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आत्मनिर्भर भारत के लिये दिवाली में जलाएं गोबर के दीये

आत्मनिर्भर भारत के लिये दिवाली में जलाएं गोबर के दीये

जब ग्रामीण अर्थव्यवस्था और उसके विकास के कारकों  की चर्चा होती है तब गांव, गाय, गोचर और गोबर से लेकर जल, जमीन और जलवायु की चुनौतियों पर बहस छिड़ जाती है। वर्ष 2011 की गणना के अनुसार देश में कुल 6.64   लाख गांव है और 65 प्रतिशत आबादी गांव में निवास करती है। आज के परिवेश में गांव के समृद्धि में गोवंश का बहुत महत्व है जहां पर्यावरण की चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। गाय के बारे में हमारी आज की अवधारणा नकारात्मक हो गई है। क्योंकि, गाय जब तक जवान रहती है तो दूध देती है तब तक वह हमारी अपनी गाय होती है। लेकिन दूध देना बंद होते ही उसे सड़क पर छोड़ दिया जाता है, कारण, अब वह उत्पादक नहीं है। इस मान्यता के परिधि में वृद्ध गाय की कई अमूल्य सेवाओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है जिसमें सबसे प्रमुख है गोबर-गोमूत्र जिसे पुरातन काल से गोल्ड माइन अर्थात सोने की खदान भी कहा जाता है।

हमारे देश में इस समय कुल 50.42 करोड़ मवेशी है जिनसे तकरीबन 50 लाख टन गोबर पैदा होता है। आज गोबर से कई चीजें बनाई जा रही है  जिसमें सबसे प्रसिद्ध है गोबर के लट्ठे और पंचगव्य दवाएं आदि। राष्ट्रीय कामधेनु आयोग इस समय  गोबर के दीए  बनाने का अभियान चला रहा है ताकि अगोबर से बने दीयों को जलाकर दिवाली मनाई जाए। यह एक अभिनव प्रयास है। अगर गोबर का सही मायने में सदुपयोग किया जाए तो यह गारंटी है कि देश के गोवंश को बधशालाओं में नहीं जाना पड़ेगा। गोबर के  सही उपयोग से छुट्टा पशुओं की समस्या से भी निजात मिलेगी। एक जमाना था जब लोग गोबर से दीवाल की लिपाई करते थे उससे कई फायदे होते थे। घर ठंडा रहता था और ऐसा माना जाता था कि गोबर से लीपा घर में सकारात्मक शक्तियां आती है। हालांकि, आज यह बात विज्ञान की कसौटी पर भी खरा पाया जा रहा है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि खेती के लिए गोबर एक अत्यंत उपयोगी एवं महत्वपूर्ण संसाधन है। चाहे हम किसी रूप में लें, खेत की उर्वरता बढ़ाने के लिए या गोबर का प्रयोग खाद के रूप में करने अथवा कीटनाशक के रूप में गोबर से फायदा ही फायदा है। गोबर से कई प्रकार के साज-सामान आज तैयार किए जा रहे हैं।गोबर से तैयार की गई ‘चिप’ मोबाइल से उत्पन्न रेडिएशन रोकने मैं काम आ रहा है। दिनों-दिन  गोबर के बने सामान  की  बाजार में आज मांग बढ़ रही है। भारत सरकार के अधीन कार्यरत राष्ट्रीय कामधेनु आयोग ने गोबर के बेहतर उपयोगिता और गोबर के बने हुए सामान की बिक्री करने के लिए लोगों को जोडऩे अभियान चला रहा है जिसके तहत इस बार की दिवाली में 55  करोड़ दीया बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

गोबर के बेहतर प्रयोग से बेशक, पशुओं को वधशाला जाने से रोकने में ऐसे कार्यक्रम अत्यंत सहायता सिद्ध होंगे। साथ ही अवैधानिक पशु तस्करी तथा मांस के लिए ले जाए जा रहे पशुओं को वधशाला जाने से  रोका जा सकेगा। वर्तमान में हर साल 70,000  करोड़ का केमिकल फर्टिलाइजर आयात किया जाता है। यदि गोबर की खाद का सही मायने में प्रयोग किया जाए तो इस खर्च को काफी हद तक कम किया जा सकता है जिससे देश की जहर बनती जा रही इससे मिट्टी को स्वस्थ बनाने के साथ-साथ उसकी उर्वरता बनाए रखने में काफी सहायता मिलेगी।


 

अपने खेतों की पराली मत जलाएं

देश में हैं 22 प्रतिशत सूखे चारे की कमी


 

20 नवंबर 2015 को नई दिल्ली में 23 वें इंटरनेशनल ग्रासलैंड कांग्रेस का आयोजन किया गया था तो उद्घाटन करते हुए तत्कालीन कृषि मंत्री ने कहा था कि भारत में चारा स्रोत  की सबसे महत्वपूर्ण साधन है फसलों के अवशेष से प्राप्त होने वाला चारा, जंगलों में मौजूद स्थायी चारागाह और गोचर भूमि का भी प्रमुख योगदान है। पशुओं की देखभाल के लिए चारे का महत्व बताते हुए कहा था कि वर्तमान में भारत को हरे चारे का लगभग 35.6 प्रतिशत और सूखे चारे की लगभग 10.9 प्रतिशत सालाना कमी है। उन्होंने सरकार की राष्ट्रीय चारा नीति के बारे में बताया कि पशुओं के लिए जाने का उपलब्ध संसाधन का बेहतर उपयोग करना होगा। देश के घटते चरागाह के क्षेत्रफल के कारण चारे की उपलब्धता संबंधी चुनौतियों का सामना करने के लिए वैज्ञानिकों को आधुनिक तकनीक विकसित करने की सलाह दी। उन्होंने देश के किसानों से यह आग्रह किया कि गेहूं के भूसे और धान के पुआल को खेत में मत जलाएं। इसका प्रयोग चारे के रूप में होना चाहिए क्योंकि देश में सूखे चारे की भारी कमी है।

दरअसल, इस समय लगभग 512 मिलियन की पशु आबादी के साथ भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक है। लेकिन सबसे बड़ी विशेषता भारतीय गोवंश के साथ जुड़ी हुई है कि भारत की जलवायु और चारे की समस्या के बीच अपनी उत्पादन क्षमता घास-फूस भी खा कर के बनाए रखते हैं। यह विशेषता अन्य किसी देश के गोवंश में नहीं पाया जाती है। ऐसी चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में राष्ट्रीय डेयरी योजना के तहत वर्ष 2012- 2027 की अवधि के दौरान दूध उत्पादन को दोगुना करने के लक्ष्य पर केंद्रित है। भारत में दूध का उत्पादन पिछले एक दशक में काफी बढ़ा है। लेकिन शुद्ध दूर की समस्या जस की तस बनी हुई है। तकरीबन 69 प्रतिशत दूध मिलावटी है। वर्ष 2019-20 के आंकड़ों के अनुसार देश 187.7 मिलियन टन दूध का उत्पादन करता हैजो छोटे-छोटे किसानों तथा पशुपालकों के माध्यम से आता है। लेकिन उनके लिए सबसे बड़ी समस्या है कि चारे की कमी।

हमारे देश में सालाना 630-635 मिलियन टन फसल अवशेष पैदा होता है। कुल फसल अवशेषों के उत्पादन का 58 प्रतिशत धान एवं गेहूं के फसलों से मिलता है ,17 प्रतिशत गन्ना से, 20 प्रतिशत रेशा वाली फसलों से और 5 प्रतिशत तिलहनी फसलों से प्राप्त होता है। अधिकांश फसल अवशेष खेत में जला दिए जाते हैं और यह अवैधानिक कार्य पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिक होता है लेकिन देखने में आया है कि आन्ध्र प्रदेश एवं महाराष्ट्र सहित बिहार-झारखंड राज्यों में फसल अवशेष जलाई जा रही है। हालांकि कुछ प्रदेशों में फसल अवशेषों को जलाने के लिए प्रतिबंधित किया गया है जिसमें उत्तर प्रदेश हरियाणा और पंजाब प्रमुख है। ऐसा माना जा रहा है कि फसल अवशेष प्रबन्धन की प्रक्रियाओं की जानकारी न होने के कारण किसान फसल अवशेषों को खेत में जला देते हैं। आंकड़े बताते हैं कि आज खेती बाड़ी में विकसित राज्यों के तकरीबन 10 प्रतिशत किसान ही फसलों के अवशेषों का बेहतर प्रबन्धन कर रहे हैं।

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मवेशियों के लिए चारे का प्रबंधन एक ऐसी समस्या है कि सामान्य किसान जब तक पशु दूध देता है तो उसे अपने पास रखता है और दूध बंद होने के बाद उसे बेच देता है। ऐसे पशु अक्सर वधशालाओं में जाने पर मजबूर हो जाते हैं। अगर देखा जाए तो चारे की समस्या का प्रमुख कारण है अपर्याप्त चारागाह या गोचर भूमि। भारत में 1947 में 70 मिलियन हेक्टेयर चारागाह की जमीन आज घटकर 38 मिलियन हेक्टेयर पर आ पहुंची है। इस संबंध में चौंकाने वाले कुछ ऐसे आंकड़े रिमोट सेंसिंग तकनीक के आधार पर किए गए सर्वेक्षण के माध्यम से पता चला है कि देश में चारागाह एवं हरा चारा उत्पादन की स्थिति बहुत खराब है। इस बात की पुष्टि इंडियन ग्रासलैंड एंड फोडर रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईजीएफआरआई) द्वारा एक टिप्पणी में की गई है। जिसमें यह आगाह किया गया है कि उत्पादन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इंस्टिीट्यूट इस दिशा में बड़ी तन्मयता के साथ काम कर रहा है। लेकिन इंस्टिीट्यूट के वैज्ञानिक धान की पराली और गेहूं भूसे सहित अन्य फसलों के अवशेषों को जलाने से रोकने की अपील कर रहे हैं ताकि देश में सूखे चारे की बढ़ती कमी को रोका जा सके।

वैज्ञानिकों द्वारा बार-बार यह बताया गया है कि फसल अवशेषों को जलाना पर्यावरण के लिए हानिकारक होने के साथ-साथ सूखे चारे के संकट को बढ़ा रहा है जिसे राज्य सरकारों को सख्त कानून बना कर रोकना चाहिए। क्योंकि, भारत में किसान अगली फसल के लिए अपने खेत को साफ करने के लिए फसल अवशेषों को बिना सोचे समझे जलाते रहते हैं। इसका जीता-जागता उदाहरण देश की राजधानी दिल्ली के निवासियों से बढयि़ा कोई नहीं जानता क्योंकि उत्तर प्रदेश हरियाणा और पंजाब मैं फसलों के अवशेष जलाने का असर दिल्ली तक पहुंचता है। आंकड़े बताते हैं कि इस समय हमारे देश में लगभग 35.6 प्रतिशत हरे चारे और लगभग 10.9 प्रतिशत सूखे चारे की कमी है। ऐसी हालत में अगर देश भर के किसान अपने खेत के फसल अवशेषों को जलाना बंद कर देते हैं तो इससे सूखे चारे की कमी काफी हद तक दूर हो जाएगी। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा प्रकाशित ‘क्रॉप रेसिड्यू मैनेजमेंट विद कंजर्वेशन एग्रीकल्चर : पोटेंशियल-कंस्ट्रेंट्स एंड पॉलिसी नीड्स’ मैं इस विषय को बड़े ही बखूबी से बताया गया है।

लगभग 500 मिलियन टन फसल अवशेष का उत्पादन प्रतिवर्ष पैदा होता है। हमारे देश में इसका एक बड़ा हिस्सा खेतों में जलाया जाता है और ज्यादातर कटाई के बाद उसके डंठल खेतों में छोड़ दिया जाता है। यह समस्या मशीनीकरण की वजह से और विकराल हो गया है। साथ ही साथ मजदूरों की कमी, अवशेषों को हटाने की उच्च लागत, कंबाइन के लगातार बढ़ते उपयोग, फसल अवशेषों के बंडल या ग_र बनाने के मशीनरी की उपलब्धता की कमी के कारण यह समस्या और कठिन हो गई है। इन्हीं सब का नतीजा है कि  आज  देश में सूखे चारे का  सरेआम जलाकर विनाश किया जा रहा है  जिससे जहां एक तरफ जानलेवा वायु प्रदूषण  फैल रहा है वहीं दूसरी तरफ उसका खामियाजा भरने के लिए मनुष्य अपने स्वास्थ्य को दांव पर लगाना पड़ रहा है। इसी प्रकार मानव स्वास्थ्य  नुकसान होने के साथ-साथ कई प्रकार के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष  प्रदूषण की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। जिसमें ग्रीनहाउस गैसों का उत्पादन एक बहुत बड़ी चुनौती है जिसका समाधान पाना बहुत कठिन होता जा रहा है।

वैज्ञानिक अनुसंधान के तहत पाया गया है कि जब खेत में फसल अवशेषों को जलाया जाता है तो नाइट्रोजन, पोटाश और फास्फोरस के साथ-साथ अन्य सूक्ष्म तत्व जैसे सल्फर, बोरान एवं आयरन जैसे महत्वपूर्ण तत्व नष्ट हो जाने के कारण पौधों को उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। इस परिपेक्ष में विशेषज्ञों का बड़े स्पष्ट तौर पर कहना है कि खेत में फसल के अवशेषों को जलाने शेर रोकने के लिए कानून बनाया जाना चाहिए ताकि किसान उसे जलाना बंद करें और मिट्टी की उर्वरा शक्ति क्षीण होने से बचाया जा सके। इतना ही नहीं स्वास्थ स्वादिष्ट एवं अच्छी उपज के लिए मिट्टी के अंदर पोषक तत्वों का मौजूद रहना अति आवश्यक है। गुणवत्ता का असर चारे की पौष्टिकता पर पड़ता है जिसे मवेशी खा कर के उसी प्रकार का दूध पैदा करते हैं। फसल के अवशेष को खेत में जलाए जाने से रोक कर मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने की बहुत बड़ी आवश्यकता है। यह कार अगर अभियान के रूप में चलाया जाता है तो इससे की पर्यावरण की रक्षा होगी। पशु वैज्ञानिकों के अनुसार इससे चारे की कमी ना होने देने से पशु खाद्य के बाजार पर पड़ेगा। इसमें दो राय नहीं कि वर्तमान समय में चारे की भारी कमी से चारे की कीमतों में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। इसका सीधा असर दुग्ध उत्पादन लागत पर पड़ेगा क्योंकि पशुओं के भरण पोषण पर आने वाला खर्च कुल खर्च का 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा पशु आहार के खर्च पर पड़ता है।

भारतीय मवेशियों की प्रजाति हमारे परिवेश में अत्यंत अनुकूल है और रुखा-सुखा चारा खा कर कम खर्च में उत्पादन देते हैं, जो विश्व के किसी कोने में इतना सस्ता पशुधन प्रबंध नहीं देखने को मिलेगा। आंकड़े बताते हैं कि भारतीय पशुधन का प्रबंधन वैश्विक प्रबंधन खर्च की तुलना में 20 से 60 प्रतिशत कम है। ऐसी परिस्थितियों में यदि देश में पशुओं के चारे का बेहतर प्रबंधन किया जाए तो दूध का उत्पादन काफी हद तक बढ़ जाएगा। इसके लिए चरागाहों की कमी की समस्या से लेकर फसल अवशेषों के व्यापक उपयोग की बेहतर व्यवस्था करनी होगी। इस समय हमारे देश में 5 प्रतिशत से भी कम खेत में  चारा उगाया जा रहा है जो एक अत्यंत सोचनीय बात है। इतना ही नहीं कुल पशुपालन बजट में चारा विकास के लिए बजट भी काफी कम है। राष्ट्रीय चारा नीति को बदलने की परम आवश्यकता है जिसके लिए एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।

मेरा अपना मानना है कि गोचर भूमि का विकास, बहुवर्षीय चारों को उगाने से लेकर पारंपरिक तथा स्थानीय घासों  के उत्पादन की तकनीक तथा चारे वाले वृक्ष और झाडिय़ों का रोपण कर चारे की समस्या पर काफी समाधान पाया जा सकता है। लेकिन दुखद बात यह है कि इस चारे की व्यापक कमी की स्थिति में भी महत्वपूर्ण पहलुओं को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है जिसका नतीजा आज सामने है। फसल के अवशेषों को नष्ट होने से बचाने के साथ-साथ चारा उगाना और चारे का भंडारण अत्यंत आवश्यक कदम होता है। इस संबंध में किसानों की जरूरतों के मुताबिक उन्हें चारे के भंडारण के तरीकों और उनकी तकनीक के बारे में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। किसानों को इस संबंध में  वैकल्पिक उपायों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित कर क्या जाना चाहिए। समय-समय पर राष्ट्रीय चारा नीति में फेरबदल किया जाना अति आवश्यक है।

(गिरीश जयंतीलाल शाह) 


आज देसी गोवंश घटता जा रहा है जिसका हमारे जीवन पर सीधा असर पड़ रहा है। एक समय था जब गोधूलि बेला को बड़ा ही पावन और पवित्र माना जाता था। मान्यताओं के अनुसार इसमें सकारात्मक ऊर्जा होती है। कई बार जब शादी की मुहूर्त या अन्य किसी धार्मिक अनुष्ठान के तिथियों का मिलान नहीं हो पाता था तो बड़े बुजुर्गों के द्वारा गोधूलि बेला को अनिष्ट निवारक मानकर अनुष्ठान किए जाते थे। वर्षों-वर्षों की इस परंपरा की मान्यता बराबर बनी रही लेकिन आज ‘गऊ या गउधन’ के महत्व को समझ न पाने के कारण हमारे सामने गांव के विकास की तमाम चुनौतियां खड़ी है। इन परिस्थितियों में राष्ट्रीय कामधेनु आयोग इस बार दिवाली में हर परिवार से 5 गोबर से बने दीये जलाने अनुरोध कर रहा है जिसका मतलब है कि इस साल 11 करोड़ परिवारों के माध्यम से 55 करोड़ गोबर के लिए जलाए जाएंगे।

जाहिर सी बात है कि यह दीए आत्मनिर्भर भारत के अभियान की एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होंगी। इसके लिए मैंने आयोग से अनुरोध किया है कि भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड के तरीके पर आधारित व्यवस्था के अनुसार कम  से कम 6 लाख ‘गौ सेवकों’ की नियुक्ति की जानी चाहिए ताकि सभी को एक नेटवर्क में जोड़ कर केंद्र की नीतियों को लोगों के बीच में ले जाया जा सके। राष्ट्रीय कामधेनु आयोग द्वारा नियुक्त गौ सेवक अपने-अपने क्षेत्र में वहां की भाषाओं में आयोग के योजनाओं को बेहतर ढंग से बता सकेंगे। नेटवर्किंग के इस व्यवस्था में न तो आयोग का कोई अतिरिक्त खर्च आएगा और नहीं कार्यकर्ताओं की कमी पड़ेगी। इतने नहीं गौ सेवा में समर्पित लोग एक दूसरे से एक चेन की तरह लोग जुड़ते जाएंगे और आयोग को अपनी बात बताने में काफी सहूलियत मिलेगी।

मैंने गोबर की उपयोगिता पर एक व्यक्तिगत प्रयोग करके देखा कि दीवाल पर सीधे गोबर लगाने की जगह पर अगर हम गोबर के साथ में गोद, कपूर और गूगल आदि को किसी बाइंडिंग मटेरियल के साथ मिलाकर लिपाई करते हैं तो दीवार का लेप बड़ा ही आकर्षक एवं टिकाऊ होता है। इस प्रकार गोबर से लिपी दीवार का सारा फायदा मिलता है। इस विषय में मेरी राय है गोबर के बेहतर उपयोग के लिए जहां दीए और मूर्तियां बनाने का काम किया जा रहा है, वहीं पर स्वस्थ जीवन के लिए गोबर से लिपी दीवाल के प्रयोग को गोबर के उपयोग को बढ़ावा मिलेगाऔर उसका उचित मूल्य भी। ऐसे कार्यों में यदि थोड़ा ‘आर एंड डी’ सिद्धांत पर ध्यान दिया जाए तो ‘सोने में सुहागे की बात’ हो जाती है।

आज गौ सेवा के उन मान्यताओं का विज्ञान धीरे-धीरे पुष्टि हो रही है। बताया जाता है कि जब गाय जंगल में चारा चरने जाती थी तो अपने मालिक के बीमारी के अनुसार मालिक को ठीक करने वाली औषधियां चर के वापस आती थी और उसके दूध में वह औषधिय गुण होने से मालिक अनेक बीमारियों से मुक्त हो जाता था। यह भी कहा जाता था कि जब गाय को हम गुड़ खिलाते थे तो गुड़ खाने के बाद गाय हाथ को चाटने लगती थी जिससे हमारे शरीर की कई बीमारियां दूर हो जाती थी। आज कितने लोग हैं जो गौशाला में जाकर के गाय को चारा डालते और गुड़ खिलाते हैं ।  गाय का लालन-पालन करते अथवा गाय  को दुलराते या सहलाते हैं ।

एक समय था जब हम गाय की उपयोगिता का मूल्यांकन दूध, दही, घी  से ही करते थे लेकिन यह पैमाना अब बदलकर गोबर एवं गोमूत्र जैसे गाय के महत्वपूर्ण उत्पादों के उपयोग पर आ गया है जो गाय तथा बैल के जीवन के अंतिम क्षण तक मिलता रहता है। इसलिए गोवंश का पैमाना कभी भी दूध या दूध के उत्पाद नहीं होने चाहिए। आज के चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में गाय के गोबर का बहुत बड़ा महत्व है।

यहां यह कहना आवश्यक है कि देशी गोवंश के संरक्षण एवं विकास संबंधी कोई भी तकनीक निकल कर सामने आती है तो उसका पेटेंट हो जाना चाहिए। कई बार यह देखने में आया है कि स्वदेशी विधियों का पेटेंट दूसरे देशों ने करा लिया और हम देखते ही रह गए। इसलिए गोधन अनुसंधान और विकास संबंधी टेक्नोलॉजी/विधियों पर आधारित पेटेंट कराने से बहुत सारे फायदे होंगे। साथ ही साथ हमारे रहन-सहन और परंपराओं और विरासत से जुड़ी हुई ज्ञान-विज्ञान सदैव हमारे हाथ में रहेगा।

 

गिरीश जयंतीलाल शाह

 

 

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