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फोकस लोहे के पर्दे के पीछे गांधी परिवार की माया

फोकस लोहे के पर्दे के पीछे गांधी परिवार की माया

जनतंत्र के किसी भी रूप और संसदीय प्रणाली में तो बिल्कुल भी नहीं, किसी राजनेता के जीवन के प्रति गोपनीयता बनाये रखने की बात सोचना ही निरर्थक है। जनतंत्र में लौह पुरूष व महिला तो हुई हैं पर लोहे के पर्दे के पीछे के जीवन की बात नहीं सुनी। जनतंत्र में भारत में लौह पुरूष हुये सरदार बल्लभभाई पटेल और ब्रिटेन में लौह महिला तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती मार्गरेट थैचर। दोनों प्रसिद्ध हुये अपनी कार्यशैली व अपने दृढ़ निश्चय व निर्णय लेने की क्षमता के लिये, पर उनका जीवन लोहे के पर्दे के पीछे का कभी नहीं रहा।

पर्दे के पीछे जीवन के गुलछर्रे तो तानाशाह ही उड़ाते हैं। गोपनीयता ही उनकी जीवन शैली व शक्ति है और सफलता का राज। उनकी सदैव यही चेष्ठा रहती है कि पर्दे के पीछे उनके शासन में क्या हो रहा है उसकी भनक या सुगंध बाहर न निकल पाये। तानाशाहों के नृशंस कार्यकाल में सैंकड़ों-हजारों लोग मौत के घाट उतार दिये जाते हैं पर उनके परिजनों को तो उनकी मौत पर शोक व्यक्त करने का भी अधिकार नहीं होता। उल्टे शोक मनाना व आंसू बहाना ही एक गम्भीर अपराध बन जाता है जिसकी सजा भी मौत ही होती है।

कभी-कभार यह सूचना लीक हो निकलती है कि अमुक तानाशाह कई दिनों, हफ्तों व महीनों से सार्वजनिक रूप में दिखाई नहीं दिया। अधिकारिक रूप से कोई नहीं बताता कि शासक कहां है और क्यों अदृश्य है। इस कारण स्वतान्त्रिक देशों के मीडिया में अफवाहें फैल जाती हैं कि वह गंभीर रूप से बीमार है या उसकी मृत्यु हो चुकी है या फिर उसका तख्ता पलट दिया गया है। तब वह यकायक ड्रामाई तौर पर एक दम प्रकट हो जाते हैं और जनता खुशी से भाव-विभोर हो उठती है मानो भगवान ने ही अचानक दर्शन दे दिये हों।

जनतन्त्र में ऐसे पाखण्डों के लिये कोई स्थान नहीं है, क्योंकि यहां तो सब कुछ जनता की आंखों के सामने उसकी जानकारी में होता है। पारदर्शिता ही तो जनतंत्र की जान और पहचान है। जनतन्त्र में एक राजनेता का जीवन उसी प्रकार नंगा है जिस प्रकार नवजात शिशु अपनी मां के सामने।

लेकिन, श्रीमती सोनिया गांधी के राजनीति के सार्वजनिक जीवन में पदार्पण के साथ तो ऐसा लगता है राजनीति में बहुत कुछ बदल गया है। खुलेपन और पारदर्शिता को गोपनीयता ने ग्रस लिया है। पहले तो श्रीमती सोनिया एक दशक तक सब को सकते में रखे रहीं और विवाह के उपरांत भी उन्होंने भारत की नागरिकता प्राप्त नहीं की। अपने पति व अपनी सास श्रीमती इन्दिरा गांधी के जीवनकाल में तो उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता प्राप्त करना भी गवारा न समझा। राजीव गांधी की दु:खद हत्या के बाद उन्होंने पांच वर्ष ऐसी चुप्पी साधे रखी कि उनके चाहने वालों और विरोधियों को कोई भनक नहीं पडऩे दी कि वह क्या करने वाली हैं। उनके समर्थक चाहते थे कि वह पार्टी की कमान अपने हाथ में संभाल लें।

मीडिया तरह-तरह की अटकलें लगाती रही। आखिर मार्च 1996 में उन्होंने कांग्रेस की साधारण सदस्यता ग्रहण की और कुछ समय बाद ही उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी का तख्ता पलट दिया और स्वयं अध्यक्ष बन गईं। तब से वह आज तक अध्य्क्ष पद पर विराजमान हैं और उन्होंने इस पद पर सबसे अधिक लम्बे समय तक आसीन रहने का इतिहास रच दिया है। इस कड़ी को कभी कोई तोड़ेगा तो लगता है कि उनका बेटा राहुल गांधी ही।

श्रीमती गांधी इस बात पर गर्व महसूस करती लगती हैं कि वह अपने प्रति पूरी गोपनीयता बनाये रखती हैं। वह अपनी जनता को यह भी पता लगने नहीं देना चाहतीं कि उनका धर्म क्या  है। उनका मानना है कि यह उनका अपना निजी व व्यक्तिगत मामला है जिससे जनता को कोई लेना-देना नहीं है।

तब तो यही देश के हर नागरिक का हक बन जाता है। ऐसी स्थिति में किसी राजनीतिक दल व सरकार को कैसे पता चलता है कि कौन किस धर्म से सम्बन्धित है और उस धर्म के देश में कितने अनुयायी हैं। तब कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ने मुस्लिम समुदाय के बारे सच्चर कमिटी का गठन कैसे कर दिया? यदि धर्म व्यक्ति का निजी मामला है तो हमारे राजनीतिक दल व नेता धर्मनिरपेक्षता व सांप्रदायिकता का खेल कैसे खेलते हैं, जिसका आधार ही मात्र धर्म है? अगर ऐसा है तो सरकार को तो सभी आवेदन-पत्रों में से ‘धर्म’ का कॉलम ही हटा देना चाहिये।

अपने धर्म से भी ज्यादा निजी व व्यक्तिगत मामला है व्यक्ति का वैवाहिक जीवन। तब तो सरकार को किसी से यह पूछने का भी हक नहीं है कि वह विवाहित है या नहीं और उसके कितने बच्चे हैं। अनेकों बार श्रीमती गांधी विदेश दौरे पर निकल जाती हैं, लेकिन किसी को यह भनक नहीं लगने देतीं कि वह कहां और क्यों गई हैं। लगभग दो वर्ष पूर्व वह दिल्ली के एम्स व गंगाराम अस्पताल में उपचार के लिये भर्ती हुईं थीं। परंपरा यह है कि जब कोई ऐसा महानुभाव अस्पताल में भर्ती होता है तो उसके स्वास्थ्य का बुलेटिन प्रतिदिन जनता की जानकारी के लिये जारी की जाती है, लेकिन सरकार व अस्पतालों ने यह परम्परा तोड़ दी और किसी को पता न लगने दिया कि उन्हें  हुआ क्या है और उनकी हालत कैसी है, जिसे जानने के लिये जनता बेताब थी। जब वह विदेश चली गईं तो न कांग्रेस और न तत्कालीन सरकार यह बताने के लिये तैयार थी कि वह किस देश में किस अस्पताल में भर्ती हैं और उनको हुआ क्या है। यह सूचना तब भी रोकी गई, जबकि सबको पता है कि श्रीमती गांधी तब राष्ट्रीय सलाहकार समिति की अध्यक्ष थीं और उन पर सारा व्यय जनता के खजाने से हो रहा था।

उनकी आयकर रिटर्न भी इतनी गोपनीय है कि सरकार उसकी जानकारी देना उनकी निजी सुरक्षा को खतरा मानती है। उनके पुत्र राहुल भी परिवार की इस महान परम्परा को बखूबी आगे बढ़ाते जा रहे हैं। वह कई बार देश में जनता की आंखों से ओझल हो जाते हैं। तब किसी को पता नहीं होता और न कोई बताता ही है कि वह कहां हैं। वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं, देश की सबसे पुरानी पार्टी के उपाध्यक्ष हैं। यही नहीं, उन्हें एसपीजी की सर्वोच्च सुरक्षा भी प्रदान की गई है। क्या उन्हें बिन बताये सुरक्षा की नजर से ओझल हो जाना चाहिये? यदि वह हो जाते हैं तो सुरक्षा का तुक ही क्या रह जाता है? यदि वह ऐसा करते हैं तो क्या वह अपने जीवन की सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं कर रहे? उसके लिये कौन जिम्मेवार होगा? यदि सरकार उनका अता-पता जानने की कोशिश करती है तो यह उन पर सरकार द्वारा नजर रखे जाने का गम्भीर अपराध बन जाता है।

श्रीमती सोनिया की बेटी प्रियंका परिवार की गोपनीयता की परंपरा को अपने साथ अपने ससुराल भी ले गई हैं। पिछले वर्ष एक व्यक्ति ने सूचना के अधिकार के अन्तर्गत प्रियंका की हिमाचल में भूमि के बारे सूचना चाही। प्रियंका ने हिमाचल सरकार से आग्रह किया कि यह सूचना उपलब्ध न करवाई जाये वरन उनकी जान खतरे में पड़ जायेगी। कौन नहीं जानता कि सरकार ने उनकी सुरक्षा की दृष्टि से जो एक बंगला दिल्ली में दे रखा है वह कहां है। उससे तो उनकी सुरक्षा को खतरा पैदा नहीं हुआ।

प्रियंका ही नहीं, श्रीमती सोनिया के दामाद रॉबर्ट वडरा की भूमि व संपत्ति के रिकॉर्ड भी गोपनीय हैं। जून 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह के कार्यालय ने श्री वडरा की भूमि के बारे कागजात यह कहकर पेश करने से मना कर दिया था कि वह ‘गोपनीय’ है। यूपीए के कार्यकाल में वडरा परिवार में संदिग्ध हालात में कई मौतें हुईं, पर उन पर जांच भी गोपनीयता के ढेर के नीचे दबकर रह गई।

कांग्रेस ने राहुल के छुट्टी और अज्ञातवास पर तो बड़ा बखेड़ा खड़ा किया था, लेकिन या तो उसे स्वयं पता नहीं था या फिर जानकर भी बताना नहीं चाहती थी कि वह कहां हैं और कब लौटेंगे। लेकिन, अब राहुल गांधी के लौट आने के बाद उनके गंतव्य स्थानों और आगमन के बारे में अखबारों में रोज-रोज नये किस्से छप रहे हैं।

अम्बा चरण वशिष्ठ

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