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कठिन सही तेरी मंजिल, मगर उदास न हो

कठिन सही तेरी मंजिल, मगर उदास न हो

उदासी और डिप्रेशन के बीच में एक सामान्य सा अंतर है। उदासी एक वैश्विक स्थिति है। इसे हर कोई महसूस करता है। इसमें व्यक्ति उदासी से एक या दो दिन में बाहर आ जाता है और उसकी हालत पहले जैसी हो जाती है। अवसाद या डिप्रेशन का तात्पर्य मनोविज्ञान के क्षेत्र में मनोभावों संबंधी दुख से होता है। इसे रोग या सिंड्रोम की संज्ञा दी जाती है।

आयुर्विज्ञान में कोई भी व्यक्ति डिप्रेस्ड होने की अवस्था में स्वयं को लाचार और निराश महसूस करता है। उस व्यक्ति-विशेष के लिए सुख, शांति, सफलता, खुशी यहां तक कि संबंध तक बेमानी हो जाते हैं। उसे सर्वत्र निराशा, तनाव, अशांति, अरुचि प्रतीत होती है। अवसाद के भौतिक कारण भी अनेक होते हैं। इनमें कुपोषण, आनुवांशिकता, हार्मोन, मौसम, तनाव, बीमारी, नशा, अप्रिय स्थितियों में लंबे समय तक रहना, पीठ में तकलीफ आदि प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त अवसाद के 90 प्रतिशत रोगियों में नींद की समस्या होती है। डिप्रेशन, सामान्य उदासी से बिल्कुल अलग है। डिप्रेशन में उदासी लगातार बनी रहती है। कोई भी उपाय करके आप नॉर्मल नहीं हो पाते। यहां तक कि अच्छी से अच्छी खबर से भी आप खुश नहीं होते।

इस प्रकार से डिप्रेशन मनोवैज्ञानिक विकार है और यह सामान्य उदासी से बहुत अलग है। इसलिए हमें डिप्रेशन और उदासी के बीच के अंतर का पता होना चाहिए। अगर किसी इंसान को सामान्य उदासी है तो डरने की कोई बात नहीं, लेकिन अगर उसे डिप्रेशन है तो ध्यान देने की जरूरत है। भारतीय समाज में इसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता। यह लिया जाता है कि यह स्वत: ठीक हो जायेगा या उस व्यक्ति का स्वभाव ही ऐसा है। वहीं कुछ लोग जिम्मेदारी से बचने के लिए अवसादग्रस्त होने का ढोंग भी करते हैं।

डिप्रेशन में मरीज के मन में अत्यधिक उदासी, कार्य में अरुचि, चिड़चिड़ापन, घबराहट, आत्म-ग्लानि, भविष्य के बारे में निराशा, शरीर में ऊर्जा की कमी, अपने आप से नफरत, नींद की कमी, सेक्स इच्छा की कमी, मन में रोने की इच्छा, आत्म-विश्वास की कमी लगातार बनी रहती है। मन में आत्महत्या के विचार आते रहते हैं। मरीज की कार्य करने की क्षमता अत्यधिक कम हो जाती  है। कभी-कभी मरीज का घर से बाहर निकलने का मन नहीं करता है। किसी से बातें करने का मन नहीं होता। मनोविश्लेषकों के अनुसार, अवसाद के कई कारण हो सकते हैं। यह मूलत: किसी व्यक्ति की सोच की बुनावट या उसके मूल व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। अवसाद लाईलाज रोग नहीं है। इसके पीछे जैविक, आनुवांशिक और मनो-सामाजिक कारण होते हैं। यही नहीं जैव-रासायनिक असंतुलन के कारण भी अवसाद घेर सकता है। इसकी अधिकता के कारण रोगी आत्महत्या तक कर सकता है। इसलिए परिजनों को सजग रहना चाहिए। अगर  परिवार का कोई सदस्य गुमसुम रहता है, अपना ज्यादातर समय अकेले में बिताता है, निराशावादी बातें करता है तो उसे तुरंत किसी अच्छे मनोचिकित्सक के पास ले जाना चाहिए। उसे अकेले में न रहने दें। हंसाने की कोशिश करें।

इस प्रकार की उदासी जब दो हफ्तों से अधिक रहे, तब इसे बीमारी समझकर परामर्श लेना चाहिये। यह एक प्रकार की मानसिक बीमारी है, जिसमें मन लगातार कई हफ्तों तक या महीनों तक या तो बहुत उदास या फिर अत्यधिक खुश रहता है। इसे बाइपोलर अवसाद कहा जाता है। यह सामान्य अवसाद से अलग होता है। उदासी में नकारात्मक तथा मैनिया में मन में ऊंचे-ऊंचे विचार आते हैं। यह बीमारी लगभग 100 में से एक व्यक्ति को जीवन में कभी ना कभी होती है।

इस बीमारी की शुरुआत अक्सर 14 साल से 19 साल के बीच होती है। इस बीमारी से पुरुष तथा महिलाएं दोनों ही समान रूप से प्रभावित होते हैं। यह बीमारी 40 साल के बाद बहुत कम ही शुरु होती है। यह स्पष्ट रूप से नहीं ज्ञात नहीं हो सका है कि डिप्रेशन या अवसाद किस वजह से होता है, मगर माना जाता है कि इसमें कई चीजों की अहम भूमिका होती है। जिंदगी के कई अहम पड़ाव जैस, किसी नजदीकी की मौत, नौकरी चले जाना, प्रेम में असफल होना या शादी का टूट जाना, व्यवसाय की असफलता और नुकसान आमतौर पर अवसाद की वजह बनते हैं। इनके साथ ही अगर आपके मन में हर समय कुछ बुरा होने की आशंका रहती है तो इससे भी अवसाद में जाने का ख़तरा रहता है। इसके तहत लोग सोचते रहते हैं ‘मैं तो हर चीज में विफल हूं’।

कुछ मेडिकल कारणों से भी लोगों में अवसाद  उत्पन्न होता है, जिनमें एक है थायरॉयड की कम सक्रिय होना। कुछ दवाओं के साइड इफेक्ट्स में भी अवसाद हो सकता है। इनमें ब्लड प्रेशर कम करने के लिए इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाएं शामिल हैं। आश्चर्य की बात यह कि अवसाद बिना किसी एक खास कारण के भी हो सकता है। यह धीरे-धीरे मन में घर कर लेता है और इस बीमारी से बचने की कोशिश के आप उसी से अनचाहा संघर्ष करते रहते हैं।

दिमाग के रसायन अवसाद की हालत में किस तरह की भूमिका अदा करते हैं, अभी तक यह भी पूरी तरह नहीं समझा जा सका है। ज्यादातर विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि यह सिर्फ दिमाग में किसी तरह के असंतुलन की वजह से ही नहीं होता, इसके पीछे कोई आनुवांशिक वजह भी हो सकती है। इसके तहत कुछ लोग जब चुनौतीपूर्ण समय से गुजर रहे होते हैं तो उनके अवसाद में जाने की आशंका अधिक रहती है। जिन लोगों के परिवार में अवसाद का इतिहास रहा हो वहां लोगों के डिप्रेस्ड होने की आशंका भी ज्यादा होती है। इसके अलावा गुणसूत्र 3 में होने वाले कुछ आनुवांशिकीय बदलावों से भी अवसाद हो सकता है। इससे लगभग चार प्रतिशत लोग प्रभावित होते हैं।

रोजगार की अनिश्चतता, भागम-भाग और प्रतिस्पद्र्धा के दौर में डिप्रेशन युवाओं को भी अपना शिकार बना रहा है। इसलिए कोशिश यह करनी चाहिए कि आप खुशनुमा पलों की तलाश करें और सकारात्मक सोच रखें। इससे बचने के उपाय हैं – व्यस्त रहकर मस्त रहना, अपने लिए समय निकालना, संतुलित आहार लेना और सामाजिक मेल-जोल बढ़ाना। लेकिन, मनोवैज्ञानिक परामर्श और औषधि सेवन भी आवश्यक है।

शैलेन्द्र चौहान

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