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छठी मईया की महिमा

छठी मईया की महिमा

उग हे सूरज देव, भेल भिनसरवा अरघ के बेरवा, पूजन के रे बेरवा हो…

समस्त देवों में भगवान भास्कर ऐसे साक्षात् देवता हैं, जिनके दर्शन इस लौकिक संसार के समस्त जीव रोज ही पाते हैं और अपने जीवन के पोषण के लिए उन्हीं से अनिवार्य ऊर्जा भी प्राप्त करते हैं। असीम आस्था एवं अगाध विश्वास, कठिन तप एवं कठोर अनुष्ठान का त्योहार छठ, जिसे कि ‘डाला छठ भी  कहा जाता है, जीवनदायी एवं वरदायी भगवान सूर्य की उपासना को समर्पित होता है। कहा जाता है कि सम्पूर्ण अनुष्ठान एवं पूर्ण भक्ति-भाव से इस व्रत का पालन करने से व्रती के जीवन में सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य एवं सौभाग्य की प्राप्ति होती है तथा एक साधक उन सभी सिद्धियों को प्राप्त करने में सफल होता है, जिनकी प्राप्ति के लिए देवी-देवता भी कठिन साधना करते हैं।

पौराणिक एवं लोक कथाओं में छठ

छठ का पर्व मुख्य रूप से सूर्य-उपासना का पर्व होता है। भारत में सूर्य-उपासना का इतिहास वेदों जैसा ही प्राचीन तथा पवित्र है। ऋग्वेद में इस पर्व के उल्लेख के अतिरिक्त इसकी चर्चा भगवत पुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण तथा विष्णु पुराण आदि धर्मग्रंथों में भी पाई जाती है। भगवान सूर्य को समर्पित होने के कारण छठ के व्रत को ‘सूर्य षष्ठी’ भी कहा जाता है।

कहते हैं कि महाभारत काल में द्रौपदी एवं पांडव बंधुओं ने भी धौम्य ऋषि के कथनानुसार छठ के व्रत का अनुष्ठान किया था। द्रौपदी के द्वारा छठ व्रत के पालन की महिमा के फलस्वरूप ही पांडवों को फिर से हस्तिनापुर का राज्य हासिल हो पाया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार कार्तिक शुक्ल की षष्ठी के सूर्यास्त तथा सप्तमी के सूर्योदय के मध्य देवमाता गायत्री जी का अवतरण हुआ था। ऐसी भी मान्यता है कि माता गायत्री का प्रादुर्भाव सूर्य देव की पूजा के परिणामस्वरूप ही संभव हो पाया था और इसी कारण से षष्ठी के दिन से माता छठी की पूजा होती रही है।

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पूजन विधि

छठ का व्रत चार दिनों तक चलता है। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को शुरू होता है तथा सप्तमी को उदित होते भगवान भास्कर को अध्र्य अर्पण के साथ समाप्त हो जाता है। वैसे छठ का त्योहार वर्ष में दो बार मनाया जाता है – एक बार कार्तिक मास में तथा दूसरा चैत्र मास में। किन्तु कार्तिक मास में मनाया जाने वाला छठ का व्रत अधिक प्रचलित है। चैत्र मास में मनाया जाने वाला छठ ‘चैती छठ’ के नाम से भी जाना जाता है।

नहाय-खाए

छठ व्रत का प्रथम दिन ‘नहाय-खाए’ कहलाता है। यह कार्तिक मास के चतुर्थी तिथि को संपन्न होता है। इस दिन घर की विशेष सफाई होती है तथा आंगन को गोबर से लीपा जाता है। छठ के व्रती किसी सरोवर या फिर गंगा नदी में स्नान करते हैं। यह दिन ‘कदवा भात’ भी कहलाता है।

खरना या लोहंडा

यह अनुष्ठान व्रत के दूसरे दिन मनाया जाता है जो कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के पंचमी को होता है। इस दिन व्रतधारी दिन भर उपवास के उपरांत रात में भोजन करते हैं। भोजन के रूप में गुड़ तथा दूध से खीर बनायी जाती है तथा शुद्ध घी की पूड़ी बनायीं जाती है जिसे कि ‘सुहारी’ कहा जाता है।

कहा जाता है कि खरना का भोजन व्रती रात में ऐसे समय में ग्रहण करते हैं, जबकि पूरी तरह से वातावरण शांत हो तथा किसी भी जीव या मनुष्य की आवाज सुनाई न दे रही हो। खरना के दिन व्रती के भोजन ग्रहण के पूर्व घर के सभी सदस्यों के द्वारा अर्थ्य का अर्पण किया जाता है। यह अध्र्य जल या फिर गाय के दूध से भी किया जाता है। इसीलिए खरना के दिन अर्पित किये गए अध्र्य को छठ व्रत का पहला तथा सर्वाधिक महत्वपूर्ण अध्र्य माना जाता है। इसी दिन के बाद से व्रती का उपवास शुरू हो जाता है।

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छठ का सांध्य अध्र्य

यह दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। यह दिन छठ व्रत के उपवास का प्रथम दिन होता है। यह दिन अति व्यस्तता का होता है। क्योंकि घर के प्राय: सभी लोग किसी-न-किसी कार्य में व्यस्त होते हैं। पास के नदी या तालाब के तट पर घाट का निर्माण किया जाता है, जहां पर सजावट के साथ रंग-बिरंगे रोशनी की व्यवस्था की जाती है। घर की महिलायें छठ पूजा की सामग्रियों को बनाने में व्यस्त होती हैं।

प्रसाद के रूप में मुख्य रूप से ठेकुआ बनाया जाता है, जो कि गेहूं के आटे को गुड़ के साथ मिलाकर शुद्ध घी में तैयार किया जाता है। फिर गुड़ तथा घी के साथ सूखी मिठाई के रूप में चावल के आटे से एक विशेष पकवान बनाया जाता है जिसे कि भूसवा या चावल का लड्डू या फिर कसार भी कहा जाता है। इन सभी पकवानों तथा फलों को बांस से निर्मित सूप में रखा जाता है। विभिन्न प्रकार के पकवानों से भरे इन सूपों को बांस की बड़ी टोकड़ी, जिसे कि चांग भी कहते है, में रखा जाता है। इस चांग को नदी या सरोवर पर भक्त अपने सिर पर तथा खुले पांव उठा कर लाते हैं। यहां पर प्रत्येक सूप में घी के दिये जलाए जाते हैं, अगरबत्तियां जलाई जाती हैं।

जब भगवान भास्कर अस्त होने वाले होते हैं तो उससे कुछ देर पहले व्रती सरोवर के जल में प्रवेश करती हैं तथा अरदाश करती हैं- अर्थात अस्ताचल गामी सूर्य से अपने परिवार की सुख-समृद्धि एवं धन-धान्य की कामना हेतु हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं। इस अवसर पर पूरा वातावरण अलौकिक भक्ति-भाव में डूबा रहता है। जब सूर्य भगवान डूबने को होते हैं तो व्रती भगवान भास्कर को अध्र्य देते हैं। फिर सभी श्रद्धालु भी अस्ताचल गामी सूर्य की तरफ खड़े होकर गाय के कच्चे दूध या फिर जल से अध्र्य समर्पित करते हैं।

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प्रात:कालीन अध्र्य और पारण

यह अनुष्ठान छठ व्रत का चौथा और अंतिम दिवस होता है जो कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के सप्तमी को संपन्न होता है। सरोवर पर पहुंचकर व्रती जल में प्रवेश करती हैं और उदित होते सूर्य को देखते हुए अध्र्य अर्पित करते हैं। सभी श्रद्धालु भी उगते सूर्य को अध्र्य अर्पित करते हैं और अपने मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। अध्र्य अर्पण के बाद व्रती श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण करती हैं। अपने घर आकर व्रती कच्चे दूध ग्रहण कर अपने व्रत का समापन करती हैं।

कोसी

छठ के अनुष्ठान के तीसरे दिवस की शाम को अर्थात अस्ताचलगामी सूर्य को अध्र्य अर्पित करने के पश्चात घर पर गन्ने के पांच पौधों को खड़ा करके एक छतरी जैसा बनाया जाता है, जिसके अन्दर मिट्टी के दीप जलाए जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि गन्ने के ये पांच पौधे पंचतत्व (क्षिति, जल, पावक, गगन तथा समीर) को दर्शाते हैं, जिनसे मानव का शरीर निर्मित हुआ माना जाता है।

कहते हैं कि कोसी का अनुष्ठान वैसे परिवार में किया जाता है, जिसमें हाल में ही या तो कोई विवाह संस्कार संपन्न हुआ हो या फिर किसी बच्चे का जन्म हुआ हो। मिट्टी के दीप की रोशनी ऊर्जा का प्रतीक है और इसके द्वारा साधक अपने तथा अपने परिवार के जीवन में शक्ति, सौभाग्य एवं सामथ्र्य की कामना करते हैं।

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छठ का लौकिक महत्व

छठ का व्रत महज एक अनुष्ठान नहीं है। बल्कि इस समस्त संसार के जीवों में प्राण और ऊर्जा का संचार करनेवाले भगवान भास्कर के प्रति आस्था और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक महती अवसर भी है । मुख्य रूप से सन्तान प्राप्ति की कामना से मनाया जानेवाला छठ व्रत अपने लौकिक स्वरुप में मातृका की उपासना का व्रत है। पौरोहित्य परंपराओं और नियमों से बिलकुल अलग महान लोकपर्व छठ का व्रत संपूर्ण जगत, प्रकृति और पर्यावरण के प्रत्यक्ष और जाग्रत देवता भगवान भास्कर को समर्पित होता है जिनके प्रभामंडल में सनातनी धार्मिक भाव से ओत-प्रोत लौकिक संसार का अद्भूत स्वरुप जीवित हो उठता है।

सनातन से यह मान्यता चली आ रही है कि इस संसार के समस्त जीव सूर्य की किरणों से ही जीवनदायी तेज, बल, पराक्रम, मेधा और ऊर्जा प्राप्त करते हैं। छठ का व्रत जीवंत और प्रत्यक्ष देवता के रूप में पूज्य सूर्य के प्रति इस लौकिक संसार के समस्त जीवों के संबंध, आस्था और श्रद्धा के भाव को और भी प्रगाढ़, मंगलकारी और वरदायिनी बनाता है।

 

श्रीप्रकाश शर्मा

 

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