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जम्मू-कश्मीर में नया प्रयोग कई प्रश्नों के उत्तर दे सकता है एक नए आयाम की ओर

जम्मू-कश्मीर में नया प्रयोग कई प्रश्नों के उत्तर दे सकता है एक नए आयाम की ओर

By कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

इस बार सकारात्मक पहलू यह है कि भाजपा न तो तुष्टीकरण को हथियार बना रही है और न ही लालच को। वह बराबर के आसन पर, कश्मीर घाटी के लोगों द्वारा बिना किसी भय या छल-कपट के माहौल में किये गये मतदान के प्रयोग से निकले परिणाम के आधार पर जम्मू, लद्दाख व कश्मीर घाटी के लोगों के बीच एक सेतु निर्माण का कार्य कर रही है, जिसकी सफलता की आशा की जानी चाहिए।

जम्मू-कश्मीर में अन्तत: पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने मिलकर सरकार बना ली। पिछले दो महीने से इस नये प्रयोग को लेकर दोनों दलों में आपस में विचार-विमर्श चल रहा था। देश ही नहीं विदेशों में भी इस प्रयोग के शुरु हो पाने या न हो पाने की संभावनाओं पर बहुत कुछ कहा और लिखा जा रहा था। वैसे तो कहा जा सकता है कि यह प्रयोग 1947 से ही प्रारम्भ हो गया था, लेकिन प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने इसे जिस तरीके से निष्पादित किया, उससे इस प्रयोग से राज्य का नुकसान ज्यादा हुआ और इस प्रयोग की असफलता घोषित कर दी गई। नेहरु के समय ही सरदार पटेल और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसी प्रयोग को अलग तरीके से करना चाहते थे। नेहरु ने पटेल को तो उस समय इस प्रयोग में दखलअंदाजी करने से सख्ती से मना कर दिया था, लेकिन डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर नेहरु का कोई दबाव नहीं था, क्योंकि उन्होंने पहले उनके मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया था। लेकिन, आखिर यह प्रयोग क्या है, जिसको लेकर 2015 में भी एक बार फिर दुनिया भर की आंखें लगी हुई हैं?

21-03-2015

दरअसल 1947 में जम्मू-कश्मीर रियासत के शासक महाराजा हरि सिंह ने पाकिस्तान में शामिल होने के लिये जिन्ना व लॉर्ड माऊंटबेटन के तमाम प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दबावों को ठुकराते हुये, देश की नई संघीय सांविधानिक व्यवस्था में शामिल होने का निर्णय किया था। लेकिन पंडित नेहरु, महाराजा हरि सिंह के व्यक्तिगत तौर पर इतने विरोधी थे कि वे यह श्रेय हरि सिंह को देने के लिये किसी भी तरह तैयार नहीं थे। उन्होंने इसका सारा श्रेय, रियासत के पांच विभिन्न संभागों में से एक, कश्मीर की नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी के अध्यक्ष शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को दिया। महाराजा हरि सिंह के प्रति उनका व्यक्तिगत विरोध इतना ज्यादा था कि उनसे किये गये अपने पत्र व्यवहार में उन्होंने बकायदा लिखा भी कि जम्मू-कश्मीर के इस पूरे मामले में आपका कोई अस्तित्व नहीं है। प्रश्न यह है कि आखिर वे इस सांविधानिक अधिमिलन का श्रेय शेख अब्दुल्ला को क्यों देना चाहते थे? उसके पीछे इतिहास है। जिन्ना ने इस आधार पर पाकिस्तान का प्रश्न उठाया था कि हिन्दुस्तान में मुसलमान और हिन्दू एक साथ नहीं रह सकते, इसलिये मुसलमानों के लिये भारत का एक हिस्सा अलग कर देना चाहिये। नेहरु राजनीति के क्षेत्र में तो जिन्ना और उसके ब्रिटिश सहयोगियों को हरा नहीं सके, बल्कि उनकी विभाजन की मांग को ही स्वीकार कर लिया। लेकिन, इस विभाजन से पैदा हुये अपने भीतरी अपराध बोध से निजात पाने के लिये, उन्हें जम्मू-कश्मीर एक अच्छा अवसर दिखाई देने लगा। यदि जम्मू-कश्मीर देश की सांविधानिक व्यवस्था में शामिल होने का निर्णय कर लेता है तो नेहरु दुनिया भर को यह बता सकेंगे कि जिन्ना झूठ बोलता था, मुसलमान तो अपनी इच्छा से भारत में रहना चाहते हैं, पाकिस्तान में शामिल नहीं होना चाहते। नेहरु का यह थीसिस तभी पूरा हो सकता था जब भारत मे अधिमिलन की इच्छा जम्मू-कश्मीर का कोई मुस्लिम नेता करे और उसी की मांग पर रियासत के भारत में अधिमिलन को स्वीकार किया जाये। नेहरु को विश्वास था कि रियासत के पांच संभागों (जम्मू, लद्दाख, कश्मीर, गिलगित, बल्तीस्तान) में से एक, कश्मीर के नेता शेख अब्दुल्ला ऐसा कर सकते हैं। नेहरु स्वयं भी कश्मीरी थे, इसलिये उनकी शेख के साथ स्वभाविक मित्रता भी थी। नेहरु का यह भी विश्वास था कि शेख कश्मीर के मुसलमानों के एकमात्र नेता हैं और उन्हीं के कारण कश्मीर के मुसलमान भारत में अधिमिलन के लिये तैयार हो सकते हैं। शेख के बारे में नेहरु की पहली अवधारणा ठीक हो सकती थी, लेकिन दूसरी गलत थी। बहुत क्षेत्रों के मुसलमान पाकिस्तान बनाने या उसमें जाने के इच्छुक नहीं थे। सीमान्त प्रान्त में, जहां 99 प्रतिशत मुसलमान थे, मुस्लिम लीग पराजित हुई थी। पंजाब में जहां 60 प्रतिशत मुसलमान थे वहां भी मुस्लिम लीग हारी थी और यूनियननिस्ट पार्टी जीती थी। इसी प्रकार कश्मीरी मुसलमानों का इतिहास, परम्परा अलग थी और वे इस कारण पाकिस्तान में जाने के लिये लालायित नहीं थे। नेहरु इसे शेख के प्रभाव का परिणाम मान बैठे थे। नेहरु की इस मानसिकता की पृष्ठभूमि में आसानी से समझा जा सकता है कि यदि यह प्रचारित हो जाये कि जम्मू-कश्मीर को देश की नई संघीय सांविधानिक व्यवस्था का हिस्सा महाराजा हरि सिंह ने बनाया है तो नेहरु मानसिक रुप से भारत विभाजन के अपराध बोध से कैसे मुक्त हो सकते थे, इसलिये उन्होंने एक साथ महाराजा हरि सिंह को धकियाना शुरु किया और शेख अब्दुल्ला को महिमामंडित करना शुरु किया। यही कारण है कि नेहरु की कल्पना के कारकों पर किया गया यह प्रयोग अपने जन्म से ही गलत रास्ते पर चल पड़ा।

21-03-2015

न्यूनतम साझा कार्यक्रम के प्रमुख मुद्दे

21-03-2015

राजनीतिक पहल
1. केन्द्र सरकार ने पाकिस्तान के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। उपमहाद्वीप में शांति और विकास के लिए गठबंधन सरकार समर्थन देकर सरकार के प्रयासों को और मजबूत करेगी।
2. सीमा के दोनों तरफ के लोगों के सीधे संपर्क के जरिए, सिविल सोसाईटी एक्सचेंज को प्रोत्साहित कर विश्वास बहाली के उपाय किए जाएंगे। अगले कदम के रूप में नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ यात्रा, वाणिज्य, व्यापार को बढ़ावा दिया जाएगा। दोनों तरफ संपर्क को और बढ़ाने के लिए तीनों क्षेत्रों में नए मार्ग खोले जाएंगे।
3. अटल बिहारी वाजपेयी की नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने ‘इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियतÓ के लिए हुर्रियत कॉन्फ्रेंस सहित सभी राजनीतिक दलों से बातचीत की पहल की थी।
4. उसी सिद्धांत को अपनाते हुए गठबंधन सरकार विचारधारा पर विचार किए बिना सभी आंतरिक दलों से अर्थपूर्ण बातचीत करेगी। इस बातचीत के जरिए जम्मू-कश्मीर के बकाया सभी मुद्दों के समाधान के लिए व्यापक आधार पर आम सहमति बनाने की कोशिश करेगी।

सुरक्षा मामले
1. राज्य में स्थिति बहुत तेजी से बदली है और लोगों के विश्वास को बहाल करने और उसे स्थायित्व देने के लिए प्रयास करेगी। राज्य की गठबंधन सरकार आवश्यकता और विशेष कानून की जरूरत को देखते हुए सुरक्षा की स्थिति की समीक्षा करेगी।

2. आम्र्ड फोर्सेज (स्पेशल पावर्स) ऐक्ट पर गठबंधन के दोनों दलों का ऐतिहासिक दृष्टिकोण भिन्न है, फिर भी वत्र्तमान एजेंडे के तहत गठबंधन सरकार राज्य के ‘संकटग्रस्त क्षेत्रÓ को डि-नोटिफाई की जरूरत की पहचान करेगी। हालांकि इस मसले पर अंतिम निर्णय केन्द्र सरकार को लेना है कि इन क्षेत्रों में अफस्पा को जारी रखना चाहती है या नहीं।

3. सुरक्षा बलों को दी गई भूमि के अलावा उन सभी भूमि, जो लीज, लाईसेंस और भूमि अधिग्रहण कानून के तहत अधिग्रहित की गई हैं उसे उसके वैध व वास्तविक स्वामी को लौटाई जाएगी, सिवाय उसके कि जो सुरक्षा दृष्टि से अति महत्वपूर्ण हैं। हर मामले में मौद्रिक पारिश्रमिक, चाहे वह किराया के रूप में हो या क्षतिपूत्र्ति के रूप में, उचित बाजार मूल्य पर देय होगी।

सामाजिक एवं मानवीय पहल
1. मान एवं सम्मान सहित कश्मीरी पंडितों की वापसी सहित उनकी सुरक्षा की सुनिश्चितता। समाज में विश्वास बहाली के लिए उपाय।
2. 1947, 1965 एवं 1971 में पाक अधिकृत कश्मीर से आए शरणार्थियों की एकमुश्त समझौता।
3. पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थियों की जीविका और जीविकोपार्जन के लिए  कदम।
4. क्रॉस बॉर्डर फायरिंग में मारे जाने वाले लोगों के परिजनों को एसआरओ 45 के तहत फायदा।
5. कोली, चोपन और पहाड़ी को अनुसूचित जनजाति का दर्जा।

शेख अब्दुल्ला नेहरु के मनोविज्ञान और उनके अपराध बोध को जल्दी ही समझ गये और उन्होंने जल्दी ही इसकी कीमत वसूलना शुरु कर दिया। विभाजन के उपरान्त जम्मू-कश्मीर का प्रयोग, राज्य के तीनों संभागों (शेष दो संभागों गिलगित और बल्तीस्तान पर पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया था और नेहरु ने उसे मुक्त करवाना इसलिये जरुरी नहीं समझा, क्योंकि वहां के लोग शेख की पार्टी से ताल्लुक नहीं रखते थे और न ही उसे अपना नेता मानते थे।) के लोगों और महाराजा हरि सिंह के साथ संयुक्त रुप में संवाद के साथ करना चाहिये था, लेकिन नेहरु इसे बाकी तीनों को दरकिनार कर केवल कश्मीर के, और वह भी केवल शेख अब्दुल्ला के सहारे करना चाहते थे। इससे भी बढ़कर नेहरु कश्मीर संभाग में मुसलमानों को बहुसंख्यक देखकर एक बार फिर तुष्टीकरण के माध्यम से उन्हें प्रसन्न करने के रास्ते पर चल निकले थे। ध्यान रहे एक बार पहले भी बाबा साहेब अंबेडकर ने कांग्रेस को इसी मुस्लिम तुष्टीकरण के रास्ते से बचने की सलाह दी थी, क्योंकि इसके परिणाम अशुभ ही निकलते हैं। संवादहीनता से उपजा यह प्रयोग शेख अब्दुल्ला के भीतर केवल तानाशाही प्रवृत्तियां ही नहीं बल्कि स्वतंत्र होने तक की इच्छाएं जगाने लगा था। प्रयोग के इस स्टेज तक आते-आते सरदार पटेल की मृत्यु हो चुकी थी, नहीं तो शायद वे ही इसमें कुछ दखलंदाजी करते और प्रयोग को सही दिशा में ले जाकर इसे डूबने से बचा लेते।
ऐसी स्थिति में राज्य के ही एक दूसरे सशक्त राजनैतिक दल प्रजा परिषद ने इस प्रयोग को संतुलित करने का प्रयास किया और मांग की कि राज्य की क्षेत्रीय विभिन्नताओं को देखते हुये सभी संभागों की भागीदारी सुनिश्चित की जाये। सबसे बड़ी मांग तो यह थी कि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण की अपनी असफल हो चुकी नीति को आधार बनाकर जम्मू-कश्मीर में यह नया प्रयोग न करे, बल्कि इसका आधार पंथनिरपेक्षता होना चाहिये। नेहरु मुस्लिम तुष्टीकरण के चक्कर में पूरे राज्य को केवल कश्मीर बना देना चाहते थे और जम्मू व लद्दाख को उसके उपनिवेश। प्रजा परिषद का आन्दोलन देखते-देखते जम्मू व लद्दाख समेत कश्मीर के कुछ हिस्सों में भी फैल गया। शेख ने नेहरु के पूरे समर्थन से इस आन्दोलन को बलपूर्वक दबाना चाहा। पन्द्रह लोग पुलिस की गोलियों से शहीद हो गये। इसी आन्दोलन में सहायता करने के लिये और शेख अब्दुल्ला से बातचीत करने के लिये डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू-कश्मीर गये थे, ताकि तीनों संभागों की समानता के आधार पर सहभागिता सुनिश्चित की जा सके। लेकिन, सरकार ने बातचीत करने की बजाय उन्हें जेल में डाल दिया और वहीं रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मौत हो गई। कांग्रेस तभी से लेकर अब तक इस प्रयोग को इसी लाईन पर चला रही थी। यही कारण था कि राज्य में हालात बद से बदतर होते गये और तीनों संभागों में खाई बढ़ती गई।

21-03-2015

प्रथम प्रधानमंत्री ने जम्मू-कश्मीर में जो प्रयोग शुरु किया था और जिसके गलत उपकरणों के कारण नतीजे भयानक आ रहे थे, पन्द्रहवें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उसी प्रयोग को एक बार फिर राह पर लाने का प्रयत्न किया है। अब की बार का यह प्रयोग नेहरु की मानसिक कल्पनाओं पर आधारित नहीं है बल्कि राज्य की जमीनी सच्चाईयों पर आधारित है। जम्मू संभाग में भारतीय जनता पार्टी ने पच्चीस सीटें हासिल की थीं। इतना ही नहीं बल्कि प्राप्त मतों के लिहाज से उसे राज्य में सबसे ज्यादा मत प्राप्त हुये थे। सीटों के हिसाब से पीडीपी 28 के आंकड़े पर पहले नम्बर पर थी, लेकिन प्राप्त मतों के लिहाज से भाजपा के बाद वह दूसरे नम्बर पर रही। मोटे तौर पर भाजपा जम्मू संभाग और पीडीपी कश्मीर संभाग के लोगों की महत्वकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है, ऐसा कहा जा सकता है। कांग्रेस और नेशनल कॉन्प्रेंस 1947 से लेकर अब तक राज्य में जिन कारकों को आधार बनाकर प्रयोग कर रही थीं, लोगों ने उसे मोटे तौर पर ठुकरा दिया। यह ठीक है कि चुनाव से पूर्व पीडीपी और भाजपा जिस एजेंडा को लेकर मतदाताओं के पास गई थीं, वे वैचारिक स्तर पर उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव ही कहे जा सकते हैं। विकास, अच्छा प्रशासन, भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन, ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें कोई भी राजनैतिक दल अलग स्टैंड नहीं ले सकता और न ही लेता है। इन मामलों में तो व्यक्ति और राजनैतिक दलों की विश्वसनीयता ही मुख्य होती है। इन मुद्दों पर कांग्रेस-नेशनल कॉन्फ्रेंस का ग्राफ  राज्य की जनता की नजर में बहुत नीचे गिरा हुआ है। पीडीपी-भाजपा को अभी परखा जाना है, लेकिन जम्मू-कश्मीर में असली झगड़ा दोनों पार्टियों में वैचारिक स्तर पर रहा है। राज्य की पहचान क्या है? क्या किसी प्रान्त की पहचान मजहबी आधार पर निश्चित की जा सकती है? क्या केवल मुस्लिम बहुल होने से ही किसी प्रान्त को विशेष दर्जा दिया जा सकता है? ये तमाम प्रश्न हैं जो जम्मू-कश्मीर के तीनों संभागों में अलग-अलग अर्थों में गूंजते रहते हैं। लेकिन, इनका उत्तर नहीं मिल पाता, क्योंकि जम्मू, लद्दाख और कश्मीर संभाग में अविश्वास की खाई बढ़ाने में पूर्ववर्ती शासकों ने अपने राजनैतिक हित साधने के लिये बहुत बड़ी भूमिका अदा की है।

पीडीपी और भाजपा की यह सरकार इस खाई को पाटने की दिशा में एक साहसिक प्रयोग है। एक बार जम्मू, लद्दाख और कश्मीर संभाग के लोगों में परस्पर संवाद और विश्वास के सेतु निर्माण हो जाते हैं, तो वे सभी प्रश्न जो आज हिमालय जितने ऊंचे दिखाई देते हैं, झेलम की लहरों जैसे तरल और संगीतमय हो जायेंगे। जम्मू-कश्मीर में नई सरकार का गठन इस नये प्रयोग की शुरुआत है। इसका प्रभाव केवल जम्मू-कश्मीर ही नहीं बल्कि पूरे देश में पड़ेगा। इसकी सफलता की कामना की जानी चाहिये और पीडीपी व भाजपा दोनों के ही नेतृत्व को बधाई दी जानी चाहिए।

21-03-2015

कुछ लोग इस नई सरकार को पीडीपी-भाजपा की साझा सरकार न कहकर कश्मीर और जम्मू की पहली बार बनी साझा सरकार भी कह रहे हैं। शुरु से ही राज्य में जम्मू और लद्दाख संभाग के लोग लगभग सभी मसलों पर एक स्वर से ही बोलते हैं, इसलिये इसे जम्मू-लद्दाख और कश्मीर की साझा सरकार भी कहा जा सकता है। दरअसल राज्य के दोनों संभागों, कश्मीर और जम्मू में विधानसभा के चुनावों में, राजनीतिक पंडित अपनी भाषा में जिसे वोटिंग बिहेवियर कहते हैं, वह बिल्कुल परस्पर विरोधी था। जम्मू-लद्दाख में लोग इस आशा में उत्साह से वोट दे रहे थे कि राज्य में पहली बार जम्मू केन्द्रित सरकार बनानी है। 1947 से लेकर आज तक जम्मू-कश्मीर में जो भी सरकार बनती आई है वह कश्मीर की सरकार मानी जाती थी। इसमें जम्मू व लद्दाख के भी कुछ लोग शामिल कर लिये जाते थे। नेशनल कॉन्फ्रेंस मोटे तौर पर कश्मीर संभाग की ही पार्टी मानी जाती है और शेख अब्दुल्ला और उनके परिवार को इस बात की बधाई देनी चाहिये कि उन्होंने अपनी पार्टी के इस चरित्र और पहचान को कभी छिपाने की भी कोशिश नहीं की। शुरु के अनेक साल तो नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस एकाकार होकर ही चलते रहे। बाद में जब दोनों अलग भी हुये तो कांग्रेस कश्मीर घाटी में अपने लिये कोई स्थान नहीं तलाश सकी। इसलिए उसने जम्मू संभाग की ओर रुख किया, लेकिन जम्मू का स्वभाव और मनोविज्ञान कांग्रेस से मेल नहीं खाता था और न ही कांग्रेस जम्मू संभाग के लोगों के मन का प्रतिनिधित्व कर सकी थी। यही कारण था कि जम्मू संभाग से सीटें प्राप्त करने के बाद भी पहले कांग्रेस और कालान्तर में सोनिया कांग्रेस, उन सीटों के बल पर राज्य में कश्मीर केन्द्रित सरकार बनाने में ही सहायता करती थी।

21-03-2015

सोनिया कांग्रेस के इस छल के बाद, जम्मू संभाग के लोगों को नई स्थितियां देखकर लगा कि इस बार यदि जम्मू एकजुट हो जाता है तो राज्य में पहली बार जम्मू केन्द्रित सरकार या फिर कश्मीर और जम्मू-लद्दाख की परस्पर समानता के आधार पर गठित सरकार संभव हो सकती है। इसलिये मतदाताओं ने अत्यन्त उत्साह से पोलिंग बूथों के आगे कतारें लगा दीं। लेकिन, कश्मीर घाटी में माहौल कुछ दूसरी प्रकार का था। भाजपा ने जिस तेजी से राज्य में अपना प्रचार शुरु किया था और मिशन 44 का जितना हल्ला पड़ा, उससे कश्मीर घाटी के राजनैतिक दलों में भय व्याप्त हो गया कि 1947 के बाद पहली बार राज्य की सरकार में से पहल घाटी के हाथ से छिन सकती है। यह भय और भी बढ़ गया जब भाजपा ने कश्मीर घाटी की भी लगभग सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिये और उनमें से भी दो-तीन को छोड़कर सभी मुसलमान ही थे। पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के सज्जाद लोन से भाजपा का समझौता ही नहीं हुआ, बल्कि लोन ने सार्वजनिक रुप से मोदी की तारीफ के पुल बांधने शुरु कर दिये।

भाजपा के घाटी में घुस आने का भय केवल राजनैतिक दलों को ही नहीं सता रहा था बल्कि पाकिस्तान, हुर्रियत कॉन्फ्रेंस और आतंकवादियों को भी सता रहा था।

आज तक जम्मू-कश्मीर में होता यह आया था कि केन्द्र में सत्तारुढ़ सरकार अपने खास तरीकों से राज्य में उसी पार्टी को जीतने का अवसर देती थी, जिससे उसके अपने राजनैतिक हित सधते थे। इस रवायत में अपवाद केवल मोरारजी देसाई और अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में हुये विधानसभा चुनाव ही कहे जा सकते हैं। नरेन्द्र मोदी के काल में इस बार इस प्रकार की धांधली की न तो आशंका थी और न ही संभावना। इस लिए कश्मीर घाटी में आम आदमी को विश्वास हो गया था कि वे जिस प्रकार मतदान करेंगे उसी प्रकार के नतीजे मतदान मशीन से बाहर निकलेंगे। आम मतदाता की आशा और आतंकवादियों के मन में भाजपा को लेकर भय, इन दोनों ने मिलकर कश्मीर घाटी में भी मतदाताओं की कतारें लम्बी कर दीं। इस बार सुरक्षा बलों ने खास ध्यान रखा कि पाकिस्तान कोई गड़बड़ी न ख़ुद कर सके और न ही अपने आतंकवादी गिरोहों द्वारा करवा सके। उसका कुल मिलाकर नतीजा यह हुआ कि राज्य में आशातीत मतदान हुआ।

21-03-2015

यह कहने में कोई गुरेज नहीं करना चाहिए कि जम्मू संभाग और कश्मीर संभाग में वोटिंग बिहेवियर एक दूसरे के विपरीत ही था। कुछ लोगों ने इसे उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव भी कहा। जम्मू-कश्मीर के आधारभूत मुद्दों पर भाजपा और पीडीपी के विचार परस्पर विरोधी हैं। संघीय संविधान के अनुच्छेद 370 को लेकर तो दोनों दलों का विरोध जगजाहिर है ही, लेकिन जम्मू-कश्मीर में मुख्य मुद्दा अनुच्छेद 370 नहीं है, बल्कि यह बहस है कि इससे जम्मू, कश्मीर व लद्दाख के लोगों को सचमुच कुछ लाभ है भी या इससे लाभ की बजाय नुकसान ही ज्यादा हो रहा है। अनुच्छेद 370 के लाभ-हानि की यह सार्थक बहस भी हाल ही में भारतीय जनता पार्टी ने ही शुरु की थी। पहले तो राज्य के कश्मीर केन्द्रित राजनैतिक दल इस विषय पर सार्वजनिक बहस के लिये भी तैयार नहीं होते थे, लेकिन कम से कम अब राज्य के तीनों संभागों में जनता के स्तर पर यह बहस तो होने लगी है कि इस अनुच्छेद से राज्य के लोगों को क्या नुकसान हो रहा है और क्या लाभ हो रहा है। इस बहस से जैसे-जैसे राज्य के लोगों में इस अनुच्छेद को लेकर भ्रम मिटता जायेगा, वैसे-वैसे किसी भी राजनैतिक दल के लिये इसका सांप गले में लटकाकर घूमना मुश्किल होता जायेगा। जम्मू और लद्दाख के लोगों में तो पहले ही इस अनुच्छेद को लेकर कोई मोह नहीं है। कश्मीर घाटी में भी गुज्र्जर, शिया समाज और जनजाति के लोग इस अनुच्छेद को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाते। स्थानीय स्वशासन निकायों के प्रतिनिधि तो इस अनुच्छेद को जमीनी स्तर पर लोकतंत्र के लिये घातक मानते हैं। भाजपा ने कश्मीर घाटी में इतने कश्मीरी मुसलमान चुनाव में उतारे और उसे पहली बार आधा लाख के लगभग वोट मिले। यह किसी मुसलमान और कश्मीरी से छिपा नहीं था कि भाजपा का अनुच्छेद 370 पर क्या स्टैंड है।

इसी प्रकार अफस्पा यानि सशस्त्र बल विशेष सुरक्षा अधिकार अधिनियम को हटाने का प्रश्न है। इस पर दोनों दल परस्पर विरोधी धरातल पर खड़े हैं। किसी भी राज्य में सिविल प्रशासन की सहायता के लिये सेना को बुलाना राज्य सरकार का अधिकार है। जम्मू-कश्मीर में भी इस काम के लिये सेना को राज्य सरकार ने ही बुलाया हुआ है। लेकिन सेना, सेना अधिनियम के अन्तर्गत काम करती है। जब सेना को सिविल काम के लिये बुलाया जाता है तो वह सेना अधिनियम के तहत कार्य नहीं कर सकती। इसलिए सिविल काम में यदि सेना को बुलाया जाता है तो उसके कार्य करने के लिये अलग से वैधानिक व्यवस्था करनी ही होगी। यह व्यवस्था ही अफस्पा कहलाती है। यदि राज्य सरकार किसी क्षेत्र से सेना को सिविल कार्य से हटा देती है तो अफस्पा वहां से अपने आप ही समाप्त हो जायेगा। नई सरकार के गठन के बाद, उसकी कार्यशैली से ही इन दोनों विषयों पर सार्थक निर्णय हो सकता है।

21-03-2015

मुफ्ती ने अलगाववादी मसरत को रिहा कर भाजपा को चिढ़ाया

21-03-2015

जम्मू-कश्मीर की मुफ्ती सरकार ने अपनी सहयोगी पार्टी बीजेपी के विरोध को दरकिनार कर चार साल से जेल में बंद मुस्लिम लीग के नेता मसरत आलम को बारामूला जेल से रिहा कर दिया है। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने 10 लाख के इनामी मसरत को 2010 में श्रीनगर के बाहरी इलाके से गिरफ्तार किया था। मसरत पर 2010 में एंटी-इंडिया कैंपेन चलाने का आरोप था। मसरत को पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था। 42 वर्षीय आलम अकेला राजनीतिक कैदी था, जो जेल में बंद था। मसरत आलम को हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी का उत्तराधिकारी भी माना जाता है। मुफ्ती सरकार की यह पहली राजनीतिक रिहाई है। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से ही मुफ्ती ने हुर्रियत और आतंकवादियों की पैरवी करनी शुरू कर दी थी। मुफ्ती ने घाटी में शांतिपूर्ण चुनाव के लिए पाकिस्तान, हुर्रियत और आतंकवादियों का धन्यवाद भी किया था। उन्होंने कहा था कि जम्मू-कश्मीर सरकार जल्द ही राजनैतिक कैदियों को राहत देने के लिए अध्यादेश लगाएगी। इस घोषणा पर भाजपा ने विरोध जताते हुए कहा था कि सरकार के ऐसे किसी भी अध्यादेश का पार्टी विरोध करेगी। बावजूद इसके मसरत को जेल से रिहा करके, सरकार अपने मंसूबे को कामयाब करने की राह में एक सफल कदम को अंजाम दे चुकी है, जिसका भाजपा विरोध भी कर रही है।

21-03-2015

बहुत लोग इस बात से दुखी हैं कि राज्य में किसी दल को बहुमत नहीं मिला। भारतीय जनता पार्टी को फिलहाल अपने बलबूते यह संभव नहीं था। इसलिये त्रिशंकु विधानसभा ही दोनों दलों, दोनों क्षेत्रों और राज्य में हिन्दुओं-मुसलमानों को संवाद के लिये एक आसन तक ला सकती है। त्रिशंकु विधानसभा परिणामों का यह लाभ भी हुआ कि जब दोनों संभागों के प्रतिनिधि बात करने के लिये बैठे तो वे समान धरातल पर बैठकर बात कर रहे थे। पीडीपी को 28 विधानसभा सीटें मिलीं थीं और भाजपा को भी कश्मीर घाटी में अपने सहयोगी पीपुल्स कॉन्फ्रेंस को मिलाकर 28 सीटें ही मिलीं थीं। इन 28 में भाजपा के विद्रोही पवन गुप्ता की सीट भी शामिल है। बातचीत की मेज पर बैठे दोनों पक्षों में से कोई एक पक्ष संख्या के लिहाज से कमजोर हो और दूसरा ताकतवर तो उन दोनों में समझौते होते हैं, मित्रता नहीं। लेकिन जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और भाजपा समान ताकत से बातचीत कर रही थी, इसलिये समझौते के बजाय मित्रता की दिशा में पहल हो रही थी। ध्यान रखना चाहिये कि समझौते विवशता में होते हैं और मित्रता हृदय से होती है। प्रश्न यह है कि मित्रता करने के लिये बैठे दोनों पक्ष उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव हों तो मित्रता का आधार क्या हो सकता है? राजनैतिक दलों में यह आधार न्यूनतम साझा कार्यक्रम होता है। उसी को तैयार करने में इतना समय लगा। यह जम्मू-कश्मीर राज्य के दोनों पक्षों में परस्पर बर्फ पिघलने का संकेत है। न्यूनतम साझा कार्यक्रम की पहली शर्त ही यह होती है कि जिन मुद्दों पर दोनों पक्ष सहमत नहीं हैं, उनको फिलहाल न छेड़ा जाये (छोड़ा जाये नहीं) और जिन प्रश्नों या समस्याओं पर दोनों पक्ष सहमत हैं उनके आधार पर सरकार चलाई जाए। भारतीय जनता पार्टी और पीडीपी ने फिलहाल इसी न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर सरकार चलाने का निर्णय किया है। दोनों पक्षों में, जम्मू-लद्दाख और कश्मीर घाटी में, हिन्दुओं और मुसलमानों में एक बार परस्पर विश्वास बन जाता है, संदेह और संशय समाप्त हो जाता है, तो यह सरकार राज्य के ही नहीं बल्कि देश के इतिहास में एक नये अध्याय की शुरुआत कर सकती है।

21-03-2015

इस बार सकारात्मक पहलू यह है कि भाजपा न तो तुष्टीकरण को हथियार बना रही है और न ही लालच को। वह बराबर के आसन पर, कश्मीर घाटी के लोगों द्वारा बिना किसी भय या छल-कपट के माहौल में किये गये मतदान के प्रयोग से निकले परिणाम के आधार पर, जम्मू-लद्दाख व कश्मीर घाटी के लोगों के बीच एक सेतु निर्माण का कार्य कर रही है, जिसकी सफलता की आशा की जानी चाहिये। जो सेतु 1947 में बनना चाहिये था, उसके अब बनने की आशा की जा सकती है। लेकिन इसके लिये बहुत सूझ-बूझ और धैर्य चाहिए। प्रश्न केवल इतना ही है कि क्या मुफ्ती मोहम्मद सईद यह धैर्य दिखा पायेंगे? वैसे कश्मीर घाटी का प्रतिनिधित्व करने वाली पीडीपी के किसी एक भी मंत्री ने कश्मीरी भाषा में शपथ नहीं ली।

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