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जम्मू कश्मीर में नगर विस्तार पर बवाल

जम्मू कश्मीर में नगर विस्तार पर बवाल

जम्मू कश्मीर में मीडिया ने एक नया शोशा छोड़ा है। कश्मीरी हिन्दू सिक्खों के लिये सरकार एक नया शहर बसाने जा रही है, जिसमें केवल वही हिन्दू सिक्ख रहेंगे, जिनको आतंकवादियों ने वहां से निकाल दिया था। लेकिन इससे पहले दो टिप्पणियां करना जरुरी है, क्योंकि इन टिप्पणियों की रोशनी में कश्मीर में उठा यह विवाद आसानी से समझा जा सकता है। यमन, जहां एक प्रकार से नरसंहार चल रहा है और वहां शिया समाज के लोगों को मुसलमान बेरहमी से मार रहे हैं, से हजारों भारतीयों को सफलतापूर्वक निकाला गया है, लेकिन मीडिया के रवैये से दुखी होकर पूर्व सेनाध्यक्ष वी.के. सिंह, जो आजकल राज्य मंत्री हैं, ने अंग्रेजी शब्द प्रास्टीट्यूट के हिज्जे में एक शब्द का हेरफेर  कर दिया, जिससे मीडिया के कुछ मालिकों को लगने लगा कि परोक्ष रुप से उनकी तुलना वेश्या से की गई है। किसी ने कहा भी है – ‘एक नुक्ते के हेर-फेर से खुदा जुदा हो गया।’ जब मैंने वी.के. सिंह द्वारा किये गये नुक्ते के इस हेर-फेर को पढ़ा, तो मुझे भी लगा था कि उन्हें यह नहीं करना चाहिये था। लेकिन अब जम्मू कश्मीर में नगरीकरण के मुद्दे पर मीडिया द्वारा मचाए गये इस विवाद को देखा तो मुझे लगा कि वी.के. सिंह ही ठीक थे, मेरी धारणा गलत थी।

भारत में पिछले आठ दशकों से तेजी से नगर विस्तार हो रहा है। नये नगर बसाए और बनाए जा रहे हैं। चंडीगढ़ और गांधीनगर इसके नजदीक के उदाहरण हैं। पुराने नगरों का विस्तार हुआ है। उदाहरण के लिये, दिल्ली से नई दिल्ली, मुम्बई से नवी मुम्बई, पंजाब में नंगल से नया नंगल इत्यादि। इस सूची में सैकड़ों नाम जोड़े जा सकते हैं। जम्मू कश्मीर में ही जम्मू शहर का इतना विस्तार हुआ है कि पुराने जम्मू के मुकाबले, नये विस्तार को नया जम्मू की संज्ञा भी दी जा सकती है। इसी प्रकार की एक योजना जम्मू कश्मीर सरकार ने राज्य में नये नगर बनाने की प्रस्तुत की।

मुख्यमंत्री ने यह भी कह दिया कि नये नगर में, आवंटन के समय कश्मीर में से निकाले गये लोगों को प्राथमिकता दी जायेगी। हिन्दुओं के लिये ही एक अलग नगर बसाया जा रहा है, इस प्रकार के संकेत उनके बयान से कहीं भी नहीं मिलते थे। लेकिन मुख्यमंत्री की भाषा के मीडिया मालिकों ने वही अर्थ निकाले, जो उनको अपने व्यवसाय और मकसद के अनुकूल पड़ते थे। (यह भी हो सकता है कि मुख्यमंत्री खुद भी अपने राजनैतिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुये, चाहते हों कि उनके बयान के वही अर्थ निकाले जायें जो मीडिया ने निकाले हैं) तुरन्त इलेक्ट्रोनिक मीडिया के माध्यम से रेड अलर्ट जारी कर दिया कि भारत सरकार, जम्मू कश्मीर सरकार की सहायता से वहां केवल हिन्दुओं के लिये एक नया शहर बसाने जा रही है। इस अवसर पर यदि मीडिया को संशय का लाभ देना हो, तो कहा जा सकता है कि जब मुख्यमंत्री खुद ही इन्हीं अर्थों के निकाले जाने में रुचि रखते हों तो मीडिया का क्या दोष है? तब भी मीडिया बरी नहीं हो सकता। तब तो मामला और भी संगीन हो जाता है। इसका अर्थ तो यह हुआ कि मीडिया मुख्यमंत्री के बिछाये जाल में फंस गई और परोक्ष रुप से उन्हीं की सहायता करने लगी। खैर, इस रेड अलर्ट के बाद अपने अपने अखाड़ों में इसके पक्ष विपक्ष में बहस चला दी। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में चलाई जा रही बहस में एक पेंच रहता है। बहस के लिये किसे आमंत्रित करना है, इसका निर्णय और कोई नहीं बल्कि मालिक स्वयं ही करता है। इसका अर्थ है बहस को किस दिशा में चलाना है और दर्शकों तक उसका क्या निष्कर्ष पहुंचना चाहिये, इसका निर्णय मोटे तौर पर कार्यक्रम में भाग लेने वालों का चयन करते समय ही हो जाता है।

यही सब कुछ कश्मीर घाटी में नया श्रीनगर या कुछ नये नगर बनाने के मामले को लेकर हुआ। जम्मू कश्मीर में समय की मांग को देखते हुये नये नगर बनाये जा सकते हैं, इससे किसी को क्या विरोध हो सकता है? नये नगरों में आवंटन को लेकर प्राथमिकता उन लोगों को दी जानी चाहिये जो आतंकवाद के कारण राज्य से भगा दिये गये, इससे भी किसी को विरोध का कोई कारण दिखाई नहीं देता। कश्मीरी हिन्दू सिक्खों को वापस राज्य में लाने के प्रयास करने चाहिये, इससे भी लगभग सभी सहमत हैं। यहां तक कि आतंकवादियों का प्रत्यक्ष परोक्ष प्रतिनिधित्व करने वाले अलगाववादी भी इसका समर्थन करने को विवश हैं। जब आप अस्थाई तौर पर कोई कालोनी बसाते हैं तब तो आप किसी खास वर्ग, समुदाय या व्यवसाय के लोगों को एक साथ वहां बसा सकते हैं, लेकिन जब आप एक पूरा शहर बसाते हैं तो आप उस शहर में किसी भी एक वर्ग के लोगों को कैसे बसा सकते हैं? आखिर आवंटन के कोई नियम बनेगें। अलबत्ता सरकार चाहे तो किसी वर्ग को प्राथमिकता जरुर दे सकती है। इस मामले में भी सरकार ने कश्मीरी हिन्दू विस्थापितों को प्राथमिकता देने की ही बात कहीं थी, लेकिन जब मीडिया ने उसमें नुक्ते का हेर-फेर करके घाटी में रेड अलर्ट जारी कर दिया तो सरकार ने पूरी स्थिति पर अपना स्पष्टीकरण दे दिया ताकि मामला ठीक से समझ में आ जाये तो उसी मीडिया ने छाती पीटनी शुरु कर दी कि सरकार अपने स्टैंड से पलट गई है। तिल का ताड़ बनाने की यही कला है, जिसको लेकर कई किस्से कहानियां प्रचलित हैं।

अब इस विषय को लेकर दो तीन दिन तक बुद्धु बक्से पर चलती रही बहस। जब इलेक्ट्रोनिक मीडिया के मालिकों को लगा कि उन्होंने अच्छी तरह लोगों के मन में बिठा दिया है कि सरकार हिन्दुओं के लिये कश्मीर घाटी में अलहदा नगर बना रही है और अब इस के पक्ष विपक्ष में बहस चलाई जा सकती है तो बुद्धु बक्से के मालिक इस मौके पर तुरन्त किसी यासीन मलिक को पकड़ कर ले आये। भाव भंगिमाएं कुछ इस प्रकार की बनाई गई मानों पूरे जम्मू कश्मीर राज्य का कोई प्रतिनिधित्व करता है, तो यही यासीन मलिक है। अब जब वह बुद्धु बक्से में कुछ बोल देगा तो मीडिया इसे जम्मू कश्मीर के अवाम की आवाज बताकर दुनिया भर में ले उड़ेगा। अब यासीन मलिक बता रहे हैं कि हम किसी भी हालत में कश्मीर घाटी में हिन्दुओं के लिये अलग नगर नहीं बनाने देंगे। उनका कहना है कि वे घाटी को इजरायल नहीं बनने देंगे। एक दूसरे सज्जन बता रहे हैं कि वे घाटी में फिलस्तीन नहीं बनने देंगे। यासीन मलिक यह भी विस्तार से बता रहे हैं कि कश्मीरी हिन्दुओं को घाटी में आकर कहां रहना चाहिये। मसलन उनका कहना है कि वे अपने अपने गांवों में ही वापिस जाकर रहना शुरु करें। कश्मीर के हिन्दुओं ने कहां रहना है और कहां नहीं रहना है, इसका निर्णय करने का अधिकार तो आखिर उन्हीं के पास रहना चाहिये या इसका फैसला भी यासीन मलिक या उनकी बिरादरी के लोग ही करेंगे?

इससे भी अहम प्रश्न एक और है जो इसी से जुड़ा है? प्रश्न है कि आखिर यह यासीन मलिक कौन है? मैं इसके पोस्टल एड्रैस और वलदीयत की बात नहीं कर रहा। मेरा अभिप्राय है कि क्या वह सचमुच कश्मीर घाटी के किसी भी वर्ग का प्रतिनिधित्व करता भी है या नहीं? यदि करता है तब तो ठीक है, लेकिन यदि नहीं करता तो मीडिया उसे अपनी ओर से ही घाटी का प्रतिनिधि बनाने के प्रयास क्यों कर रही है? यासीन कश्मीर घाटी के गुज्जरों का प्रतिनिधि नहीं है। वह वहां के शिया समाज का भी प्रतिनिधि नहीं है। वह वहां के सैयदों और मुगलों का भी प्रतिनिधि नहीं कहा जा सकता। पठान उसे अपना प्रतिनिधि मानते हों इसका कोई प्रमाण उसने अभी तक नहीं दिया। कश्मीर घाटी के हिन्दू और सिक्ख उसे अपना प्रतिनिधि मानते हैं, ऐसा दावा करने का साहस शायद वह ख़ुद भी जुटा न पाये। कश्मीर के जो लोग जियारतखानों में भीड़ लगाये रखते हैं, वे तो खुद ही यासीन मलिक को अपना नुमायंदा स्वीकार नहीं करते, क्योंकि कश्मीर को भी अरबस्तान बनाने का सपना देखने वाले लोग सबसे ज्यादा विरोध इन जियारतखानों का ही करते हैं और उन्हें इस्लाम विरोधी बताते हैं। फिर आखिर यासीन मलिक किसकी ओर से बोल रहा है? यही प्रश्न अनुपम खेर ने पूछा था कि क्या यासीन मलिक राष्ट्रपति है, मुख्यमंत्री है, सांसद है या विधायक है? आखिर बुद्धु बक्सा क्या सोचकर यासीन मलिक को कश्मीर घाटी की आवाज बताकर पूरे देश को गुमराह कर रहा है? यदि यासीन मलिक के साथ केवल कश्मीर घाटी की ही जनता होती, कश्मीर घाटी में शहरों की हालत को सुधारने के लिये आधुनिक ढंग से नगरीकरण विस्तार की इस योजना का विरोध करने के लिये, मलिक की पार्टी समेत हुर्रियत ने सड़कों पर विरोध का जो नारा दिया था, उसे जनसमर्थन न मिलता? वह विरोध प्रदर्शन तो टांय टांय फुस्स हो गया, लेकिन ताज्जुब है तब मीडिया मालिकों ने इस पर बहस करवाना जरुरी नहीं समझा।

The Chief Minister of Jammu and Kashmir, Mufti Mohammad Sayeed calling on the Union Home Minister, Shri Rajnath Singh

अब इससे जुड़े एक और मुद्दे पर विचार करना भी आवश्यक है। आखिर मीडिया मुगलों को तिल का ताड़ बनाने का मौका कैसे हासिल हुआ या उन्होंने खुद प्रयास करके यह मौका कैसे तैयार किया? वैसे तो उत्तर स्पष्ट है कि राज्य के मुख्यमंत्री अपने बयान के माध्यम से जो तिल गिरा रहे थे, उन्हीं में से एक तिल उन्होंने उठाया और जम्मू कश्मीर में अरसे से जो आग जल रही है, उस पर तेल डालना शुरु कर दिया। अब यह तिल मुख्यमंत्री ने खुद जान-बूझकर गिराया था या उनसे अनजाने में गिर गया था, इसके बारे में तो वही अच्छी तरह जानते होंगे। इसमें भी कोई शक नहीं कि मुफ्ती साहिब को इस प्रकार के तिल गिराने की पुरानी आदत है, लेकिन इतना तो सभी मानेंगे कि मुफ्ती साहिब ने जो गिराया था वह तिल ही था, फिर मीडिया के एक हिस्से ने उसे ताड़ क्यों बनाया? क्या केवल टी.आर.पी. के लिये या फिर यह भी कश्मीर घाटी में हालत बिगाडऩे की किसी बड़ी साजिश का ही हिस्सा है?

यह भी ग्रीन पीस की तरह का ही मामला लगता है। यह मीडिया में पल रहा ग्रीन पीस ब्रिगेड है जो मौके-मौके पर तिल का ताड़ बनाता है। शीत युद्ध के दिनों में तिल का ताड़ बनाने की यह कला सोवियत संघ ने विकसित की थी। काम करने का तरीका निराला था। भारत की किसी नामालूम अखबार में खबर छपती थी कि दबे कुचले लोगों ने फलां तारीख को सरकार के खिलाफ विशाल जुलूस निकाला और क्रान्ति का बिगुल बजा दिया।

Actor Anupam Kher during a press conference to promote his upcoming film `Gang Of Ghosts` in New Delhi on March 19, 2014. (Photo: Amlan Paliwal/IANS)

उसको उद्धृत करके रुस की अखबारों ने मोटी-मोटी खबर छापतीं थीं कि भारत में सर्वहारा वर्ग ने क्रान्ति शुरु कर दी है। रुस की अखबार को उद्धृत करके पूर्वी यूरोप की दूसरी अखबारों में यह अभियान चलाया जाता। फिर इन विदेशी अखबारों के हवाले से भारत की अखबारों में ये खबरें छपाई जातीं। लेकिन तिल गिराने का काम उस अखबार ने किया होता जिस की मुश्किल से दो सौ प्रतियां मुफ्त बांटने के लिये ही छपती थीं। उस अखबार का प्रयोजन ही यही होता था, लेकिन आज मीडिया का एक हिस्सा जिस तिल का ताड़ बना रहा है, उसका मकसद क्या है और उसके पीछे कौन है?

जम्मू कश्मीर में समरसता के नये प्रयोग को कौन ध्वस्त करना चाहता है? वे कौन लोग हैं जो चाहते हैं कि कश्मीर घाटी में आग सुलगती रहे और वे अपनी रोटियां सेंकते रहें! मेंढक को फुला-फुला कर कौन बैल बनाना चाहता है। यासीन मलिक के पीछे कैमरा लेकर घूमने वाले इतना तो जानते होंगे कि इस प्रकार मेंढक से बैल नहीं बनता, लेकिन इस प्रक्रिया में कश्मीर घाटी के सामान्य होने की गति जरुर धीमी होती है।

कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

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