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कोरोना पर विपक्ष की भूमिका निंदनीय मौत के साये में पटरी पर लौटती जिन्दगी

कोरोना पर विपक्ष की भूमिका निंदनीय  मौत के साये में पटरी पर लौटती जिन्दगी

देश में कोरोना महामारी द्वारा दस्तक दिये हुये छ: माह हो गये पर कोरोना थमने का नाम नहीं ले रहा। आज भी ये समस्या पूरे विश्व की है। न इसका इलाज है और न ही इसकी वैक्सीन बनानेे में किसी देश को सफलता मिल पायी। ये सच भी उजागर हो चला है कि चीन ने चालबाजी कर चमगादड़ से इसे हथियार के रूप में तैयार किया था। बीमारी फैलने पर चांद पर जाने की डींग भरने वाले भी इस बीमारी को काबू नहीं कर पाये।

भारत में बीमारी के दस्तक देते ही सरकार ने बेहद कारगर कदम उठाये। तुरन्त हवाई यात्रा से आने वालों की थर्मल चेकिंग, 14 दिन का आईसोलेशन, एकांतवास आदि लागू किया लेकिन बीमारी नही रूक पायी। डाक्टरों और स्वास्थ्य सेवा मे जुड़े लोगों ने अपनी जान पर खेल कर भी लोगों का इलाज किया और उन्हें बचाया। सरकारी कर्मचारी भी लगे रहे और पहली बार सरकारी तंत्र, यहां तक कि पुलिस विभाग को भी जनता ने सराहा। पर एक तबका ऐसा भी था जो कोरोना जैसी महामारी पर भी गंदा खेल खेलने से बाज नहीं आया। उसे न लोगों की परवाह थी, न सेवा में काम करने वाले डॉक्टरों, नर्सों आदि के बेमौत कोरोना से मरने की चिंता, न ही देश की फिक्र। और ये तबका था गैर जिम्मेदार विपक्ष। विपक्ष को इस संकट की घड़ी में सरकार का साथ देना था लेकिन कभी किसी मौत को, कभी किसी घटना को, कभी मास्क, पीपीई किट, वेन्टिलेटर को, तो कभी दवाईयों की कमी को लेकर सरकार पर निशाना साधा। करोड़ों लोगों को मास्क और सेनेटाइजर का उपलब्ध होना कठिन तो था ही। अमेरिका जैसे देश में 2 माह तक इनकी आपूर्ति नही हो सकी थी। फिर भी विपक्ष और विशेष तौर से सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस नेे हाय तौबा मचायी। बुखार उतारने वाली और अन्य दवाईयों की कमी की बात कांग्रेसी नेताओं ने प्रचारित की जो कि सफेद झूंठ साबित हुई। किसी भी वक्त दवाईयों की कोई नहीं हुई। बीमारी के फैलने से पहले ही मास्क घर घर बने, अस्पतालों में जेलों में भी बनाये गये कुछ ही दिनों में सर प्लस हो गये। सेनेटाइजर की कमी को लेकर भी कांग्रेस चिल्लाती रही जबकि यह काम साबुन से हाथ धोकर भी हो रहा था और साबुन की कोई कमी नहीं हुई।

बाद में अस्पताल में पलंग की कमी को लेकर भी विपक्ष ने तमाशा खड़ा किया जबकि उस समय बेड की कोई कमी थी ही नहीं। बेड तो महीनों खाली पड़े रहे। ज्यादा खराब स्थिति महाराष्ट्र में हुई जहां मुम्बई में तो सब कुछ काबू से बाहर ही हो गया था। सरकार की लापरवाही के कारण बस वही एक प्रदेश था उस समय जहां बेड आदि की कमी देखी गयी।

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बिना जाने-समझे वेन्टिलेटर की कमी बता कर पूरे देश में पैनिक फैलानें का काम भी किया गया। सघन इलाज कक्ष (आई.सी.यू.) के बारे में भी यही कहा गया सच को ढकने का प्रयास किया गया। और सच ये है कि कुल 3 प्रतिशत यानि 100 पोजिटिव मरीजों में से 3 को ही आई.सी.यू. की जरूरत पड़ी जो कि उपलब्ध थे और 1 प्रतिशत से भी कम को वेन्टिलेटर की, जो उपलब्ध थे। वेन्टिलेटर सदा और प्रत्येक गम्भीर मरीज को लगता भी नहीं है। अमेरिका, स्पेन, ब्रिटेन, फ्रांस जैसी महाशक्तियां कोरोना से नहीं जीत पाई, तब भी भारत उनसे बहुत बेहतर स्थिति में रहा। कोरोना की गति को रोकने में भी और उपचार करनें में भी काफी हद तक सफल रहा।

कोरोना के खिलाफ दो मजबूत बातें: एक सामाजिक दूरी रखना और सदा मास्क का उपयोग करना ही लोगों को समझाना था। उसका गांव-गांव में प्रचार होना जरूरी था। मीडिया, रेडियो, टी.वी., माईक, लाउड स्पीकर, विज्ञापन, पोस्टर अपील हर तरह के माध्यम का उपयोग किया गया। इसी कड़ी में घंटे बजाना, थाली बजाना या मोमबत्ती जलाना आदि कई कार्यक्रम हेतु एक दिन और समय चुना गया। उस दिन समस्त देशवासियों को एक ही दिन में इस विशाल माध्यम से कोरोना के प्रति जागरूक कर उन्हें इस संकट की जानकारी देने का प्रयास किया गया। इसका भी कांग्रेसी नेताओं ने मजाक बनाया। थाली बजानें से क्या कोरोना भाग जायेगा, मोमबत्ती से भाग जाये तो हम लाखों जला दें आदि जैसे व्यंग भी किये गये। येे तो सभी जानते हैं कि इससे कोरोना नहीं भागेगा पर इस तरह की टिप्पणी भले विपक्षी नेताओं ने खिल्ली उड़ानें के लिये की हो पर अच्छा ये हुआ इससे जानकारी जगह जगह पहुंची और लोगों ने मरीजों की सेवा में लगे डॉक्टरों और कर्मचारियों को वधाई दी, अभिनन्दन किया। जिससे वे और अधिक उत्साहित हुये।

एैसी महामारी में, विपक्ष को सरकार का साथ देना चाहिये था क्योंकि ये आमजन की जिन्दगी का सवाल था पर विपक्ष ने इसमें भी राजनैतिक लाभ लेने का प्रयास किया और लोगों तथा राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी भूल गये। कांग्रेस पार्टी ने सर्जिकल स्ट्राईक और वालाकोट में भी सरकार और आर्मी से पाकिस्तान को परास्त करनें के सबूत मांगे थे और बाद में अपनी नाक भी कटवायी। क्या आज का विपक्ष इतना गैर जिम्मेदाराना हो गया है कि राष्ट्र के हितों की भी परवाह नहीं करता। आज हमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की याद आ गयी। जब बाजपेयी जी विपक्ष में थे और इन्द्रा गांधी प्रधानमंत्री थी तो उन्होंने हर संकट की घड़ी में सरकार को साथ देने की घोषणा की थी। बंगलादेश की लड़ाई में समर्थन भी किया और तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्द्रा जी की प्रशंसा भी की। लेकिन आज के कांग्रेसी नेता ये क्यों नही सीखते। एक तरफ ये थाली, घंटे, शंख बजाने और मोमबत्ती जलानें का मजाक बनाते हुये कहते है इससे क्या होगा और दूसरी तरफ खुद जनेउ पहिन कर अपने को ब्राह्मण साबित करते हैं। यानि जनेउ के फायदे मानते हैं और जाति का सहारा वोटों के लिये लेते हैं। जबकि इसी पार्टी के उनके नेता भगवान राम के अस्तित्व को नकारते हैं। रामसेतु का अस्तित्व नहीं मानते हैं तो जनेउ क्यों धारण किया गया था। ये दो तरफा चाल चलना वक्त देख कर बात बदलना अब तो जैसे कांग्रेस की नियति ही हो गयी है। शायद यही कारण है कि पार्टी में नेतृत्व बदलाव की बात उठी है।

कोरोना में जब मजदूरों को वापिस गांव लौटना था तो ममता बनर्जी जैसे मुख्यमंत्रियों ने उसमें भी केन्द्र का साथ नहीं दिया। सैकड़ों ट्रेन मुम्बई खड़ी रही पर न तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने कोई तत्परता दिखाई न ही ममता  ने कोई व्यवस्था उनकी वापसी के लिये की। इस तरह कुछ प्रदेश सरकारें एैसे काम कर रही थी कि इस मदद या कार्य का श्रेय नरेन्द्र मोदी जी को न मिल पाये, भले मजदूर फंसे रहे। उनके बाल बच्चे विलखते रहे घर पहुंचे या नहीं।

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बात यहीं तक सीमित नहीं रही। मजदूरों को वापिस गांव भेजा तो सवाल किया कि सारे गांव नहीं पहुंच पा रहे है जब पहुंच गये तो अब विपक्ष कहता है कि क्यों भेजा कोई व्यवस्था या काम गांवों में नहीं है। इसी तरह पहले लॉकडाउन करनें की जिद पकड़े रहे जब लॉकडाउन हुआ तो कहने लगे इससे कोई लाभ नहीं हुआ। लोगों को रोटी रोजी नहीं मिल रही लॉकडाउन को गलत बतानें लगे। हालांकि मजदूरों को गांव भेजने में खाने रहने की पूरी व्यवस्थायें की गयी और लॉकडाउन में भी राशन पहुंचाने तथा गरीबों को धन राशि आदि की भी व्यवस्था की गयी पर विपक्ष ने सुझाव या कोई ठोस प्रस्ताव देने के बजाय काम में विघ्न डालने का ही प्रयास किया। अभी ये समय था एक जुटता का सरकार के साथ रहने का, कर्मचारियों की मदद करने का पर इसमें समूचे देश का विपक्ष शिथिल रहा। यहां मैं व्यापारियों की सेवायें और समर्पण की प्रशंसा करूंगा। जनता ने भी जो धैर्य का परिचय दिया वो भी एक मिशाल है कुछ संस्थायें लाइन क्लब, रोटरी क्लब, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, व्यापारी समाज, डॉक्टर एसोशिएशन आदि ने दिन-रात एक कर इस महामारी पर विजय पानें के लिये अथक प्रयास किये। उसका ही नतीजा है कि आज भारत दूसरे देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में है और मौतें भी कम हुई जबकि हम एक गरीब देश की श्रेणी में माने जाते हैं।

कांग्रेस की हालत ये हो गयी कि पार्टी एक ठोस निर्णय नहीं ले पाती है और नेतृत्व दिशानिर्देश नहीं दे पा रहा। 370 का समर्थन फि र विरोध, सीएसी का समर्थन फिर विरोध किया। पर कोरोना में तो हद ही हो गयी, पहले लॉकडाउन का समर्थन फिर विरोध, पहले मास्क आपूर्ति की मांग, अब कहते है  मास्क से क्या होगा? आखिर कब सीखेंगे ये एक जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाना?

 

डॉ0 विजय खैरा

 

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