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बीमारियों का ‘सरकारी वायरस’

बीमारियों का ‘सरकारी वायरस’

आज तलाशने पर भी एक स्वस्थ परिवार नहीं मिलता। परिवार तो क्या, पूरी तरह स्वस्थ एक आदमी भी नहीं मिलता। लोगों को बीमार करने या बीमार बनाये रखने के लिये सरकारी तंत्र विशेष तौर से जिम्मेदार है। बच्चे इसीलिये बीमार रहते हैं क्योंकि बाजार में सरेआम मिलावटी दूध बिकता है। यहां तक कि सरकारी कम्पनियों द्वारा बनाये जाने वाले दूध के नमूने जांच करने पर सही नहीं पाये गये। उत्तर प्रदेश में तो पुलिस ने कई बार दूध में मिलावटी हानिकारक रसायन पकड़े। हजारों लीटर नकली दूध, पनीर, खोया पकड़ा। करोड़ों-अरबों लीटर दूध छोटे-छोटे बच्चे पी डालते हैं, जिसमें कीटनाशक पदार्थ भरे पड़े रहते हैं। ये बच्चे कभी स्वस्थ नहीं रह सकेंगे। इनका दिमाग और शरीर कभी स्वस्थ नहीं रह सकता। सरकार कोई ठोस कार्यवाही नहीं करती है, न ही कड़ी सजा का कोई प्रावधान किया जाता है, क्योंकि उन्हें वर्ग विशेष, जाति विशेष के वोट की राजनीति करना है। उन्हें किसी भी सूरत में चुनाव जीतना है चाहे लोगों की जान जाये या देश बर्बाद हो जाये।

बच्चे, विद्यार्र्थी अकसर कोल्ड ड्रिंक्स पीते दिखे जाते हैं। ड्रिंक्स के नमूनों में भी कीटनाशक या अन्य मिलावटी तत्व पाये गये हैं, पर कुछ नहीं हुआ। न कोई कोल्ड ड्रिंक बन्द हुआ, न कोई मालिक जेल गया। जो लोग नकली ड्रिंक्स बनाकर ब्रांड नाम से बाजार में डुप्लीकेट बेचते हैं, उनका भी कुछ नहीं होता है।

बच्चे जब स्कूल जाते हैं तो उन्हें फुटपाथ पर चलने की जगह नहीं मिलती। फुटपाथों पर दुकानदारों और  ठेले वालों ने कब्जा कर रखा है। दिल्ली में तो आधे से अधिक फुटपाथों पर फल, फूल, सब्जी या अन्य दुकानदारों ने कब्जा करके दुकानें जमा ली है। नतीजन बच्चों को फुटपाथ से हटकर रोड पर चलना पड़ता है और वे आये दिन दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं। कुछ तो मर भी जाते हैं। कुछ विकलांग हो जाते हैं। सरकार इन कब्जों को हटायेगी तो वोट चले जायेंगे, इसीलिये कोई कार्यवाही नहीं होती।

बच्चे मिलावटी दूध पीकर पलते हैं, मिलावटी पदार्थ खाकर बड़े होते हैं और फुटपाथों पर चलकर अपाहिज होते रहते हैं। इन कर्णधारों के कन्धों पर देश के कल का भविष्य है। ये कमजोर कंधें, बीमार बदन कल कैसे देश का भार उठा सकेंगे, इसकी चिंता सरकार को नहीं है। नेताओं को तो बस वोट चाहिये।

हर वर्ष वायरल बुखार फैलता है। डेंगू, टायफाइड, मलेरिया तो जैसे महानगर में रहने वालों की जिंदगी का हिस्सा ही बन गये हैं। इन बीमारियों को फैलाने वाली वायरस है  सरकार। पिछले वर्षों में इन बीमारियों ने न जाने कितनी जान ले ली। शायद ही कोई कालोनी ऐसी हो जो सरकारी एजेंसी ने बनायी और उसमें झुग्गी-झोपड़ी का मुहल्ला सटकर न बस गया हो। इसमें रहने वालों का जीवन नरक जैसा है।

रोजाना नई झुग्गी, झोपड़ी, दुकानें सरकारी जमीन पर बसती जा रही हैं। सैकड़ों नई दुकानें रोड किनारे बन रही हैं। इस तरह रोड संकरे होते जाते हैं और ट्रैफिक जाम होता है। कई लोग तो एम्बुलेस या गाडिय़ों में रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। वे समय से अस्पताल नहीं पहुंच पाते हैं। ये फुटपाथ खाली नहीं कराये जाते हैं। और तो और, लोग सरकारी बाउंड्री वॉल तोड़कर, दीवार फैसिंग तार तोड़कर मजे से बैठकर, चोरी की बिजली लगाकर दुकानें चला रहे हैं। निगम चुप है, पुलिस कार्यवाही करती नहीं। इन्हें कोई हटा नहीं सकता, क्योंकि सरकार चलाने वालों को वोटों की चिंता रहती है। चुनाव हारने का खतरा उन्हें कार्यवाही नहीं करने देता। झुग्गियों में बिजली अधिकंश बिना मीटर के सीधी चल रही हैं। इससे जान को खतरा बना रहता है। पानी की व्यवस्था नहीं है, बाहर रोड पर पानी से भरे टैंक लेकर सरकारी वाहन खड़े होते हैं, जिसमें से हजारों लीटर पानी बिखरता है और फिर इकट्ठा होता है। उसमें मच्छर, मक्खी, कीटाणु आदि पैदा होते रहते हैं। यही हाल झुग्गी के अंदर गालियों में है। न सफाई, न सड़क, न धूप। गलियां घर से फेंके हुये कूड़े-करकट, पानी, गंदगी से भरी रहती है। ये जगह हैं, जहां से बीमारियों के जीव पैदा होते हैं। जीवाणु अच्छा, बुरा, गरीब, अमीर, झोपड़ी, महल या अस्पताल नहीं पहचानता, वो हमला कर देता है और पूरा शहर उसकी चपेट में आ जाता है। आखिर क्यों ऐसे स्थानों को पनपने दिया जाए। इस तरह का जीवन खुद झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों के लिये अभिशाप है।

व्यापारियों के बीमार रहने में भी सरकार का अच्छा खासा योगदान है। ईमानदारी से कोई फैक्ट्री नहीं चला सकता है, न ही दुकान। व्यापारी लाइसेंस प्रणाली और एन.ओ.सी. लेन के लिये चक्कर काटते-काटते थक जाता है। जब व्यवसाय शुरू हो जाता है तो टैक्स वसूलने वाले जीना हराम किये रहते हैं। छुट्टी का दिन भी इनका वकीलों के यहां कटता है। झूठे नोटिस, झूठी वसूली, कोर्ट कचहरी, फिर अपील, फिर कार्यवाही। बस तनाव ही तनाव रहता है इनके जीवन में। अदालतें फैसला करती नहीं हैं। पेशी पर पेशी और उन्हें कोई कुछ कहता नहीं। निपटने के बजाय केस लटके रहते हैं। अपनी देखभाल का वक्त नहीं बचता उनके पास और न ही परिवार वालों के साथ वक्त गुजार पाते हैं।

बचा खुचा काम देश की अदालतें पूरा करा देती हैं। कोई भी केस हो, यदि अदालत में गया तो वर्षों वर्षों कोर्ट और वकीलों के चक्कर,  लगा लगा कर थक जाने के कारण चिंताग्रस्त व्यापारी-व्यवसायी उच्च रक्तचाप, डायबीटिज, डिप्रेशन आदि की बीमारी से पीडि़त हो जाता है।

सरकारी कर्मचारी भी इसी तरह घुटन की जिंदगी जीता है। उसे रोजाना राजनैतिक दबाव में काम करना पड़ता है। घटिया निर्माण या बिना किसी कार्य के इंजीनियर को सही रिर्पोटें लगानी पड़ती हैं, नही तो स्थानीय माफिया या नेता उसकी शिकायत करा कर कर्मचारियों को सस्पेंड भी करवा देते हैं। इसी तरह बाबू को झूठी नकली बिलों पर पेमेंट करना पड़ती है। सभी ऐसी जिंदगी जीकर सुखी-प्रसन्न कैसे रह सकते हैं। ऐसे में ब्लड प्रेशर आदि बीमारी हो जाना तो मामूली सी बात है।

सैकड़ों लोग रोजाना कोर्ट में आते हैं, जिनकी डेट तो लगती है पर सुनवायी नहीं होती। ऐसे कई लोग जो दस-पन्द्रह वर्षों से अधिक समय से आ रहे होते हैं, वह बाहर बैठकर अपनी किस्मत पर रोते दिखाई देते हैं।  यदि उनका केस सरकार के खिलाफ है चार-पांच सुनवाईयों तक तो जबाव ही नहीं देना है। तारीख लगेगी हर 10-15 दिन में, पर  सुनवायी नहीं होगी। प्रदेश के दूर-दराज जगहों से लोग आते हैं और मायूस होकर उच्च अदालतों से वापिस चले जाते हैं। ये लोग बीमार तो हो ही जायेंगे। उनके पास रात को सोने की जगह नहीं होती। अदालतें कार्य करने और कार्यवाही फैसलों के लिये स्वतंत्र है, पर तारीख देने और सुनवायी नहीं करने के लिये अदालतों पर भी अंकुश लगना चाहिये। मुकदमों को विलम्बित करने की स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती।

जब डॉक्टर, कलेक्टर, पुलिस ऑफिसर चौबीसों घंटे काम कर सकते हैं, वर्कलोड कहकर वे अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते, तो अदालतें कैसे बच सकती हैं? प्रशासनिक कार्यप्रणाली की जिम्मेदारी, वेबजह डेट पर डेट देना, तारीखें लगाकर आधे केसों की सुनवायी नहीं करना न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। इसमें सुधार तो कोई सुप्रीम कोर्ट ही कर सकती है और सभी मातहत अदालतों की जिम्मेदारियों और न्याय देने की नीतियों में सुधार कर सकती है। सरकार को चाहिये कि अदालतों को प्रशासनिक रूप से कार्य करने के लिये कुछ  सुधार करना चाहिए, ताकि लोगों को समय से फैसले मिले, समस्याएं सुलझे और बेवजह  होने वाली बीमारियों से लोग बच सकें। मिलावटी दूध, मिलावटी भोजन, कीटनाशक से भरी सब्जियां, गंदी और बिना सुविधाओं की बस्तियां, मुहल्ले, सड़क-मार्गों पर कब्जे, कीचड़ और गंदे पानी का भराव, सरकारी तंत्र की गैर-जिम्मेदराना कार्यप्रणली और अदालतों की फैसला करने में देरी आदि समस्याओं का निवारण होना चाहिये। यदि सरकार वोटों की परवाह किये बिना कड़े कानून बनाकर उन्हें रोक पायी तो आधी बीमारियां ऐसे ही रूक जायेंगी। जो बीमारियां तेजी से फैलती हैं और बाद में जिनके लिये स्वास्थ्य अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराकर बलि का बकरा बनाया जाता है, उन बीमारियों की भी रोकथाम हो जायेगी।

यदि लोगों को एक ही काम के लिये दर्जनों सरकारी दफ्तरों के चक्कर तथा न्याय के लिये अदालतों के सैकड़ों चक्कर लगाने से बचाने के लिये कारगर कानून बन गया तो न जाने कितने लोग असमय बीमारियों का शिकार होने से बच जाएंगे। समय आ गया है कि सरकार कोई भी हो, वोटों की राजनीति छोड़कर जनहित में जनता के हितों के बारे में सोचे।

 डॉ. विजय खैरा

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