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पालिटिक्स और चुनाव के कुछ अलग ही नज़ारे

पालिटिक्स और चुनाव  के कुछ अलग ही नज़ारे

बेटा: पिताजी।

पिता: हाँ बेटा।

बेटा: आजकल तो पिताजी राहुल गांधीजी मोदीजी व उनके मंत्रिमंडल पर रोज़ ही ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं।

पिता: हमले का क्या मतलब?

बेटा: मेरा मतलब राजनितिक हमले।

पिता: बेटा यह तो विपक्ष का संवैधानिक अधिकार है।

बेटा: हाँ, सरकार नहीं बना सके तो यह तो करना ही पड़ेगा। अब राजनीति में तो उन्हें जीते रहना है न भला।

पिता: यह उत्तरदायित्व तो वह अच्छी तरह निभा रहे हैं।

बेटा: पर पिताजी उनकी बहुत सी वातें और आरोप सत्य की कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे  हैं।

पिता: कुछ भी हो बेटा, पालिटिक्स में सच्च-झूठ सब चलता है। मीडिया की सुर्खियाँ तो बन ही जाती हैं न।

बेटा: सच्च तो ठीक, पर झूठ भी? झूठ बोलना मना नहीं है, अपराध नहीं है?

पिता:  बेटा, यह तो चाहे पालिटिक्स हो या क़ानून, मैंने तो झूठ बोलने पर किसी राजनेता और आम आदमी को सजा होने की बात हमने न कभी देखी है और न सुनी है।

बेटा: तो क्या भारत में सबको झूठ बोलने खुली छुट्टी है?

पिता: बेटा, कुछ भी हो पर सच्चाई तो यही है कि आज तक  किसी व्यक्ति को झूठ बोलने पर कोई सजा नहीं मिली है।

बेटा: मतलब?

पिता: बेटा मुकद्दमों की सुनवाई के समय अदालतों में रोज लोग गवाही देते हैं किसी के पक्ष में या विरोध में। अदालतें उस पक्ष में फैसला देते हैं जिसने सच्च बोला हो और दूसरे पक्ष के झूठ को नकार कर उसके विरुद्ध निर्णय करते हैं।

बेटा: इसका निष्कर्ष तो यही निकला कि सच्च बोलने वाले को न्याय मिलता है और निर्णय दूसरे के विरुद्ध जाता है।

पिता: पर जिस पक्ष के लोगों और गवाहों ने झूठ बोला हो उनको तो कोई सजा नहीं मिलती।

बेटा: यह ठीक है कि एक पक्ष तो जीत जाता है पर दूसरे पक्ष को जिसने झूठ बोला है उसको व उसके गवाहों को झूठ बोले की सजा तो नहीं मिलती है न।

पिता: यह तो है।

बेटा: इसका मतलब यही निकला न कि हमारी न्याय व्यवस्था में झूठ बोलने पर कोई सजा नहीं मिलती।

पिता: यह बात तो तेरी ठीक है।

बेटा: पिताजी, पिछले चुनाव अभियान के समय में राहुलजी ने रोज़ बोला कि चौकीदार चोर है।

पिता: हाँ यह तो कहा था।

बेटा:  पर उन्होंने यह साबित तो किया नहीं कि जो आरोप वह लगा  रहे हैं वह सच्च है।

पिता: बेटा, चुनाव  के समय में तो सब कुच्छ चलता है — सच्च भी और झूठ भी।

बेटा:  सच्च तो ठीक पर झूठ पर तो सजा होनी ही चाहिए न।

पिता: बेटा, व्यवहारिक बनो। चुनाव अभियान के चलन को भी समझो। उस समय यो इतना कुछ सच्च और झूठ बोला जाता है कि उसका हिसाब लगाना ही असंभव है।

बेटा: उन्होंने तो राफेल सौदे पर भी कई प्रकार के आरोप लगाये थे।

पिता: कुछ नेता तो इस सौदे के विरुद्ध उचतम न्यायलय तक भी चले गए थे।

बेटा: नतीजा क्या निकला?

पिता: न्यायलय ने भी इसमें कुछ भी ग़लत नहीं पाया।

बेटा: एक समय तो राहुलजी जी ने यह भी कह दिया था कि न्यायलय ने भी उनकी बात को सच्च माना है।

पिता: पर इस झूठ पर तो न्यायलय ने भी उनको नोटिस जारी कर दिया था। उनकी जान तो तब बची जब उन्होंने न्यायालय से माफ़ी माँगी।

बेटा: तो फिर किरकिरी किस की हुई?

पिता: इसमें क्या हुआ? पालिटिक्स में सब चलता है। नेता को बड़ा दिल रखना पड़ता  है। छोटी छोटी बातों को यदि कोई दिल में  लगाने लगेगा तो हो गयी पालिटिक्स। हाँ, अमरीका  में अवश्य एक उदहारण है जब राष्ट्र से झूठ बोलने पर राष्ट्रपति को अपने पद से हाथ धोना पड़ा था।

बेटा: तब क्या हुआ था?

पिता: रिचर्ड निक्सन बहुत बड़े बहुमत से अमरीका के राष्ट्रपति चुने गए थे पर उनके कार्यकाल में वाटरगेट नाम से एक घपला हो गया जिसमें उन्होंने राष्ट्र से एक झूठ बोल दिया। वह झूठ उनके गले का फन्दा बन बैठा। इसी झूठ पर अमरीकी संसद में उनके विरुद्ध इम्पीचमेंट का मुकद्दमा चलाया गया और उन्हें पद से हटा दिया गया।

बेटा: पिताजी, भारत भी तो विश्व का सब से बड़ा गणतंत्र है। हमारे यहाँ भी कोई ऐसा मामला हुआ?

पिता: मैंने तुम्हें पहले भी साफ़ कर दिया था कि यहाँ ऐसा कुछ नहीं हो सकता।

बेटा: क्यों?

पिता: हमारी व्यवस्था बड़ी उदाएवादी है। छोटी-छोटी बातों की परवाह नहीं की जाती।

बेटा: यह बात तो आपकी ठीक है। पर हमारी पालिटिक्स में तो कई बार ऐसा समय आ जाता है जब माननीय नेताओं को जनता के रोष का सामना करना पड़ता है। जनता उनपर फूल ही नही कई बार तो गले-सड़े टमाटर और अंडे भी फैंक देती है।

पिता: नेता वही महान होता है और पालिटिक्स के ऊंचे से ऊंचे शिखर पर पहुँच जाता है जो जनता द्वारा फैंकी गई सभी वस्तुओं को सिर झुका कर पूरे सम्मान के साथ सहर्ष ग्रहण कर लेता है। मुंह पर पड़े टमाटरों व अण्डों को रूमाल से साफ़ कर लेता हैं और चेहरे पर मुस्कान बनाये रखता हैं। वह जानता है कि जो आज ऐसा व्यवहार करते हैं वही कल उसको वोट देकर जिताएंगे भी। वह मंत्री भी बन जाता है।।

बेटा: हाँ जनता भी ध्यान कर लेती है कि वह नेता कितना महान है जिसने उनकी गालियां भी सुनी, गले-सड़े टमाटर-अंडे भी सिर झुका कर हँसते-हँसते कबूल किये और उफ़ तक न की। इसलिए वही उनके कीमती वोट का हकदार है।

पिता: इस पर मुझे याद आ रहा है एक पुराना कार्टून जो एक प्रतिष्ठित साप्ताहिक में छपा था। उसमें दिखाया गया था कि एक महान नेता भाषण कर रहे हैं और जनता उनपर जूते फेंकती जा रही है। उनके पीछे उनका एक चमचा एक टोकरी ले कर उसमें सब जूतों को डालता जा रहा है और नेताजी को कह रहा है कि बॉस आप अपना भाषण जारी रखें। हम लखपति हो जायेंगे। जूते सब एक्सपोर्ट क्वालिटी के हैं।

बेटा: वाकई पालिटिक्स में ऐसा ही चलता है।

पिता: इस पर तो मुझे एक और बात याद आ गई।

बेटा: क्या?

पिता: एक मंत्री महोदय अपने कार्यकाल के समय मशहूर हो गए अपने भ्रष्टाचार के लिए। उनके बारे यह बात प्रचलित हो गयी कि वह हर काम केलिए पैसे लेते हैं। तबदीली करवाने केलिए इतने, रुकवाने के लिए इतने और किसी और केलिए इतने। जब चुनाव आया तो जनता ने उन्हें हरा दिया।

बेटा: फिर?

पिता: बेचारे मंत्री हार के बाद दो-तीन मास तो घर से निकले ही नहीं। पर उनके चमचे बताते थे कि शहर वालों ने एक चौराहे पर उनका एक कट-औट लटका रखा है और उसके पास ही एक पुराना जूता रखा है। जो भी उधर से गुज़रता है वह उनके कट-औट पर दो-चार जूते मार जाता है।

बेटा:  फिर?

पिता:  एक दिन जब वह उधर से गुज़रा तो बाज़ार के लोगों ने उसके सामने और भी घुस्सा दिखाया। वह तो मुंह छुपा कर भागा। वह अपने मित्र को मिलने गया जो भी उसी की पार्टी का था और चुनाव हार गया था।

बेटा: वहां क्या हुआ?

पिता: वहां क्या होना था? दोनों ही हारे हुए महारथी लगे एक-दूसरे के साथ अपनी हार के बाद के दुखी जीवन की कहानियां एक-दूसरे को सुनाने।

बेटा: अंत में क्या हुआ?

पिता: होना क्या था? ज्यों-ज्यों समय  बीतता गया तो उस हारे हुए प्रतिनिधि के प्रति उनका घुस्सा भी आहिस्ता-आहिस्ता  ठंडा होने लगा। जब पांच साल बाद चुनाव हुए तो जिसके कट-औट पर आते-जाते जूते मारते थे और उसे भ्रष्टाचारी कहते थे, उसी को भारी बहुमत से जिता दिया। उसके गले को फूल मालाओं से लाद कर विजय यात्रा में  उसके आगे-आगे भांगड़ा डालते हुए उसकी जीत का जश्न मनाते फिरे।।

बेटा: तब तो पिताजी लोग ठीक ही कहते हैं कि जनता की यादाश्त बड़ी कमज़ोर होती है। लोग पुरानी  बातें बड़ी जल्दी भूल जाते हैं।

पिता: यही तो हमारी पालिटिक्स की ब्यूटी है बेटा। इसीलिए तो बेटा मैं कहता हूँ कि हमारी पालिटिकस और  चुनाव में सब चलता है — सच्च, झूठ, गाली-गलोच, आरोप-प्रत्यारोप, जूते-फूल मालाएं, दल-बल, पैसा-शराब और भी बहुत कुछ।

बेटा:  हाँ पिताजी, जीत जीत होती है और हार हार। जीत एक वोट से भी हो तो वह जीत होती है और हार एक वोट से भी हो वह हात ही होती है।

पिता: तब भी जब जीतने वाले प्रत्याशी के विरुद्ध अन्य प्रत्याशियों ने हज़ारों वोट क्यों न पाए हों।

बेटा: अब तो मैं भी पालिटिक्स को कुछ समझने लगा हूँ। मैं भी सोच रहा हूँ कि यह इतनी बुरी चीज़ नहीं है जैसा कि लोग उसे बताते हैं। मैं भी सोच रहा हूँ कि अगले चुनाव में तो अभी पांच साल हैं। क्यों न आज से ही शुरू हो जाऊं? घाटे का सौदा नहीं है।

पिता: हाँ बेटा जीतेगा तो वही जो चुनाव लडेगा। और एक बार चुनाव जीत गए तो मंत्रिपद भी दूर नहीं।

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