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गुप्तचर सेवाओं को सुदृढ़ करने से होगा देश सुरक्षित

गुप्तचर सेवाओं को सुदृढ़ करने से होगा देश सुरक्षित

चीन की कंपनी द्वारा भारत के विशिष्ट व्यक्तियों की जासूसी का मामला जब से प्रकाश में आया है तब से लोगों के मन में कई तरह के सवाल उपजे हैं। दुश्मन देश कितने वर्षों से भारत के लोगों की जानकारी एकत्र कर रहा था। साइबर स्पेस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के द्वारा डाटा चुराने के लिए जब पहले से ही चीन बदनाम है तो उसकी कंपनियों को भारत में खुली छूट क्यों और कब से दी गई? राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री, मुख्यमंत्री, राजनयिक, पत्रकार, उच्च अधिकारी, उद्योगपति सहित अनेक विशिष्ट व्यक्तियों की निजी जानकारी लीक कैसे होती रही? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या हमारी गुप्तचर सेवाएं इतनी कमजोर हैं, कि दूसरे देश की कंपनियां डाटा आसानी से चोरी कर सकती हैं? क्या इस तरह के साइबर अपराध के दोषियों पर नजर रखने और उन्हें पकड़कर और दंडित करने की भारत में सुदृढ़ व्यवस्था है? जब बड़े लोगों की निजी जानकारी चुराई जा सकती है, तो जनसामान्य का डाटा चुराना कितना आसान होगा।

इन दिनों चीनी सैनिकों की सीमा पर घुसपैठ से हमारे जवान सीमा पर चौकसी कर रहे हैं। चीन भारत को कई स्थानों में घेरने में लगा है। अपनी विस्तारवादी नीति के चलते वह भारत की सीमाओं पर अतिक्रमण करने की कोशिश कर रहा है। युद्ध के लिए वह हमें लगातार उकसा रहा है। इसके साथ ही वह दुनिया को दिखाने के लिए कई तरह की सुलह-शांति की बैठकें भी कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ वह सीमाओं पर युद्ध की तैयारियों में लगा है। इन परिस्थितियों को देखते हुए हमें हर समय सचेत रहने की आवश्यकता है।

यह तकनीक का युग है। संभावना है कि अगले युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों के दम पर ही नहीं लड़े जायेंगे, बल्कि इसके लिए कई और तरीके भी प्रयोग किए जा सकते हैं। हमने देखा है कि चीन से निकलकर जब एक छोटा सा वायरस दुनिया को हिलाकर रख सकता है, तो उसके पास और भी कई तरह के वायरस हो सकते हैं। इनका प्रयोग वह दुश्मन देशों के खिलाफ कर सकता है। जैविक हथियारों का संचालन अदृश्य होने के कारण इनका फौरी तौर पर मुकाबला करना कठिन होगा। दूसरा है- रासायनिक हथियारों का प्रयोग। दुनिया में कई स्थानों पर पहले गैस कांड हो चुके हैं। खतरनाक गैसों को प्रवाहित करके दुश्मन देशों के सैनिकों को कमजोर किया जा सकता है। इसी तरह साइबर हमला करके दुश्मन देश को कमजोर किया जा सकता है। इससे वहां के नागरिकों के विचारों को मोड़ा जा सकता है। कई विकसित देश रोबोट सेना का विकास कर रहे हैं। अब युद्धभूमि में रोबोट सैनिक भी लड़ेंगे। वे हथियारों का संचालन भी करेंगे। मानव रहित विमान और ड्रोन से भी युद्ध में हमले होंगे। इस तरह हमें कई स्तर पर तैयारी करना होगी।

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भारत की सेनाएं सीमा पर मुस्तैद हैं। थल, जल और नभ में भारत की सेना मजबूत स्थिति में है। मित्र देशों से आवश्यक हथियार और लड़ाकू विमान भी मंगा लिए गए हैं। इसके बावजूद हमें अपने खुफिया तंत्र को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है। देश में पहले ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं, जिससे हम अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारी गुप्तचर सेवाओं में कहीं ना कहीं कोई कमजोरी है। इसे हमें प्राथमिकता से सुदृढ़ करने की जरूरत है। देश के विभिन्न स्थानों पर पूर्व में कई बार आतंकवादी हमले हो चुके हैं। कश्मीर में सबसे अधिक हमले हुए हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में हिंसक वारदातें होती रही हैं। असम और पश्चिम बंगाल में पिछले कई वर्षों में अवैध रूप से विदेशी नागरिक आकर बसते रहे हैं और हमारे खुफिया तंत्र को वर्षों तक पता ही नहीं चल सका। कई राज्यों में दंगे होना, वर्ग संघर्ष की घटनाएं होना, मॉब लिंचिंग की घटनाएं होना, दिल्ली और अन्य स्थानों पर शाहीन बाग की तर्ज पर कुछ लोगों के द्वारा आंदोलन किए गए और बाद में इसके कार्यकर्ता देश विरोधी नारे लगाते रहे। बाद में इन अराजक तत्वों की मंशा देश के टुकड़े करने की जाहिर होती है। दिल्ली और अलीगढ़ के शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई के स्थान पर देश विरोधी गतिविधियां होने लगती है। वहां का प्रबंधन भी इन गतिविधियों को रोकने में नाकाम रहता है। जब अमरीका के राष्ट्रपति भारत के दौरे पर आते हैं, तभी दिल्ली में दंगे होने लगते हैं। इस दंगे में अनेक लोगों का जानमाल का नुकसान हो जाता है और हमारे खुफिया तंत्र को इस तरह की घटनाओं का पूर्वाभास ही नहीं हो पाता है। जिस तरह से सेटेलाइट के माध्यम से हम मौसम और जलवायु संबंधी जानकारी एकत्र करते हैं, वैसे ही हमें देश के भीतर होने वाली असामाजिक और देश विरोधी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए डिजिटल तकनीक से लैस रहना होगा।

दुनिया में प्राचीन काल से ही गुप्तचर सेवाओं का संचालन होता रहा है। यह सच है कि किसी भी देश या राज्य की सुरक्षा और मजबूती वहां की सेनाओं के साथ-साथ सुदृढ़ गुप्तचर सेवाओं से जानी जाती है। भारत में पहले राजतंत्र था। अलग-अलग रियासतें थी। बाद में बाहरी आक्रांताओं ने इस देश पर कई बार हमले किए और यहां शासन किया। अंग्रेजो ने भी भारत पर हुकूमत की। उस समय शिक्षा और जागरूकता की कमी, सेना की कमी, प्रशिक्षण का अभाव और गुप्तचर सेवाओं की कमजोरी जैसे अनेक कारण रहे होंगे, जिसके चलते इस देश ने दासता का वह दुखद दौर झेला है। आजादी के बाद पाकिस्तान और चीन से भारत के युद्ध हुए। इसमें भारत विजयी तो रहा, परंतु युद्ध के दौरान और बाद में भारत की हजारों एकड़ भूमि दुश्मन देशों ने हथिया ली। इसके पीछे कहीं ना कहीं पूर्ववर्ती सरकारों की अदूदर्शिता और कूटनीति में कमी नजर आती है।

देश की सीमाओं पर हमारे सैनिक पहरा दे रहे हैं। वे देश की रक्षा में रात-दिन मुस्तैद हैं, परंतु हमें देश के भीतर छिपे अज्ञात दुश्मनों पर भी नजर रखनी होगी। आंतरिक सुरक्षा को और अधिक मजबूत बनाना होगा। जब चीन की एक कंपनी झेंहुआ डाटा इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी ने जिस तरह भारत के हजारों विशिष्ट नागरिकों का डाटा चुराया और जासूसी की, क्या पता वैसी ही और भी कई कंपनियां देश में छिपी हो सकती हैं? इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए हमें सचेत रहना होगा। हमें ऐसी डिजिटल तकनीक पर काम करने वाली विदेशी कंपनियों से सावधान रहने की आवश्यकता है। विदेशी संस्थाओं पर भी नजर रखने की जरूरत है, जो देश के भीतर चंद रुपयों का लालच देकर लोगों के विचारों को मोडऩे के कार्यों में लगे हो सकते हैं। तस्करी और आपराधिक गतिविधियों में लगे आसामाजिक लोगों पर भी नजर रखने के लिए हमें सोशल नेटवर्क को मजबूत करना होगा, तभी हमें देश को सुरक्षित रख सकेंगे।

श्रीराम माहेश्वरी

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं)

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