बढ़ता है, तो देश का भी विकास होता है, देश भी आगे बढ़ता है।

आज हर नियम-कानून को, हर पॉलिसी को क्कह्म्शष्द्गह्यह्य और क्कश2द्गह्म् ष्टद्गठ्ठह्लह्म्द्बष् अप्रोच से बाहर निकालकर उसको क्कद्गशश्चद्यद्ग ष्टद्गठ्ठह्लह्म्द्बष् और क्कह्वड्ढद्यद्बष् स्नह्म्द्बद्गठ्ठस्रद्य4 बनाने पर बल दिया जा रहा है। ये नए भारत के नए गवर्नेंस मॉडल का प्रयोग है और इसके सुखद परिणाम भी देश को मिल रहे हैं। आज हर किसी को ये एहसास हुआ है कि शॉर्ट-कट्स ठीक नहीं है, गलत तौर-तरीके अपनाना सही नहीं है।वो दौर अब पीछे चला गया है। अब देश में माहौल बनता जा रहा है कि कर्तव्य भाव को सर्वोपरि रखते हुए ही सारे काम करें।

सवाल ये कि बदलाव आखिर कैसे आ रहा है? क्या ये सिर्फ सख्ती से आया है? क्या ये सिर्फ सज़ा देने से आया है? नहीं, बिल्कुल नहीं। इसके चार बड़े कारण हैं। पहला, पॉलिसी ड्रिवेन गवर्नेंस। जब पॉलिसी स्पष्ट होती है तो त्रह्म्द्ग4 ्रह्म्द्गड्डह्य रूद्बठ्ठद्बद्वह्वद्व हो जाते हैं और इस कारण व्यापार में, बिजनेस में डिस्क्रीशन की गुंजाशन कम हो जाती है। दूसरा- सामान्य जन की ईमानदारी पर विश्वास। तीसरा, सरकारी सिस्टम में ह्यूमेन इंटरफेस को सीमित करके टेक्नॉलॉजी का बड़े स्तर पर उपयोग। आज सरकारी खरीद हो, सरकारी टेंडर हो या सरकारी सेवाओं की डिलिवरी, सब जगह ञ्जद्गष्द्धठ्ठशद्यशद्दद्बष्ड्डद्य ढ्ढठ्ठह्लद्गह्म्द्घड्डष्द्ग सर्विस दे रहे हैं। और चौथा, हमारी जो सरकारी मशीनरी है, जो ब्यूरोक्रेसी है, उसमें द्गद्घद्घद्बष्द्बद्गठ्ठष्4, ढ्ढठ्ठह्लद्गद्दह्म्द्बह्ल4 और स्द्गठ्ठह्यद्बह्लद्ब1द्बह्ल4 के गुणों को क्रद्ग2ड्डह्म्स्र किया जा रहा है, पुरस्कृत किया जा रहा है।

एक दौर था जब हमारे यहां क्रद्गद्घशह्म्द्वह्य की बहुत बातें होती थीं। कभी मजबूरी में कुछ फैसले ले लिए जाते थे, कभी दबाव में कुछ फैसले हो जाते थे, तो उन्हें क्रद्गद्घशह्म्द्व कह दिया जाता था। इस कारण इच्छित परिणाम नहीं मिलते थे। अब ये सोच और अप्रोच, दोनों बदल गई है।

हमारे लिए क्रद्गद्घशह्म्द्व का मतलब है, क्रद्गद्घशह्म्द्व नीति आधारित हो, टुकड़ों में नहीं हो, ॥शद्यद्बह्यह्लद्बष् हो और एक क्रद्गद्घशह्म्द्व, दूसरे क्रद्गद्घशह्म्द्व का आधार बने, नए क्रद्गद्घशह्म्द्व का मार्ग बनाए। और ऐसा भी नहीं है कि एक बार क्रद्गद्घशह्म्द्व करके रुक गए। ये निरंतर, सतत चलने वाली प्रक्रिया है। बीते कुछ वर्षो में देश में डेढ़ हजार ज्यादा कानूनों को समाप्त किया गया है।

श्वड्डह्यद्ग शद्घ ष्ठशद्बठ्ठद्द क्चह्वह्यद्बठ्ठद्गह्यह्य की रैंकिंग में भारत आज से कुछ साल पहले 134वें नंबर पर था। आज भारत की रैंकिंग 63 है। रैंकिंग में इतने बड़े बदलाव के पीछे अनेकों क्रद्गद्घशह्म्द्वह्य हैं, अनेकों नियमों-कानूनों में बड़े परिवर्तन हैं। क्रद्गद्घशह्म्द्वह्य के प्रति भारत की इसी प्रतिबद्धता को देखकर, विदेशी निवेशकों का विश्वास भी भारत पर लगातार बढ़ रहा है। कोरोना के इस संकट के समय भी भारत में रिकॉर्ड स्नष्ठढ्ढ का आना, इसी का उदाहरण है।

भारत के टैक्स सिस्टम में स्नह्वठ्ठस्रड्डद्वद्गठ्ठह्लड्डद्य और स्ह्लह्म्ह्वष्ह्लह्वह्म्ड्डद्य क्रद्गद्घशह्म्द्वह्य की ज़रूरत इसलिए थी क्योंकि हमारा आज का ये सिस्टम गुलामी के कालखंड में बना और फिर धीरे धीरे श्व1शद्य1द्ग हुआ। आज़ादी के बाद इसमें यहां वहां थोड़े बहुत परिवर्तन किए गए, लेकिन रुड्डह्म्द्दद्गद्य4 सिस्टम का ष्टद्धड्डह्म्ड्डष्ह्लद्गह्म् वही रहा।

परिणाम ये हुआ कि जो टैक्सपेयर राष्ट्र निर्माण का एक मज़बूत पिलर है, जो देश को गरीबी से बाहर निकालने के लिए योगदान दे रहा है, उसको कठघरे में खड़ा किया जाने लगा। इन्कम टैक्स का नोटिस फरमान की तरह बन गया। देश के साथ छल करने वाले कुछ मु_ीभर लोगों की पहचान के लिए बहुत से लोगों को अनावश्यक परेशानी से गुजऱना पड़ा। कहां तो टैक्स देने वालों की संख्या में गर्व के साथ विस्तार होना चाहिए था और कहां गठजोड़ की, सांठगांठ की व्यवस्था बन गई।

इस विसंगति के बीच ब्लैक और व्हाइट का उद्योग भी फलता-फूलता गया। इस व्यवस्था ने ईमानदारी से व्यापार-कारोबार करने वालों को, रोजग़ार देने वालों को और देश की युवा शक्ति की आकांक्षाओं को प्रोत्साहित करने के बजाय कुचलने का काम किया।

जहां ष्टशद्वश्चद्यद्ग&द्बह्ल4 होती है, वहां ष्टशद्वश्चद्यद्बड्डठ्ठष्द्ग भी मुश्किल होता है। कम से कम कानून हो, जो कानून हो वो बहुत स्पष्ट हो तो टैक्सपेयर भी खुश रहता है और देश भी। बीते कुछ समय से यही काम किया जा रहा है। अब जैसे, दर्जनों ह्लड्ड3द्गह्य की जगह त्रस्ञ्ज आ गया। रिटर्न से लेकर रिफंड की व्यवस्था को पूरी तरह से ऑनलाइन किया गया।

जो नया स्लैब सिस्टम आया है, उससे बेवजह के कागज़ों और दस्तावेज़ों को जुटाने की मजबूरी से मुक्ति मिल गई है। यही नहीं, पहले 10 लाख रुपए से ऊपर के विवादों को लेकर सरकार हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाती थी। अब हाईकोर्ट में 1 करोड़ रुपए तक के और सुप्रीम कोर्ट में 2 करोड़ रुपए तक के केस की सीमा तय की गई है। विवाद से विश्वास जैसी योजना से कोशिश ये है कि ज्यादातर मामले कोर्ट से बाहर ही सुलझ जाएं। इसी का नतीजा है कि बहुत कम समय में ही करीब 3 लाख मामलों को सुलझाया जा चुका है।

प्रक्रियाओं की जटिलताओं के साथ-साथ देश में ञ्जड्ड3 भी कम किया गया है। 5 लाख रुपए की आय पर अब टैक्स जीरो है। बाकी स्लैब में भी टैक्स कम हुआ है। ष्टशह्म्श्चशह्म्ड्डह्लद्ग ह्लड्ड3 के मामले में हम दुनिया में सबसे कम ह्लड्ड3 लेने वाले देशों में से एक हैं।

कोशिश ये है कि हमारी टैक्स प्रणाली स्द्गड्डद्वद्यद्गह्यह्य हो, क्कड्डद्बठ्ठद्यद्गह्यह्य हो, स्नड्डष्द्गद्यद्गह्यह्य हो। स्द्गड्डद्वद्यद्गह्यह्य यानि टैक्स एडमिनिस्ट्रेशन, हर टैक्सपेयर को उलझाने के बजाय समस्या को सुलझाने के लिए काम करे। क्कड्डद्बठ्ठद्यद्गह्यह्य यानि टेक्नॉलॉजी से लेकर क्रह्वद्यद्गह्य तक सबकुछ स्द्बद्वश्चद्यद्ग हो। स्नड्डष्द्गद्यद्गह्यह्य यानि ञ्जड्ड3श्चड्ड4द्गह्म् कौन है और ञ्जड्ड3 ह्रद्घद्घद्बष्द्गह्म् कौन है, इससे मतलब होना ही नहीं चाहिए। आज से लागू होने वाले ये रिफॉर्म्स इसी सोच को आगे बढ़ाने वाले हैं।

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अभी तक होता ये है कि जिस शहर में हम रहते हैं, उसी शहर का टैक्स डिपार्टमेंट हमारी टैक्स से जुड़ी सभी बातों को हैंडल करता है। स्क्रूटनी हो, नोटिस हो, सर्वे हो या फिर ज़ब्ती हो, इसमें उसी शहर के इन्कम टैक्स डिपार्टमेंट की, आयकर अधिकारी की मुख्य भूमिका रहती है। अब ये भूमिका एक प्रकार से खत्म हो गई है, अब इसको टेक्नोलॉजी की मदद से बदल दिया गया है।

अब स्क्रूटनी के मामलों को देश के किसी भी क्षेत्र में किसी भी अधिकारी के पास रैंडम तरीके से आवंटित किया जाएगा। अब जैसे मुंबई के किसी टैक्सपेयर का क्रद्गह्लह्वह्म्ठ्ठ से जुड़ा कोई मामला सामने आता है, तो अब इसकी छानबीन का जिम्मा मुंबई के अधिकारी के पास नहीं जाएगा, बल्कि संभव है वो चेन्नई की फेसलेस टीम के पास जा सकता है। और वहां से भी जो आदेश निकलेगा उसका ह्म्द्ग1द्बद्ग2 किसी दूसरे शहर, जैसे जयपुर या बेंगलुरु की टीम करेगी। अब फेसलेस टीम कौन सी होगी, इसमें कौन-कौन होगा ये भी ह्म्ड्डठ्ठस्रशद्वद्य4 किया जाएगा। इसमें हर साल बदलाव भी होता रहेगा।

इस सिस्टम से करदाता और इन्कम टैक्स दफ्तर को जान-पहचान बनाने का, प्रभाव और दबाव का मौका ही नहीं मिलेगा। सब अपने-अपने दायित्वों के हिसाब से काम करेंगे। डिपार्टमेंट को इससे लाभ ये होगा कि अनावश्यक मुकदमेबाज़ी नहीं होगी। दूसरा ट्रांस्फर-पोस्टिंग में लगने वाली गैरज़रूरी ऊर्जा से भी अब राहत मिलेगी। इसी तरह, टैक्स से जुड़े मामलों की जांच के साथ-साथ अपील भी अब फेसलेस होगी।

टैक्सपेयर्स चार्टर भी देश की विकास यात्रा में बहुत बड़ा कदम है। भारत के इतिहास में पहली बार करदाताओं के अधिकारों और कर्तव्यों को कोडीफाई किया गया है, उनको मान्यता दी गई है। टैक्सपेयर्स को इस स्तर का सम्मान और सुरक्षा देने वाले गिने चुने देशों में अब भारत भी शामिल हो गया है।

अब टैक्सपेयर को उचित, विनम्र और तर्कसंगत व्यवहार का भरोसा दिया गया है। यानि आयकर विभाग को अब टैक्सपेयर की ष्ठद्बद्दठ्ठद्बह्ल4 का, संवेदनशीलता के साथ ध्यान रखना होगा। अब टैक्सपेयर की बात पर विश्वास करना होगा, डिपार्टमेंट उसको बिना किसी आधार के ही शक की नजऱ से नहीं देख सकता। अगर किसी प्रकार का संदेह है भी, तो टैक्सपेयर को अब अपील और समीक्षा की अधिकार दिया गया है।

अधिकार हमेशा दायित्वों के साथ आते हैं, कर्तव्यों के साथ आते हैं। इस चार्टर में भी टैक्सपेयर्स से कुछ अपेक्षाएं की गई हैं। टैक्सपेयर के लिए टैक्स देना या सरकार के लिए टैक्स लेना, ये कोई हक का अधिकार का विषय नहीं है, बल्कि ये दोनों का दायित्व है। टैक्सपेयर को टैक्स इसलिए देना है क्योंकि उसी से सिस्टम चलता है, देश की एक बड़ी आबादी के प्रति देश अपना फर्ज़ निभा सकता है।

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इसी टैक्स से खुद टैक्सपेयर को भी तरक्की के लिए, प्रगति के लिए, बेहतर सुविधाएं और इंफ्रास्ट्रचर मिल पाता है। वहीं सरकार का ये दायित्व है कि टैक्सपेयर की पाई-पाई का सदुपयोग करे। ऐसे में आज जब करदाताओं को सुविधा और सुरक्षा मिल रही है, तो देश भी हर टैक्सपेयर से अपने दायित्वों के प्रति ज्यादा जागरूक रहने की अपेक्षा करता है।

देशवासियों पर भरोसा, इस सोच का प्रभाव कैसे जमीन पर नजर आता है, ये समझना भी बहुत जरूरी है। वर्ष 2012-13 में जितने टैक्स रिटर्न्स होते थे, उसमें से 0.94 परसेंट की स्क्रूटनी होती थी। वर्ष 2018-19 में ये आंकड़ा घटकर 0.26 परसेंट पर आ गया है। यानि केस की स्क्रूटनी, करीब-करीब 4 गुना कम हुई है। स्क्रूटनी का 4 गुना कम होना, अपने आप में बता रहा है कि बदलाव कितना व्यापक है।

बीते 6 वर्षों में भारत ने ह्लड्ड3 ड्डस्रद्वद्बठ्ठद्बह्यह्लह्म्ड्डह्लद्बशठ्ठ में द्दश1द्गह्म्ठ्ठड्डठ्ठष्द्ग का एक नया मॉडल विकसित होते देखा है। इन सारे प्रयासों के बीच बीते 6-7 साल में इन्कम टैक्स रिटर्न भरने वालों की संख्या में करीब ढाई करोड़ की वृद्धि हुई है। ये वृद्धि तो बहुत बड़ी है लेकिन इस बात से हम इनकार नहीं कर सकते हैं कि इसके बावजूद भी 130 करोड़ के देश में ये बहुत कम है। इतने बड़े देश में 130 करोड़ में से डेढ़ करोड़ साथी ही इन्कम टैक्स जमा करते हैं। मैं आज देशवासियों से भी आग्रह करूंगा जो सक्षम हैं उनको भी आग्रह करूंगा, भिन्न-भिन्न करके व्यापार उद्योग के संगठन चलाते हैं, उनको भी आग्रह करूंगा। इस पर हम सबको चिंतन करने की जरूरत है, देश को आत्मचिंतन करना होगा। और ये हमारा आत्मचिंतन ही आत्मनिर्भर भारत के लिए आवश्यक है, अनिवार्य है। और ये जिम्मेदारी सिर्फ टैक्स डिपार्टमेंट की नहीं है, ये जिम्मेदारी हर हिन्दुस्तानी की है, हर भारतीय की है। जो टैक्स देने में सक्षम हैं, लेकिन अभी वो टैक्स नेट में नहीं है, वो स्वप्रेरणा से अपनी आत्मा को पूछें, आगे आएं, और अभी दो दिन के बाद 15 अगस्त है, आजादी के लिए मर-मिटने वालों को जरा याद कीजिए; आपको लगेगा हां, मुझे भी कुछ न कुछ देना ही चाहिए।

आइए, विश्वास के, अधिकारों के, दायित्वों के, इस महत्वपूर्ण भावना का सम्मान करते हुए, इस प्लेटफॉर्म का सम्मान करते हुए, नए भारत, आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को सिद्ध करें। एक बार फिर देश के वर्तमान और भावी ईमानदार टैक्सपेयर्स को बहुत-बहुत बधाई देता हूं, शुभकामनाएं देता हूं और ये पहल बहुत बड़ा फैसला किया गया है। इन्कम टैक्स के अधिकारियों को भी जितनी बधाई दें उतनी कम है। हर टैक्सपेयर को इन्कम टैक्स अधिकारियों को भी बधाई देनी चाहिए क्योंकि एक प्रकार से उन्होंने अपने-आप पर बंधन डाले हैं। अपनी खुद की ताकत को, अपने अधिकारों को उन्होंने खुद ने काटा है। अगर इन्कम टैक्स डिपार्टमेंट के अधिकारी इस प्रकार से आगे आते हैं तो किसको गर्व नहीं होगा। हर देशवासी को गर्व होना चाहिए। और पहले के जमाने में शायद टैक्स के कारण कुछ समय से उन्हीं लोगों ने टैक्स देने के रास्ते पर जाना पसंद नहीं किया होगा। अब जो रास्ता बना है, वो टैक्स देने की तरफ जाने का आकर्षक रास्ता बना है। और इसलिए आइए, भव्य भारत के निर्माण के लिए इस व्यवस्था का लाभ भी उठाएं इस व्यवस्था से जुडऩे के लिए आगे भी आएं।

(यह लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘‘ट्रांसपेरेंट टैक्सेशन, होनोरिंग दी ऑनेस्ट’’ प्लेटफार्म के  लांच के मौके पर दिए गए भाषण के सम्पादित अंशो पर आधारित है )

 

 

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