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‘बीजेपी और पीडीपी गठबंधन राजनीतिक या वैचारिक नहीं’’- राम माधव

‘बीजेपी और पीडीपी गठबंधन राजनीतिक या वैचारिक नहीं’’- राम माधव

हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भरोसा है कि वो ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे अतंकवाद से निपटने के लिए सेना की शक्तियां कमजोर पड़े।’’ राम माधव, राष्ट्रीय महासचिव, भाजपा, ने एस.ए.हेमंता से बातचीत करते हुए बेंगलुरू में ऐसा कहा। अफ्स्पा (AFSPA) पर भाजपा के दृष्टिकोण के विषय में पूछने पर उन्होंने ये बात कही, जिसका विरोध उसकी गठबंधन पार्टी पीडीपी के द्वारा किया जा रहा है। भाजपा महासचिव ने आगे कहा, ”कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन क्या कहता है, अंत में इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री का निर्णय मान्य है। उन पर भरोसा रखे, वह सेना को कमजोर नहीं करेंगे।’’

बेंगलुरू में आयोजित भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक का क्या संदेश है?

पंचायत से लेकर संसदीय स्तर तक पार्टी को मजबूत बनाना; पार्टी के सदस्यों को सक्रिय कार्यकर्ता बनाना, वैचारिक भावना के लिए दिशा-निर्देशक शिविर का आयोजन करना, गवर्नमेंट ऐक्शन की रक्षा करना, सरकार के कार्यक्रम और योजनाओं को लोगों तक पहुंचाना, डबल स्टैंण्डर्ड को बेनकाब करना तथा विपक्षी दलों के जनविरोधी और  विकास विरोधी नकारात्मक और अवरोधक रवैये का खुलासा करना।

कुछ मंत्रियों के द्वारा दिए गए बयान से पार्टी और सरकार दोनों ही शर्मनाक स्थिति का सामना कर रही हैं। क्या इस पर नेतृत्व में चर्चा हुई?

यह पार्टी का आंतरिक मामला है, जिसकी हम सार्वजनिक रूप से चर्चा नहीं कर सकते, लेकिन मैं यह कह सकता हूं कि जिससे सरकार का ध्यान विकासात्मक एजेंडे से भटकता हो, इस तरह के बयानों पर पार्टी मूकदर्शक बनकर नहीं बैठी रहेगी।

भाजपा कैडर और भाजपा से सहानुभूति रखने वाले लोगों को जम्मू-कश्मीर में बीजेपी की भूमिका को लेकर आशंका है। उन्हें लगता है कि पीडीपी ने जम्मू-कश्मीर में भाजपा को बिल्कुल भी महत्व नहीं दिया है।

मैं वास्तविक चिंता को समझ सकता हूं, लेकिन मैं पूरी तरह से आपको अश्वासन दे सकता हूं कि कॉमन मिनीमम प्रोग्राम में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे देश की सुरक्षा और अखंडता खतरे में पड़े। इसका मतलब ये नहीं है कि बीजेपी का पीडीपी के साथ एक संपूर्ण समझ और समझौता हो गया है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है और न ही इस विचारधारा को बिल्कुल विपरीत दिशा में देखा जा सकता है। लेकिन, मैं यह कह सकता हूं कि भाजपा  और पीडीपी का गठबंधन सरकार बनाने के लिए है, राजनीतिक या वैचारिक नहीं। इस व्यवस्था के माध्यम से एक विकास के एजेडे के क्रम को आगे बढ़ाने के लिए और राष्ट्रीय मुख्यधारा से लोगों को जोडऩे के लिए हम ऐसा चाहते हैं।

क्या ये संभव है और अगर हां, तो कैसे?

यह एक सतत प्रक्रिया है। मैं आपको एक उदाहरण देता हूं। एक अलगाववादी नेता अब्दुल घनी लोन हुआ करते थे। उनके बेटे सज्जाद लोन विधायक हैं। सज्जाद ने बीजेपी कोटे के तहत मंत्री पद की शपथ ली। उन्होंने भारतीय संविधान की कसम खाई और शपथ ग्रहण की कि भारत की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा करेंगे। क्या ये सकारात्मक विकास नहीं है? हजारों लोग हैं जो कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनकर राष्ट्रीय मुख्यधारा से जुडऩा चाहते हैं।

अनुच्छेद 370 के बारे में क्या कहेंगे? भाजपा ने इसको हटाने की बात तो की, लेकिन अब इस मामले पर शांत नजर आ रही है?

हमने अपने दृष्टिकोण को नहीं बदला है। हमने सिर्फ ये कहा है कि हमें वर्तमान यथास्थिति को बनाए रखना होगा। अब इसका क्या मतलब है? इसका केवल इतना मतलब है कि वर्तमान स्थिति निरस्त न हो, और कुछ नहीं। अनुच्छेद 370 को खत्म करने के लिए जरूरी है कि भाजपा को लोकसभा और राज्यसभा दोनों में दो-तिहाई बहुमत मिले और साथ ही जम्मू-कश्मीर विधानसभा में भी दो-तिहाई बहुमत हो, तभी यह संभव है।  राज्यसभा में इतना बहुमत पाने के लिए जरूरी है कि कई राज्य कि विधानसभाओं का बहुमत हमारे पास हो, यानि हमारी कई राज्यों में  जीत हो। तब तक हम इस विषय पर टिके रहने के सिवाय कोई पर्याप्त, ठोस, सार्थक और व्यवहारिक कदम नहीं उठा सकते। अनुच्छेद 370 को खत्म करने की जरूरत को देखते हुए हमने अपने दृष्टिकोण को दोहराने का निर्णय लिया है, लेकिन वर्तमान स्थिति बिगड़े नहीं, इसके लिए परिपक्व स्टैंड भी लिया है।

अफ्स्पा के बारे में क्या कहेंगे? इसे हटाने के मुद्दे पर भाजपा शांत नजर आ रही है और पीडीपी सक्रिय है?

अफ्स्पा अशांत क्षेत्रों में सेना के द्वारा ही इस्तेमाल किया जा रहा है, जैसा कि अशांत क्षेत्र अधिनियम द्वारा अधिसूचित है। अब सुरक्षा बलों, अद्र्ध सैनिक बलों, खुफिया ब्यूरो और राज्य पुलिस के प्रतिनिधियों के साथ मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एकीकृत कमान है। ये एकीकृत कमान समय-समय पर अशांत क्षेत्रों की जांच करती रहती है और अगर किसी क्षेत्र को अफ्स्पा वाले क्षेत्र से हटाने कि जरूरत होती है तो इसके लिए सिफारिश प्रधानमंत्री के पास भेज दी जाती है। हमने कहा है कि अशांत क्षेत्र ऐक्ट की जांच करने दी जाए, क्योंकि समय-समय पर इसकी जांच करने में कोई बुराई नहीं है। हमें प्रधानमंत्री पर भरोसा है कि वो ऐसा कुछ नहीं करेंगे, जिससे अतंकवाद से निपटने के लिए सेना की शक्तियां कमजोर पड़े। दिलचस्प है लेह-लद्दाख को छोड़ कर पूरा जम्मू और कश्मीर घाटी अशांत क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत है। सेना अशांत क्षेत्रों में ही अफ्स्पा का प्रयोग करती है और अगर अधिक-से-अधिक क्षेत्रों को इस लिस्ट से हटा दिया गया तो सेना के लिए अफ्स्पा का प्रयोग करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। इतने अशांत क्षेत्रों को इस सूची से सामान्य स्थिति में लाने की जिम्मेदारी राज्य सरकार पर है और सरकार अशांत क्षेत्रों कि लिस्ट को कम करने की ओर काम कर रही है।

तो आपके कहने का मतलब है कि भाजपा और पीडीपी के बीच सभी मामलों पर आपसी समझ है?

सभी मामलों पर नहीं, विकासात्मक मुद्दों पर हमारे विचार एक-से हैं। जैसा कि मैंने पहले भी कहा, जम्मू, कश्मीर घाटी और लेह-लद्दाख, इन तीनों क्षेत्रों में विकास की शुरूआत के लिए ये केवल सरकारी गठबंधन है। ये न तो राजनीतिक गठबंधन है और न ही वैचारिक गठबंधन। पीडीपी और भाजपा अपने-अपने विचारों को स्पष्ट करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन इससे सरकार की स्थिरता पर कोई खतरा नहीं होगा।

लेकिन मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कहा था कि हुर्रियत से बात करेगी और भाजपा ने इसका विरोध भी किया था। ऐसे में आप कैसे सामंजस्य बैठाते हैं? 

केंद्र में मौजूद भाजपा की सरकार पाकिस्तान के मुद्दे पर हुर्रियत से बात नहीं करेगी, क्योंकि हमारा मानना है कि भारत-पाकिस्तान द्विपक्षीय चर्चा का विषय है। इसमें तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। इस संदर्भ में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने सचिव-स्तर की वार्ता बुलाई, तब पाकिस्तान ने जोर देकर कहा कि वह इस मुद्दे पर हुर्रियत से बात करेगा। लेकिन, जम्मू-कश्मीर की सरकार का हुर्रियत से बात करने में और केंद्र सरकार का हुर्रियत से बात करने में बहुत बड़ा फर्क है। जम्मू-कश्मीर की सरकार हुर्रियत से बात करे इसमें कुछ गलत नहीं है, क्योंकि सरकारों को राज्य के सभी हितधारकों को बातचीत में संलग्न करना चाहिए। ये वास्तविकता है कि कई राज्य सरकारों ने नक्सल प्रतिनिधियों से बात की है। देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा पर कोई समझौता किए बिना, ये आवश्यक है कि सभी सही विचार वाले व्यक्तियों और बलों को राज्य के विकास के लिए आगे लाया जाए। वास्तव में अटलजी के नेतृत्व में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने भी हुर्रियत से बात करने की पेशकश की थी। इसलिए जम्मू-कश्मीर के हुर्रियत से बात करने में कुछ भी गलत नहीं है। अंत में देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा को देखते हुए केंद को संबंधित मामलों पर कदम उठाना होगा।

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