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सबको अपना मानने वाले रज्जू भैया

सबको अपना मानने वाले रज्जू भैया

By सुधीर गहलोत

सामाजिक दायित्वों के निर्वाह के लिए अपना जीवन होम करने वाले मनीषियों और महापुरूषों की धरती रही है भारतवर्ष की भूमि। उनमें प्रो. राजेन्द्र सिंह का नाम भी शामिल किया जा सकता है। ‘हमारे रज्जू भैया’ पुस्तक में लेखक देवेंद्र स्वरूप और ब्रजकिशोर शर्मा ने राजेन्द्र सिंह के समाज के प्रति योगदान और बचपन से लेकर उनकी जीवन की अंतिम बेला तक के कालखंडों पर प्रकाश डालने का प्रयास किया है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चौथे सरसंघचालक रहे प्रो.राजेन्द्र सिंह का जन्म 1867 में मध्य प्रदेश के ग्वालियर के समीप ठाकुर महताब सिंह के पौत्र के रूप में हुआ था। अलीगढ़ में स्वामी दयानंद की सामीप्य के कारण उनका पूरा परिवार शाकाहारी हो गया। अपने पितामह के प्रयास के कारण प्रो. राजेन्द्र सिंह शिक्षा से बहुत गहराई तक जुड़े। 1939 में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। वे अक्सर मीलों पैदल सैर किया करते थे। राजेन्द्र सिंह की गणना मेधावी छात्रों में होती थी। अपने प्रयासों और विलक्षण प्रतिभा के कारण राजेन्द्र सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भौतिकी शास्त्र के प्रोफेसर बन गए। अक्टूबर 1942 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए। संघ की ओर से उन्हें प्रयाग नगर का दायित्व सौंपा गया।

1994 में संघ के तीसरे सरसंघचालक बालासाहेब देवरस ने अपने जीवनकाल में ही राजेन्द्र सिंह का सरसंघचालक पद पर अभिषेक कर दिया। यह संघ में पहली घटना थी। उनकी प्रसिद्धि और विनम्र व्यवहार के कारण लोग उन्हें प्यार से रज्जू भैया कहते थे। उनके संबंध विभिन्न राजनीतिक दलों और विभिन्न विचारधारा के राजनेताओं और लोगों से थे। सभी संप्रदाय के आचार्यों और संतों के प्रति उनके मन में गहरी श्रद्धा थी। इसके कारण सभी वर्ग के लोगों का स्नेह और आशीर्वाद उन्हें प्राप्त था। देश-विदेश के वैज्ञानिक, खासकर सर सी.वी. रमण जैसे श्रेष्ठ वैज्ञानिक का रज्जू भैया से गहरा लगाव था।

रज्जू भैया संघ के साथ 60 सालों तक जुड़े रहे और विभिन्न प्रकार के दायित्वों का निर्वाह करते रहे। इस तरह 1943 से 1966 तक वे प्रयाग विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य करते हुए भी अपने  प्रचारक के दायित्वों का निर्वाह भ्रमण करके करते रहे। प्रथम वर्ष का प्रशिक्षण उन्होंने सन् 1943 में लिया। इस दौरान वे नगर कार्यवाह का दायित्व निभा रहे थे। द्वितीय वर्ष का प्रशिक्षण उन्होंने 1954 में लिया। इस दौरान भाऊराव उन्हें पूरे प्रांत का दायित्व सौंपकर बाहर जाने की तैयारी कर चुके थे। तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण उन्होंने 1957 में लिया और उत्तर प्रदेश के दायित्व का निर्वहन करने लगे। औपचारिक तौर पर उन्हें 1958 में प्रचारक घोषित किया गया, लेकिन वास्तव में संघ से जुडऩे के साथ ही वे इस भूमिका को निभाते रहे। इस दृष्टि से उन्होंने संघ की विचारधारा को फैलाने, शाखाओं को बढ़ाने और लोगों को संघ से जोडऩे का महत्वपूर्ण काम किया।

‘हमारे रज्जू भैया’ पुस्तक में लेखकद्वय ने उनके पूरे जीवन को एक पुस्तक के रूप में उकेरा है। जीवन में कार्यों के बीच सामंजस्य और सामाजिक कार्यों के निर्वाह के बीच समन्वय स्थापित करने की प्रेरणा देने की दृष्टि से यह पुस्तक पठनीय है। मुरादाबाद में पैदा हुए लेखक देवेंद्र स्वरूप प्राचीन इतिहास में स्नातकोत्तर कर पाञ्जन्य से जुड़े रहे। वहीं लखनऊ विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे और भारत सरकार के विधि मंत्रालय में विभिन्न पदों पर कार्य कर चुके ब्रजकिशोर शर्मा नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष रहे हैं।

14-03-2015

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