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हिन्दुस्तान में हिन्दू कब जगेगा?

हिन्दुस्तान में हिन्दू कब जगेगा?

हम दो, हमारे दो’-

यह बात मुसलमान भाई लोग क्यों नहीं समझते हैं

मनुष्य इतिहास से यह सीखता है कि मनुष्य इतिहास से कुछ नहीं सीखता – अंग्रेजी के जाने-माने लेखक जार्ज बर्नाड शॉ का यह बयान कम से कम हिन्दुओं के लिए तो सोलह आने सही है। अड़सठ साल पहले आजादी मिलने से पहले ही यह देश एक विभाजन झेल चुका है।

जब मुसलमान देश के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में बहुसंख्यक हो गए तो वो हिस्से देश से अलग हो गए और मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान बना। अब देश में फिर तेजी से मुस्लिम आबादी बढ़ रही है और उसके साथ ही सवाल उठने लगे हैं कि क्या फिर वही इतिहास अपने आपको दोहराएगा?

पिछले दशक यानी 2001 से 2011 की जनगणना के हाल ही में जारी आंकड़े हिन्दुओं के लिए चौंकाने वाले हैं। हिन्दुओं की जनसंख्या के प्रतिशत में इतनी भारी गिरावट आई है कि हिन्दू जनसंख्या का प्रतिशत अस्सी प्रतिशत से भी नीचे घटकर मात्र 78.35 प्रतिशत रह गया है। 2001 में देश की 121 करोड़ आबादी में हिन्दुओं की आबादी 80.75 प्रतिशत थी। दस वर्षों में वह 14.5 प्रतिशत की दर से बढ़कर 82.75 करोड़ से बढ़कर 94.78 करोड़ हो गई। दूसरी तरफ इन 10 सालों में मुस्लिमों की जनसंख्या में 24 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। वह 13.8 करोड़ से बढकर 17.18 करोड़ हो गई। यह ट्रेंड कोई नया नहीं है। उल्लेखनीय है कि 1951 से 2001 के बीच मुस्लिमों का प्रतिशत 9.8 से बढकर 13.4 हो गया। 2011 में  देश की कुल जनसंख्या में 14.2 फीसदी लोग मुस्लिम हैं, जबकि 2001 में मुस्लिमों की जनसंख्या 13.4 फीसदी थी। 1991-2001 में मुस्लिमों की जनसंख्या का विकास दर 29 फीसदी था। मौजूदा दशक में मुस्लिमों की जनसंख्या की बढ़ोतरी दर में गिरावट आई है, लेकिन वह  देश की औसत वृद्धि दर 18 फीसदी से ज्यादा है।

MUSLIMS OFFERING NAMAJ ON THE OCASSION OF EID AT JAMA MASJID IN THE CAPITAL

आपको बता दें कि धर्म के आधार पर की गई जनगणना के आंकड़ें जल्द सार्वजनिक होने वाले हैं। आंकड़ें 2011 तक के हैं और यूपीए सरकार के कार्यकाल में इकट्ठा किए गए थे, लेकिन इन्हें अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है।

विभाजन के बाद के पचास वर्षों में हिन्दू जनसंख्या में 3.65 प्रतिशत की कमी आई थी। हिन्दुओं का प्रतिशत 84.1 से घटकर 80.45 रह गया था। दरअसल आजादी के बाद के पचास वर्षों में हिन्दुओं की जनसंख्या में 172 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वह 30.36 करोड़ से  बढ़कर 82.75 करोड़ हो गई, लेकिन कुल आबादी में उनका प्रतिशत घट गया, क्योंकि हिन्दू जनसंख्या वृद्धि की दर में गिरावट आ गई। 2011 की जनगणना के आंकड़ें बताते हैं कि बाद के पचास वर्षों में हिन्दुओं की आबादी में 5.6 प्रतिशत की गिरावट आई तो मुस्लिमों का प्रतिशत 4 से ज्यादा बढ़ा। 1951 की जनगणना में हिन्दुओं का प्रतिशत 84.1 प्रतिशत था जो अब 78.58 रह गया है। आजादी से पहले हिन्दुओं की आबादी 66 प्रतिशत थी, लेकिन विभाजन के बाद पाकिस्तान से हिन्दू यहां आए और मुसलमान पाकिस्तान गए।

लंबे वक्त से अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की समस्या का सामना कर रहे असम में मुस्लिमों की आबादी सबसे तेजी से बढ़ी। 2001 में राज्य की आबादी में मुसलमानों का हिस्सा 30.9 फीसदी था, लेकिन एक दशक बाद यह आंकड़ा बढ़कर 34.2 फीसदी हो गया। पश्चिम बंगाल में भी मुस्लिमों की जनसंख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 2001 में राज्य की कुल आबादी के 25.2 फीसदी की तुलना में 2011 में यह 27 प्रतिशत तक पहुंचा गया। इसके अलावा उत्तराखंड में भी मुसलमानों की आबादी में तेजी देखने को मिली है। इसके अलावा उत्तराखंड में मुसलमानों की आबादी 11.9 प्रतिशत से बढ़कर 13.9, जम्मू-कश्मीर में 67 प्रतिशत से बढ़कर 68.3, हरियाणा में 5.8 प्रतिशत से बढ़कर 7 और दिल्ली में 11.7 प्रतिशत से बढ़कर 12.9 प्रतिशत हो गई है।

जनगणना के आंकड़ों से स्पष्ट है कि इस्लाम भारत सहित विश्व का सबसे तेजी से बढऩे वाला धर्म है। इंडोनेशिया और पाकिस्तान के बाद यहां सबसे ज्यादा मुसलमान हैं। बाकी दो धर्मों, ईसाई और सिखों की आबादी लगभग दो प्रतिशत पर स्थिर है। वैसे हर जनगणना के बाद यह सवाल उठता रहा है कि मुसलमानों की आबादी बाकी धर्मों के मुकाबले ज्यादा तेजी से क्यों बढ़ रही है और क्या एक दिन मुसलमानों की आबादी इतनी बढ़ जायेगी कि वह हिन्दुओं से संख्या से आगे निकल जायेंगे? ये सवाल आज से नहीं उठ रहे हैं। आज से सौ साल से भी अधिक पहले से उठ रहे हैं। 1901 में जब अविभाजित भारत में आबादी के आंकड़े आये और पता चला कि 1881 में 75.1 प्रतिशत हिन्दुओं के मुकाबले 1901 में उनका हिस्सा घट कर 72.9 प्रतिशत रह गया है, तब बड़ा बखेड़ा खड़ा हुआ था। उसके बाद से लगातार यह बात उठती रही है कि मुसलमान तेजी से अपनी आबादी बढ़ाने में जुटे हैं। अगर उन पर अंकुश नहीं लगाया गया तो एक दिन भारत मुस्लिम राष्ट्र हो जायेगा या फिर एक और विभाजन होगा।

पाकिस्तान के निर्माण और कश्मीर के अलगाववाद और दुनिया भर में मुस्लिमों में बढ़ते कट्टरतावाद और उग्रवाद को देखते हुए इस आशंका को निर्मूल नहीं कहा जा सकता। हिन्दू संगठन जनगणना के आंकड़ों को खतरे की घंटी मानते हैं। उनका मानना है कि हिन्दू अब भी नहीं जागे तो हिन्दू समाज विभाजित भारत में अल्पसंख्यक होने की दिशा में बढ़ सकता है। दरअसल ऐसा होना स्वाभाविक भी है। एक बार विभाजन की पीड़ा झेल चुका हिन्दू समाज को इससे चिंतित होना लाजमी है। कहते हैं न दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है, लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि अब स्यापा करने से हालात बहुत बदलने वाले नहीं हैं। कहावत है न अब पछताये होत क्या जब चिडिय़ा चुग गई खेत। आजादी के समय हमारे गांधी-नेहरू जैसे कथित सेकुलर नेताओं ने जो गलतियां की हैं उनका नुकसान तो देश और हिन्दू समाज को उठाना ही पड़ेगा। इस देश का बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ था। मुसलमानों की अलग देश की मांग के कारण पाकिस्तान बना। इसलिए भारत को हिन्दू हितों की रक्षा के लिए हिन्दू राष्ट्र होना चाहिए था। लेकिन, हमारे उदार हृदय सेकुलर नेताओं ने देश को सेकुलर राष्ट्र बनाने की गलती की। वह गलती भी सहनीय होती यदि बंटवारे के समय मुस्लिम समस्या को हल कर लिया जाता जिसके कारण बंटवारा हुआ। यानी बंटवारे के बाद हिन्दू मुस्लिम आबादी की अदला-बदली की जाती। डॉ. अंबेडकर ने पाकिस्तान पर लिखी अपनी पुस्तक में हिन्दू-मुस्लिम आबादी की अदला-बदली पर गहराई से विचार किया था। लेकिन, हमारे सेकुलर नेताओं ने ऐसा न करके मुस्लिम समस्या को जस का तस बनाए रखा। नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान तो मुसलमानों का पर्सनल एकाउंट बन गया, लेकिन भारत हिन्दू-मुसलमानों का ज्वाइंट एकाउंट बन गया। नतीजा सामने है। पाकिस्तान के मुसलमानों ने अपने देश के  हिन्दू और सिख अल्पसंख्यकों पर इतने अत्याचार किए कि उन्हें धर्मपरिवर्तन करना पड़ा या भागकर भारत शरण लेनी पड़ी। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी अब पाकिस्तान में हिन्दू नाममात्र को ही रह गए हैं। दूसरी तरफ भारत के मुसलमानों को आजादी ही नहीं यूनीफॉर्म सिविल कोड लागू न होना, अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाएं चलाने में स्वायत्तता, कश्मीर में धारा 370, जैसे विशेषाधिकार मिलने के बावजूद वे अन्याय होने का रोना रोते रहे और आबादी भी बढ़ाते रहे। देश में लगातार दंगे भी होते रहे। हिन्दू ‘मुस्लिम आतंकवाद’ का शिकार भी होते रहे। पाकिस्तान में कोई मुसलमान धर्मांतरण करके हिन्दू सिख या ईसाई नहीं बन सकता, लेकिन भारत में मुस्लिम धर्मांतरण कराके हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का अभियान चलाते रहे हैं। इस तरह विभाजित  भारत में सेकुलर राजनीति का बोल-बाला होने से केवल हिन्दू ही भारी नुकसान में रहे। जनसंख्या शास्त्री विनोद कुमार ने अपने लेख ‘इंडियन सेनसस एंड मुस्लिम पोपुलेशन ग्रोथ’  में लिखा है – ”मैंने 1961 से 1991 के जनगणना के आंकड़ों का विश्लेषण किया था। दोनों की आबादी में बढ़ोतरी फर्क वैसा ही था जैसा कि 1991 से 2001 के बीच था। 1961 से 1991 के दौरान मुस्लिम आबादी 133 प्रतिशत बढ़ी, जबकि हिन्दू आबादी 89 प्रतिशत। इस तरह मुस्लिम आबादी की वृद्धि हिन्दू आबादी की तुलना में 150 सौ प्रतिशत थी। यदि कुल मिलाकर देखा जाए तो 1961 से 2001 के बीच हिन्दू आबादी 36.6 करोड़ से बढ़कर 82.7 करोड़ हो गई, यानी 126 प्रतिशत बढ़ी, जबकि मुस्लिम आबादी 4.7 करोड़ से बढकर 13.8 करोड़ हो गई यानी 193 प्रतिशत बढ़ी। इसका अर्थ हुआ कि  मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर हिन्दुओं से 50 प्रतिशत ज्यादा थी।

बढ़ती मुस्लिम आबादी को लेकर केवल भारत ही नहीं, दुनिया के कई सारे देश चिंतित हैं। यूरोप में तो कहा जा रहा है कि यदि वहां मुस्लिम आबादी इसी तरह बढ़ती रही तो यूरोप यूरेबिया (यूरोप+अरेबिया) बन जाएगा। इसकी वजह यह है कि एक तरफ मुस्लिम देशों से आकर आव्रजक वहां बस रहे हैं और उनकी जन्म दर बहुत अधिक है, जबकि वहां के मूल निवासियों का जन्म दर बहुत कम है। नतीजतन वह दिन दूर नहीं, जब मुस्लिमों की आबादी कई देशों में यूरोपियों से ज्यादा हो जाएगी।

मुस्लिम आबादी तेजी से बढऩे की यूं तो कई वजहें हैं, लेकिन सबसे बड़ी वजह यह है कि मुस्लिम आबादी की प्रजनन दर गैर-मुस्लिमों की प्रजनन दर से ज्यादा है। कुछ जानकारों का कहना है कि यह मुस्लिमों के ‘जनसंख्या जिहाद’ का हिस्सा है। कभी इस्लाम तलवार से फैला था, अब जनसंख्या के जरिये उसे फैलाया जा रहा है। जनसंख्या जिहाद यानी किसी गैर-मुस्लिम समाज में ज्यादा बीवियां रखकर और ज्यादा बच्चे पैदा करना ताकि मुस्लिमों की आबादी गैर-मुस्लिमों के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़े और मुस्लिम बहुसंख्यक हो जाएं। कोई मुस्लिम महिला गैर-मुस्लिम से शादी न करे, ताकि मुस्लिम महिला और बच्चे गैर-मुस्लिम न बनें। मुस्लिमों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाता है कि वे गैर-मुस्लिम महिला से शादी करें, ताकि उसे मुस्लिम बनाया जा सके और उसके बच्चे भी मुस्लिम बनें।

भारत में मुस्लिम आबादी बढऩे की वजह मुसलमानों की आबादी की जन्म दर गैर-मुस्लिमों की जन्म दर के मुकाबले ज्यादा होती है। एक रिसर्च के मुताबिक, 1998-99 में दूसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के समय प्रजनन दर (एक महिला अपने जीवनकाल में जितने बच्चे पैदा करती है) हिन्दुओं में 2.8 और मुसलमानों में 3.6 बच्चा प्रति महिला थी। तीसरे राष्ट्रीय परिवार सर्वेक्षण के अनुसार यह घटकर हिन्दुओं में 2.59 और मुसलमानों में 3.4 रह गयी थी। यानी औसतन एक मुस्लिम महिला एक हिन्दू महिला के मुकाबले अधिक से अधिक एक बच्चे को और जन्म देती है।

भारत में मुसलमान क्यों ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं? गरीबी और अशिक्षा इसका सबसे बड़ा कारण है। भगत और प्रहराज के अध्ययन के मुताबिक, 1992-93 के एक अध्ययन के अनुसार तब हाईस्कूल या उससे ऊपर शिक्षित मुस्लिम परिवारों में जनन दर सिर्फ तीन बच्चा प्रति महिला रही, जबकि अनपढ़ परिवारों में यह पांच बच्चा प्रति महिला रही। यही बात हिन्दू परिवारों पर भी लागू रही। हाईस्कूल व उससे ऊपर शिक्षित हिन्दू परिवार में जनन दर दो बच्चा प्रति महिला रही, जबकि अनपढ़ हिन्दू परिवार में यह चार बच्चा प्रति महिला रही। ठीक यही बात आर्थिक पिछड़ेपन के मामले में भी देखने को मिली। इसके अलावा एक प्रमुख कारण यह है कि मुस्लिम परिवार नियोजन में विश्वास नहीं करते। ऐसा करना वे अल्लाह की इच्छा में दखलंदाजी देना मानते हैं, जबकि गैर-मुस्लिम परिवार नियोजन अपनाते हैं।

कई लोग यह तर्क देते हैं कि मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, वे खतरा महसूस करते हैं इसलिए अपनी संख्या बढ़ाने की कोशिश करते हैं। इस बात में कोई दम नहीं है, क्योंकि भारतीय मुसलमानों की आबादी की वृद्धि की दर पाकिस्तान से थोड़ी ही कम है, जबकि पाकिस्तान में तो मुसलमानों को कोई खतरा नहीं है। पाकिस्तान में 1961 से 1998 के बीच मुस्लिम आबादी 3.09 प्रतिशत की दर से बढ़ी तो भारत में 2.7 प्रतिशत की दर से। दरअसल आबादी बढ़ाकर इस्लाम को दुनिया का सबसे बड़ा धर्म बनाना मुसलमानों की वैश्विक योजना का हिस्सा है। मुस्लिम नेता इसके बारे में खुलकर बात करने को तैयार हैं कि वे क्यों आबादी बढ़ाना चाहते हैं। कई मुस्लिम नेता कहते हैं कि वे मुस्लिमों की जीवन की गुणवत्ता को लेकर चिंतित नहीं हैं, वरन मुसलमानों की संख्या को बढ़ाना चाहते हैं।

Indian Muslims pray on a road during an Eid al-Adha congregation in Kolkata, India on Saturday. - Image credit Bikas Das

देश के पूर्वी हिस्सों में बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ मुस्लिमों की आबादी बढऩे का प्रमुख कारण है। यह 2011 की जनगणना के आंकड़ों से स्पष्ट है। बांग्लादेश से सटे राज्य इस घुसपैठ से सबसे ज्यादा प्रभावित  हुए हैं और वहां मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी है। वैसे घुसपैठिए आगे निकल कर बाकी राज्यों में भी जाकर बसते हैं। हमारे देश की सेकुलर  और वोटबैंक राजनीति के चलते इन घुसपैठियों की शिनाख्त कर उन्हें वापस भेजना आसान नहीं है। तब सभी सेकुलर पार्टियां झूठा शोर मचाने लगती हैं कि मुसलमानों को परेशान किया जा रहा है।

बढ़ती मुस्लिम आबादी पर लगाम के लिए कुछ कदम तुरंत उठाने की जरूरत है।

  1. भारत के सभी धर्मों पर तुरंत प्रभाव से समान आचार संहिता लागू की जाए।
  2. परिवार नियोजन को सभी धर्मों के लोगों पर लागू किया जाए।
  3. बांग्लादेश से मुस्लिमों की अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने का काम तेजी से पूरा हो और चौकसी तेज हो।
  4. धारा 370 को खत्म किया जाए और कश्मीर को सभी भारतीयों के लिए खोला जाए।

आजकल दुनिया भर के मुसलमानों में रेडिकलाइजेशन (चरमपंथ) बढ़ता जा रहा है। भारत में तेजी से बढ़ती मुस्लिम आबादी के साथ रेडिकलाइजेशन का खतरा और बढ़ जाएगा। बढ़ती मुस्लिम आबादी सेकुलरिज्म के लिए बहुत बड़ा खतरा है। इस्लाम एक सेकुलरिज्म विरोधी धर्म है, जो यह मानता है कि इस्लाम ही एकमात्र सच्चा और ईश्वर का धर्म है, बाकी धर्म मानव मिर्मित और झूठे हैं। ईश्वर बाकी धर्मों को मान्यता नहीं देता। इस्लाम को मानने वाले मोमिन हैं और न मानने वाले काफिर। कुरान में ईश्वर ने इन काफिरों के खिलाफ युद्ध या जिहाद  करने का निर्देश दिया है। इस्लाम को मानने वालों का एक ही मकसद होता है, इस दुनिया को  दारूल हर्ब (गैर-मुस्लिम देश) से दारूल इस्लाम (इस्लामिक मुल्क) बनाया जाए। यानी ईश्वर का भेजा इस्लामी कानून और व्यवस्था यानी शरीयत लागू हो। मुसलमान कई सेकुलर पश्चिमी देशों में, जहां-जहां उनकी सघन बस्ती है, वहां शरीयत लागू क्षेत्र घोषित कर देते हैं। नाइजीरिया जैसे देश भी हैं, जहां एक क्षेत्र में सामान्य कानून लागू है और एक में शरीयत लागू। सेकुलर भारत में ही देखिए कश्मीर घाटी में हिन्दू रह नहीं सकते, उन्हें वहां से भागना पड़ा। अभी बराक ओबामा आए और भारत को सेकुलरिज्म पर भी भाषण दे गए, लेकिन उनके ही देश के लूसियाना राज्य के गवर्नर बॉबी जिंदल ने फॉक्स न्यूज को दिए गए साक्षात्कार में कहा कि यदि अमेरिका ने रेडिकल इस्लाम की चुनौती को गंभीरता से नहीं लिया तो निकट भविष्य में यहां भी ‘नो गो जोन’ जाएंगे। उल्लेखनीय है कि अमेरिका में तो एक प्रतिशत ही मुसलमान हैं। हाल ही में ब्रिटेन के बारे में विवाद हुआ था कि वहां कई इलाके ऐसे हैं जहां सघन मुस्लिम आबादी वाले बस्ती में शरीयत कानून लागू होता है और मुसलमानों के अलावा बाकी लोग वहां नहीं जा सकते। मुसलमानों के साथ यह समस्या है कि वे देश के कानून के मुताबिक नहीं, अपने धर्म के कानून के मुताबिक रहना चाहते हैं। इस कारण बढ़ती मुस्लिम आबादी हर देश के लिए चिंता का विषय बन गई है। भारत इसका अपवाद नहीं है।

षडयंत्र के अंतर्गत हो रहा है सब

सुरेन्द्र जैन, विहिप के संयुक्त महामंत्री और प्रवक्ता

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ये चिंता केवल भारत में ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व में की जा रही है। पिछले दिनों ब्रिटेन के अंदर वहां के पार्लियामेंट में मुस्लिम आबादी का विषय पर चर्चा हुई हाउस ऑफ कॉमन्स के अंदर वहां के लीडर ऑफ अपोजिशन ने कहा कि हमारी आबादी कम होती जा रही है। डेमोक्रेसी का स्तर घट रहा है और मुसलमानों की आबादी बढ़ रही है। ‘ऐवरी ब्रिटिशर हेव प्रोड्यूस फोर चिल्ड्रेन’। कुछ लोग हंसे भी इस बात पर, तब वहां के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने हस्तक्षेप करते हुए कहा, ‘नो ऐवरी ब्रिटिशर हेब प्रोड्यूस थ्री चिल्ड्रेन, वन फॉर मदर, वन फॉर फादर, ऐंड वन फॉर द नेशन’। उस वक्त किसी ने उनकी बात का मजाक नहीं उड़ाया, बल्कि उनकी इस बात का स्वागत किया, क्योंकि वो देश के सामने आ रहे खतरे को देख पा रहे थे। दुर्भाग्य से भारत के अंदर सेक्युलेरिज्म के नाम पर एक ऐसा वर्ग राजनीति के अंदर और पत्रकारिता के अंदर खड़ा हो गया है जो इस खतरे की ओर से भारत के लोगों की नजरें हटाना चाहता है चंद वोटों के लिए। वो इस खतरे की ओर से भारत के लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं, जो कि कल के दिन उन्हें भी डस लेगा। ये सब निश्चित तौर पर एक षडयंत्र के अंतर्गत हो रहा है, जिसे कि मुस्लिम समाज खुद कहता है कि वो भारत को दारुल इस्लाम में परिवर्तित करना चाहता है। प्रजातंत्र के अंतर्गत कितने वोट हैं ये इस पर निर्भर करेगा कि वहां पर सत्ता किसकी होगी, इसलिए वोटों को बढ़ाना, आबादी को बढ़ाना उनका मकसद है। वो खुद कहते हैं कि आबादी बढ़ाना तो अल्लाह ताला की सेवा है। इसलिए ये सब एक निश्चत उद्देश्य के अंतर्गत चल रहा है। इसके लिए पहला कदम ये उठाना होगा कि इस खतरे की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करना, दूसरा इस खतरे को रोकने के लिए उचित कार्यवाही करना, तीसरा सबसे महत्वपूर्ण देश में कॉमन सिविल कोर्ट लाना चाहिए। पूरे विश्व के अंदर केवल भारत ही ऐसा देश है जहां पर धर्म के आधार पर सिविल कोर्ट तैयार होता है। किसी भी सभ्य देश में ऐसा नहीं है। गोवा के अंदर भी सिविल कोर्ट लागू है। न जाने इन्हें भारत के अंदर ही क्यों परेशानी है?

हिंदुओं को आबादी के असंतुलन को भांपना होगा

चंपत राय, विहिप के अंतर्राष्ट्रीय महामंत्री

World Hindu Congress 2014

मैं इसका कारण ये समझता हूं कि हिंदू समाज भारत सरकार के कानून का पालन करता है। सरकार ये कहती है कि देश की भलाई के लिए परिवार को छोटा करो तो हिंदू समाज मानता है, लेकिन कुछ मुस्लिम नेता अपने समाज को देश की भलाई के लिए काम करने से रोकते हैं। तो ये भारत सरकार के कानून को न मानने वाले और कानून को मानने वाले दो समाज के बीच की मानसिकता का अंतर है। दूसरी बात मुस्लिम समाज को लगता है कि ये देश तो हमारा है ही नहीं। इस देश पर तो हमें कब्जा करना है और कब्जा करेंगे वो लोकतांत्रिक पद्धति से यानी जनसंख्या बढ़ाएंगे। और आबादी बढ़ा भी रहे हैं राजनीतिक वर्चस्व बढ़ाने के लिए। दूसरी तरफ हिंदुओं में ये दोष आ गया है कि वो आबादी के असंतुलन के खतरे का अनुभव ही नहीं करता है। कश्मीर घाटी में आबादी का असंतुलन हो गया तो कश्मीर के ब्राह्मणों की जो अवस्था हुई है उसे सारी दुनिया जानती है। हिंदू समाज इससे कुछ सीख नहीं ले रहा है। तो हिंदू समाज आबादी के असंतुलन को भांपे। जब हिंदू समाज ये भांपने लगेगा, दुष्परिणाम की परवाह करने लगेगा तो सब ठीक हो जाएगा। देश में कानून हैै, लेकिन कानून बराबरी के आधार पर लागू होना चाहिए, कठोरता से लागू होना चाहिए, सब पर लागू होना चाहिए। जो देश का कानून नहीं मानते उन्हें उसके परिणाम बता देने चाहिए। पढ़े-लिखे हिंदूओं को आबादी के असंतुलन को समझना होगा कि अगर ऐसा होता रहा तो उसकी नस्ल ही नष्ट हो जाएगी।

नहीं मिलना चाहिए वोटिंग राईट

मुरली मनोहर शर्मा, राष्ट्रीय सह-सहयोजक, भारत रक्षा मंच

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मुस्लिम संप्रदाय ने देश में स्वाधीनता के दिन ही कह दिया था कि वो हिंदू समाज के साथ नहीं रह सकते हैं, तो देश का विभाजन सिर्फ और सिर्फ धर्म के आधार पर किया गया। अब समय आ गया है कि हमें जागना है और समझना है कि इनकी जनसंख्या जिस तरह से बढ़़ रही है और अगर कल इनकी जनसंख्या हमारे बराबर हो गई तो देश का टुकड़ा होने से कोई भी रोक नहीं सकता है। ये होकर रहेगा। आज देश का बड़ा भाग इनके कब्जे में है तो देश का टुकड़ा होना निश्चत है। इनकी मनोस्थिति ऐसी है कि ये हिंदुओं के साथ नहीं रह सकते। एक देश में दो संविधान नहीं होने चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि आप हिंदू के साथ फैमिली प्लानिंग की बात करें और मुस्लिम के साथ न करें। या तो उनके संविधान को मानें या देश के संविधान को और अगर हिंदुओं के साथ फैमिली प्लानिंग की बात लागू हो तो सिक्ख, मुस्लिम, ईसाई सबके साथ ये लागू हो। अगर उनके लिए जबर्दस्ती कोई कानून बनता है तो उनको देश में वोटिंग राईट बिल्कुल भी नहीं देना चाहिए।

  सतीश पेडणेकर

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