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अब अकबर नहीं महाराणा प्रताप महान

अब अकबर नहीं महाराणा प्रताप महान

राजस्थान में वर्ष 2015-16 के शैक्षणिक सत्र से सरकारी उच्च प्राथमिक विद्यालयों में सामाजिक ज्ञान की पुस्तकों में अकबर महान की जगह महाराणा प्रताप, महाराजा सूरजमल, वीर दुर्गादास राठौड़, वीर सावरकर और हेमू कालाणी जैसे महापुरूषों की जीवनी पढ़ाने का निर्णय लिया गया है।

02-05-2015

राज्य के शिक्षा मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी के अनुसार, ”चूंकि पाठ्य-पुस्तकें तैयार की जा चुकी थीं, इसलिए छठी से आठवीं कक्षा की पुस्तकों में पूरक सामग्री के रूप में इन महापुरूषों की जीवनी को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।’’ उन्होंने शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के तत्वावधान में विद्यालय शिक्षण के पाठ्यक्रम का विश्लेषण: दशा एवं दिशा विषयक संगोष्ठी का जयपुर में समापन करते हुए कहा कि ऐसे पाठ्यक्रम के माध्यम से बालक-बालिकाओं में देश प्रेम की भावना जागृत करते हुए उन्हें भारतीय संस्कृति से जोडऩे में सहायता मिलेगी। शिक्षकों के सहयोग से बच्चों को संस्कारवान पीढ़ी के रूप में तैयार किया जाएगा, जिसे पिछले वर्षों में अनदेखा किया गया है। दो दिवसीय संगोष्ठी का उद्घाटन संस्कृत एवं उच्च शिक्षामंत्री कालीचरण सराफ ने किया था। सराफ  ने भी कहा कि अंग्रेजी राज में लागू मैकाले शिक्षा पद्धति से काले अंग्रेज पैदा हुए और वर्तमान में हम बच्चों को संस्कारहीन शिक्षा दे रहे हैं, जिसका कोई उद्देश्य नहीं है। सही इतिहास नहीं पढ़ाया जाता, इसलिए पाठ्यक्रम में बदलाव के साथ नैतिक शिक्षा भी जरूरी है।

प्रो. देवनानी ने इस बदलाव को शुरूआत बताया है। उनका कहना है कि अगले शैक्षणिक सत्रों में पाठ्यक्रमों में व्याप्त विसंगतियों को दूर करके उन्हें अद्यतन बनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि इसे भगवाकरण नहीं माना जाना चाहिए। दरअसल भगवा तो त्याग-समर्पण का प्रतीक है। पाठ्यक्रम में बदलाव इसलिए भी जरूरी है कि राजस्थान राज्य शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (एस.आई.ई.आर.टी.) में लम्बे अर्से तक वामपंथी विचारधरा के लोगों का दबदबा बना रहा, जो अपने हिसाब से पाठ्यक्रम तैयार करते रहे और बिना पड़ताल के उसे लागू कर दिया जाता था। इस रवैये को लेकर अब सख्ती की गई है।

संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में शिक्षा की दिशा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चिंतन मनन हुआ। पाठ्य-विधि और मूल्यांकन, भाषा व साहित्य इत्यादि विषयों के साथ विभिन्न राज्यों के शिक्षा बोर्डों के स्तर पर किए गए प्रयोगों एवं उनके निष्कर्षों पर भी चर्चा की गई। पाठ्यक्रम के स्वरूप को रेखाकिंत करते हुए न्यास के सचिव अतुल कोठारी ने कहा कि किसी भी देश की शिक्षा वहां की संस्कृति एवं प्रगति तथा प्रकृति के अनुरूप होनी चाहिए। इसका उद्देश्य स्वामी विवेकानंद के अनुरूप चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व का विकास सामाजिक एवं राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति तथा राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय चुनौतियों के समाधान के लिए होना चाहिए। शिक्षा और इसके पाठ्यक्रम में व्यवहार एवं सिद्धांत संतुलन के साथ भौतिकता एवं आध्यात्मिकता का समायोजस्वामी विवेकानंदन, प्राचीन एवं आधुनिकता का समन्वय तथा समग्र एवं एकात्म दृष्टिकोण आवश्यक है। पाठ्यक्रम में पर्यावरण, राष्ट्रीय सुरक्षा, आंतकवाद और आर्थिक साम्राज्यवाद के खतरे, उदारीकण, वैश्विक मंदी का मूल्यंाकन, स्वास्थ्य शिक्षा के समावेश के साथ विश्व भाषाओं के अध्ययन पर भी जोर हो।

शिक्षा में खण्ड-खण्ड में विचार किए जाने से युवाओं का व्यक्तित्व भी खंडित बन रहा है, जिसका प्रतिबिम्ब सामाजिक जीवन में भी दिखाई देता है। इसी के परिणाम स्वरूप समाज आज जाति, भाषा, अमीर-गरीब, महिला-पुरूष तथा कथित सवर्ण-दलित इत्यादि वर्गों में बंटा हुआ दिखाई देता है। इसलिए पाठ्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थी की सृजनात्मक, कल्पनात्मक शक्ति, जिज्ञासा वृत्ति, ज्ञानात्मक, बोधात्मक, भावात्मक, संवेदनात्मक, क्रियात्मक और कौशलात्मक विकास होना अपेक्षित है। पाठ्यक्रम तैयार में क्षेत्रीय आवश्यकताओं, गांवों तथा जनजातीय अंचल का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। पाठ्यक्रम में लचीलापन भी हो। पाठ्य-चर्चा समग्र प्रक्रिया का आधारभूत अंग है। इसी के अनुरूप पाठ्य के आधार पर पाठ्य-सामग्री का निर्धारण करके पाठ्य पुस्तकें तैयार की जानी चाहिए।

आयोजन समिति के अध्यक्ष तथा राज्य के पूर्व सूचना एवं जनसम्पर्क आयुक्त श्याम सुंदर बिस्सा ने संगोष्ठी के उद्देश्यों की चर्चा करते हुए कहा कि शिक्षा पद्धति ने हमें सांस्कृतिक परम्परा और चिंतन से काट दिया है, जिसकी छाप पाठ्यक्रम पर भी दिखाई देती है। व्यक्ति को मात्र उपभोक्ता बना दिया गया है तथा चारित्रिक एवं व्यक्तित्व विकास से उसका कोई लेना-देना नहीं है। विडम्बना यह है कि इस शिक्षा पद्धति की बुराईयों से अवगत होने के बावजूद अधिकारी वर्ग इसका खुलकर विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। उन्होंने कहा कि शिक्षा पद्धति ऐसी हो जिससे ‘मिनख’ (इंसान) बन सके, तभी इंसानियत भी पनपेगी।

राजस्थान विधानसभा के बजट सत्र में भी शिक्षा विभाग की अनुदान मांगों पर हुई चर्चा के जवाब में प्रो. देवनानी ने कहा कि प्रशासनिक ढांचे का पुनर्गठन तथा सुदृढ़ीकरण करते हुए गुणवत्तापूर्ण एवं संस्कारयुक्त शिक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। शिक्षा मंत्री का कहना था कि शिक्षा में राजनीति नहीं बल्कि राजनीति में शिक्षा की आवश्यकता है। प्रत्येक बालक-बालिका को शिक्षित करने के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के अनुरूप सम्पूर्ण विद्यालयी शिक्षा का पाठ्यक्रम भारतीय परिवेश, प्रदेश के गौरवशाली इतिहास एवं संस्कृति के साथ आधुनिक तकनीकी ज्ञान एवं कौशल से परिपूर्ण करते हुए समीक्षा करके सभी आवश्यक कदम उठाए जायेंगे। जीवन में भारतीय संस्कृति को आत्मसात करने की दिशा में सरकारी विद्यालयों में सूर्य नमस्कार, योग एवं ध्यान को लागू किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि संस्कार-विहीन साक्षर से संस्कारवान निरक्षर अच्छा है।

इसी क्रम में उच्च शिक्षा मंत्री कालीचरण सराफ ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी एवं राजकीय शिक्षण संस्थाओं में गुणवत्ता सुनिश्चित करने तथा निरकुंश प्रवृत्ति रोकने के लिए राज्य नियामक आयोग के गठन की घोषणा की।

 जयपुर से गुलाब बत्रा

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