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दिलीप राय : होटल मालिक का राजनीतिक उत्थान और पतन

दिलीप राय : होटल मालिक का राजनीतिक उत्थान और पतन

पिछले तीन दशक से अधिक समय तक ओडिशा राज्य की राजनीति में दखल रखने वाले अल्पभाषी पर धनपति होटल व्यवसायी दिलीप राय के सितारे अब गर्दिश में आ गए हैं। वाजपेयी सरकार में कोयला मंत्री रहे दिलीप राय को सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने 1999 के एक कोयला घोटाले में संलिप्त होने के आधार पर तीन साल के कारावास की सजा और दस लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। कोयला घोटाले में दंडित होने वाले वे एनडीए सरकार के पहले मंत्री हैं। हालांकि कोर्ट ने उन्हें और अन्य तीन लोगों को तत्काल जमानत भी दे दी है। दो वर्ष पूर्व भाजपा और राउरकेला विधायक पद से इस्तीफा देने के बाद से ही उनके राजनीतिक भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लग गया था। एक समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उन्हें ‘मित्र’ कहकर संबोधित किये जाने वाले दिलीप राय का इस तरह राजनैतिक पतन होगा यह बात  कल्पना से परे थी। कुछ लोगों का मानना है कि भाजपा से दूरी बनाने के परिणामस्वरूप उनकी यह हालत हुई है।

अब एक भ्रष्टाचार मामले में सजायाफ्ता होने के बाद से उनके राजनीतिक यात्रा पर पूर्णविराम लगने के आसार बन गये हैं।  इस्पात नगरी राउरकेला से तीन बार विधायक, दो बार राज्यसभा सांसद, राज्य सरकार और केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके दिलीप राय ने राउरकेला में 1982 में एक छोटे से होटेल व्यवसाय की शुरुआत की और आज वे पांच राज्यों में फैले मेफेयर होटेल ग्रुप के मालिक हैं।

झारखंड के गिरिडीह जिले के 105.153 हेक्टेयर भूमि पर फैले प्रतिबंधित कोयला खदान से संबंधित केस में विशेष सीबीआई अदालत ने 6 अक्टूबर को अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कोयला राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिलीप राय समेत तीन अन्य लोगों को दोषी करार दिया।  26 अक्तूबर को अदालत ने दोषियों को तीन वर्ष कैद की सजा सुनाने के साथ उन पर दस लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।

विशेष सीबीआई न्यायाधीश भरत पाराशर ने दिलीप राय को सेक्शन 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) और 120-बी/40/420 (ठगी) आइपीसी,और 409 (विश्वास भंग करना) और सेक्शन 13(1)(सी) और 13(1) (डी) भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 के तहत दोषी ठहराया। कोयला विभाग के अतिरिक्त सचिव प्रदीप कुमार बनर्जी और  नित्यानंद गौतम, सलाहकार (परियोजना) को भी उपरोक्त धारा के तहत दोषी करार किया। कोलकाता स्थित कैस्ट्रॉन टेक्नॉलजीज लिमिटेड (सीटीएल) के मालिक महेन्द्र कुमार अग्रवाल भी इस मामले में दोषी करार दिये गए।

इस मामले के 2012 में उजागर होने के बाद केंद्रीय सतर्कता आयोग ने खदान आबंटन मामले में गलत तरीके और भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की और बाद में सीबीआई को मामला सौंपा, जिसने पर्याप्त सुबूत जुटाने के बाद मुकदमा दर्ज किया।

कहा गया कि दिलीप राय ने स्वंय मंत्रालय के निर्देशवली को स्वीकृति दी थी कि किसी ऐसी कंपनी को जो लोहा इस्पात या स्पंज आयरन उत्पादन से जुड़ी हो और उसका उत्पादन  क्षमता 1 एम टी पी ए से कम हो को केप्टिव खनन के लिए कोयला ब्लाक नहीं दिया जायेगा। पर सीटीएल के मामले में ढिलाई देकर उसे लाभ पंहुचाया गया। न्यायाधीश पाराशर ने कहा कि निसन्देह रूप सभी आरोपियों ने षड्यंत्र कर ब्रह्मडिला कोयला ब्लॉक को सीटीएल को दिया।

विशेष सीबीआई कोर्ट ने अप्रैल, 2017 में दिलीप राय के अलावा कोयला मंत्रालय में रहे तब के दो वरिष्ठ अधिकारियों प्रदीप कुमार बनर्जी और नित्यानंद गौतम के साथ-साथ कैस्ट्रॉन टेक्नॉलजीज लिमिटेड के डायरेक्टर महेंद्र कुमार अग्रवाल के खिलाफ धोखाधड़ी, आपराधिक साजिश और विश्वास हनन का आरोप तय किया।

सीबीआई ने चार्जशीट में कहा कि सीटीएल ने मई 1998 में ब्रह्मडीहा कोयला ब्लॉक के लिए आवेदन दिया। पर कोल इंडिया लिमिटेड ने कोयला मंत्रालय को बताया कि यह ब्लॉक त्याग दिये क्षेत्र में है और वहां पानी भरा हुआ है अत: खनन करना खतरनाक होगा। संबंधित फाइल 23 अप्रैल, 1999 को पुन: दिलीप राय के पास आई। 12 मई, 1999 को सीटीएल ने दुबारा आवेदन कर उनके आवेदन पर तेजी से निर्णय लेने का आग्रह किया।

जब 13 मई, 1999 को कोयला सचिव के पास दिलीप राय के ऑफिस से पुनरीक्षण के लिये फाइल आई तो इसे नित्यानंद गौतम के पास भेज दिया गया। सीबीआई का आरोप है कि गौतम ने अपने पहले के रुख से पलटी मारते हुए कहा जिसके आधार पर स्क्रीनिंग समिति ने ढि़लाई बरतते हुए सीटीएल को देने की सिफारिश की।

सीबीआई न्यायाधीश ने कहा कि ‘आपराधिक षडयंत्र कर महत्वपूर्ण राष्ट्रीय  संसधानों में घोटाला किया गया।’  दिलीप राय की भूमिका का उल्लेख करते हुए न्यायाधीश ने कहा ‘उन्होंने बेईमानी व गलत इरादे से स्पष्ट नियमों का उल्लंघन करते हुए कानून के नियमों को तोड़ा। दिलीप राय ने त्याज्य खदानों को कानून के विरुद्ध जाकर सीएलटी को फायदा पंहुचाया।’

सजा सुनाये जाने के अगले दिन 27 अक्टूबर को ही दिल्ली उच्च न्यायालय ने पूर्व केंद्रीय मंत्री दिलीप राय को राहत देते हुए उनकी तीन वर्ष जेल की सजा निलंबित कर दी। न्यायालय ने सीबीआई को नोटिस जारी कर दिलीप राय की याचिका पर एजेंसी से जवाब मांगा। राय ने याचिका दायर कर मामले में खुद को दोषी ठहराने एवं सजा दिए जाने को चुनौती दी है। बहरहाल, निचली अदालत ने दोषी व्यक्तियों को एक महीने की जमानत दी ताकि वे फैसले को ऊपरी अदालतों में चुनौती दे सकें।

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ओडिशा की राजनीति में शिखर पुरूष माने जाने वाले बीजू पटनायक ने दिलीप राय को  राजनीति में आने को प्रेरित किया। वे दिलीप राय को जीवन भर पुत्र मानते रहे। दिलीप राय के राजनीतिक सफर की शुरुआत 1985 में हुई जब वे राउरकेला नगर परिषद के अध्यक्ष बने। उसी वर्ष 1985 में जनता पार्टी टिकट पर राउरकेला विधायक चुने गए। पांच वर्ष बाद जनता लहर में दुबारा विधायक बनकर  बीजू पटनायक  मंत्री परिषद में मंत्री बने। 1995 के विधानसभा चुनाव दिलीप राय को कांग्रेस प्रार्थी प्रभात महापात्र के हाथों शिकस्त झेलनी पड़ी। पर यह पराजय उनके लिए लाभदायक सिद्ध हुई। वे राज्य राजनीति से निकल कर राष्ट्रीय राजनीति के प्रांगण में पंहुच गये। बीजू पटनायक ने राय को 1996 में राज्यसभा सांसद बनवाया दिया और वे देवगौड़ा सरकार में मंत्री बन गए। 1997 में बीजू बाबू के देहावसान के बाद ओडिशा की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। बीजू पटनायक की राजनीतिक विरासत को जीवित रखने के लिये दिलीप राय व अन्य बीजू अनुयायियों ने राजनीति से कोसों दूर रहते आये उनके छोटे पुत्र नवीन पटनायक को राजनीति में लेकर आये। उस समय तक राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा उर्ध्वगामी हो चली थी। बीजू पटनायक ने हमेशा भाजपा से दूरी बनाये रखी पर नई पीढ़ी भाजपा के प्रभाव से बच नहीं पाई। भाजपा के प्रोत्साहन से बीजू अनुयायियों ने जनता पार्टी को दो फाड़ कर बीजू जनता दल के नाम से नई क्षेत्रीय दल का गठन किया। इसने भाजपा से गठबंधन किया और यह केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ हो गया। नवीन पटनायक 2000 में राज्य के मुख्यमंत्री बने। नौसिखिए नवीन पटनायक ने बीजद पर अपना पूरा दबदबा कायम करने की नीयत से बीजू पटनायक के करीबी लोगों को दल से दूर करना शुरू किया। इस मुहिम में दिलीप राय उनके पहले राजनीतिक शिकार बने। उन्होंने वाजपेयी सरकार से इस्पात राज्य मंत्री दिलीप राय का 27 मई, 2000 को इस्तीफा करवा दिया, और 2002 में बीजद से निकाले गए। उसी वर्ष दिलीप राय ने एक निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में राज्यसभा का चुनाव लड़ा और नवीन पटनायक की उनको हराने की कोशिशों के बावजूद दिलीप राय सभी दलों में अपने ‘मित्रों’ की मदद से चुनाव जीत गये। इससे दिलीप राय और नवीन पटनायक के बीच की तल्खी बहुत बढ़ गई। अपनी राजनीतिक प्रासंगकिता को बचाये रखने के लिए उन्होंने 2003 में ओडिशा गण परिषद का गठन किया। फिर जनशक्ति दल गठन कर राउरकेला नगरपालिका का चुनाव लड़े और नगर पालिका चुनाव जीता लिया। दिलीप राय ने अपने राउरकेला का किला तो बचा लिया पर राज्य राजनीति में नवीन बाबू के बढ़ते वर्चस्व को रोकने में कामयाब नहीं हो सके। राजनीतिक वजूद को बचाने के लिए वे  2004 में कांग्रेस में शामिल हुए पर चार साल बाद 2008 में कांग्रेस छोड़ दी। 2009 में जब नवीन पटनायक ने भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया तो दिलीप राय 2009 में भाजपा में शामिल हो गए। 2014 में वे पुन: तीसरी बार राउरकेला से भाजपा प्रार्थी के रूप में विधायक बने। पर शीघ्र ही भाजपा से भी उनका मोह भंग होने लगा। वास्तव में दिलीप राय की सारी राजनीति वैयक्तिक रही है। वे एक बड़े संगठन में अनुशासित कार्यकर्ता के रूप काम करने मानसिकता के व्यक्ति नहीं हैं। भाजपा में शामिल होने के बावजूद वे भाजपा कार्यालय में जाने की बजाए सारा काम अपने घर से करते थे। इससे नगर में भाजपा ‘नये’ और ‘पुराने’ खेमे में बंटी दिखाई देने लगी थी। 2015 में अप्रैल माह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राउरकेला आये थे। उन्होंने राउरकेला-वासियों की दो पुरानी मांगों – ब्राह्मणी नदी पर दूसरा पुल और सुपर स्पेशलियटी अस्पताल की शीघ्र स्थापना की घोषणा की। दिलीप राय चाहते थे कि ये दोनों काम तत्काल पूरा हो जाये। इसमें थोड़ा विलंब भी उन्हें विचलित कर रहा था। 6 जून, 2016 को राउरकेला में भाजपा ने विकास पर्व का आयोजन किया था। इसमें तत्कालीन इस्पात मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर मुख्य अतिथि थे। लेकिन दिलीप राय के  विरोध के चलते नरेंद्र सिंह तोमर नहीं आये। इससे पुराने भाजपाइयों में दिलीप राय के विरुद्ध रोष बढ़ा।

इसी बीच एक कोयला घोटाले में अप्रैल, 2017 में  सीबीआई द्वारा उन्हें नामजद करने से भाजपा से उनकी नाराजगी और दूरी बढऩे लगी। वे फेसबुक पर नवीन पटनायक की कार्यशैली की प्रशंसा करने लगे और  ब्राह्मणी पुल और सुपर स्पेशलियटी अस्पताल के विलंब को लेकर मोदी सरकार पर कटाक्ष करने लगे। माना जाता है कि वे भाजपा में धर्मेंद्र प्रधान के बढ़ते प्रभाव से परेशानी महसूस करने लगे थे क्योंकि उनके साथ दिलीप राय के संबंध बहुत मधुर नहीं थे।

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21 जुलाई 2017 को राउरकेला में नितिन गड़करी द्वारा ब्राह्मणी नदी पर पुल के शिलान्यास समारोह में धर्मेंद्र प्रधान व दिलीप राय के बीच की तल्खी साफ नजर आई। धर्मेंद्र प्रधान ने दिलीप राय द्वारा बार-बार केंद्र को पत्र लिखने के प्रसंग का जिक्र करते हुए पूछा कि उन्होंने राज्य सरकार द्वारा भूमि उपलब्ध नहीं कराये जाने  पर कितने पत्र लिखे हैं। बाद में शहर में दिलीप समर्थकों ने पोस्टर लगाये जिसमें लिखा था ‘माटी पहले पार्टी पीछे’।

इतना ही नहीं 30 जनवरी, 2018 को राउरकेला इस्पात संयंत्र में यूनियन मान्यता के चुनाव होने थे। दिलीप राय ने इस चुनाव में कांग्रेस के इंटक समर्थित राउरकेला श्रमिक संघ को समर्थन दिया। जुएल ओराम ने भारतीय मजदूर संघ समर्थित राउरकेला इस्पात कारखाना कर्मचारी संघ ने समर्थन दिया जिसमें अंतत: बीएमएस विजयी हुआ। दिलीप राय के अन्तरंग मित्र बिजय महापात्र भी बारंबार भाजपा पर कटाक्ष करते रहे थे। उन्हें लगता था कि भाजपा उन्हें उनके स्तर के अनुरूप महत्त्व नहीं दे रही है। वे अक्सर भाजपा से अलग होने का इशारा भी करने लग गये थे। आखिरकार 30 नवंबर 2018 को  दोनों ने भाजपा से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। दिलीप राय ने विधायक पद से भी इस्तीफा दे दिया। दिलीप राय ने यह भी कहा है कि वे 2019 आम चुनाव में राउरकेला से प्रतिद्वंदिता नहीं करेंगे।

दिलीप राय ने अध्यक्ष अमित शाह को दिये इस्तीफा में लिखा है कि वे अपने क्षेत्र की जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाने की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे रहे हैं।  इस्तीफे में यह भी लिखा कि एक आत्मसम्मानी नेता के तौर पर ओडिशा की दशकों तक सेवा करने के बाद वे पार्टी में शोपीस के तौर पर बने रहने से इनकार करते हैं।

भाजपा से इस्तीफा देने के बाद उनके वापस बीजद में जाने की जोरदार अटकलें लगनी शुरू हुईं थीं। नवीन पटनायक से उनकी मुलाकात भी हुई थी। पर बात बनी नहीं। कहा जाता है कि दिलीप राय अपने मित्र बिजय महापात्र को भी दल में प्रविष्टि दिलाना चाहते थे जिसके लिये नवीन पटनायक राजी नहीं हुए।

राजनीति में किसी भी तरह की भविष्यवाणी अत्यंत कष्टकर काम है। परंतु राज्य में बीजद से दूरी और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा से झगड़ा मोल लेकर वे किस प्रकार की राजनीति करेंगें यह समझ से परे है। इस समय तो उनकी पहली प्राथमिकता कोयला घोटाले से बेदाग निकालने की होगी उसके बाद ही वे कोई और बात सोच सकेंगे। इसमें कितना वक्त लगेगा यह भी वक्त तय करेगा।

 

भुवनेश्वर से सतीश शर्मा

 

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